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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

क्रांतिकारियों के सरताज: चन्द्रशेखर आजाद

27 फरवरी/पुण्यतिथि विशेष

क्रांतिकारियों के सरताज: चन्द्रशेखर आजाद
-राजेश कश्यप
चन्द्रशेखर आजाद
आज हम जिस गौरव और स्वाभिमान के साथ आजादी का आनंद ले रहे हैं, वह देश के असंख्य जाने-अनजाने महान देशभक्तों के त्याग, बलिदान, शौर्य और शहादतों का प्रतिफल है। काफी देशभक्त तो ऐसे थे, जिन्होंने छोटी सी उम्र में ही देश के लिए अतुलनीय त्याग और बलिदान देकर अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में में अंकित करवाया। इन्हीं महान देशभक्तों में से एक थे चन्द्रशेखर आजाद। उनका जन्म 23 जुलाई, 1906 को उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के बदरका नामक गाँव में ईमानदार और स्वाभिमानी प्रवृति के पंडित सीताराम तिवारी के घर श्रीमती जगरानी देवी की कोख से हुआ। चाँद के समान गोल और कांतिवान चेहरे को देखकर ही इस नन्हें बालक का नाम चन्द्रशेखर रखा गया। पिता पंडित सीताराम पहले तो अलीरापुर रियासत में नौकरी करते रहे, लेकिन बाद में भावरा नामक गाँव में बस गए। इसी गाँव में चन्द्रशेखर आजाद का बचपन बीता। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में बचपन बीतने के कारण वे तीरन्दाजी व निशानेबाजी में अव्वल हो गए थे।
चन्द्रशेखर बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उच्च शिक्षा के लिए वे काशी जाना चाहते थे। लेकिन, इकलौती संतान होने के कारण माता-पिता ने उन्हें काशी जाने से साफ मना कर दिया। धुन के पक्के चन्द्रशेखर ने चुपचाप काशी की राह पकड़ ली और वहां जाकर अपने माता-पिता को कुशलता एवं उसकी चिन्ता न करने की सलाह भरा पत्र लिख दिया। उन दिनों काशी में कुछ धर्मात्मा पुरूषों द्वारा गरीब विद्यार्थियों के ठहरने, खाने-पीने एवं उनकी पढ़ाई का खर्च का बंदोबस्त किया गया था। चन्द्रशेखर को इन धर्मात्मा लोगों का आश्रय मिल गया और उन्होंने संस्कृत भाषा का अध्ययन मन लगाकर करना शुरू कर दिया।
सन् 1921 में देश में गांधी जी का राष्ट्रव्यापी असहयोग आन्दोलन चल रहा था तो स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने एवं विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार करने का दृढ़ सकल्प देशभर में लिया गया। अंग्रेजी सरकार द्वारा आन्दोलकारियों पर बड़े-बड़े अत्याचार किए जाने लगे। ब्रिटिश सरकार के जुल्मों से त्रस्त जनता में राष्ट्रीयता का रंग चढ़ गया और जन-जन स्वाराज्य की पुकार करने लगा। विद्याार्थियों में भी राष्ट्रीयता की भावना का समावेश हुआ। पन्द्रह वर्षीय चन्द्रशेखर भी राष्ट्रीयता व स्वराज की भावना से अछूते न रह सके। उन्होंने स्कूल की पढ़ाई के दौरान पहली बार राष्ट्रव्यापी आन्दोलनकारी जत्थों में भाग लिया। इसके लिए उन्हें 15 बैंतों की सजा दी गई। हर बैंत पड़ने पर उसने ‘भारत माता की जय’ और के नारे लगाए। उस समय वे मात्र पन्द्रह वर्ष के थे। सन् 1922 में गाँधी जी द्वारा चौरा-चौरी की घटना के बाद एकाएक असहयोग आन्दोलन वापिस लेने पर क्रांतिकारी चन्द्रशेखर वैचारिक तौरपर उग्र हो उठे और उन्होंने क्रांतिकारी राह चुनने का फैसला कर लिया। उसने सन् 1924 में पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल, योगेशचन्द्र चटर्जी आदि क्रांतिकारियों द्वारा गठित ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकल एसोसिएशन’ (हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक संघ) की सदस्यता ले ली।यह सभी क्रांतिकारी भूखे-प्यासे रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों में दिनरात लगे रहते।
