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बुधवार, 21 दिसंबर 2011

जंग-ए-आजादी के नायाब महायोद्धा थे सरदार उधम सिंह


113वीं जयन्ति पर विशेष

जंग-ए-आजादी के नायाब महायोद्धा थे सरदार उधम सिंह

-राजेश कश्यप
शहीद उधम सिंह

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मिटने वालों का, बाकी यहीं निशां होगा।
ये पंक्तियां उन असंख्य जाने-अनजाने शूरवीर देशभक्त शहीदों के प्रति कृतज्ञता व सम्मान की प्रतीक हैं, जिन्होंने, देशी की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया और हंसते-हंसते अपने प्राणों की कुर्बानी तक दे गए। ऐसे ही महान शूरवीर देशभक्त शहीदों में ‘जंग-ए-आजादी’ के महायोद्धा सरदार उधम सिंह का नाम भी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। जब भी देश के अमर क्रांतिकारियों और शहीदों का जिक्र होता है तो उसमें शहीद उधम सिंह का नाम बड़ी शान से लिया जाता है। शहीद उधम सिंह ने आजीवन देश की आजादी के लिए संघर्ष किया और 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड का बदला लेकर हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमा। इस अमर शहीद का जन्म 26 दिसम्बर, 1899 को पंजाब के सुनाम गाँव में सरदार टहल सिंह के घर हुआ था। हालांकि टहल सिंह का शुरूआती नाम चुहड़ सिंह था। लेकिन, अमृत छकने के बाद उनका नाम टहल सिंह पड़ा। उनका पैतृक व्यवसाय खेतीबाड़ी था। लेकिन, उससे परिवार का गुजारा चल नहीं पा रहा था। इसलिए सरदार टहल सिंह ने पड़ौसी गाँव उपाल में रेलवे क्रासिंग पर चौकीदारी की नौकरी करने को मजबूर होना पड़ा। कहने का अभिप्राय सरदार उधम सिंह का जन्म एक अति साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम शेर सिंह था। उनके बड़े भाई का नाम मुक्ता सिंह था।

शहीद उधम सिंह का पैतृक घर 
शहीद उधम सिंह का बचपन भी बड़ा कष्टपूर्ण रहा। जब वे मात्र 12 वर्ष के थे, तो वर्ष 1901 में उनकीं माता जी का स्नेहमयी आंचल छिन गया और कुछ ही समय बाद वर्ष 1907 में उनके सिर से पिता का साया भी हमेशा के लिए उठ गया। अब वे इस दुनिया में एकदम अकेले और अनाथ हो गए। बचपन में ही उनकी दुनिया उजड़ गई थीं। ऐसे में उन्हें भाई किशन सिंह रागी का सहारा मिला और उन्होंने दोनों भाईयों को अमृतसर के खालसा अनाथालय में भर्ती करवा दिया। यहां पर दोनों भाईयों को नए नाम मिले। बालक शेर सिंह को उधम सिंह और मुक्ता सिंह को साधु सिंह नाम मिला। वर्ष 1917 में उनके बड़े भाई का भी निधन हो गया। अब तो अनाथ उधम सिंह पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। अनाथालय में रहते हुए बालक उधम सिंह ने जैसे तैसे वर्ष 1918 में दसवीं की परीक्षा पास की। इससे आगे वे कुछ सोचते, अगले ही वर्ष 1919 में उनके जीवन में एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया।
13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी वाले दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में पंजाब कांगेस के शीर्ष नेता डा. सैफुद्दीन किचलू व सत्यपाल की गिरफ्तारी और रोलट ऐक्ट के विरोध में लगभग 20 हजार लोग इक्कठा हुए, जिससे अंग्रेजी सरकार के माथे पर पसीना आ गया। तभी पंजाब के तत्कालीन गर्वनर माइकल ओ डायर के आदेश पर जनरल हैरी डायर ने बन्दूकों से लैस 90 से अधिक सैनिकों और दो बख्तरबंद गाड़ियों के साथ जलियांवाला बाग में प्रवेश किया और सभा में शांतिपूर्ण ढ़ंग से बैठे लोगों, महिलाओं और मासूम बच्चों पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। जब तक कोई कुछ समझ पाता चारों तरफ लाशों के ढ़ेर, मासूम बच्चों की चित्कार और घायलों की करूणामयी चित्कार का आलम स्थापित हो चुका था। 
अंग्रेजों की इस दमनात्मक कार्यवाही में आधिकारिक तौरपर 379 लोग मारे गए और जलियांवाला बाग में स्थापित सूचना पट्ट के अनुसार 120 लोगों के शव तो कुएं से ही मिले, जोकि जान बचाने के लिए उसमें कूद गए थे। पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार जलियांवाला बाग में कम से कम 1300 लोग शहीद हुए थे। जबकि स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार यह आंकड़ा 1500 को पार कर गया था। इसी घटना के सन्दर्भ में अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डाक्टर स्मिथ के अनुसार इस हत्याकाण्ड में मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी। कुल मिलाकर हजारों निर्दोष लोगों, महिलाओं और मासूम बच्चों को जनरल डायर ने देखते ही देखते मौत की नींद सुला दिया।
जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। क्रांतिकारियों के खून में आग लग गई। आक्रोश की ज्वाला हर देशवासी के दिल में धधक उठी। यह हत्याकाण्ड उधम सिंह ने अपनी आंखों से देखा। उस समय वे इक्कठा हुई भीड़ को अनाथालय के साथियों के साथ पानी पिलाने का काम कर रहे थे। यह हत्याकाण्ड देखकर नवयुवक उधम सिंह का खून भी खौल उठा। उन्होंने उसी समय जलियांवाला बाग की मिट्टी उठाई और अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में ले जाकर शपथ ली, कि जब तक इस नरसंहार के असली गुनहगार को मौत को भी मौत की नींद नहीं सुला दूंगा, तब तक चैन से नहीं बैठूंगा।
उधम सिंह ने इस हत्याकाण्ड का असली गुनहगार पंजाब के तत्कालीन गर्वनर माइकल ओ डायर को माना, क्योंकि उसी के आदेश पर यह जनसंहार हुआ था। अब उधम सिंह का जनरल डायर को मौत की नींद सुलाने का प्रमुख मिशन बन गया था। अपने इस मिशन को पूरा करने के लिए उधम सिंह अनाथालय को छोड़कर स्वतंत्रता आन्दोलन के समर में कूद पड़े। उन्होंने देश के क्रांतिकारियों से सम्पर्क साधना शुरू कर दिया। वर्ष 1920 में वे अफ्रीका जा पहुंचे। वर्ष 1921 में नैरोबी के रास्ते संयुक्त राज्य अमेरिका जाने का भरसक प्रयत्न किया, लेकिन वीजा न मिलने के कारण कामयाबी हाथ नहीं लगी और उन्हें स्वदेश लौटना पड़ा। लेकिन, निरन्तर प्रयासों के बाद अंतत: वे वर्ष 1924 में अमेरिका पहुंचने में कामयाब हो गए। वे अमेरिका में सक्रिय गदर पार्टी में शामिल हो गए और क्रांतिकारियों से सम्पर्क मजबूत बनाते चले गए। उन्होंने फ़्रांस, इटली, जर्मनी, रूस आदि कई देशों की यात्राएं करके क्रांतिकारियों से मजबूत संबंध बनाए। वे वर्ष 1927 में पुन: स्वदेश लौटे। यहां पर उन्होंने शहीदे आजम भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों से मुलाकात की। स्वदेश लौटने के मात्र तीन माह बाद ही वे अवैध हथियारों और प्रतिबन्धित क्रांतिकारी साहित्य के साथ पुलिस की गिरफ्त में आ गए। उन्हें 5 वर्ष की कठोर कैद की सजा हुई। 
वर्ष 1931 में उधम सिंह जेल से रिहा हुए। रिहा होने के उपरांत उधम सिंह अपने गाँव सुनाम में लौट आए। गाँव में आने के बाद थाने में प्रतिदिन हाजिरी देने के नाम पर उन्हें कई तरह की प्रताड़ओं को झेलना पड़ा। पुलिस उन पर कड़ी नजर रख रही थी। इससे बचने के लिए वे अमृतसर में आ गए और अपना नाम बदलकर मोहमद सिंह आजाद रख लिया। यहां पर उन्होंने साईन बोर्ड पेंट करने की दुकान खोल ली। उधम सिंह वर्ष 1933 में पुलिस को चकमा देने में कामयाब हो गए और कश्मीर जा पहुंचे। इसके बाद वे जर्मनी होते हुए इटली जा पहुंचे। इटली में कुछ माह के बाद फ़्रांस, स्विटजरलैण्ड और आस्ट्रिया होते हुए वर्ष 1934 में अपने मिशन को पूरा करने के लिए इंग्लैण्ड पहुंचने में कामयाब हो गए।
वर्ष 1938 में लन्दन के शेफ़र्ड बुश गुरुद्वारा में लंगर सेवा के दौरान रोटी बनाते शहीद उधम सिंह
इंग्लैण्ड पहुचंकर उधम सिंह पूर्वी लन्दन की एडरल स्ट्रीट में एक किराए का मकान लेकर रहने लगे। यहां रहकर उन्होंने जनरल डायर को मारने की अचूक तैयारियां शुरू कर दीं और मौके की तलाश करने लगे। उनकीं यह तलाश वर्ष 1940 में जाकर पूरी हुई। जब उधम सिंह को पता चला कि 13 मार्च, 1940 को लन्दन के कैक्सटन हॉल में ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन और रायल सेन्ट्रल एशियन सोसायटी का संयुक्त अधिवेशन होने जा रहा है और उसमें जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड के वास्तविक गुनहगार माइकल ओ डायर बतौर वक्ता आमंत्रित हैं तो मौके की बाट जोह रहे उधम सिंह एकदम जोश से भर उठे। उधम सिंह ने गोलियों से भरा पिस्तोल लिया और एक मोटी पुस्तक के अन्दर उसकी आकृति के अनुसार पृष्ठ काट डाले। फिर वे पुस्तक के अन्दर इस पिस्तोल को छुपाकर समय से पहले ही पूरी तैयारी के साथ अधिवेशन स्थल की दर्शक दीर्घा में जा बैठे।
अधिवेशन में जैसे ही माइकल ओ डायर ने मंच पर आकर अपना वकतव्य देना शुरू किया, 21 सालों से सीने में प्रतिशोध की धधकती ज्वाला को दबाए बैठे उधम सिंह ने तुरन्त पुस्तक से अपना पिस्तोल निकाला और देखते ही देखते अन्धाधुन्ध छह राउण्ड गोलियां दाग दीं। उधम सिंह के इस अचूक हमले से हर कोई सन्न और स्तब्ध रह गया। अगले ही पल मंच का नजारा बदल चुका था। दो गलियां जलियांवाला बाग के हजारों लोगों के हत्यारे जनरल माइकल ओ डायर का सीना छलनी करके मौत की नींद सुला चुकीं थीं। मंच पर सर लुईस और लार्ड लेंमिगटन के अलावा जेटलेंड भी गोलियां लगने से घायलावस्था में चीख रहे थे और सभा में भयंकर भगदड़ मची हुई थी। लेकिन, भारत माता का वीर सपूत उधम सिंह गर्व और शौर्य भरा सीना ताने विजयी भाव से भरा निडरता के साथ खड़ा था। उन्होने वहां से भागने की तनिक भी कोशिश नहीं की।
महान क्रांतिकारी और देशभक्त उधम सिंह को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। 1 अप्रैल, 1940 को उन पर औपचारिक रूप से हत्या का मुकदमा शुरू किया गया। इसी बीच उधम सिंह ने जेल में भूख हड़ताल शुरू कर दी। उन्होंने 42 दिन तक भूख हड़ताल जारी रखी। उन्हें जबरदस्ती तरल पदार्थ दिया गया। अंतत: ब्रिटिश जज एटकिंसन ने त्वरित अदालती कार्यवाही करते हुए भारत माता के वीर सपूत उधम सिंह को सजा-ए-मौत का फरमान जारी कर दिया। इस सजा को सुनकर वीर क्रांतिकारी उधम सिंह को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। उन्होंने अपने अंतिम उद्गार प्रकट करते हुए कहा-"मैं परवाह नहीं करता, मर जाना कोई बुरी बात नहीं है। क्या फायदा है, यदि मौत का इंतजार करते हुए हम बूढ़े हो जाएं? ऐसा करना कोई अच्छी बात नहीं है। यदि हम मरना चाहते हैं तो युवावस्था में मरें। यही अच्छा है और यही मैं कर रहा हूँ। मैं अपने देश के लिए मर रहा हूँ।" अपने इन अमूल्य उद्गारों के साथ भारत माँ का यह नायाब योद्धा 31 जुलाई, 1940 को लन्दन की पेंटविले जेल में हंसता-हंसता फांसी के फंदे पर झूल गया। इस महान शहीद को इसी जेल के अहाते में दफना दिया गया।
भारत माँ के इस अनूठे लाल की शहादत को देशभर में सलामी दी गई। नेता जी सुभाषचन्द्र बोस सरीखे महान क्रांतिकारियों ने शहीद उधम सिंह के अमूल्य बलिदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। सत्तर के दशक में शहीद उधम सिंह के अवशेषों को लाने की कवायद शुरू की गई। पंजाब के सुल्तानपुर लोधी के विधायक सरदार साधु सिंह थिण्ड के अथक प्रयासों और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी की विशेष रूचि के बाद इंग्लैण्ड ने शहीद उधम सिंह के अवशेष देना स्वीकार किया। भारत सरकार के विशेष दूत के रूप में सरदार साधु सिंह थिण्ड जुलाई, 1974 में लन्दन पहुंचे और इंग्लैण्ड सरकार से शहीद उधम सिंह के अवशेष प्राप्त करके स्वदेश लौटे। जंग-ए-आजादी के इस पराक्रमी महायोद्धा उधम सिंह की अस्थियों के स्वागत के लिए हवाई अड्डे पर तत्कालीन कांगे्रस अध्यक्ष शंकर दयाल शर्मा, पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह सहित देश की कई नामी हस्तियां मौजूद थीं। शहीद उधम सिंह का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गाँव सुनाम (पंजाब) में किया गया और उनकीं अस्थियों को पूरे राजकीय सम्मान के साथ सतलुज में प्रवाहित किया गया।
जब जंग-ए-आजादी के नायाब और पराक्रमी क्रांतिकारी उधम सिंह की वीरता को स्मरण किया जाता है तो गर्व से सीना तन जाता है और जब आजादी के चौंसठ सालों के बाद उनके वारिसों की एकदम दयनीय हालत को देखा जाता है तो सिर शर्म के मारे झुक जाता है। दरअसल, आज इन्हीं महान शहीद उधम सिंह के वंशज सरदार जीत सिंह (पौत्र) ईंटे ढ़ोकर, पत्थर तोड़कर और मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का गुजारा करने को मजबूर हैं। बेरोजगारी, बेकारी, गरीबी, बेबसी और बेकद्री के चलते पूरा परिवार अभिशप्त जीवन जीने को विवश है। गरीबी की इंतहा के चलते शहीद उधम सिंह के प्रपौत्र जग्गा सिंह को 11वीं कक्षा पास करने के उपरांत पढ़ाई अधूरी छोड़कर मेहनत मजदूरी करने को विवश होना पड़ा।
मजदूरी करते एवं ईंटे तोड़ते शहीद उधम सिंह के पौत्र जीत सिंह
गत जुलाई माह में राज्यसभा सांसद डा. राम प्रकाश के प्रयासों के बाद हरियाणा के कुरूक्षेत्र जिले में पिपली स्थित पैरीकीट में आयोजित एक सम्मान-समारोह में पहुंचे शहीद उधम सिंह के पौत्र सरदार जीत सिंह और प्रपौत्र जग्गा सिंह की अत्यन्त दयनीय हालत देखकर और मार्मिक उद्गार सुनकर हर किसी का कलेजा मुंह को आ गया और सिर शर्म से झुक गया। शहीद का पौत्र सरदार जीत सिंह समारोह में हल्के रंग का कुर्ता-पायजामा पहने, कुर्ते पर अलग-अलग रंग के बटन लगाए, पैरों में 15-20 रूपये की प्लास्टिक की टूटी चप्पलें पहनें और बेबसी व कांतिहीन चेहरे के साथ आजादी के गीतों पर झूमने वाले हर निवासी को हकीकत का बोध करवा रहा था। जब उनसे अपने दादा के बारे में कुछ बोलने के लिए अनुरोध किया गया तो वे बस यही बोल पाए-"मैं कि बोलना, बोले तो उधम सिंह थे।" शिक्षा के बारे में पूछने पर वे इतना ही बोले कि, "मजदूरी करो और पेट भरो की जुगत में पढ़ाई-लिखाई के बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिला।"
मजदूरी करते एवं ईंटे ढोते शहीद उधम सिंह के पौत्र जीत सिंह 
शहीद उधम सिंह की चौथी पीढ़ी के वंशज जग्गा सिंह के उद्गार तो हर देशवासी को झिंझोड़कर रख देने वाले थे। शहीद के प्रपौत्र जग्गा सिंह का दर्द एकाएक छलक पड़ा और वे यही बोल पाए कि, "गरीबी के कारण ही उसे बीच में पढ़ाई छोड़नी पड़ी है। बड़ा दु:ख होता है कि देश को आजाद कराने के लिए फांसी पर चढ़ने वालों के वंशजों की इस आजाद देश में बेकद्री हो रही है।"
शहीद उधम सिंह के भांजे इंदर सिंह व खुशी नंद के अनुसार परिजनों ने पंजाब के मुख्यमंत्री से पत्र के जरिए गुहार लगाई है कि अमर शहीद उधम सिंह के पैतृक मकान के एक बड़े हिस्से पर पड़ौसियों ने अवैध कब्जा किया हुआ है। लेकिन, सरकार कोई रूचि नहीं ले रही है। एक अन्य जानकारी के अनुसार इससे पहले शहीद के परिवार को पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने शहीद के परिवार को एक सरकारी नौकरी देने का वायदा भी किया था, जोकि सिर्फ वायदा ही बनकर रह गया।
कुल मिलाकर जंग-ए-आजादी के नायाब योद्धा शहीद उधम सिंह को उनकीं 113वीं जयन्ति पर स्मरण करके सीना चौड़ा करने और शाब्दिक गौरवगान करते समय हमें उनके वंशजों की हालत और अपने परम-कत्र्तव्यबोध का भी स्मरण करना चाहिए। हर शहीद की जयन्ति और पुण्यतिथि को मनाते समय इस परंपरा का निर्वहन करना होगा। तभी हम अपने शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि और सच्चे अर्थों में अपनी कृतज्ञता का निर्वहन कर पाएंगे। महान क्रांतिकारी और अमर शहीद सरदार उधम सिंह को कोटि-कोटि नमन। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

देहात के देवता थे चौधरी रणबीर सिंह



26 नवम्बर / जन्म दिवस विशेष

देहात के देवता थे चौधरी रणबीर सिंह
-राजेश कश्यप


चौधरी रणबीर सिंह सच्चे गाँधीवादी, महान् स्वतंत्रता सेनानी, कट्टर आर्यसमाजी, प्रखर वक्ता, प्रबुद्ध नेता, संविधान निर्मात्री सभा के विद्वत सदस्य और कर्मठ धरतीपुत्र थे। वे देश की एक गौरवमयी शख्सियत थे। उनका पूरा जीवन राष्ट्र-निर्माण, समाज-उत्थान एवं मानव-कल्याण के प्रति समर्पित रहा। उन्होंने जीवनपर्यन्त देहात के लोगों की सेवा की और उनके सुख-दु:ख बांटे। ‘देहात का दर्द’ समझने, जीने, बांटने और उन्हें दूर करने में अनूठी भूमिका निभाने के कारण देहात में उनकी छवि ‘देहाती’ देवता बनकर उभरी। संसद में भी उनकी सर्वमान्य छवि ‘देहात प्रतिनिधि’ की रही। जब भी संसद में देहात का विषय आता था, सबकी नजरें स्वत: चौधरी रणबीर सिंह की तरफ उठनें लगतीं थीं। क्योंकि देहात से जूड़े हर मुद्दे को चौधरी साहब बड़ी संजीदगी से लेते थे और देहात के दर्द से अवगत करवाने के लिए हमेशा बैचेन रहते थे।

पिता चौधरी मातु राम 


माता श्रीमती मामकौर 

इस ‘देहाती देवता’ चौधरी रणबीर सिंह का जन्म २६ नवम्बर, १९१४ को रोहतक (हरियाणा) के सांघी गाँव में महान् आर्यसमाजी एवं दे’ाभक्त चौधरी मातूराम के घर, सुघड़ एवं सुशील गृहणी श्रीमती मामकौर की कोख से तीसरी संतान के रूप में हुआ था। राष्ट्रपे्रम, राष्ट्रभक्ति, स्वदेश, स्वराज आदि भावनाओं को विरासत में हासिल करने वाले रणबीर सिंह की शिक्षा-दीक्षा भी आर्य समाज की विचारधारा एवं देशभक्ति के वातावरण में पूर्ण हुई। वे मात्र १५ वर्ष की आयु में अपने बड़े भाई के साथ १९२९ के लाहौर अधिवेशन में भी जा पहुंचे थे। उन्होंने वर्ष १९३३ में वै’य हाईस्कूल से दसवीं और वर्ष १९३७ में दिल्ली के रामजस कॉलेज से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इस समय उनके सामने उनके कैरियर का यक्ष प्रश्न खड़ा था। काफी आत्म-मन्थन के उपरांत उनके पैतृक संस्कारों ने जोर मारा और उन्होंने झट से निर्णय ले लिया कि ‘पहले आजादी, बाकी सब बाद में।’ 

सांघी गाँव की वो पैतृक हवेली जहाँ चौधरी रणबीर सिंह का जन्म हुआ 

चौधरी रणबीर सिंह ने १९४० के दशक से ही राष्ट्रीय आन्दोलनों में अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज करवा दी थी। इससे पूर्व वर्ष १९३७ में वे डूमर खां (जीन्द) के एक सम्भ्रान्त परिवार की सुशील कन्या सुश्री हरदेई के साथ विवाह बन्धन में बंध चुके थे। इसके बावजूद वे स्वतंत्रता आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी करते थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान चौधरी रणबीर सिंह पहली बार ५ अपै्रल, १९४१ को जेल क्या गए कि उनके जेल जाने व जेल से छूटने का ही सिलसिला चल निकला। इसी दौरान उन्हें १४ जुलाई, १९४२ को पितृ शोक का भी सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होने कभी भी अपने कदम पीछे नहीं हटाए। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा गोली मारने के आदेश को न केवल नजरअन्दाज किया, बल्कि आसौदा की हवाई पट्टी उखाड़कर उन्होंने अपने तेवर और भी तीखे कर लिए थे। 

१९५२ का चुनाव जीतने के बाद अपनों के साथ 

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होने ‘हिन्दी-हरियाणा’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र भी निकाला। चौधरी रणबीर सिंह पूरे देश को अपना परिवार मानते थे। उन्होंने वतन की आजादी के लिए अपनी सुध-बुध यहां तक भूला दी थी कि उनके अपने, सगे-सम्बंधी तक भी नहीं पहचान पाए। एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्हांेने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान रोहतक, हिसार, अम्बाला, फिरोजपुर, मुल्तान, स्यालकोट तथा केन्द्रीय व बोस्र्टल जेल लाहौर सहित आठ जेलों की यात्राएं करते हुए कुल साढ़े तीन वर्ष की कठोर कैद और दो वर्ष की नजरबन्दी की सजा झेली।

प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ 

चौधरी रणबीर सिंह ने न केवल स्वतंत्रता प्राप्ति में अपना अनूठा व अमूल्य योगदान दिया, बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भी राष्ट्र के निर्माण एवं उत्थान में अपना विशिष्ट योगदान दिया। सन् १९४७ में देश विभाजन के उपरांत देशभर में भड़के साम्प्रदायिक दंगों को रोकने, सामाजिक सौहार्द पैदा करने, मुसलमानों के पलायन को रोकने, विस्थापित परिवारों को पुन: बसाने में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाकर अपने ‘मानव-मसीहा’ होने की स्पष्ट झलक दिखला दी थी। इन दंगों के दौरान उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की रोहतक व मेवात के घासेड़ा जैसे संवेदनशील गाँवों की यात्रा भी करवाई, और चहुं ओर अमन, चैन व सौहार्द स्थापित करने में सफलता हासिल की।

प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को भाखड़ा बाँध का निरिक्षण करवाते हुए 

राष्ट्र के प्रति अटूट, अनुपम, अनूठी, अनुकरणीय सेवाओं, त्याग एवं बलिदानों को देखते हुए चौधरी रणबीर सिंह को १० जुलाई, १९४७ को संयुक्त पंजाब (हरियाणा सहित) भारत की संविधान सभा के सदस्य के तौरपर चुना गया और १४ जुलाई को उन्होंने शपथ ग्रहण की। इसके बाद चौधरी रणबीर सिंह के हर कदम और हर शब्द में मानवीयता की अमिट छाप देखने को मिली, जिनके चलते उन्हें ‘मानव-मसीहा’ कहना, सहज दिखाई देता है। संविधान सभा में उन्होंने देहात (गाँवों) में रहने वाले लोगों के पैरवीकार की पहचान बनाई। उन्होंने ६ नवम्बर, १९४८ को अपने पहले ही भाषण में  स्पष्ट कर दिया था, कि "मैं एक देहाती हूँ, किसान के घर पला हूँ और परवरिश पाया हूँ। कुदरती तौरपर उसका संस्कार मेरे Åपर है। उसका मोह और उसकी सारी समस्याएं आज मेरे दिमाग में हैं।"
चौधरी रणबीर सिंह ने संविधान निर्माण के दौरान वर्ग विहिन समाज के निर्माण, सरकार में शक्ति के विकेन्द्रीयकरण, सिंचाई व बिजली उत्पादन की कारगर योजनाओं के निर्माण, पशु-नस्ल सुधार, गो-वध पर पूर्ण प्रतिबन्ध, हर व्यक्ति के लिए रोटी-कपड़ा और मकान की व्यवस्था करने, आयकर की तर्ज पर कृषि पर ‘कर’ निर्धारण, छोटी जोतों को ‘कर-मुक्त’ करने, फसलों का बीमा करवाने, शहरी ’िाक्षा व्यवस्था के तुलनात्मक देहात शिक्षा पर जोर देने, लोकसेवा आयोग में ग्रामीण बच्चों को कुछ ढ़ील देने जैसे अनेक ऐतिहासिक मसौदे पेश किए। 
चौधरी रणबीर सिंह एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने लोकतंत्र के इतिहास में सर्वाधिक सात अलग-अलग सदनों के सदस्य रहे। वे १९४७ से १९५० तक संविधान सभा (विधायी) के सदस्य, १९५० से १९५२ तक अस्थाई लोकसभा के सदस्य, १९५२ से १९६२ तक पहली तथा दूसरी लोकसभा के सदस्य, १९६२ से १९६६ तक संयुक्त पंजाब विधानसभा के सदस्य, १९६६ से १९६७ तक और १९६८ से १९७२ तक हरियाणा विधानसभा के सदस्य और १९७२ से १९७८ तक राज्य सभा के सदस्य के रूप में चुने गए। वे जिस भी पद पर रहे, उन्होंने हमेशा गरीबों, किसानों, मजदूरों, दलितों, पिछड़ों, असहायों, पीड़ितों आदि के कल्याण पर जोर दिया। उन्होने ‘गाँवों में खुशहाली और किसानों के चेहरे पर लाली’ लाने के लिए अनेक प्रयत्न किए। रोहतक-गोहाना रेलमार्ग, खरखौदा का सुभाष हाई स्कूल, बसन्तपुर, बहुजमालपुर प्राथमिक स्कूल, गाँधी स्मारक गौरड़ आदि सब चौधरी रणबीर सिंह की ही महत्वपूर्ण देनों में से हैं। उन्होने गांव पोलंगी तथा बिधलान में प्राइमरी स्कूलों के निर्माण में भी बड़ी उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उन्होने अपने अनूठे सद्प्रयासों के द्वारा रोहतक मैडीकल कॉलेज (अब डीम युनिवर्सिटी) जैसी अनुपम सौंगातें भी हरियाणा प्रदेश को दीं।

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी के साथ 

चौधरी रणबीर सिंह ने हरियाणा प्रदेश के नव-निर्माण एवं उसके उत्थान में बड़ा ही उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होने १८ नवम्बर, १९४८ को संविधान सभा में अपने संबोधन के दौरान हरियाणा प्रान्त के निर्माण का मुद्दा बड़े जोर-’ाोर से उठाया। जब वे १९६२ में कलानौर से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे तो उन्हें पंजाब मंत्रीमण्डल में बिजली व सिंचाई मंत्री बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होने भाखड़ा बांध के निर्माण को पूरा करवाया, जिसे प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने २२ अक्तूबर, १९६३ को राष्ट्र को समर्पित किया। उन्होंने पांेग बांध एवं ब्यास-सतलुज लिंक निर्माण के कार्य को भी शुरू करवाया, जिससे भाखड़ा से ब्यास का पानी मिलने में मदद मिली। इसी दौरान उन्होने पंजाब व उत्तर प्रदे’ा के बीच हुए यमुना जल के बंटवारे के समझौते में बड़ी दूरददर्शिता का परिचय देते हुए हरियाणा के हितों की रक्षा की। चौधरी रणबीर सिंह ने कि’ााÅ और रेणुका बांध योजनाओं की रूपरेखा भी तैयार की, जिसकी स्वीकृति हाल ही में भारत सरकार ने दे दी है। इसके अलावा गुड़गांव नहर योजना भी उन्ही के कार्यकाल के दौरान मंजूर हुई थी। चौधरी रणबीर सिंह की अटूट मेहनत एवं सच्ची लगन की बदौलत ही पंजाब एवं हरियाणा में हरित क्रांति सफल हो पाई थी। लुधियाना में कृषि वि’वविद्यालय की स्थापना में भी उन्होने प्र’ांसनीय योगदान दिया। जब वे हरियाणा के पहले मंत्रीमण्डल में काबीना मंत्री बने, तब उन्होंने  हरियाणा की प्रगति एवं समृद्धि मंे उल्लेखनीय भूमिका अदा की।
चौधरी रणबीर सिंह ने स्वतंत्रता सेनानियों के लिए वर्ष १९७२ में पें’ान मंजूर करवाई, जिसे १९८० में इस पें’ान योजना को ‘स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पें’ान’ का नया रूप दिया गया। बाद में उन्हीं के सद्प्रयासों से इस पें’ान की रा’िा में बढ़ौतरी हुईं। चौधरी रणबीर सिंह अखिल भारतीय कांगे्रस कमेटी की कार्यकारिणी के सदस्य व कांग्रेस संसदीय दल (राज्यसभा) के उपनेता भी चुने गए। उनकी ईमानदारी, निष्पक्षता, उदारता एवं कर्मठता को देखते हुए वर्ष १९७७ से १९८० तक हरियाणा प्रदे’ा कांग्रेस के अध्यक्ष पद की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी सौंपी गई।