इसी दौरान क्रांतिकारियों ने बनारस के मोहल्ले में ‘कल्याण आश्रम’ नामक मकान में अपना अड्डा स्थापित कर लिया। उन्होंने अंग्रेजी सरकार को धोखा देने के लिए आश्रम के बाहरी हिस्से में तबला, हारमोनियम, सारंगी आदि वाद्ययंत्र लटका दिए। एक दिन रामकृष्ण खत्री नामक साधू ने बताया कि गाजीपुर में एक महन्त हैं और वे मरणासन्न हैं। उसकी बहुत बड़ी गद्दी है और उसके पास भारी संख्या में धन है। उसे किसी ऐसे योग्य शिष्य की आवश्यकता है, जो उसके पीछे गद्दी को संभाल सके। यदि तुममें से ऐसे शिष्य की भूमिका निभा दे तो तुम्हारी आर्थिक समस्या हल हो सकती है। काफी विचार-विमर्श के बाद इस काम के लिए चन्द्रशेखर आजाद को चुना गया। चन्द्रशेखर न चाहते हुए भी महन्त के शिष्य बनने के लिए गाजीपुर रवाना हो गए। चन्द्रशेखर के ओजस्वी विचारों एवं उसके तेज ने महन्त को प्रभाव में ले लिया और उन्हें अपना शिष्य बना लिया। चन्द्रशेखर मन लगाकर महन्त की सेवा करने और महन्त के स्वर्गवास की बाट जोहने लगे। लेकिन, जल्द ही आजाद किस्म की प्रवृति के चन्द्रशेखर जल्दी ही कुढ़ गए। क्योंकि उनकी सेवा से मरणासन्न महन्त पुनः हृष्ट-पुष्ट होते चले गए। चन्द्रशेखर ने किसी तरह दो महीने काटे। उसके बाद उन्होंने अपने क्रांतिकारी साथियों को पत्र लिखकर यहां से मुक्त करवाने के लिए आग्रह किया। लेकिन, मित्रों ने उनके आग्रह को ठुकरा दिया। चन्द्रशेखर ने मन मसोसकर कुछ समय और महन्त की सेवा की और फिर धन पाने की लालसाओं और संभावनाओं पर पूर्ण विराम लगाकर एक दिन वहां से खिसक लिए।
इसके बाद उन्होंने पुनः अंग्रेजी सरकार के खिलाफ सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी। उन्होंने एक शीर्ष संगठनकर्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। वे अपने क्रांतिकारी दल की नीतियों एवं उद्देश्यों का प्रचार-प्रसार के लिए पर्चे-पम्फलेट छपवाते और लोगों में बंटवाते। इसके साथ ही उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की मदद से सार्वजनिक स्थानों पर भी अपने पर्चे व पम्पलेट चस्पा कर दिए। इससे अंग्रेजी सरकार बौखला उठी। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकल एसोसिएशन’ के बैनर तले राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 9 अगस्त, 1925 को काकोरी के रेलवे स्टेशन पर कलकत्ता मेल के सरकारी खजाने को लूट लिया। यह लूट अंग्रेजी सरकार को सीधे और खुली चुनौती थी। परिणामस्वरूप सरकार उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गई। गुप्तचर विभाग क्रांतिकारियों को पकड़े के लिए सक्रिय हो उठा और 25 अगस्त तक लगभग सभी क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया। लेकिन, चन्द्रशेखर आजाद हाथ नहीं आए। गिरफ्तार क्रांतिकारियों पर औपचारिक मुकदमें चले। 17 दिसम्बर, 1927 को राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और दो दिन बाद 19 दिसम्बर को पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, अफशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह आदि शीर्ष क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया गया। इसके बाद सन् 1928 में चन्द्रशेखर ने ‘एसोसिएशन’ के मुख्य सेनापति की बागडोर संभाली।
चन्द्रशेखर आजाद अपने स्वभाव के अनुसार अंग्रेजी सरकार के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों को बखूबी अंजाम देते रहे। वे अंग्रेजी सरकार के लिए बहुत बड़ी चिन्ता और चुनती बन चुके थे। अंग्रेजी सरकार किसी भी कीमत पर चन्द्रशेखर को गिरफ्तार कर लेना चाहती थी। इसके लिए पुलिस ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। पुलिस के अत्यन्त आक्रमक रूख को देखते हुए और उसका ध्यान बंटाने के लिए चन्द्रशेखर आजाद झांसी के पास बुन्देलखण्ड के जंगलों में आकर रहने लगे और दिनरात निशानेबाजी का अभ्यास करने लगे। जब उनका जी भर गया तो वे पास के टिमरपुरा गाँव में ब्रह्मचारी का वेश बनाकर रहने लगे। गाँव के जमींदार को अपने प्रभाव में लेकर उन्होंने अपने साथियों को भी वहीं बुलवा लिया। भनक लगते ही पुलिस गाँव में आई तो उन्होंने अपने साथियों को तो कहीं और भेज दिया और स्वयं पुलिस को चकमा देते हुए मुम्बई पहुंच गए। वे मुम्बई आकर क्रांतिकारियों के शीर्ष नेता दामोदर वीर सावरकर से मिले और साला हाल कह सुनाया। सावरकर ने अपने ओजस्वी भाषण से चन्द्रशेखर को प्रभावित कर दिया। यहीं पर उनकी मुलाकात सरदार भगत सिंह से हुई। कुछ समय बाद वे कानपुर में क्रांतिकारियों के प्रसिद्ध नेता गणेश शंकर विद्यार्थी के यहां पहुंचे। विद्यार्थी जी ने उन तीनों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया। यहां पर भी पुलिस ने उन्हें घेरने की भरसक कोशिश की। इसके चलते चन्द्रशेखर यहां से भेष बदलकर पुलिस को चकमा देते हुए दिल्ली जा पहंुचे।