जन समारोह को संबोधित करते हुए चौधरी रणबीर सिंह 

चौधरी रणबीर सिंह ने ६५ वर्ष की आयु में सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया, और समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय हो गए। वे हरियाणा सेवक संघ, पिछड़ा वर्ग संघ, भारत कृषक समाज, किसान सभा, हरियाणा विद्या प्रचारिणी सभा आदि सामाजिक संगठनों से जुड़े। उनकी रहनुमाई में स्वतंत्रता सेनानियों के कल्याणार्थ अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संगठन और अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी संगठन गठित हुए। राष्ट्र के प्रति उनकी अनमोल देनों को देखते हुए कुरूक्षेत्र वि’वविद्यालय कुरूक्षेत्र ने उन्हें वर्ष २००७ में डी.लिट की उपाधि से विभूषित किया। इसके साथ ही भारत सरकार ने चौधरी रणबीर सिंह की स्मृति में १ फरवरी, २०११ को पाँच रूपये का डाक टिकट भी जारी किया। 
१ फरवरी, २००९ को यह देहाती देवता अपनी सांसारिक यात्रा पूरी करके हमेशा के लिए परमपिता परमात्मा के पावन चरणों में जा विराजे। स्वर्गीय चौधरी रणबीर सिंह दिखावे से लाखों कोस दूर थे। उन्होने जीवन में कभी भी अपनी उपलब्धियों अथवा कार्यों का बखान व प्रचार-प्रसार नहीं करवाया और न ही स्वयं किया। उन्हांेने जीवन-पर्यन्त गरीबों, किसानों, मजदूरों, वृद्धों, महिलाओं आदि समाज के हर वर्ग के कल्याण के लिए अनेक कल्याणकारी कार्य किए। पूरा देश उनके सिद्धान्तों, अनूठे कार्यों, महत्वपूर्ण देनों और दूरदर्शी विचारों का कायल रहा और हमेशा रहेगा। 

संसद में देहात का प्रखर प्रतिनिधित्व किया

चौधरी रणबीर सिंह संविधान निर्मात्री सभा में सबसे कम उम्र के प्रतिनिधि थे। उस समय कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि यह नौजवान संविधान सभा में बड़े-बड़े प्रखर वक्ताओं, विद्वानों और विचारकों के सामने इतनी बड़ी रचनात्मक भूमिका भी निभा पाएगा। लेकिन, चौधरी रणबीर सिंह न केवल देहात के दर्द से अच्छी तरह परिचित थे, बल्कि, उनके खून में भी देहाती संस्कार समाहित थे। उन्होंने संविधान निर्मात्री सभा में ६ नवम्बर, १९४८ को अपने प्रथम भाषण में ही अपने तेवर दिखाते हुए कहा था, "मैं एक देहाती हूँ, किसान के घर पला हूँ और परवरिश पाया हूँ। कुदरती तौर पर उसका संस्कार मेरे ऊपर है और उसका मोह उसकी सारी समस्याएं आज मेरे दिमाग में हैं।"

प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यालय में प्रतिनिधि मंडल के साथ 

चौधरी रणबीर सिंह ने संविधान निर्मात्री सभा से लेकर, अस्थायी लोकसभा, संविधान सभा (विधायी), पहली तथा दूसरी लोकसभा, संयुक्त पंजाब विधानसभा और हरियाणा विधानसभा तक गरीबों, मजदूरों, किसानों, पिछड़ों, हरिजनों, स्वतंत्रता सेनानियों आदि हर वर्ग की समस्याओं को पटल पर रखा और उनके निवारण में  अहम् भूमिका निभाई। चौधरी रणबीर सिंह के अन्दर देहात के किसान व मजदूर का कितना दर्द समाया हुआ था, इसकी मिसाल के तौर पर भारत की अस्थायी लोकसभा में उनकी कुछ प्रमुख अभिव्यक्तियां इस प्रकार थीं :

-"सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के साधन इस्तेमाल करना छोड़ें और सही मायने में देश की उन्नति करें और काश्तकार को ऊंचा उठाएं व उसकी मार्फत देश को खुशहाल बनायें।" (अस्थायी लोकसभा, २१ नवम्बर, १९५०)

"देश में कृषि शोध संस्थानों का तब तक कोई फायदा नहीं है, जब तक उनके द्वारा किए गए शोधों को खेत में न पहुँचाया जाए।"
(भारत की अस्थायी लोकसभा में २७ मार्च, १९५०)

"संसद सदस्यों की योग्यता यदि यह निर्धारित कर दी जाए कि जो कोई जब तक कम से कम पाँच या सात या दस एकड़ नई जमीन को आबाद न करे, उसको काश्त में न लाए, वह संसद सदस्य नहीं बन सकता, तो देश का भी भला होगा और कम से कम आज की देश की जो आर्थिक हालत है, उससे देश आजाद हो जाएगा।"
( अस्थायी लोकसभा, २३ नवम्बर, १९५०)

"हम अपने देश की आर्थिक स्थिति को तब तक नहीं सुधार सकते, जब तक कि हम अपने खेतों की पैदावार को न बढ़ायें।"
( अस्थायी लोकसभा, १८ दिसम्बर, १९५०)

"चुनावों पर आप जितना खर्चा बढ़ाएंगे, उतने ही गरीबों के अधिकार कम हो जाएंगे।"
( अस्थायी लोकसभा, २२ दिसम्बर, १९५०)

"जितना हमारे देश को काला बाजारी करने वालों से खतरा है, उतना शायद देश में किसी दूसरे आदमी से खतरा नहीं है। "
( अस्थायी लोकसभा, १५ फरवरी, १९५१)

"देश के अन्दर जो हमारी आर्थिक दशा है, उसमें तब तक कोई सुधार नहीं हो सकता, जब हमारे देश की सारी खेती की पैदावार को न बढ़ाया जाए। "
(अस्थायी लोकसभा, २३ फरवरी, १९५१)

"खेती की पैदावार बढ़ाना, आज केवल कृषक के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि, इस सारे देश के लिए, सारे लोगों के लिए, चाहे वे खेत में काम करने वाले हों या खेत के मालिक हों या शहर के रहने वाले हों, उन सबके लिए जरूरी हो गया है। "
( अस्थायी लोकसभा, २३ फरवरी, १९५१)

"वैसे तो जहां तक संभव हो सके, उस कृषि भूमि (उपजाÅ) को छोड़ दें, क्योंकि वहां काफी अन्न पैदा होता है और उसके बदले जहां तक हो सके कृषि बंजर भूमि में से जमीन लें और उपजाÅ जमीन को छोड़ दें। कृषि बंजर भूमि पर जो सरकारी चीज बनाना हो, वहां बनाएं। लेकिन, किसी जरूरत के आधार पर वह समझें कि उस उपजाऊ कृषि भूमि को नहीं छोड़ सकते, तभी वह ऐसी जमीन पर हाथ रखें या डालें, अन्यथा, नहीं। लेकिन, उसी के साथ-साथ जैसा कि भूमि-अर्जन कानून में दर्ज है, बहुत मामूली सा मुआवजा देकर काश्तकार से अपना पल्ला छुड़ाना कोई अच्छी नीति नहीं है, उनको जब तक वह कोई रोजगार न दे, उस वक्त तक मेरी समझ में सरकार का कोई हक नहीं रहता कि उनको विस्थापित कर दे।"
( अस्थायी लोकसभा, १५ मार्च, १९५१)

"कपास को पैदा करने वाला, जो देहात के अन्दर बैठा है, उसकी तकलीफ आपको मालूम नहीं है। "
(अस्थायी लोकसभा, २ अपै्रल, १९५१)

"देश के अन्दर आज अनाज ज्यादा पैदा करने का काम उन आदमियों के जिम्मे होता है, जो यह नहीं जानते कि गेहूँ का पौधा कितना बड़ा होता है और चने का पौधा कितना बड़ा होता है।"
( अस्थायी लोकसभा, ७ अप्रेल, १९५१)

"मुझे इस बात का बहुत अफसोस है कि यहां उन लोगों की बात सुनी जाती है, जिसे स्वयं खेती का कोई ज्ञान नहीं है और इसका नतीजा यह होने वाला है कि देश की जो नीति बनेगी, वह देश की भलाई के लिए न होगी, बल्कि, देश के नुकसान के लिए होगी।"
(अस्थायी लोकसभा, ७ अपै्रल, १९५१)

"इस देश के अन्दर सबसे कम जिनकी आमदनी है, वह लोग देहात के हरिजन और देहात में खेतों के मजदूर हैं।"
( अस्थायी लोकसभा, १४ अपै्रल, १९५१)

"यह देश गरीबों का देश है और इसके अन्दर बड़ी-बड़ी तनख्वाहों वाले और इतने Åँचे काडर वाले लोग बहुत हद तक रखना देश के लिए फायदेमन्द नहीं होगा।"
( अस्थायी लोकसभा, १५ अक्तूबर, १९५१)

"जब तक खेत की पैदावार देश में नहीं बढ़ेगी, उस वक्त तक देश की आर्थिक अवस्था नहीं सुधर सकती।"
( अस्थायी लोकसभा, १६ अक्तूबर, १९५१)

"हिन्दूस्तान की तरक्की के लिए अगर कोई क्रांति आने वाली है तो वह देहात से आने वाली है।"
(अस्थायी लोकसभा, ५ मार्च, १९५१)


स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल यात्राएं

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी के रूप में चौधरी रणबीर सिंह कई बार जेल गए।

वर्ष                   विवरण
१९४१ (५ अप्रेल) : पहली बार जेल गए(व्यक्तिगत सत्याग्रह)
१९४१(२४-२५ मई) : जेल से रिहा हुए।
१९४१                 : दूसरी बार जेल गए।
१९४१ (२४ दिसम्बर) : जेल से रिहा हुए।
१९४२ (२४ सितम्बर) : तीसरी बार जेल (भारत छोड़ो आन्दोलन)
१९४३ (२५ अप्रैल) : मुल्तान से लाहौर जेल में भेजे गए।
१९४४ (२४ जुलाई) : जेल से रिहा।
१९४४ (२८ सितम्बर) : चौथी बार जेल (नजरबन्दी उल्लंघन)
१९४४ (७ अक्तूबर) : रोहतक जेल से अम्बाला जेल भेजे।
१९४५ (१४ फरवरी) : जेल से रिहा हुए।
१९४५                 : पुन: गिरफ्तार करके जेल भेजे।
१९४५ (१८ दिसम्बर) : जेल से रिहा हुए।

कुल मिलाकर चौधरी रणबीर सिंह ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान रोहतक, हिसार, अम्बाला, फिरोजपुर, मुल्तान, स्यालकोट तथा केन्द्रीय व बोस्र्टल जेल लाहौर सहित आठ जेलों की यात्राएं करते हुए कुल साढ़े तीन वर्ष  की कठोर कैद की सजा झेली।

नजरबंदी  की सजा

चौधरी रणबीर सिंह ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान धारा १२९ डी.आई.आर. के तहत नज+रबन्दी की सजा को भी झेला।  झज्जर के चुनावों में नज+रबन्दी का उल्लंघन करके पार्टी के प्रचार के लिए जाने पर उन्हें २३ सितम्बर, १९४४ को नज+रबन्दी उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। कुल मिलाकर चौधरी रणबीर सिंह  स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान दो वर्”ा नजरबन्द रहे।

सुसंस्कारवान संतानें 

चौधरी रणबीर सिंह के यहां सुसंस्कारवान संतान के रूप में पाँच सुपत्र हुए :
१. कैप्टन प्रताप सिंह
२. श्री इन्द्र सिंह
३. श्री जोगेन्द्र सिंह
४. श्री भूपेन्द्र सिंह
५. श्री धर्मेन्द्र सिंह
चौधरी रणबीर सिंह एवं श्रीमती हरदेई ने अपने सभी पुत्रों को अच्छी ’िाक्षा दिलवाई और उन्हें ईमानदार, कर्मठ, परोपकारी, दे’ाभक्त और समाजसेवी बनाया।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी समर्पित राष्ट्रसेवा

चौधरी रणबीर सिंह, उस गौरवमयी वंश  की सशक्त कड़ी बने, जिसमें राष्ट्र सेवा में समर्पित पीढ़ी-दर-पीढ़ी जुड़ती चली जा रही हैं।


चौधरी मातु राम 

पहली पीढ़ी : चौधरी मातू राम आर्य सांधी गाँव के नम्बरदार और जैलदार जैसे प्रतिष्ठित पद पर रहे। वे रोहतक कांग्रेस के प्रमुख संस्थापकों में से एक और जिला बोर्ड के सदस्य भी रहे। १९२१ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के रोहतक पधारने पर हुई विशाल जनसभा की अध्यक्षता, उन्होंने ही की थी।

चौधरी रणबीर सिंह 

दूसरी पीढ़ी : चौधरी रणबीर सिंह ने स्वतंत्रता आन्दोलन में तीन वर्ष की कठोर कैद और दो वर्ष की नजरबन्दी की सजाएं झेलीं। संविधान सभा के सदस्य चुने गए। लोकतंत्र के इतिहास में रिकार्ड़ सात विभिन्न सदनों के सम्मानित सदस्य बने।

श्री भूपेन्द्र सिंह हूडा, माननीय मुख्यमंत्री, हरियाणा 

तीसरी पीढ़ी : चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा १९९१ मंे लोकसभा में पहुंचे। वे दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं लोकसभा सदस्य रहे। उन्होंने २००५ में रिकार्ड+ मत  लेकर किलोई विधानसभा से जीत दर्ज की और हरियाणा के मुख्यमन्त्री बने। उनके नेतृत्व में दूसरी बार २००९ में हरियाणा में कांगे्रस सरकार बनी है।


श्री दीपेन्द्र सिंह हूडा, माननीय सांसद, रोहतक लोकसभा क्षेत्र 

चौथी पीढ़ी : श्री दीपेन्द्र सिंह हुड्डा ने अपने पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए दो बार वर्ष २००५ और २००९ में रिकार्ड़ मतों से रोहतक लोकसभा  चुनाव जीता। चौदहवीं और पन्द्रहवीं लोकसभा में पहुंचे।
  
(नोट : लेखक महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में स्थापित ‘चौधरी रणबीर सिंह शोध केन्द्र’ में शोध-सहायक एवं स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)


रविवार, 13 नवंबर 2011

कहीं कलयुग के कंस न बन जाएं कल के कर्णधार !

14 नवम्बर / बाल दिवस पर विशेष

कहीं  कलयुग के कंस न बन जाएं कल के कर्णधार !

-राजेश कश्यप

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता सर्वप्रथम वर्ष 1934 में महसूस की गई और जेनेवा घोषणा के तहत बाल अधिकार सुनिश्चित किए गए। इसके उपरांत बच्चों के सर्वांगीण विकास और उनके हितों के रक्षार्थ संयुक्त महासभा द्वारा 20 नवम्बर, 1989 को बाल अधिकार सम्मेलन में तीन भागों में 54 अनुच्छेदों के साथ महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। भारत ने 12 नवम्बर, 1992 को इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करके अपनी स्वीकृति दे दी थी। इस समय दुनिया के 191 देशों द्वारा यह प्रस्ताव स्वीकृत किया जा चुका है। ये प्रस्ताव बच्चों के लिए ‘पहली पुकार के सिद्धान्त’ पर आधारित हैं किसी भी स्थिति में संसाधनों के आवंटन के दौरान बच्चों की अनिवार्य जरूरतों को सर्वाधिक प्राथमिकता दी गई है। इनमें बच्चों के सुकुमार बचपन एवं सम्मान को ध्यान मे रखते हुए बच्चों के चार मौलिक अधिकार जीने का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास का अधिकार और विकास का अधिकार शामिल किए गए हैं।

सबसे पहले वर्ष 1952 में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बाल-दिवस मनाने का निर्णय लिया गया था और अक्टूबर, 1953 में पहली बार एक दर्जन से अधिक देशों ने ‘बाल-दिवस’ मनया, जिसका आयोजन अन्तर्राष्ट्रीय बाल-संघ ने किया था। सन् 1954 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बाल-दिवस मनाने का प्रस्ताव स्वीकार किया। आज 160 से अधिक देश प्रतिवर्ष बाल-दिवस मनाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय बाल-दिवस दिसम्बर में मनाया जाता है, लेकिन भारत में प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवम्बर को बाल-दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘बाल-दिवस’ मनाने का मुख्य उद्देश्य बच्चों की आवश्यकताओं और अधिकारों के प्रति सरकार और जनता का ध्यान आकृष्ट करना है।

बच्चे ‘कल के कर्णधार’ और ‘कल का भविष्य’ होते हैं। यदि बच्चे स्वस्थ, सुशिक्षित, प्रतिभावान और सर्वांगीण विकास से ओतप्रोत होंगे तो, निश्चित तौरपर वे आने वाले समय में हमारे सच्चे और सशक्त कर्णधार साबित होंगे। लेकिन, जो बच्चे सर्वांगीण विकास एवं मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं, उनका भविष्य किसी भयंकर अभिशाप से भी बदतर होता है। विडम्बना का विषय है कि बहुत बड़ी संख्या में कल के कर्णधारों आज मझदार में फंसे हुए हैं, अर्थात वे भूख, गरीबी, बीमारी, निरक्षरता, शोषण, यौनाचार जैसी भयंकर समस्याओं के भंवर-जाल में फंसकर अभावग्रस्त और अभिशप्त जीवन जीने का बाध्य हैं। यदि ऐसे बच्चों से सम्बंधित आंकड़ों पर गौर किया जाए तो भयंकर सिहरन पैदा हो उठती है।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 8 करोड़ 30 लाख बच्चे कुपोषित जीवन जीने को बाध्य हैं। इससे बड़ा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इनमें अकेले भारत के 6.1 बच्चे शामिल हैं, जोकि देश की कुल जनसंख्या का 48 प्रतिशत बनता है। यह पड़ौसी देश पाकिस्तान (42 प्रतिशत) और बांग्लादेश (43 प्रतिशत) से भी अधिक है। केवल इतना ही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ो के अनुसार ऐसे बच्चे जिनका विकास अवरूद्ध हो चुका है, उनमें 34 प्रतिशत बच्चे भारत में है। रिपोर्ट के अनुसार देश में मध्य प्रदेश, बिहार और झारखण्ड में सर्वाधिक कुपोषित बच्चों की संख्या है।

अंतर्राष्ट्रीय आंकड़े बताते हैं कि भूख, गरीबी, शोषण, रोग तथा बाल-दुव्र्यवहार, प्राथमिक स्वास्थ्य व शिक्षण सुविधाओं के मामले में भारत की हालत अत्यन्त दयनीय है। ‘द स्टेट ऑफ वल्डर््स चिल्ड्रन’ नाम से जारी होने वाली यनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक 5 वर्ष की उम्र के बच्चों के मौतो के मामले में भारत विश्व में 49वाँ स्थान है, जबकि पड़ौसी देशों बांग्लादेश का 58वाँ और नेपाल का 60वाँ स्थान है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष लगभग 2.5 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं और प्रति 1000 बच्चों में से 124 बच्चे 5 वर्ष होने के पूर्व ही, जिनमें से लगभग 20 लाख बच्चे एक वर्ष पूरा होने के पहले ही मौत के मुँह में समा जाते हैं। ये मौतें अधिकतर कुपोषण एवं बिमारियों के कारण ही होती हैं।

एक अन्य अनुमान के अनुसार 43.8 प्रतिशत बच्चे औसत अंश के प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण के शिकार हैं और 8.7 प्रतिशत बच्चे भयानक कुपोषण के शिकार हैं। देश में लगभग 60 हजार बच्चे प्रतिवर्ष विटामीन ‘ए’ की कमी के साथ-साथ प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण के चलते अन्धेपन का शिकार होने को मजबूर होते हैं। इसके साथ ही पिछले कुछ समय से बच्चे बड़ी संख्या में एड्स जैसी महामारी की चपेट में भी आने लगे हैं। वर्ष 1996 में 8 लाख 30 हजार बच्चे एड्स के शिकार मिले और एड्स के कारण मरने वाले 3.5 लाख बच्चों की उम्र पन्द्रह वर्ष से कम थी।

देश में मातृ-मृत्यु दर के आंकड़े भी बड़े चांैकाने वाले हैं। यूनिसेफ के अनुसार वर्ष 1995-2003 के दौरान भारत में प्रति लाख जीवित जन्मों पर 540 मातृ-मृत्यु दर थी। रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष लगभग 5.30 लाख माताएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं और भारत में लगभग एक लाख माताएं प्रसव के दौरान प्रतिवर्ष मृत्यु का शिकार हो जाती हैं। लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी का शिकार होती हैं और 56 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं अपने गर्भावस्था के तीसरे चरण में आयरन की कमी से ग्रसित होती हैं।

यह भी बड़ी विडम्बना का विषय है कि दुनिया में भारत देश में ही सर्वाधिक बाल मजदूरों की संख्या सामने आई है। योजना आयोग के एक आकलन के अनुसार भारत में सन् 2000 में लगभग 2 करोड़ बाल मजदूर थे। देश के लिए सबसे बड़ी शर्मनाक बात तो यह सामने आई कि लगभग 5 लाख मासूम बच्चे मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली, हैदराबाद, कानपुर , चेन्नई जैसे महानगरों में सडक़ों पर ही जीवन जीने को बाध्य हैं।

शिक्षा के मामले में भी देश में बच्चों की स्थिति बेहतर नहीं है। आंकड़े बतलाते हैं कि देश की 40 प्रतिशत बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं और देश के लगभग 48 फीसदी बच्चे प्राथमिक स्कूलों से अछूते हैं। केवल इतना ही नहीं, देश में 6 से 14 साल की लड़कियों में से 50 प्रतिशत स्कूल बीच में ही छोडऩे के लिए बाध्य होती हैं।

भारत में बाल अपराधों के मामलों में भी तेजी से इजाफा होता चला जा रहा है। बच्चों के बीड़ी, सिगरेट, शराब, चोरी, झूठ, मार-पिटाई, कत्ल, स्कूल से गायब होना, वाहन चोरी, मोबाईल चोरी, अपहरण जैसे अपराधिक मामलों में बच्चों की भारी संख्या में उपस्थिति दर्ज हो रही है। सन् 1991 में कुल 29,591 बाल-अभियुक्त विभिन्न अपराधों के दोषों के तहत विवेचित किए गए, जिनमें 23,201 लडक़े और 6,390 लड़कियां शामिल थीं। इनमें अधिकतर बाल-अभियुक्त सेंधमारी, चोरी, दंगा, मद्यपान, जुआ और आबकारी के आपराधिक मामलों में संलिप्त थे। वर्ष 2007 में कुल 34,527 बाल-अपराध मामले दर्ज हुए, जिनमें 32,671 लडक़े और 1,856 लड़कियां शामिल थीं।

देश में बाल शोषण के तेजी से बढ़ते मामले भी बेहद चौंकाने लगे हैं। मार्च, 2007 में गठित राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को प्राप्त शिकायतों के तहत वर्ष 2007-08 में 35, वर्ष 2008 में 115 और वर्ष 2009-10 में कुल 222 मामले प्रकाश में आए। सबसे बड़ी ह्दयविदारक तथ्य यह है कि देश में बड़ी संख्या में मासूम बच्चों का यौन शोषण जैसे भयंकर अत्याचार का सामना भी करना पड़ता है। समाजशास्त्रियों के अनुसार बालक और बालिका श्रमिकों का यौन-शोषण मालिकों, ठेकेदारों, एजेन्टों, सहकर्मियों, अपराधियों आदि द्वारा इसीलिए किया जाता है, ताकि वे उनके अन्दर इस कद्र भय पैदा हो जाए, जिससे वे किसी भी तरह के शोषण के खिलाफ आवाज ही न उठा सकें। नेशलन क्राइम रिकाडऱ्स ब्यूरों द्वारा वर्ष 1991 में प्रकाशित अपराध के आँकड़ों के अनुसार 10,425 बच्चों को बलात्कार का शिकार होना पड़ा था।

देश में बाल कन्याओं पर होने वाले अत्याचार तो रूह कंपाने वाले हैं। ‘स्टेटिस्टिस्टिक्स ऑन चिल्डे्रन इन इण्डिया (1996)’ के आँकड़ों के अनुसार देश में सबसे ज्यादा शिशुओं की हत्या महाराष्ट्र (37.4 प्रतिशत) में, इसके बाद बिहार (17.6 प्रतिशत) व मध्य प्रदेश (14 प्रतिशत) होती हैं। इनमें मासूम बच्चियों की संख्या ज्यादा होती है। इसके साथ ही देश में होने वाली भ्रूण हत्याओं में भी कन्याओं की ही संख्या ज्यादा होती है। भू्रण हत्या के मामले में महाराष्ट्र (37.8 प्रतिशत) तथा मध्य प्रदेश (37.8 प्रतिशत) पहले स्थान पर और उसके बाद गुजरात (13.3 प्रतिशत) व राजस्थान (8.9 प्रतिशत) का स्थान था। अबोध बच्चियों की बिक्री के मामले में बिहार (33.5 प्रतिशत) पहले और उसके बाद महाराष्ट्र (21.8 प्रतिशत) व गुजरात (13.1 प्रतिशत) का स्थान था। वेश्यावृति के लिए होने वाली बच्चियों की बिक्री के मामलों में दिल्ली (44.2 प्रतिशत) पहले स्थान, इसके बाद आन्ध्र प्रदेश (23.5 प्रतिशत) व बिहार (13.7 प्रतिशत) का स्थान दर्ज हुआ।

सबसे बड़ी चांैकाने वाली बात यह है कि राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय बाल-श्रम उन्मूलन नीतियों की मौजूदगी में देश में गैर-कानून तरीके से बच्चों से जोखिमपूर्ण व खतरनाक उद्योगों एवं उत्पादन की प्रक्रियाओं में काम लिया जा रहा है, जिसके कारण वे नाना प्रकार की बिमारियों का सहज शिकार हो रहे हैं। मासूम बच्चे गरीबी व अन्य कई प्रकार की लाचारियों के चलते शीशा सम्बंधी कार्याे, ईंट भठ्ठा, पीतल बर्तन निर्माण, बीड़ी उद्योग, हस्तकरघा एवं पॉवरलूम, जरी एवं कढ़ाई, रूबी एवं हीरा कटाई, रद्दी चुनने, माचिस पटाखा उद्योग, कृषि उद्योग, स्लेट उद्योग, चूड़ी उद्योग, मिट्टी-बर्तन निर्माण, पत्थर एवं स्लेट खनन, गुब्बारा उद्योग, कालीन उद्योग, ताला उद्योग जैसे खतरनाक कायों में संलंग्र बाल-श्रमिक निरन्तर दमा, जलन, नेत्रदोष, तपेदिक, सिलिकोसिस, ऐंठन, अपंगता, श्वास, चर्म, संक्रमण, टेटनस, श्वासनली-शोथ, खाँसी, कैंसर, बुखार, निमोनिया जैसे रोगों का शिकार होने के साथ अन्य कई भयंकर दुर्घटनाओं के भी शिकार हो रहे हैं।

कुल मिलाकर कल के कर्णधारों का कटू सच यही है कि आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत देश में अधिकतर बच्चों की दयनीय व चिन्तनीय दशा बनी हुई है। बड़ी संख्या में बच्चे अत्यन्त अभावग्रस्त एवं अभिशप्त जीवन जीने के लिए बाध्य हैं। अनेक बच्चे दिहाड़ी, मजदूरी, बन्धुआ मजदूरी, होटल, रेस्तरां और घरों व दफ्तरों में चन्द रूपयों के बदले नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। देश में कई ऐसे बड़े-बड़े गिरोह सक्रिय हैं, जो बच्चों से जबरदस्ती अनैतिक, असामाजिक व आपराधिक काम करवाते हैं। जो बच्चे उनके इशारों पर काम नहीं करते, उन्हें अपंग तक बना दिया जाता है। फूटपाथी जीवन जीने वाले, रद्दी-कूड़ा बीनकर गुजारा करने वाले और भीख माँगकर रोटी खाने वाले बच्चों की त्रासदी तो रूह कंपाने वाली है। बहुत बड़ी संख्या में मासूम बच्चे अपने परिवार वालों की गरीबी, लाचारी और उपेक्षा के साथ-साथ अय्यासी, नशाखोरी व कामचोरी जैसी कई अन्य लतों का खामियाजा अपना अनमोल बचपन और भावी जीवन अंधकारमय बनाकर चुका रहे हैं।

हालांकि देश में बच्चों पर होने वाले अत्याचारों व शोषणों पर अंकुश लगाने के लिए कारखाना अधिनियम 1881, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1891, खान अधिनियम 1901, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1922, भारतीय खान अधिनियम 1923, खान (संशोधन) अधिनियम 1926, भारतीय बन्दरगाह (संशोधन) अधिनियम 1931, चाय जिला अप्रवासी अधिनियम 1932, बाल (श्रमिक बन्धक) अधिनियम 1933, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1934, खान (संशोधन) अधिनियम 1935, बाल नियोजन अधिनियम 1938, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, कारखाना अधिनियम 1948, बाल नियोजन (संशोधन) अधिनियम 1949, भारतीय संविधान (1950), बाल नियोजन (संशोधन) अधिनियम 1951, बागान श्रमिक अधिनियम 1951, खान अधिनियम 1952, बिहार दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम 1953, कारखाना (संशोधन) अधिनियम 1954, व्यापारिक जहाजरानी अधिनियम 1958, मोटर परिवहन कामगार अधिनियम 1961, एपे्रन्टिस अधिनियम 1961, बीड़ी एवं सिगार कामगार (नियोजन की शर्तें) अधिनियम 1966, बाल नियोजन (संशोधन) अधिनियम 1978, खतरनाक मशीन (विनियमन) अधिनियम 1983,, बाल श्रमिक (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986 आदि के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के अनुरूप नियम एवं कानून लागू किए गए हैं, लेकिन उन पर गम्भीतापूर्वक अमल में नहीं लाए जाते, जिनके चलते ये बाल-स्थिति में सुधार होने के बजाय समस्या निरन्तर गम्भीर से गम्भीरतम होती चली जा रही है।

यदि सरकार व समाज गंभीरतापूर्वक अपने नैतिक, मानवीय व सामाजिक दायित्वों के निर्वहन करने के साथ-साथ कानूनों का भी भलीभांति पालन करे और कल के कर्णधारों का अच्छा भविष्य सुनिश्चित करने का संकल्प ले तो निश्चित तौर पर हमारेदेश व समाज का भविष्य भी अत्यन्त उज्ज्वल होगा। अन्यथा, हमारे यही कल के कर्णधार, कलयुग के कंस साबित हो सकते हैं। इसलिए हमें यह हर हाल में अपने कल के कर्णधारों को कलयुग के कंस बनने से रोकना होगा।


(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

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मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

खतरे में पड़ती पर्वों की मूल पहचान, परंपरा और परिपाटी!

संपादकीय लेख / दीपावली विशेष

खतरे में पड़ती पर्वों की मूल पहचान, परंपरा और परिपाटी!