दिल्ली पहुंचने के बाद वे मथुरा रोड़ पर स्थित पुराने किले के खण्डहरों में आयोजित युवा क्रांतिकारियों की सभा में शामिल हुए। अंग्रेज सरकार ने चन्द्रशेखर को गिरफ्तार करने के लिए विशेष तौरपर एक खुंखार व कट्टर पुलिस अधिकारी तसद्दुक हुसैन को नियुक्त कर रखा था। वह चन्द्रशेखर की तलाश में दिनरात मारा-मारा फिरता रहता था। जब उसे इस सभा में चन्द्रशेखर के शामिल होने की भनक लगी तो उसने अपना अभेद्य जाल बिछा दिया। वेश बदलने की कला में सिद्धहस्त हो चुके चन्द्रशेखर यहां भी वेश बदलकर पुलिस को चकमा देते हुए दिल्ली से कानपुर पहुंच गए। यहां पर उन्होंने भगत सिंह व राजगुरू के साथ मिलकर अंग्रेज अधिकारियों के वेश में अंग्रेजों के पिठ्ठू सेठ दलसुख राय से 25000 रूपये ऐंठे और चलते बने।
जब 3 फरवरी, 1928 को भारतीय हितों पर कुठाराघात करके इंग्लैण्ड सरकार ने ‘साईमन’ की अध्यक्षता में एक कमीशन भेजा। साईमन कमीशन यह तय करने के लिए आया था कि भारतवासियों को किस प्रकार का स्वराज्य मिलना चाहिए। इस दल में किसी भी भारतीय के न होने के कारण ‘साईमन कमीशन’ का लाला लाजपतराय के नेतृत्व में राष्ट्रव्यापी कड़ा विरोध किया गया। अंग्रेजी सरकार ने लाला जी सहित सभी आन्दोलनकारियों पर ताबड़तोड़ पुलिसिया कहर बरपा दिया और पुलिस की लाठियों का शिकार होकर लाला जी देश के लिए शहीद हो गए। बाद में चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह व राजगुरू आदि क्रांतिकारियों ने लाला जी की मौत का उत्तरदायी साण्डर्स माना और उन्होंने उसको 17 दिसम्बर, 1928 को मौत के घाट उतारकर लाल जी की मौत का प्रतिशोध पूरा किया।
सांडर्स की हत्या के बाद अंग्रेजी सरकार में जबरदस्त खलबली मच गई। कदम-कदम पर पुलिस का अभेद्य जाल बिछा दिया गया। इसके बावजूद चन्द्रशेखर आजाद अपने साथियों के साथ पंजाब से साहब, मेम व कुली का वेश बनाकर आसानी से निकल गए। इसके बाद इन क्रांतिकारियों ने गुंगी बहरी सरकार को जगाने के लिए असैम्बली में बम फंेकने के लिए योजना बनाई और इसके लिए काफी बहस और विचार-विमर्श के बाद सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को चुना गया। 8 अपै्रल, 1929 को असैम्बली में बम धमाके के बाद इन क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया और मुकदमें की औपचारिकता पूरी करते हुए 23 मार्च, 1931 को सरदार भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को बम काण्ड के मुख्य अपराधी करार देकर, उन्हें फांसी की सजा दे दी गई।
इस दौरान चन्द्रशेखर आजाद ने अपने क्रांतिकारी दल का बखूबी संचालन किया। आर्थिक समस्याओं के हल के लिए भी काफी गंभीर प्रयास किए। पैसे की बचत पर भी खूब जोर दिया। इन्हीं सब प्रयासों के चलते दल की तरफ से सेठ के पास आठ हजार रूपये जमा हो चुके थे। चन्द्रशेखर ने सेठ को आगामी गतिविधियों के लिए यही पैसा लाने कि लिए इलाहाबाद के अलफ्रेड पार्क में बुलाया। इसी बीच चन्द्रशेखर के दल के सदस्य वीरभद्र तिवारी को अंग्रेज सरकार ने चन्द्रशेखर को पकड़वाने के लिए दस हजार रूपये और कई तरह के अन्य प्रलोभन देकर खरीद लिया। जब 27 फरवरी, 1931 को चन्द्रशेखर सेठ से पैसे लेने के लिए निर्धारित स्थान अलफ्रेड पार्क में पहुंचे तो विश्वासघाती वीरभद्र तिवारी की बदौलत पुलिस ने पार्क को चारों तरफ से घेर लिया। उस समय चन्द्रशेखर अपने मित्र सुखदेव राज से आगामी गतिविधियों के बारे में योजना बना रहे थे। चन्द्रशेखर ने सुखदेव राज को पुलिस की गोलियों से बचाकर वहां से भगा दिया। उसने अकेले मोर्चा संभाला और पुलिस का डटकर मुकाबला किया।