-राजेश कश्यप

सभी बाजार सजे हुए हैं, शहरों की रौनक सबको रिझा रही है, सभी समाचार-पत्र पर्व विशेष परिशिष्टों व विशेषांकों से रंगे पड़े हैं, टेलीविजन पर फिल्मी और धारावाहिक कलाकारों के मनोहारी कार्यक्रमों की धूम मची है और बॉक्स आWफिस पर बड़े-बड़े सितारों से सजी फिल्मों का रोमांच चरमसीमा पर है। ठहरिये, यह मात्र प्रकाश पर्व दीपावली पर आधारित लेख की भूमिका नहीं है, बल्कि यह भूमिका है सभी प्राचीन पर्वों के आधुनिक स्वरूप की। होली, दीवाली, दशहरा, ईद, क्रिसमस, लोहड़ी, रक्षाबन्धन, तीज आदि चाहे कोई भी त्यौहार हो, उपर्युक्त पंक्तियां उस पर्व के आधुनिक उल्लास एवं उत्साह को बराबर रेखांकित करती नजर आती हैं। क्योंकि, आज हर त्यौहार की यही सब पहचान बनकर रह गई है। हमारे हर प्राचीन पर्व की अपनी अलग विशेषता और पहचान होती थी। हर किसी को प्रत्येक त्यौहार का बेसब्री से इंतजार होता था। बच्चे, बूढ़े, जवान, पुरूष, महिलाएं आदि सबमंे खुशी, उमंग, उत्साह, रोमांच देखते ही बनता था। हर पर्व के प्रति अटूट आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा देखते ही बनती थी।

कहना न होगा कि हमारा हर पर्व आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा के साथ-साथ धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक त्रिवेणी से युक्त होता था। यही हमारे पर्वों की मूल परिभाषा, परिपाटी और पहचान होती थी। विडम्बना देखिए कि आज हमारे किसी भी त्यौहार की न तो कोई परिभाषा रह गई है, न परिपाटी बची है और न ही पहचान रह पाई है। हर पर्व की केवल एक ही परिभाषा, परिपाटी और पहचान बनकर रह गई है और वह है भौतिकवादी दिखावा, दिखावा और केवल दिखावा। पर्वों की वो चिरकालिक सादगी, भातृभाव, समता, पवित्रता और नवीनता संरक्षण का एकदम मोहताज बनकर रह गई हैं। भौतिकवादी बाजारवाद ने इन मूल तत्वों को बिल्कुल निगल लिया है। पहले चाहे कोई अमीर था या गरीब, हर किसी के अन्दर पर्व का एक रोमांच होता था। लेकिन, आज कोई भी त्यौहार किसी गरीब का नहीं रह गया है। अब हर त्यौहार सिर्फ और सिर्फ अमीर की जागीर बनकर रह गया है। यदि किसी के पास पैसा है तो उसके घर पर्व की चमक-दमक है और यदि नहीं है तो पर्व मनाना उसके लिए पाप है।

भौतिकतावादी प्रवृति ने हर पर्व की परंपरा को अमीरों की चौखट का ताबेदार बनाकर रख दिया है। दीपावली पर्व पर घर-घर घी व सरसों के तेल से जलते दीयों की कतारें नदारद हो चली हैं, मिट्टी के खिलौनांे हीड़ों, कुल्हियांें, चुघड़ों में मोमबती जलाए मासूम बच्चों की खुशी व उमंग की किलकारियां व अटखेलियां गायब हो चुकी हैं, पारंपरिक घरेलू पकवान व मिष्ठान बीते कई जमानों की बात हो गई हैं और आम आदमी के अंदर पर्व की उमंग व लालसा मृतप्राय: हो गई है। देश की लगभग ८० फीसदी आबादी के लिए अब किसी भी पर्व के कोई मायने नहीं रह गए हैं। यदि इन पर्वों के कोई मायने रह गए हैं तो देश के सिर्फ उन बीस फीसदी लोगों के लिए रह गए हैं, जो सत्ता पर काबिज हैं, बड़े-बड़े उद्योगपति हैं, सरकारी अथवा गैर-सरकारी पदों पर आसीन हैं, कॉरपोरेट जगत के चमचमाते सितारे हैं, भ्रष्टाचार और व्याभिचारी कर्मों में लिप्त हैं, फायनेंस के नामी ठग हैं, गैर-सरकारी सामाजिक संस्थाओं (एनजीओ) के स्वयंभू समाजसेवी हैं, बड़े-बड़े अपराधी और दलाल हैं। आज यदि किसी त्यौहार की रौनक देखनी हो तो उपर्युक्त श्रेणी के लोगों के यहां ही देखने को मिलेगी। गरीबों के यहां तो पर्व के नाम पर बेबसी, बेबसी और सिर्फ बेबसी ही मिलेगी। क्योंकि, आज महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बेकारी और भूखमरी के इस महादौर में आम आदमी को जीने के लिए दो रोटी सहज नसीब नहीं हो पा रही हैं तो भला उनके लिए पर्व के क्या मायने हैं?

विडम्बना देखिए। किसान कर्ज के चलते आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। युवा बेरोजगारी व बेकारी के चलते आपराधिक मार्ग पर चलने को विवश हैं। श्रमिक अपने हकों के लिए चिल्ला-चिल्लाकर मर रहे हैं। गरीबी का ग्राफ निरन्तर तेजी से बढ़ता चला जा रहा है। महंगाई दिनोंदिन भयंकर आग उगल रही है। देश की ८० फीसदी जनता औसतन २० रूपये से कम की कमाई में गुजारा करने को विवश है। जबकि, सरकार उनके लिए जीने के नए मानदण्ड तय कर रही है कि जो शहर में ३२ रूपये और गाँव में प्रतिदिन २६ रूपये खर्च करता है, वह गरीबी की श्रेणी में नहीं है। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि आंकड़ों में न केवल गरीबी निरन्तर कम होती चली जा रही है, अपितु देश के नागरिकों की औसत आमदनी भी कई गुना होती चली जा रही है। निश्चित तौरपर इसका श्रेय देश की उस २० प्रतिशत आबादी को जाता है, जिसने पूरे देश की सम्पति को अपने यहां केन्द्रित करने का अनूठा कारनामा कर दिखाया है।

विडम्बनाएं यहीं तक सीमित नहीं हैं, वे तो असीमित हो चली हैं। सबसे बड़ी विडम्बना यह नहीं है कि गरीब पर्व नहीं मना पा रहे हैं और सिर्फ अमीर ही मना रहे हैं। यदि विषय का गहराई तक विश्लेषण किया जाए तो पता लगेगा कि सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि पर्वों की मूल पहचान, परिभाषा और परिपाटी खतरे में पड़ चुकी है। उदाहरण के तौरपर प्रकाश पर्व दीपावली को ही ले लीजिए। दीपावली पर्व मूलत: भगवान श्री राम के लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करके चौदह वर्ष वनवास पूर्ण करने के उपरांत अयोध्या लौटने की खुशी में घी के दीप प्रज्जवलित करने की परंपरानुरूप मनाया जाता है। लेकिन, आज स्वयंसिद्ध विद्वानों ने पुरूषोत्तम श्री राम, माता सीता, बजरंग बली हनुमान, देवी अहिल्या जैसी पौराणिक हस्तियों पर ही गन्दा कीचड़ उछालकर देश की संस्कृति और आस्था पर ही पानी फेरने की कुचेष्टा की हुई है। आज उन्होंने राम को अधम, बजरंग बली हनुमान को चरित्रहीन, माता सीता को अपवित्र बनाकर घृणित रूप दे दिया और बुराई के प्रतीक रावण को पुज्य बना दिया है। क्या यह देश की चिरकालिक संस्कृति पर कुठाराघात नहीं है? यदि भगवान श्री राम पर ही आक्षेप लगा दिया गया है तो फिर दीपावली पर्व का धार्मिक और आध्यात्मिक स्वरूप तो समाप्त ही हो गया। ऐसे में दीपावली मनाने का कौन सा औचित्य शेष रह जाता है?

अब रही दीपावली के प्राकृतिक स्वरूप की बात। दीपावली पर्व पर घी व सरसों के तेल से प्रज्जलित दीपों की कतारों का बहुत बड़ा प्राकृतिक व वैज्ञानिक महत्व छिपा हुआ था। दीपावली पर्व वर्षा ऋतु से निकलकर शीत ऋतु में प्रवेश करने का द्वार है। वर्षा ऋतु की नमी से उत्पन्न कीट, पतंगों, मच्छरों, काई व विषाणुओं का संहार दीपावली पर्व पर आराम से हो जाता था। क्योंकि दीपावली पर्व पर घरों की नए सिरे से साफ-सफाई, लीपा-पोती, रंग-रोगन आदि होता था। हवा में मौजूद विषाणुओं का खात्मा दीपों की जलती लौं के ताप से हो जाता था और गन्ध युक्त वातावरण में घी व तेल की खूशबू से सुगन्ध व महक भर उठती थी। लेकिन, आज दीपों की जगह बिजली के रंगबिरंगे बल्बों और लड़ियों ने ले ली है। इससे पर्व के प्राकृतिक स्वरूप की महत्ता भी खण्डित हो चली है।

कुल मिलाकर खतरे में पड़ती पर्वों की पहचान, परिभाषा और परिपाटी के मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही पर्वों की मूल महत्ता और उनके धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक स्वरूप को बचाए रखने पर ही जोर देना होगा, क्योंकि इसके बिना कोई भी पर्व टिका ही नहीं रह सकता है। आधुनिकता और पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में भौतिकतावाद के शिकार होकर पर्वों के महत्व की उपेक्षा करने अथवा उनके प्रति अनास्था पैदा करने के बेहद घातक परिणाम होंगे। हमें यह कदापि नहीं भूलना होगा कि हमारे पर्व-त्यौहार ही हमारे देश की मूल पहचान, ताकत और गौरव की अनुभूति रहे हैं। हर त्यौहार हमारी संस्कृति एवं सभ्यता का वाहक है। हमारा हर पर्व असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की, अंधकार पर प्रकाश की और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। उनका धार्मिक, आध्यात्मिक व प्राकृतिक रूप में अपना विशिष्ट महत्व है। सभी पर्व-त्यौहार राष्ट्रीय स्वतंत्रता, एकता, अखण्डता एवं अस्मिता का अभेद्य कवच हैं। इसलिए अपने प्राचीन पर्वों की अमिट पहचान बनाए रखना अति आवश्यक है।

यदि किसी भी त्यौहार पर किसी तरह की अनास्था अथवा षड़यंत्रकारी आघात अथवा प्रतिघात होगा तो, परोक्ष-अपरोक्ष रूप से हमारी सभ्यता एवं संस्कृति पर भी गहरा आघात होगा। जो असामाजिक तत्व व स्वयंसिद्ध विद्वान पश्चिमी संस्कृति का शिकार होकर अपने गौरवमयी पर्वों के प्रति शोध के नामपर अनास्था पैदा करने की कुचेष्टा करने से बाज नहीं आ रहे हैं, उन पर कड़ा अंकुश लगाए जाने की सख्त आवश्यकता है। हमें अपने पर्वों की मूल पहचान, परिभाषा और परिपाटी पुन: पटरी पर लानी होगी, तभी हम इन पंक्तियों के अस्तिव को बनाए रख पाएंगे :

यूनान, मिश्र, रोमों, सब मिट गए जहां से।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।।

(नोट : लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)



(राजेश कश्यप)

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक

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राजेश कश्यप
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बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

गरीबी के बदलते पैमाने और मायने

ज्वलंत मुद्दा

गरीबी के बदलते पैमाने और मायने

-राजेश कश्यप

गत दिनों सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई अपनी एक रिपोर्ट में योजना आयोग ने कहा कि शहर में 32 रूपये और गाँव में 26 रूपये प्रतिदिन खर्च करने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा (बीपीएल) की परिधि में नहीं आता है। कमाल की बात तो यह रही कि देश की शीर्ष अदालत में दाखिल बतौर शपथ पत्र दाखिल की गई इस रिपोर्ट पर प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर भी थे। सरकार की इस कुटनीति और कुटिलता पर बवाल मचना स्वभाविक था। सरकार की सर्वत्र थू-थू (आलोचना) हुई। मंहगाई, भूखमरी और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर बुरी तरह घिरी यूपीए सरकार के लिए गरीबी का ये नया पैमाना बनाना, गरीबों के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान रहा। नि:सन्देह सरकार की यह कुटिलता किसी ‘आत्मघाती’ कदम से कम नहीं कही जा सकती। आंकड़ों की बाजीगरी से देश की गरीबी को मिटाने का दिवास्वप्न देखने वाली कांग्रेस को जब इस मसले पर न उगलते बना और न निगलते बना तो उसने आनन-फानन में अपना दूसरा पैंतरा चला दिया। पहले तो सरकार ने इसे सरकारी नजरिए की बजाय सुरेश तेन्दुलकर की सिफारिश कहकर पल्ला झाड़ने की भरसक कोशिश की। लेकिन, जब बात बनते दिखाई नहीं दी तो सरकार ने फिर से अपना सियासी पैंतरा खेला है।

अब सरकार ने गरीबी का पैमाना तय करने के नजरिये को जायज बताते हुए कहा है कि जाति आधारित जनगणना से आने वाले सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों को आधार बनाकर गरीबी की रेखा नए सिरे से तय होगी। इसके तहत हर योजना के लिए पात्र गरीबों का चयन अभाव के हिसाब से होगा और इसके लिए वरीयता (ग्रेडिंग) बनाई जाएगी। इसके साथ ही सरकार ने कहा है कि अदालत में दाखिल किए गए हल्फनामे को वापिस नहीं लिया जाएगा। योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने तो यहां तक कहा है कि मैं तो चाहता हूँ कि अब कोई बीपीएल लिस्ट या कार्ड न बने। जरूरतों के लिहाज से ही योजनाओं का लाभ दिया जाए।

सरकार की नीतियों और वक्तव्यों और नीतियों से साफ झलकता है कि हकीकत में गरीबी दूर करने की उसकी मंशा दूर-दूर तक नहीं है। सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी और छलावा नीतियों के जरिए ही वह आम आदमी को बरगलाए रखना चाहती है। कुछ समय पहले बेलगाम महंगाई के मुद्दे पर सरकार की तरफ से बड़ी बेहूदा तार्किकता पेश की गई थी कि जब इतनी मंहगाई में भी आम आदमी गुजारा कर रहा है और उसकी क्रय शक्ति बनी हुई है तो इसका मतलब उसके जीवन-स्तर में इजाफा हुआ है। इसके तर्क के मायने यह थे कि सरकार के सद्प्रयासों के चलते आज आम आदमी आर्थिक रूप से इतना सम्पन्न हो गया है कि उस पर महंगाई का कोई असर नहीं पड़ रहा है। सरकारी की इस मानसिकता पर भी आम आदमी को रोना आया था। सरकार गरीबी के मनमाने पैमाने बदलकर, गरीबी का जड़ से उन्मूलन करने का दिवास्वप्न देखने से बाज नहीं आ रही है।

दरअसल गरीबी भ्रष्ट और बेईमान सत्ताधारियों के कारण देश के लिए एक नासूर बन चुकी है। आजादी के समय भी आम आदमी गरीबी के चंगुल में फंसा हुआ था और आज भी फंसा हुआ। आजादी प्राप्ति से लेकर आज तक आम आदमी सिर्फ गरीबी मिटाने के सरकारी आश्वासनों और दावों के चक्रव्युह को झेलता आ रहा है। सरकारें बदल रही हैं, नीतियां बदल रही हैं, लेकिन, स्थिति वही ढ़ाक के तीन पात वाली है। गरीबों के हालात बद से बदतर होते चले जा रहे हैं। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और बेकारी के चलते गरीबी का ग्राफ दिनोंदिन तेजी से चढ़ता चला जा रहा है और सरकार इस ग्राफ को उलटा पकड़कर दिखाने की जादुगिरी कर रही है।

आंकड़ों के तराजू में गरीबी को कई बार तोला गया है। आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि आंकड़ों के परिणाम एकदम विरोधाभासी रहे। यदि आंकड़ों की नजर में गरीबी की स्थिति को देखा जाए तो वर्ष 1973-74 में कुल 54.4 प्रतिशत गरीबी थी, जोकि वर्ष 1977-78 में यह आंकड़ा घटकर 51.3 प्रतिशत पर आ गया। आगे चलकर गरीबी का प्रतिशत वर्ष 1983 में घटकर 44.5 प्रतिशत पर आ पहुंचा और वर्ष 1987-88 में 38.9 प्रतिशत हो गया। जादूई तरीके से यही प्रतिशत वर्ष 1993-94 में घटता हुआ 36.0 प्रतिशत पर आ गया और वर्ष 1999-2000 में एक झटके से यह 26.1 प्रतिशत के आंकड़े पर आ पहुंचा। वर्ष 2004-05 के मिश्रित स्मरण अवधि के अनुसार गरीबी का प्रतिशत घटता-घटता 21.8 प्रतिशत हो गया और अब हाल यह है कि सरकार परोक्ष रूप से इस आंकड़े को शून्य प्रतिशत दिखाने का प्रयत्न कर रही है। जबकि हकीकत इन आंकड़ों के ठीक विपरीत है।

भारत सरकार द्वारा नियुक्त अर्जुन सेन गुप्त आयोग के अनुसार भारत के 77 प्रतिशत लोग (लगभग 83 करोड़ 70 लाख लोग) 20 रूपये से भी कम रोजाना की आय पर किसी तरह गुजारा करते हैं। विश्व बैंक के अनुसार भारत में वर्ष 2005 में 41.6 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे। एशियाई विकास बैंक के अनुसार यह आंकड़ा 62.2 प्रतिशत बनता है। केन्द्र सरकार द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समूह द्वारा सुझाए गए मापदण्डों के अनुसार देश में गरीबों की संख्या 50 प्रतिशत तक हो सकती है। गरीबों की गिनती के लिए मापदण्ड तय करने में जुटे विशेषज्ञों के समूह की बात यदि सरकार स्वीकार करे तो देश की 50 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा से नीचे (बीपीएल) पहुंच जाएगी। उल्लेखनीय है कि सरकार ने एन.सी.सक्सेना की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समूह बनाया था। इस समूह को बीपीएल तय करने के लिए पैमाना तय करना था। समूह ने इसके लिए कैलोरी खपत को आधार बनाने का सुझाव दिया था। तर्क दिया गया था कि 1987-88 से लगातार गरीबों की कैलोरी खपत में कमी हो रही है।

समूह ने यह भी ध्यान दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र के सहस्त्राब्दी लक्ष्य में 2015 तक भूख-गरीबी को आधा करने को कहा गया है। विशेषज्ञ समूह ने पाया कि 2400 कैलोरी के पुराने मापदण्ड को आधार बनाया गया तो देश में बीपीएल की आबादी 80 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। लेकिन, बदली जीवन शैली में कम कैलोरी खपत (2100 कैलोरी) के आधार पर भी ग्रामीण इलाकों में रहने वाली बीपीएल जनता की संख्या 50 प्रतिशत होगी। समूह का आंकलन प्रति व्यक्ति 12.25 किलो अनाज की खपत पर आधारित है। यहां आंकड़ा इसलिए भी तर्कसंगत है, क्योंकि देश में 50 प्रतिशत बच्चों का वजन औसत से कम है। केवल इतना ही नहीं, कम से कम 75 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं में खून की कमी पाई जाती है। विश्व बैंक ने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बीपीएल के लिए 1.25 डॉलर प्रतिदिन आय का मापदण्ड तय किया था।

सरकार ने गरीबी उन्मूलन के लिए ‘महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’, ‘भारत निर्माण योजना’, ‘प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना’, ‘कुटीर उद्योग योजना’, ‘नेहरू विकास योजना’, ‘इन्दिरा आवास योजना’, ‘अन्त्योदय योजना’ जैसी दर्जनों कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण एवं क्रियान्वयन किया है। लेकिन, इसके बावजूद देश में गरीबी घटने की बजाय, बढ़ी है। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि योजनाओं का क्रियान्वयन ईमानदारी से नहीं हुआ और सभी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं। आम व गरीब आदमी तक उन योजनाओं का पूरा लाभ नहीं पहुंच पाया। इस कटू सत्य को तो सरकार भी स्वीकार कर रही है कि इन योजनाओं के सौ में से मात्र 14 पैसे जरूरतमन्दों तक पहुंच पाते हैं, बाकि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। गत स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा पन्द्रह मिनट तक भ्रष्टाचार पर केन्द्रित चिन्ता प्रकट करना, हकीकत को स्वयं बयां करता है।

निरन्तर बढ़ते भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और बेकारी ने आम आदमी को आक्रोश से भर दिया है। आम आदमी के प्रति सरकार की लापरवाही आग में घी का काम कर रही है। इसका साक्षात् नमूना गत जून माह में बाबा रामदेव के सत्याग्रह और वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे की ‘अगस्त क्रान्ति’ में कालेधन व भ्रष्टाचार के खिलाफ और सख्त जन लोकपाल बिल लाने के समर्थन में देशभर से उमड़ा जन-सैलाब पूरी दुनिया देख चुकी है। देश ‘गृहयुद्ध’ जैसी भयानक स्थिति में पहुंचने की कगार पर खड़ा है और सत्तारूढ़ सरकार गरीबी के पैमाने बदलकर गरीबों के साथ एकदम बेहूदा व अभद्र मजाक करके, बारूद के ढ़ेर को चिंगारी दिखाने की विनाशकारी व अक्षम्य भूल करने से बाज नहीं आ रही है।

विडंबना का विषय तो यह है कि गरीबी के पैमाने व मायने बदलने को लेकर भारी आलोचनाओं के बावजूद सरकार सचेत नहीं हो रही है। गत तीन अक्तूबर को योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया और ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने सरकार की तरफ से गरीबी के पैमाने को लेकर जिन नए मानकों का खुलासा किया है, वह तात्कालिक आलोचनाओं पर अंकुश लगाने, आम आदमी को बेवकूफ बनाने और मुद्दे को लंबे समय के लिए ठण्डे बस्ते में डालकर सियासी लाभ उठाने के सिवाय, कुछ भी नजर नहीं आता है। क्योंकि सरकार सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हल्फनामें को न तो वापिस लेगी और न ही गरीबों की वास्तविक हकीकत को समझने और सामने लाने का वादा करेगी देगी। कहना न होगा कि यह स्थिति यूपीए सरकार के लिए न केवल ‘आत्मघाती’ साबित होगी, अपितु, देश को ‘गृहयुद्ध’ जैसी भयंकर स्थिति में भी पहुंचा देंगी, क्योंकि अब आम आदमी के लिए सामान्य जीवन जीना बेहद मुश्किल हो चला है और अब वह भ्रष्टाचार, महंगाई, भूखमरी, गरीबी, बेरोजगारी, बेकारी आदि को सहने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है।

बुधवार, 22 जून 2011

आखिर देश में ये हो क्या रहा है?

मुद्दा : महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार
आखिर देश में ये हो क्या रहा है?


-राजेश कश्यप



गत 15 जून को टॉमसन-रायटर्स ट्रस्ट लॉ फाउण्डेशन की शोध-रिपोर्ट ने महिलाओं के लिए सबसे असुरिक्षत माने जाने वाले देशों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत को चौथा स्थान देकर तहलका मचा दिया था। फाउण्डेशन के यह सर्वे रिपोर्ट आसानी से गले उतरने वाली नजर नहीं आ रही थी। भला जिस देश में जहां, नर में राम और नारी में सीता देखने की संस्कृति रही हो, नदियों को भी माता कहकर पुकारा जाता हो, भगवान के विभिन्न अवतारों, ऋषि-मुनियों, योगियों-तपस्वियों आदि की क्रीड़ा व कर्म-स्थली रही हो, महिला सशक्तिकरण के लिए दिन-रात एक कर दिया गया हो, संसद में भी तेतीस प्रतिशत महिलाओं को बैठाने की तैयारियां चल रही हों, शीर्ष पद राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री, मंत्री, जिला पार्षद, सरपंच व पंच पदों पर महिलाएं विराजमान हों और हर प्रमुख परीक्षा व क्षेत्र में लड़कियों का वस्र्चव स्थापित हो रहा हो, राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल पर राखी व रतन के स्वयंवर चल रहे हों, लड़कियां घुड़चढ़ी करवा रही हों, तो भला वहां महिलाओं के साथ इतना दुराचार कि उसे दुनिया में चौथा स्थान दिया जाए? इस चौंकाने वाले सर्वे की चीर-फाड़ शुरू होती, उससे पहले ही देशभर में एक के बाद एक नाबालिग लड़कियों व बेबस महिलाओं के साथ दिल दहलाने वाली शर्मनाक व दरिन्दगी भरे बलात्कार की घटनाओं ने फाउडेशन की रिपोर्ट पर अपनी मोहर लगा दी और यहां तक सोचने के लिए बाध्य कर दिया कि शायद यह चौथा स्थान भी कुछ कम तो नहीं है?

देश की राजधानी दिल्ली और उसके साथ सटे उत्तर प्रदेश, जिनकीं बागडोर महिला मुख्यमंत्रियों के हाथों है, इसके बावजूद महिलाओं पर एक से बढ़कर एक घिनौने अपराध हो रहे हैं। लड़कियों एवं महिलाओं के साथ होने वाली घिनौनी हरकतों से दिल्ली तो प्रतिदिन दिल दहला ही रही थी, उससे बढ़कर उत्तर प्रदेश ने हर किसी के अन्र्तमन को झकझोर करके रख दिया है। प्रतिदिन औसतन तीन बलात्कारों की घटनाओं ने देशभर में महिलाओं की वास्तविक स्थिति और महिला सशक्तिकरण के दावों की हवा निकालकर रख दी है। बलात्कार की इन भंयकर घटनाओं ने यह सोचने पर बाध्य कर दिया है कि क्या इंसान इस कद्र भी हैवान व दरिन्दा बन सकता है जो समूह बनाकर एक नाबालिग मासूम की अस्मिता के साथ दरिन्दगी भरा खेल खेले और उसके बाद भयंकर मौत के हवाले कर दे? क्या हमारे रिश्ते इतने कच्चे हो गए हैं कि अपने ही मित्र व रिश्तेदार की मासूम किशोरियों व महिलाओं को अपनी हवश का शिकार बना डाले? क्या हमारे रक्षक इतने भक्षक भी बन सकते हैं जो बेखौफ होकर खाकी वर्दी के लिबास में भेड़ियों वाले कृत्य करें और अबलाओं की इज्जत से खेलकर इंसानियत व कानून दोनों की धज्जियां उड़ाने में तनिक भी न हिचकें? क्या देश का मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय महिला आयोग इस कद्र पंगु हो सकता है कि उसका विवके ही शून्य से नीचे चला जाए? क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने वाले देश का सत्तातंत्र इस कद्र बेशर्म हो सकता है कि वह इन जघन्य घटनाओं को छुटपुट घटनाएं बताकर अपना पल्ला बेशर्मी से झाड़ ले और एक-दूसरे पर राजनीतिक छींटाकसी करके अपने कत्र्तव्य व उत्तरदायित्व की इतिश्री कर दे? वैसे घिन्न आती है ऐसे देश, समाज और कानून से। पत्थर दिल भी इन शर्मनाक व दरिन्दगी भरी घटनाओं को देख व सुनकर पानी-पानी हो जाए।

गत 13 मार्च को दिल्ली में रोहिणी से एक 77 वर्षीय वृद्धा अपनी बहन से मिलने के बाद शाम को अपने घर के लिए रिक्शे में रवाना हुई। रास्ते में रिक्शा चालक ने उसे कुछ सुंघाकर बेहोश कर किया और सुनसान इलाके में जाकर वृद्धा की आबरू के साथ-साथ इंसानियत को भी तार-तार कर दिया। इसके बाद वह असहाय वृद्धा को वहीं छोड़कर फरार हो गया। घरवालों थाने में केस दर्ज करवाने पहुंचे तो कोई सुनवाई नहीं हुई।

10 अप्रैल को एक मासूम लड़की को उसक रिश्तेदार फरीदाबाद (हरियाणा) से दिल्ली लेकर गया। वहां जाकर उसने बच्ची के साथ जी-भरकर हैवानियत भरा खेल खेला। किसी तरह वहां से बचकर भागी उस लड़की ने एक टैक्सी से लिफ्ट की गुहार लगाई। टैक्सी में बैठे दो दरिन्दों ने भी इस लाचार मासूम को नहीं छोड़ा और द्वारका में ले जाकर टैक्सी में ही बारी-बारी से तब तक अपनी हवस मिटाई, जब तक उनका दिल नहीं भरा।

17 जून को लखीमपुर (उत्तर प्रदेश) में पुलिस चौकी में मौजूद खाकी वर्दी वाले दरिन्दों ने पहले तो सामूहिक रूप से एक 14 वर्षीय लड़की को अगवा किया और उसके बाद उसकी अस्मत से जी-भरकर प्यास बुझाई। इसके बाद घटना को दूसरा रूप देने के लिए पास खड़े पेड़ पर रस्सी के लटका दिया। परिवार वालों की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दम घूटने से लड़की की मौत दिखा दी। लड़की की माँ की निरन्तर गुहार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मीडिया के भारी दबाव के चलते मामला सीबीसीआईडी के पाले में पहुंचा और दोबारा पोस्टमार्टम रिपोर्ट करवाने के साथ साथ चौकी के 11 खाकी वर्दीधारी दरिन्दों को तत्काल सस्पेन्ड भी किया गया।

18 जून को हरियाणा की राजनीतिक राजधानी और सीएम सीटी कहलाने वाले रोहतक जिले के सैक्टर-एक में बदमाशों ने सरेआम राह चलतीं तीन किशोरियों पर तेजाब डालकर कानून को बौना साबित कर दिया। अगले दिन 19 जून को बहुअकबर पुर गाँव में एक युवती की बलात्कार के बाद हत्या कर दी और युवती का शव पास बह रहे नाले में फेंककर चलते बने। इससे अगले दिन 20 जून को रोहतक के सलारा मोहल्ले में एक मित्र ने अपने मित्र को उसके घर पर खूब शराब पिलाकर बेबस कर दिया और बाद में उसी की नौ वर्षीय मासूम बच्ची को हैवानियत का नंगा नाच खेलते हुए जी-भरकर नोंचा।

19 जून को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में करनैल गंज थाना के इलाके में 12 वर्षीय मासूम दलित लड़की जब शौच के लिए घर से निकली तो उसे अपहृत कर लिया और उसे खेतों में ले जाकर दरिन्दों ने सामूहिक ताण्डव मचाया और अबोध को भेड़ियों की तरह नोंचकर उसे मार डाला। बच्ची तीन दिन से लापता थी, परिवार वालों की लाख कोशिशों के बावजूद पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया।

19 जून को ही यू.पी. के कन्नौज जिले के गोसाईं गंज इलाके में पशुओं को चराने के लिए गईं 14 वर्षीय किशोरी को गाँव के ही दो लफंगों ने दबोच लिया और अपनी हवस मिटाने के लिए जी-तोड़ प्रयास किया। लेकिन जब लड़की की हिम्मत के चलते वे अपने काले मंसूबों में कामयाब नहीं हुए तो चाकू से लड़की की दोनों आंखे गोदकर चलते बने। प्रारम्भ में पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया, बाद में भारी दबाव के चलते केस दर्ज हो पाया।