एक तरफ अकेला शूरवीर चन्द्रशेखर आजाद था और दूसरी तरफ पुलिस कप्तान बाबर के नेतृत्व में 80 अत्याधुनिक हथियारों से लैस पुलिसकर्मी। फिर भी काफी समय तक अकेले चन्द्रशेखर ने पुलिस के छक्के छुड़ाए रखे। अंत में चन्द्रशेखर के कारतूस समाप्त हो गए। सदैव आजाद रहने की प्रवृति के चलते उन्होंने निश्चय किया कि वो पुलिस के हाथ नहीं आएगा और आजाद ही रहेगा। इसके साथ ही उन्होंने बचाकर रखे अपने आखिरी कारतूस को स्वयं ही अपनी कनपटी के पार कर दिया और भारत माँ के लिए कुर्बान होने वाले शहीदों की सूची में स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम अंकित कर दिया। इस तरह से 25 साल का यह बांका नौजवान भारत माँ की आजादी की बलिवेदी पर शहीद हो गया। यह देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा। भारत माँ के इस वीर सपूत और क्रांतिकारियों के सरताज को कोटि-कोटि नमन है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)


सम्पर्क  सूत्र  :
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889



सशस्त्र क्रांति के अग्रदूत वीर सावरकर

26 फरवरी/पुण्यतिथि विशेष

सशस्त्र क्रांति के अग्रदूत वीर सावरकर
 -राजेश कश्यप 
विनायक दामोदर सावरकर
देश की आजादी के लिए असंख्य वीरों ने असीम त्याग एवं बलिदान किए। उन्होंने अंग्रेजी सरकार के जुल्म एवं अत्याचार सहे। भूखे-प्यासे रहकर स्वतंत्रता के लिए निरन्तर अथक संघर्ष किया। देश की आजादी का दृढ़ संकल्प लेने वाले देशभक्तों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। ऐसे ही महान देशभक्तों में से एक सशस्त्र क्रांति के अग्रदूत वीर सावरकर थे, जिनका पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था। इनका जन्म 28 मई, 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले में भगूर नामक गाँव में दामोदर पंत के घर राधाबाई की कोख से हुआ था। उनका मन बचपन से ही पढ़ाई मंे रम गया था। उन्हंे त्यांत्या राव के उपनाम से भी पुकारा जाता था। वीर सावरकर ने वर्ष 1901 में शिवाजी हाईस्कूल नासिक से मैट्रिक की परीक्षा पास की। फर्गयूसन कॉलेज मंे पढ़ते हुए वे राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत भाषण देते थे। वीर सावरकर ने बचपन में ही प्रतिज्ञा कर ली थी कि अपने देश को पुनः स्वतंत्रता दिलवाने के लिए सशस्त्र क्रांति की पताका फहराएंगे।
सावरकर छोटी उम्र से ही देशभक्ति से भरे लेख एवं कविताएं लिखते थे। 6 जून, 1906 को सावरकर कानून में बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए वे लन्दन के लिए रवाना हुए। यहां पर आते ही उन्होंने हिन्दुस्तानी छात्रों से सम्पर्क साधना शुरू कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने जर्मनी के तानाशाह मैजिनी की आत्मकथा का मराठी में अनुवाद करना शुरू कर दिया। लन्दन में रहते हुए वे लाला हरदयाल और मदन लाल ढ़ींगरा के अलावा वी.वी.एस. अय्यर, डब्लू.बी.फड़के, सुखसागर दत्त, पाण्डुरंग बापट, निरंजन पाल, आशिफ अली, एम.पी.टी. आचार्य, नहुक चतुर्भुज, सिकन्दर हयात, ज्ञानचन्द वर्मा, विरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, हेमचन्द दास आदि युवा हिन्दुस्तानियों के सम्पर्क में आए। इन युवा हिन्दुस्तानियों को अपने जोशिले भाषणों के जरिए क्रांतिकारी पथ पर अग्रसर करने के प्रयास में सावरकर कामयाब रहे। उन्होनंे मैजिनी की आत्मकथा के मराठी अनुवाद के निष्कर्ष रूप में एक प्रस्तावना तैयार की, जिसका मूलभाव था, ‘‘...राष्ट्र कभी नहीं मरता। परमात्मा ने मानव को स्वतंत्र रहने के लिए ही पैदा किया है, गुलाम बनकर रहने के लिए नहीं। ये तथ्य सुनिश्चित है कि जब दृढ़ संकल्प लोगे तभी तुम्हारा देश स्वतंत्र हो जाएगा।’’ इस प्रेरणादायक प्रस्तावना को पुस्तक रूप में प्रकाशित करवाकर देश के क्रांतिकारियों के बीच बांटा गया। भारी संख्या में युवाओं ने इसे कंठस्थ कर लिया। अंग्रेज सरकार को जब इस घटना की भनक लगी तो आनन-फानन में उसने इस पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगा दिया