20 जून को उत्तर प्रदेश एटा जिले के सभापुर गाँव में अपने दो बच्चों के साथ साथ रह रही 35 वर्षीय महिला को देर रात प्रभावशाली परिवार के युवकों ने बलात्कार के बाद जिन्दा जला दिया। पुलिस ने इसे आत्महत्या का रूप देने की भरसक कोशिश की, लेकिन जनता व मीडिया के भारी दबाव के चलते कामयाब न हो सकी।

ये सब घटनाएं तो हाल ही में घटी घटनाओं की बानगी भर ही हैं। यदि सभी घटनाओं की गहराई में जाएं तो इंसान की रूह कांप जाए। नैशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में दिनोंदिन महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधांे में बढ़ौतरी हो रही है। उसके देशभर के 35 शहरों के एक अध्ययन के अनुसार इस तरह के मामलों में दिल्ली अव्वल स्थान पर है और उसके बाद हैदराबाद का स्थान आता है। देश का कोई महानगर, शहर अथवा गाँव नहीं बचा है, जिसमें महिलाओं के साथ किसी न किसी तरह का अत्याचार न हो रहा हो। एक सामान्य अनुमान के अनुसार हर तीन मिनट में एक महिला किसी भी तरह के अत्याचार का शिकार हो रही है। देश में हर 29वें मिनट में एक महिला की अस्मत को लूटा जा रहा है। हर 77 मिनट में एक लड़की दहेज की आग में झोंकी जा रही है। हर 9वें मिनट में एक महिला अपने पति या रिश्तेदार की क्रूरता का शिकार हो रही है। हर 24वें मिनट में किसी न किसी कारण से एक महिला आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रही है। नैशनल क्राइम ब्यूरो के अनुमानों के अनुसार ही प्रतिदिन देश में 50 महिलाओं की इज्जत लूट ली जाती है, 480 महिलाओं को छेड़खानी का शिकार होना पड़ता है, 45 प्रतिशत महिलाएं पति की मार मजबूरी में सहती हैं, 19 महिलाएं दहेज की बलि चढ़ जाती हैं, 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं हिंसा का शिकार होती हैं और हिंसा का शिकार 74.8 प्रतिशत महिलाएं प्रतिदिन आत्महत्या का प्रयास करती हैं।

ये सब आंकड़े, घटनाएं, शोध, सर्वेक्षण और हालात देश में महिलाओं की स्थिति को स्वत: बयां कर रहे हैं। विडम्बना और अचरज का विषय तो यह है कि इन सबके बावजूद समाज का कोई भी वर्ग उतना गंभीर नजर नहीं आ रहा है, जितना कि आना चाहिए! प्रतिदिन एक से बढ़कर एक दरिन्दगी भरी घटनाओं को पढ़कर, सुनकर और देखकर एक सामान्य सी प्रतिक्रिया के बाद सामान्य क्रिया-कलापों में व्यस्त हो जाना, देश व समाज की निष्क्रियता एवं संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को दर्शाता है, जोकि भावी समाज के लिए सबसे घातक सिद्ध होने वाला है। देश के इस गंभीर एवं संवेदनशील पर राजनीतिकों के बीच चिरपरिचित रस्साकशी और समाजसेवियों एवं महिला प्रतिनिधियों द्वारा भी अप्रत्याशित अनर्गल प्रलाप दिल को झकझोरने वाला है। इससे बढ़कर महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के समाचारों को दरकिनार करके ‘रतन का स्वयंवर’ कार्यक्रम में आनंदातिरेक महिलाओं को देखकर तो कलेजा मुंह को आना स्वभाविक ही है। अंत में कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आखिर देश में ये हो क्या रहा है और ये जो कुछ भी हो रहा है, वह अच्छा नहीं हो रहा है। इसकी कीमत देश व समाज को भविष्य में बहुत भारी चुकानी पड़ सकती है।



(राजेश कश्यप)

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

टिटौली (रोहतक), हरियाणा-१२४००५

Mob. 09416629889



e-mail: rkk100@rediffmail.com

शुक्रवार, 17 जून 2011

1857 की क्रांति का महान क्रांतिवीर : उदमी राम

28 जून/शहीदी दिवस विशेष

1857 की क्रांति का महान क्रांतिवीर : उदमी राम

-राजेश कश्यप
सन् 1857 की क्रांति के दौर में असंख्य ऐसे असीम महान क्रांतिकारी, देशभक्त, बलिदानी, एवं शहीद रहे, जो इतिहास के पन्नों में या तो दर्ज ही नहीं हो जाए, या फिर सिर्फ आंशिक तौरपर ही उनका उल्लेख हो पाया। ऐसा ही एक उदाहरण सोनीपत जिले के गाँव लिबासपुर के महान क्रांतिकारी उदमी राम हैं। सोनीपत से सात किलोमीटर दूर बहालगढ़ चौंक के नजदीक इस लिबासपुर गाँव के नंबरदार उदमी राम ही थे और दूर-दूर तक उनकी देशपरस्ती के किस्से मशहूर थे। उदमी राम ने आजादी पाने के लिए हर मजदूर, किसान, दुकानदार आदि को अपनी ताकत बना लिया था। उन्होंने लिबासपुर व आसपास के कुंडली, भालगढ़, खामपुर, अलीपुर, हमीदपुर, सराय आदि गाँवों के जन-जन में आजादी की बलिवेदी पर कुर्बान होने का जज्बा कूट-कूट कर भर दिया था।
उन दिनों उदमी राम के नेतृत्व में २२ नौजवान वीरों का एक दल तो चौबीस घण्टे अंग्रेजी अफसरों को ठिकाने लगाने के मि’ान में लगा रहता था। सबसे बड़ी बात यह थी कि वे भूमिगत होकर अपने पारंपरिक हथियारों मसलन, लाठी, जेली, गंडासी, कुल्हाड़ी, फरसों  आदि से दिल्ली से होते हुए यहां से गुजरने वाले अंग्रेज अफसरों पर धावा बोलते और उन्हें मौत के आगोश में सुलाकर गहरी खाईयों व झाड़-झंखाड़ों के हवाले कर देते थे।
एक दिन एक अंग्रेज अधिकारी लिबासपुर के नजदीक जी. टी. रोड़ से निकल रहा था। जब इसकी सूचना उदमी राम को लगी तो उन्होंने अपनी टोली के साथ उस अंग्रेज अफसर को भी घात लगाकर मार डालने की योजना बना डाली। उदमी राम ने साथियों सहित अफसर पर घात लगाकर हमला बोल दिया और उस अंगे्रज अफसर को मौत के घाट उतार दिया।
विडम्बनावश उस अंग्रेज अफसर के साथ उनकी पत्नी भी थीं। भारतीय संस्कृति के वीर स्तम्भ उदमी राम ने एक महिला पर हाथ उठाना पाप समझा और काफी सोच-विचार कर उस अंग्रेज महिला को लिबासपुर के पड़ौसी गाँव भालगढ़ में एक बाई (ब्राहा्रणी) के घर बड़ी मर्यादा के साथ सुरक्षित पहुंचा दिया और बाई को उसकी पूरी देखरेख करने की जिम्मेदारी सौंप दी। उदमी राम के कहेनुसार अंग्रेज महिला को अच्छा खाना, कपड़े और अन्य सामान दिया जाने लगा।
कुछ दिन बाद इस घटना का समाचार आसपास के गाँवों में फैल गया। कौतुहूलवश लोग उस अंग्रेज महिला को देखने भालगढ़ में बाई के घर आने लगे और उदमी राम व उसके साथियों के संस्कारों की दाद देने लगे। राठधाना गाँव का निवासी सीताराम अंग्रेजों का मुखबिर और दलाल था। उदमी राम एवं उनके साथियों से संबंधित नया समाचार सुनकर वह भी घटना का पता लगाने के लिए पहले लिबासपुर गाँव में पहुंचा और फिर सारी जानकारी एकत्रित करके बहालगढ़ में बाई के घर जा पहुंचा।
अंग्रेजों के मुखबिर सीता राम बंधक अंग्रेज महिला से मिला और लिबासपुर से एकत्रित की गई सारी जानकारी उस महिला को दे दी। उसने अंगे्रज महिला को उदमी राम एवं उनके सभी साथियों गुलाब सिंह, जसराम, रामजस, जसिया, रतिया आदि के बारे में विस्तार से जानकारी दी। केवल इतना ही नहीं, सीताराम ने उस अंग्रेज महिला को बताया कि लिबासपुर गाँव ही अंग्रेजी सरकार के विद्रोह का केन्द्र है और उसी के निवासी ही नंबरदार उदमी राम के नेतृत्व में अंग्रेज अफसरों की घात लगाकर हत्या कर रहे हैं। सीता राम ने अंग्रेज महिला को यह कहकर और भी डरा दिया कि बहुत जल्द वे क्रांतिकारी उसे भी मौत के घाट उतारने वाले हैं। यह सुनकर अंग्रेज महिला भय के मारे कांप उठी। उसने चालाकी से काम लेते हुए सीता राम को बहुत बड़ा लालच दिया और कहा कि यदि वह उसकी मदद करे और उसे पानीपत के अंग्रेजी कैम्प तक किसी तरह पहुंचा दे तो उसे मुंह मांगा ईनाम दिलवाएगी।
सीता राम तो था ही इसी लालच की इंतजार में। उसने झट अंग्रेज महिला की मदद करना स्वीकार कर लिया। लेकिन उसके मार्ग में बाई बाधा बन गई। बाई ने सीता राम को भला-बुरा कहा और अंग्रेज महिला को किसी भी कीमत पर घर से बाहर न जाने देने की जिद्द पर अड़ गई। अब सीता राम ने बाई को यह कहकर बुरी तरह धमकाया और डराया कि यदि वह उसकी बात नहीं मानेगी तो अंग्रेजी सरकार को वह इस घटना की खबर दे देगा और फिर उसके पूरे परिवार को कोल्हू के नीचे कुचल दिया जाएगा। बाई डर गई और डरकर गद्दार सीता राम के हाथों की कठपुतली बन गई। अंतत: सीता राम अपने मंसूबे में कामयाब हुआ। वह बाई के साथ रातोंरात लोगों की नजरों से बचते-बचाते हुए उस अंग्रेज महिला को लेकर पानीपत के अंग्रेजी कैम्प में पहुंच गया।
कैम्प में पहुंचकर अंग्रेज महिला ने सीता राम की दी हुई सभी गोपनीय जानकारियां अंग्रेजी कैम्प में दर्ज करवाईं और यह भी कहा कि विद्रोह में सबसे अधिक भागीदारी लिबासपुर गाँव ने की है और उसका नेता उदमीराम है। इसके बाद अंग्रेजों का कहर लिबासपुर एवं उदमीराम पर टूटना ही था। सन् 1857 की क्रांति पर काबू पाने के बाद क्रांतिकारियों एवं विद्रोही गाँवों को भयंकर दण्ड देना शुरू किया। इसी क्रम में अंग्रेजों ने लिबासपुर गाँव को सुबह चार बजे चारों तरह से भारी पुलिस बल के साथ घेर लिया और सख्त नाकेबन्दी कर दी, ताकि एक भी व्यक्ति बचकर जाने न पाए। क्रांतिवीर उदमी राम अपने साथियों सहित अपने पारंपरिक हथियार लाठी, जेली, गंडासी, फरसे आदि के साथ अंग्रेजी सिपाहियों का काफी देर तक मुकाबला किया। अंतत: आधुनिक हथियारों से लैस सिपाहियों के आगे उदमी राम और उसके साथियों को हार का सामना करना पड़ा। कई क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया, काफी क्रांतिकारी मौके पर ही मारे गए और कई भागने में कामयाब हो गये। क्रांतिकारियों के नायक उदमी राम को भी मौके की नजाकत को समझते हुए पास के खेतों में छुपने को विवश होना पड़ा।
इसके बाद अंग्रेज सिपाही गाँव में घुसे और उनके सामने जो भी आया उसी को पकड़ लिया। गाँव में एकाएक आतंक का माहौल बन गया। बच्चे से लेकर बूढ़े तक अंग्रेजों के आतंक से सिहर उठे। सभी गाँव वालों को जबरदस्ती घर से पकड़-पकड़कर चौपाल में एकत्रित कर दिया। इसके बाद हर किसी पर अंग्रेजों का कहर टूट पड़ा। सभी लोगों, महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों को जमीन पर उलटा लिटा-लिटाकर कोड़ों से भयंकर पिटाई की गई, लेकिन किसी ने क्रांतिकारियों के खिलाफ मुंह नहीं खोला।
उसी चौपाल में उदमी राम के पिता को भी पकड़कर लाया गया और उसकी बेरहमी से पिटाई की गई और कई तरह से अमानवीय यातना देने के साथ-साथ बुरी तरह से बेइज्जत किया। उनपर अपने लड़के उदमी राम को अंग्रेजी सरकार के सामने आत्म-समर्पण करने के लिए भारी दबाव बनाया। अंतत: वह बुजुर्ग अमानवीय यातनाओं के आगे बेबस हो गया और उसने घर की छत पर खड़े होकर अपने बेटे उदमी राम को आवाज लगाई।
पिता की दर्दभरी आवाज सुनकर उदमी राम पर रहा नहीं गया और उसने अपने खेत की मिट्टी को चूमा और माथे पर तिलक लगाकर उसे आखिरी सलाम किया, क्योंकि क्रान्तिवीर उदमी राम को अंग्रेजी सरकार के समक्ष आत्म-समर्पण करने के अंजाम को भलीभांति पता था। अंजाम की परवाह किए बगैर उदमी राम पूरी निडरता के साथ खेतों से निकलकर गाँव की चौपाल की तरफ चल पड़ा। जैसे ही उसने गाँव में प्रवेश किया, उसका सामना दो सिपाहियों से हो गया और भारत माँ के इस सच्चे लाल ने अपनी जेली से दोनों सिपाहियों को यमलोक पहुंचा दिया। इसके बाद वह खून से सनी जेली के साथ गाँव में पहुंच गया।
उदमीराम के इस भयंकर रौद्र रूप को देखकर चौपाल में मौजूद अंग्रेज सिपाही एकदम हक्के-बक्के रह गये और खौफ के भाव उनके चेहरों पर उतर आए। अंग्रेज सिपाहियों ने साहस बटोरा और एकाएक उदमी राम पर टूट पड़े और उन्हें बन्धक बना लिया।
उदमी राम के बन्धक बनने के बाद अब बाजी पूरी तरह से अंग्रेजों के हाथ में आ गई थी। अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों की शिनाख्त के लिए देशद्रोही एवं गद्दार सीता राम और भालगढ़ की बा्रहा्रणी बाई, जिसके घर अंगे्रज महिला को सुरक्षित रखा गया था को भी चौपाल में बुलवाया गया। गद्दारों ने उस समय जिस-जिस व्यक्ति का नाम लिया, अंग्रेजों ने उन सबको तत्काल गिरफ्तार कर लिया।
इसके बाद अंगे्रजों ने क्रांतिकारियों को जो दिल दहलाने वाली भयंकर सजाएं दीं, उन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। क्रान्तिवीर उदमी राम को उनकी पत्नी श्रीमती रत्नी देवी सहित गिरफ्तार करके राई (सोनीपत) के कैनाल रैस्ट हाऊस में ले जाकर उन्हें पीपल के पेड़ पर लोहे की कीलों से ठोंक दिया गया। अन्य क्रांतिकारियों को जी.टी. रोड़ पर लेटाकर बुरी तरह से कोड़ों से पीटा गया और उनकी चमड़ी उधेड़ दी गई। इसके बाद सड़क कूटने वाले कोल्हू के पत्थरों के नीचे राई पड़ाव के पास बहालगढ़ चौंक पर सरेआम खून से लथपथ क्रांतिकारियों को बुरी तरह से रौंद दिया गया। इनमें से एक कोल्हू का पत्थर सोनीपत के ताऊ देवीलाल पार्क में आज भी स्मृति के तौरपर रखा हुआ है।
क्रांतिकारियों का कतरा-कतरा कोल्हू के पत्थरों के नीचे मलहम बनकर सड़क पर फैल गया। इस खौफनाक मौत को देखकर आसमान भी थर्रा उठा।
उधर राई के रैस्ट हाऊस में पीपल के पेड़ पर लोहे की कीलों से टांगे गए क्रांतिवीर उदमी राम और उसकी पत्नी रत्नी देवी को तिल-तिल करके तड़पाया जा रहा था। उन दोनों को खाने के नाम पर झन्नाटेदार कोड़े और पीने के नाम पर पेशाब दिया जाता था। कुछ दिनों बाद उनकी पत्नी ने पेड़ पर कीलों से लटकते-लटकते ही जान दे दी। इतिहासकारों के अनुसार क्रांतिवीर उदमी राम ने 35 दिन तक जीवन के साथ जंग लड़ी और 35वें दिन भारत माँ का यह लाल इस देश व देशवासियों को हमेशा-हमेशा के लिए आजीवन ऋणी बनाकर चिन-निद्रा में सो गया।
उदमी राम की शहादत के बाद अंगे्रजी सरकार ने उनके पार्थिव शरीर का भी बहुत बुरा हाल किया और कोल्हू के नीचे रौंदकर सड़क पर बहा दिया। क्रांतिवीर उदमी राम की स्मृति में एक स्मृति-स्तम्भ सोनीपत के ही ताऊ देवीलाल पार्क में बनाया गया है।
अंग्रेजों का दिल इतने भयंकर दमन व अत्याचार के बावजूद नहीं भरा। अंग्रेजी सरकार ने अपने मुखबिर सीताराम को पूरा लिबासपुर गाँव मात्र  900 रूपये में निलाम कर दिया। सबसे बड़ी विडम्बना की बात तो यह है कि आजादी के छह दशक बाद भी आज लिबासपुर गाँव की मल्कियत सीताराम के वंशजों के नाम ही है और शहीद उदमीराम एवं उसके क्रांतिकारी शहीदों के वंशज आज भी अंग्रेजी राज की भांति अपनी ही जमीन पर मुजाहरा करके गुजारा कर रहे हैं। लिबासपुर के ग्रामीण अपनी जमीन वापिस पाने के लिए दशकों से कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी तक न्याय नहीं मिला है। यदि शहीद उदमी राम की शहादत पर सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो लिबासपुर को शहीद गाँव और शहीदों के वंशजों को शहीद-परिवार का सम्मान एवं उसका लाभ देना ही होगा। इसके साथ ही उनकी अपनी जमीन भी वापिस लौटानी होगी। तभी हम सच्चे अर्थों में शहीदों की शहादत को नमन कर सकते हैं।

आज भी कर रहा है बगावत का भुगतान लिबासपुर गाँव
सन् 1857 की क्रांति में सबसे बड़ी कुर्बानी देने वाला लिबासपुर गाँव और अमर शहीद क्रांतिकारी उदमी राम सहित सभी शहीदों के वंशज, स्वतंत्रता प्राप्ति के छह दशक बाद भी बगावत का भुगतान कर रहे हैं। सबसे बड़ी विडम्बना देखिए, सरकारी कागजों में पुरस्कार के तौरपर नीलामी में अंग्रेजों से लिबासपुर को हासिल करने वाले सीताराम के वंशजों का स्वामित्व आजादी के छह दशक बाद भी चल रहा है। लिबासपुर के शहीद क्रांतिकारियों के बीस परिवार आज भी आजाद अपना हक हासिल करने के लिए न्यायालयों के चक्कर कर रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक आजादी के बाद लागू हुई चकबन्दी के दौरान गाँव को ‘कॉमन प्रपज’ के लिए जो जमीन दी गई, उस पर भी सीताराम परिवारों का स्वामित्व है। सोनीपत जिला बार के मुंशी एवं लिबासपुर निवासी अतर सिंह का कहना है कि उस समय लिबासपुर गाँव की 2200 बीघे जमीन थी। इसमें से कुछ जमीन मुजाहरा करके और कुछ पैसों से ग्रामीणों ने खरीद ली और अब भी गाँव के बीस परिवार लगभग 150 एकड़ जमीन का हक पाने के लिए कोर्टों के चक्कर काट रहे हैं। अपनी इस विडम्बनापूर्ण बदकिस्मती के दर्द को बयां करते हुए लिबासपुर के 80 वर्षीय वृद्ध एवं गाँव के भूतपूर्व सरपंच चौधरी सुल्तान सिंह कहते हैं कि, "सन् 1857 की क्रांति के बाद से लेकर आज तक इस गाँव के साथ अन्याय होता आ रहा है। गाँववासी अपनी व्यथा को लेकर आजादी के बाद नेहरू जी के पास भी गए और दिल्ली से लाहौर तक के न्यायालयों में गए, लेकिन कहीं न्याय नहीं मिला। किसी भी सरकार ने हमारी सुनवाई नहीं की। हम अपनी ही जमीन पर मुजाहरे बन गए।

आज भी मुजाहरे के तौरपर किसानों को देना पड़ता है फसल का एक-तिहाई हिस्सा

शहीद उदमी राम के 75 वर्षीय वंशज जयनारायण कहना है कि आजादी के 64 साल बाद भी हमें अंग्रेजों के जमाने की तरह मुजाहरे के तौरपर राठधाना निवासी सीताराम के वंशजों को प्रति छ: माही फसल का एक-तिहाई हिस्सा देना पड़ता है। यह सब अन्याय नहीं तो और क्या है। जयनारायण ने रूंधे गले से बताया कि हम अपनी ही जमीन पर मजदूर का जीवन जी रहे हैं और कई पीढ़ियों से न्याय पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन हमें कहीं न्याय नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने जिस आजादी के लिए अपनी कुर्बानी दी, वह आजादी तो हमें आज तक नसीब नहीं हुई है, उल्टे हम अपनों के ही गुलाम बनकर रह गए हैं।

‘निर्मल ग्राम’ बनने के बावजूद लिबासपुर में समस्याओं का लगा है अंबार

28 जून, 2007 में चौधरी भूपेन्द्र हुड्डा की सरकार ने शहीद उदमी राम के शहीदी दिवस पर लिबासपुर गाँव को ‘निर्मल ग्राम’ घोषित कर दिया था। लेकिन इसके बावजूद इस गाँव की समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। गाँव में गन्दे पानी की निकासी भी नहीं हो पा रही है, जिससे गाँव के बीचों-बीच एक दस फूट गहरा गन्दगी का तालाब बन चुका है। इस बारे में पन्द्रह वर्षों तक पंच रह चुके राजू ने बताते हैं कि हम हर अधिकारी के यहां गाँव के गन्दे पानी की निकासी के लिए अपनी समस्या को लेकर गए, लेकिन कहीं, कोई सुनवाई नहीं हुई। हमारी आज भी यही माँग है कि ये गन्दगी गाँव से बाहर जानी चाहिए। हम बिमार पड़ रहे हैं। गाँव के बीच में यह 8-10 फूट गहरा गन्दा तालाब बन चुका है। इससे बच्चों को भी खतरा बना रहता है। इसी समस्या पर ६६ वर्षीय वृद्धा श्रीमती फूलो ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि गाँव के आदमी व औरत अफसरों के चक्कर लगाकर थक चुके हैं, लेकिन हमारी समस्या का समाधान करने वाला कोई नहीं मिला है। लिबासपुर गाँव के नम्बरदार राजेश सरोहा का कहना है कि हमारे गाँव लिबासपुर को ‘निर्मल गाँव’ घोषित किए जाने के बावजूद उन्हें निर्मल गाँव वाली सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। गाँव के गन्दे पानी की निकासी भी नहीं हो पा रही है। गाँव के बीच में सड़ रहे पानी से गाँव में प्रतिवर्ष बिमारियां फैल रही हैं और गरीब लोगों की मौतें हो रही हैं। सरकार से निवेदन है कि हमारी इन सभी समस्याओं का तत्काल समाधान करे। गाँव में चौधरी उद्यमीराम से संबंधित एक द्वार निर्माणाधीन है, वह भी घपले की चपेट में आने से अधर में लटका पड़ा है।

लिबासपुर में रहते हैं विभिन्न बिरादरियों के एक हजार से अधिक लोग

लिबासपुर गाँव में चार मुख्य ठौले हैं, जसवाणे, हिन्द्याण, झुण्डा के और छक्कड़े। इन ठौलों में जाट, ब्राहमण, वाल्मिकी, चमार, कुम्हार, फकीर, नाई आदि रहते आए हैं। पहले प्रति ठौले चार-चार या पाँच-पाँच घर होते थे। आज तो कम से कम चालीस-चालीस घर हो गए हैं। इस समय लिबासपुर गाँव में लगभग 800 से 1000 के बीच मतदाता हैं।

150 साल बाद मिली गाँच को नम्बरदारी

सन् 1857  में लिबासपुर गाँव के नम्बरदार शहीद उदमी राम थे। इसके बाद उनसे यह नम्बरदारी अंग्रेजों ने छीनकर सीताराम परिवार को सौंप दी थी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 150 वर्षों तक लिबासपुर गाँव की यह नम्बरदारी सीताराम परिवार के यहीं गिरवी थी। सन् 2008 में सीताराम परिवार के वंशज खेमचन्द की मृत्यु के बाद नम्बरदारी का पद रिक्त हो गया था। इस रिक्त पद पर नंबरदारी पद के लिए लंबे समय से संघर्षरत लिबासपुर ग्रामवासियों ने मुख्यमंत्री चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के समक्ष अपनी दावेदारी प्रस्तुत की, जिसे हरियाणा सरकार ने उनकी दावेदारी का सम्मान करते हुए लिबासपुर गाँव को नम्बरदारी लौटा दी। यह गौरवमयी नम्बरदारी लिबासपुर गाँव के ३९ वर्षीय युवा राजे’ा सरोहा को 20 फरवरी, 2008 को दी गई है।

बुनियादी सुविधाओं से वंचित है शहीद उदमी राम का वंशज

सबसे बड़ी विडम्बना की बात तो यह है कि जिस आजादी के लिए उदमी राम ने सबसे बड़ी कुर्बानी दी, उसी आजादी में उनका वंशज हरदेवा रोटी-कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी मोहताज बना हुआ है। गाँव लिबासपुर के मध्य में आंगनवाड़ी भवन के पास एक अत्यन्त जर्जर हालत में है एक मकान, जिसमें रहता है महान शहीद उदमी राम का वंशज-परिवार। परिवार मंे कुल छह सदस्य हैं। श्री हरदेवा (मुखिया, 48 वर्ष), श्रीमती मुकेश देवी (पत्नी, 40 वर्ष) और चार बच्चे सीमा (15 वर्ष), परमजीत (7 वर्ष), हर्ष (5 वर्ष) व मोनी ( 3  वर्ष)।
जब इस परिवार के हालातों से रूबरू होते हैं तो कलेजा मुंह को आता है। यह परिवार दाने-दाने के लिए मोहताज है और गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में आता है। घर का मुखिया हरदेवा कर्ज और बीमारी के बोझ के नीचे हड्डियों का ढ़ांचा मात्र रह गया है। घर की रोजी-रोटी चलाने के लिए दीन-हीन हरदेवा दूर-दूर गाँवों में मजदूरी की तलाश में जाता है। कभी मजदूरी मिलती है, कभी नहीं। जब मजदूरी मिलती है तो बीमारी काम के आड़े आ जाती है। घर को कोई सदस्य बीमार पड़ता है तो डॉक्टर को दिखाने के लिए सौ बार सोचा जाता है, क्योंकि दवा के लिए खर्च के पैसे ही नहीं हैं। सिर छिपाने के लिए पूर्वजों का पुश्तैनी मकान है, जोकि जर्जर हो चुका है। घरेलू सामान के लिए दुकानदारों के पास उधार खाता इतना बढ़ चुका है कि वे और सामान देने से कन्नी काटने लगे हैं। डॉक्टरों की उधार के चलते अब ईलाज भी सहज संभव नहीं हो पाता। जर्जर मकान कब गिर जाए, इसी भय के साये में समय काटना मजबूरी बन चुका है। गाँव के कुछ रसूखदार लोगों का कर्ज पिछले कई वर्षों से गले की फांस बना हुआ है। कुल मिलाकर मुसीबतों का विशाल पहाड़ हरदम ढ़ो रहा है महान शहीद उदमी राम का वंशज परिवार।

लिबासपुर निवासी आज भी मानते हैं स्वयं को गुलाम
कितने बड़े आश्चर्य एवं विडम्बना का विषय है कि देश को आजाद हुए छह दशक से अधिक हो चुके हैं और आजादी के लिए कुर्बान होने वाले शहीदों के वंशज आज भी स्वयं को गुलामी से मुक्त नहीं मान पा रहे हैं। इस बारे में नवनियुक्त नम्बरदार राजेश सरोहा ने बातचीत के दौरान बताया कि बड़े दु:ख की बात है कि आजादी के बावजूद हम अपने आपको गुलाम मानते हैं। उसका कारण यह है कि हमारे सार्वजनिक जोहड़, रास्ते, कुंए आदि ‘कॉमन-प्रपज’ की जमीन के मालिक आज भी वे सीताराम के वंशज ही हैं और हम उनके ‘मुजाहरे’ हैं। आज हमारे गाँव की हर प्रकार की जमीन पर उनका मालिकाना हक है। आज भी 150 एकड़ जमीन ऐसी है, जिसके वे मालिक हैं और मुजाहरे हैं। इसी नाइंसाफी की लड़ाई हम कोर्टों में लड़ रहे हैं। हमारे बुजुर्गों ने भी 50-60 सालों तक दिल्ली से लेकर लाहौर तक कानूनी तारीखें भुगती हैं।
हमारी मुख्य मांगे हैं कि व्यक्तिगत झगड़ों के अलावा गाँव की जो जमीन ‘कॉमन-प्रपज’ के लिए छोड़ी गई है, उसकी मलकियत हमारे गाँव को दी जाए। 1953 की चकबन्दी के नियम के तहत हमें मुजाहरों से मालिक घोषित किया जाए और हमारी ‘कॉमन-प्रपज+’ जमीन का इंतकाल गाँव के नाम पर चढ़ाया जाए। हमारे लिबासपुर गाँव को ‘स्वतंत्रता सेनानी गाँव’ घोषित किया जाए और शहीदों के वंशजों के परिवारों को ‘स्वतंत्रता सेनानी परिवार’ घोषित किया जाए एवं उन्हें वे सभी सरकारी सुविधाएं मुहैया करवाई जाएं, जो एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार को सरकार द्वारा दी जा रही हैं। गाँव में शहीद उदमी राम का स्मारक बनाया जाए। मुख्यमंत्री चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा द्वारा हमारे गाँव लिबासपुर को ‘आदर्श गाँव’ घोषित किए जाने के बावजूद उन्हें आदर्श गाँव वाली सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। गाँव के गन्दे पानी की निकासी भी नहीं हो पा रही है। गाँव के बीच में सड़ रहे पानी से गाँव में प्रतिवर्ष बिमारियां फैल रही हैं और गरीब लोगों की मौतें हो रही हैं। सरकार से निवेदन है कि हमारी इन सभी समस्याओं का तत्काल समाधान करे।




(राजेश कश्यप)

स्वतंत्र पत्रकार एवं युवा समाजसेवी

टिटौली (रोहतक)

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