इसी बीच सावरकर ने अपने एक साथी बापट को रूसी क्रांतिकारी साथी से बम बनाने की विधि सीखने के लिए प्रेरित किया। काफी प्रयासों के बाद बापट अपने जानकार रूसी क्रांतिकारी से बम बनाने का मैनुअल हासिल करने में कामयाब हो गए। सावरकर ने इस मैनुअल को पुस्तक रूप में प्रकाशित करवाकर भारत के क्रांतिकारियों तक पहुंचावाई, ताकि देशभर में एक साथ बम विस्फोट करके अंग्रेजी शासन का तख्ता पलट किया जा सके।
इसी बीच सावरकर ने जर्मनी के स्टुअर्ट में दुनिया के सोशलिस्टों की एक बड़ी कांफ्रेंस हुई, जिसमें सभी देशों के झण्डे फहराए गए। भारत की तरफ से मैडम कामा ने सावरकर द्वारा तैयार भारतीय झण्डा फहराया। इस झण्डे में सभी आठ प्रान्तों के प्रतीक कमल पुष्प, सूर्य, चांद और बीच में ‘वन्देमातरम’ अंकित था। इसी दौरान उन्होंने सन् 1857 की क्रांति पर आधारित पुस्तक ‘1857 का सम्पूर्ण सत्य’ लिखी। जब अंग्रेजों को इसकी भनक लगी तो उन्होंने इस पुस्तक को प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रतिबन्धित कर दिया।
जब सावरकर लन्दन में थे तो भारत में उनके परिवार पर जुल्मों का दौर जारी हो चुका था। उनके पुत्र प्रभाकर की मौत हो गई थी। देशभक्ति की कविताएं प्रकाशित करवाने और अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध जन-विद्रोह भड़काने के आरोप में उनके भाई को गिरफ्तार करके अण्डेमान जेल में भेज दिया गया था। नासिक जैक्सन हत्या केस में सावरकर के साथियों को पकड़ लिया गया था और उन्हें फांसी पर लटकाने के लिए तैयारी की जा रही थी। सावरकर की भाभी व पत्नी को अंग्रेजी सरकार ने बेघर कर दिया था। अंग्रेजी सरकार ने लन्दन और हिन्दुस्तान में दोनों जगह सावरकर की गिरफ्तारी के वारन्ट भी जारी कर दिए। इसके बावजूद सावरकर ने स्वदेश लौटने का संकल्प लिया।
इसी बीच 1 जुलाई, 1909 को युवा क्रांतिकारी मदन लाल धींगड़ा ने आजादी के रास्ते में कर्जन वाइली को रोड़ा समझा और उन्हें रास्ते से हटाने के लिए गोली मारकर मौत की नींद सुला दिया। अंग्रेजी सरकार बौखला उठी। आनन फानन में मदन लाल को गिरफ्तार करके फांसी की सजा सुना दी। उधर कुछ भारतीय नेताओं ने एक बैठक कैकस्टन हॉल में बैठक बुलाकर धींगड़ा के खिलाफ सर्वसम्मति से निन्दा प्रस्ताव पास करने की घोषणा की गई। इस बैठक में पहुंचकर वीर सावरकर ने धींगड़ा के पक्ष की जबरदस्त पैरवी की और उनके खिलाफ निन्दा प्रस्ताव पास नहीं होने दिया।
जब वीर सावरकर 13 मई, 1910 की रात्रि को पैरिस से लन्दन पहुंचे तो रेलवे स्टेशन उतरते ही पुलिस ने उन्हें तुरन्त गिरफ्तार कर लिया। अदालत ने उनके मुकदमे को भारत में शिफ्ट कर दिया। जब सावरकर को 8 जुलाई, 1910 को एस.एस. मोरिया नामक समुद्री जहाज से भारत लाया जा रहा था तो वे रास्ते में जहाज के सीवर के रास्ते से समुद्र में कूद पड़े और तैरते हुए फ्रांस के दक्षिणी तट तक जा पहुंचे। लेकिन, बाद में अंग्रेज पुलिस ने उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया और उन्हें बम्बई लाया गया। यहां पर तीन जजों की विशेष अदालत गठित की गई। इसमें अपराधी की पक्ष जानने का कोई प्रावधान नहीं था। इस अदालत मंे सावरकर को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध शस्त्र बनाने की विधि की पुस्तक प्रकाशित करवाने का दोषी ठहराकर 24 दिसम्बर, सन् 1910 को 25 साल कठोर काले पानी की सजा सुनाई। इसके साथ ही दूसरे मुकदमें में नासिक के कलक्टर मिस्टर जैक्शन की हत्या के लिए साथियों को भड़काने का आरोपी ठहराकर अलग से 25 साल के काला पानी की सजा सुनाई गई। इस तरह सावरकर को दो अलग-अलग मुकदमों में दोषी ठहराकर दो-दो आजन्मों के कारावासों की सजा के रूप में कुल 50 साल काले पानी की सजा सुनाई गई। ऐसा अनूठा मामला विश्व के इतिहास में पहली बार हुआ, जब किसी को इस तरह की सजा दी गई।
7 अपै्रल, 1911 को उन्हें काले पानी भेज दिया गया। वीर सावरकर ने 4 जुलाई, 1911 से 21 मई, 1921 तक अंडमान की सेल्युलर जेल में बिताए। इस दौरान उन्होंने जेलर डेविड के कहर का सामना करना पड़ा। कैदियांे को दुषित पानी, सड़ा-गला खाना और भयंकर अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं। इन सबके विरूद्ध कैदियों के साथ मिलकर सावरकर ने भूख हड़ताल की और सावरकर ने किसी तरह पत्र के जरिए कमिश्नर को अण्डेमान जेल में कैदियों पर हो रहे अत्याचार से अवगत करवाया। परिणामस्वरूप कार्यवाही हुई और जेलर डेविड को वहां से हटा दिया गया। इसके साथ ही कैदियांे की सभी शर्तों को भी मान लिया गया। अण्डेमान जेल में रहते हुए सावरकर कोयले से जेल की दीवारों पर देशभक्ति से परिपूर्ण कविताएं लिखते रहते थे। देशभर में सावरकर की रिहाई के लिए भारी आन्दोलन चला और उनकी रिहाई के मांग पत्र पर 75000 लोगों ने हस्ताक्षर किए। वर्ष 1921 में देशभर में भारी जन-आक्रोश के चलते उन्हें अंडेमान से वापिस भारत भेजा गया और उन्हें रत्नागिरी सैन्ट्रल जेल में रखा गया। इस जेल में वे तीन वर्ष तक रहे। जेल में रहते हुए उन्होंने ‘हिन्दुत्व’ पर शोध ग्रन्थ तैयार किया। इसी दौरान 7 जनवरी 1925 को उनके घर पुत्री प्रभात और 17 मार्च, 1928 को पुत्र प्रभात का जन्म हुआ।
देशभर में सावरकर की रिहाई को लेकर चले आन्दोलनांे के बाद अंग्रेजी सरकार ने उन्हें इन शर्तों के साथ सावरकर को रिहा कर दिया कि वे न तो रत्नागिरी से बाहर जाएंगे और न ही किसी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेंगे। जेल से रिहा होने के बाद देश के बड़े-बड़े नेता और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक उनसे मिलने आए। मार्च, 1925 में उनके मिलने के लिए संघ के मुखिया डा. हैडगवार और 22 जून, 1941 को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस उनसे मिलन के लिए आए। मुहम्मद अली जिन्हा सरीखे मुस्लिम नेता सावरकर को कट्टर हिन्दु नेता समझते थे और सावरकर इस पर गर्व करते थे। 10 मई, 1937 को अंग्रेजी सरकार ने सावरकर पर लगे सभी तरह के प्रतिबन्धों को हटा लिया। अब सावरकर को रत्नागिरी से बाहर जाने और हर तरह की राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की पूर्ण आजादी थी। सावरकर ने एक बार फिर देश की आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष के लिए युवा क्रांतिकारियों को तैयार करना शुरू कर दिया। इसके साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने भारतीय नौजवानांे को अंग्रेजी सेना में अधिक से अधिक भर्ती होने के लिए प्रेरित किया ताकि समय आने पर विद्रोह करके अंग्रेजी सरकार का तख्ता पलटा जा सके।
वीर सावरकर ने पूना में वर्ष 1940 में ‘अभिनव भारत’ नाम के क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य समय पड़ने पर सशस्त्र क्रांति के जरिए स्वतंत्रता हासिल करना था। इसी के साथ उन्होंने ‘मित्र मेला’ नाम की एक गुप्त संस्था भी बनाई। फरवरी, 1931 में वीर सावरकर के प्रयासों से बम्बई में पतित पावन मन्दिर की स्थापना हुई। यह मन्दिर हर जाति, धर्म व वर्ग के लोगों के लिए खुला रहता था। सावरकर ने देश से जातिपाति, धर्म-मजहब के भेदभाव मिटाने के लिए राष्ट्रव्यापी जागरूकता आन्दोलन चलाए। देशभक्तों के अटूट स्वतंत्रता संघर्ष की बदौलत 15 अगस्त, 1947 को देश को आजादी नसीब हुई। लेकिन, देश का विभाजन हो गया। सावरकर इस विभाजन के बिल्कुल विरूद्ध थे। वे लाख प्रयास करने के बावजूद इस विभाजन की त्रासदी को रोक नहीं पाए।
वीर सावरकर कई मामलों में अन्य क्रांतिकारियों से अलग मिसाल बने। वे पहले ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने ब्रिटिश राज्य के केन्द्र लंदन में उसके विरूद्ध आंदोलन किया। उन्होंने ही सर्वप्रथम वर्ष 1906 में बंगाल विभाजन के विरूद्ध ‘स्वदेशी’ का नारा लगाया और विदेशी कपड़ों की होली जलाई। वे पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिनके विचारों से खफा होकर अंग्रेजी सरकार ने उनकीं बैरिस्टर की डिग्री छीन ली थी। वे पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले पहले भारतीय क्रांतिकारी नेता बने। वे ऐसे पहले लेखक बने जिन्होंने 1857 की क्रांति को ‘स्वाधीनता संग्राम’ सिद्ध करते हुए एक हजार पृष्ठों की पुस्तक लिखी और जिसे अंग्रेजी साम्राज्य ने उस पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। सावरकर दुनिया के पहले ऐसे राजनीतिक कैदी बने, जिस पर हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में केस चलाया गया। उन्होंने ही सर्वप्रथम वर्ष 1907 में भारतीय झण्डा तैयार करवाया, जिसे अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम कामा ने फहराया था। वे दुनिया के ऐसे पहले कलमकार भी बने जिनकी पुस्तक को प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया गया। वे ऐसे पहले क्रांतिकारी भी बने जिन्हें एक ही समय मंे दो अलग-अलग मामलों में 25-25 वर्ष की कठोर काले पानी की सजा सुनाई गई। इस तरह की अनेक विशिष्ट मिसालें वीर सावरकर के नाम दर्ज हुईं।
वीर सावरकर एक महान क्रांतिकारी के साथ-साथ प्रखर वक्ता, दूरदृष्टा, भाषाविद, कवि, लेखक, कूटनीतिक, राजनेता, इतिहासकार और समाज सुधारक भी थे। वीर सावरकर ने अपने जीवनकाल में ‘भारतीय स्वातांत्रय युद्ध’, ‘मेरा आजीवन कारावास’, ‘अण्डमान की प्रतिध्वनियां’, ‘हिन्दुत्व’, ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेस-1857’ जैसी कालजयी पुस्तकों की रचनाएं कीं। वीर सावरकर हिन्दू संगठनों के कई महत्वपूर्ण पदांे पर रहे और कई राष्ट्रीय कार्यक्रमों में मुख्य वक्ता भी बने। 8 अक्तूबर, 1959 को उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डी.लिट. की उपाधि से नवाजा। 8 नवम्बर, 1963 को इनकीं पत्नी यमुनाबाईं चल बसीं। सितम्बर, 1966 में वे स्वयं भी भयंकर ज्वर का शिकार हो गए। इसके बाद दिनोंदिन उनके स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आती चली गई। 1 फरवरी, 1966 को सशस्त्र क्रांति के इस अग्रदूत ने मृत्युपर्यन्त उपवास करने का निर्णय ले लिया। अंत में यह हुतात्मा 26 फरवरी, 1966 के दिन मुम्बई में प्रातः दस बजे इस नश्वर संसार को हमेशा के लिए अलविदा हो गई। उन पर कई हिन्दी व मलयालम भाषा में फिल्में व वृतचित्र बनाए गए। उन्हीं की स्मृति में पोर्ट ब्लेयर विमान क्षेत्र का नाम वीर सावरकर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा रखा गया। कुल मिलाकर वीर सावरकर ने जीवन भर देश की आजादी और उसके उत्थान के लिए अटूट संघर्ष किया और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। देश के इस वीर अमर क्रांतिकारी का देश हमेशा ऋणी रहेगा। इस महान आत्मा को दिल की गहराईयों से कोटि-कोटि नमन।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

सम्पर्क सूत्र :
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889

भक्ति परम्परा का प्राचीनतम प्रतीक शबरी

24 फरवरी/जयन्ति विशेष

भक्ति परम्परा का प्राचीनतम प्रतीक शबरी
-राजेश कश्यप
शबरी देवी अपने भगवन श्रीराम को बेर खिलते हुए
रामायण भगवान श्रीराम के सम्पूर्ण जीवन का दर्पण है। विष्णु के अवतार रूपी श्रीराम की सम्पूर्ण कार्यकलापों व लीलाओं के प्रसंग श्रीमद्वाल्मीकीय ‘रामायण’, गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘श्रीराम चरितमानस’ आदि पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित हैं। इन ग्रन्थों में श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विशिष्टता एवं महत्ता रही। कई व्यक्ति तो ऐसे रहे, जिनका पौराणिक ग्रन्थों में तो अल्प वर्णन हुआ, लेकिन हकीकत में उनका योगदान बड़ा उल्लेखनीय एवं विशिष्ट रहा। ये व्यक्ति बेशक भगवान श्रीराम के जीवन में अल्पकाल के लिए जुड़े, लेकिन इसी अल्प समय में वे अमरता हासिल कर गए। ऐसी ही सौभाग्यशाली महिला रहीं, शबरी। हालांकि, उनका वास्तविक नाम ‘श्रमणा’ था और वह भील समुदाय की ‘शबरी’ जाति से संबंध रखती थी। कालांतर में यही ‘श्रमणा’ नामक भीलनी ‘शबरी’ नाम से प्रसिद्ध हुई।
शबरी भगवान श्रीराम की अनन्य भक्त थी। वह हरदम भगवान श्रीराम की भक्ति में लीन रहती थी और उनके नाम का भजन-कीर्तन करतीं रहती थी। पौराणिक सन्दर्भाें के अनुसार, श्रमणा का विवाह एक दुराचारी व अनाचारी व्यक्ति के साथ हो गया। वह यह जानकर अति व्यथित हुई कि उसका पति हत्या व लूटमार जैसे घटिया कृत्यों में संलिप्त है। उसने अपने पति को सुधारने की भरसक कोशिश की लेकिन, नाकाम रही। इसी के चलते उसकी अपने पति के साथ दिनोंदिन अनबन बढ़ती चली गई और अक्सर भारी कलह, झगड़े व मारपीट तक पहुंच गई। सात्विक हृदयी श्रमणा का पति के घर में जीन एकदम नारकीय हो गया। अंत में विवश होकर उसने पति का घर छोड़ दिया और भागकर मतंग ऋषि के आश्रम जाकर शरण ली। प्रारंभ में तो मतंग ऋषि भीलनी श्रमणी को आश्रम में आश्रय देने में संकोचग्रस्त हुए, लेकिन उसकी करूणामयी पुकार और पीड़ा सुनकर वे द्रवित हो उठे। इसके बाद उन्होंने श्रमणा को अपने आश्रम में आश्रय दिया और उसे जबरदस्ती लेने आए उसके पति को वहां से वापस भगा दिया। इसके बाद श्रमणा आश्रम में रहते हुए भगवान श्रीराम का भजन करती और ऋषियों की सेवा-सुश्रुषा करती।
यह आश्रम दंडकारण्य नामक वन में पम्पासरोवर के पवित्र तट पर स्थित था। इस आश्रम में मतंग ऋषि अपने शिष्यों के साथ निवास करते थे और एकाग्र एवं शांत चित में तप करते रहते थे। उनके शिष्य वन मंे जाकर जंगली फल-फूल और कंद-मूल लेकर आते थे। मतंग ऋषि की अटूट साधना व तप के कारण इस दंडकारण्य वन का नाम मतंग वन पड़ा। ऋषि मतंग शबरी श्रमणा की सात्विकता और भगवान श्रीराम की भक्ति से अत्यन्त प्रभावित थे। उन्होंने श्रमणा के तप व सेवा से खुश होकर आशीर्वाद दिया कि एक न एक दिन उसकी अगाध भक्ति के तप से भगवान श्रीराम स्वयं इस आश्रम में पधारेंगे और उनके आशीर्वाद से उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी।
कालान्तर में भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता एवं भाई लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष का वनवास काटने के लिए वन में आए। लंकापति रावण ने छल से सीता का हरण कर लिया। अपनी पत्नी की खोज करते हुए वे वन में भटकने लगे। वन में भटकते हुए उनकी मुलाकात घायल जटायु से हुई। जटायु ने रावण द्वारा सीताहरण करके ले जाने और युद्ध में उसको बुरी तरह घायल करने की घटना बतलाकर प्राण त्याग दिए। श्रीराम व लक्ष्मण जटायु का अंतिम संस्कार करके उनके बताई पश्चिमी दिशा में नैर्ऋत्य कोण पर आगे बढ़े। फिर वे दक्षिण दिशा की तरफ चलकर क्रौन्चारण्य नाम प्रसिद्ध गहन वन में पहुँचे। वे इस वन को पार करके मतंग वन पहुंच गए। वहां एक कबन्ध नामक विशालकाय राक्षस ने उन्हें घेर लिया। उसका नाम ‘कबन्ध’ इसीलिए था, क्योंकि उसका शरीर एक धड़मात्र था और उसके पेट में ही मुँह था। महर्षि वाल्मिकी कृत रामायण के अनुसार स्थूलशिरा नामक महर्षि के अभिशाप से राक्षस बने कबन्ध को श्रीराम ने उसका वध करके मुक्ति दी और उससे सीता की खोज में मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। तब कबन्ध ने श्रीराम को मतंग ऋषि के आश्रम का रास्ता बताया और राक्षस योनि से मुक्त होकर गन्धर्व रूप में परमधाम पधार गया।
श्रीराम व लक्ष्मण मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचे। वहां आश्रम में वृद्धा शबरी भक्ति में लीन थी। मतंग ऋषि अपने तप व योग के बल पर अन्य ऋषियों सहित दिव्यलोक पहुंच चुके थे। जब शबरी को पता चला कि भगवान श्रीराम स्वयं उसके आश्रम में आए हैं तो वह एकदम भाव विभोर हो उठी और ऋषि मतंग के दिए आशीर्वाद को स्मरण करके गद्गद हो गईं। वह दौड़कर अपने प्रभु श्रीराम के चरणों से लिपट गईं। इस भावनात्मक दृश्य को गोस्वामी तुलसीदास इस प्रकार रेखांकित करते हैं:
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।
प्रेम मगर मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।

(अर्थात, कमल-सदृश नेत्र और विशाल भुजा वाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाईयों के चरणों में शबरीजी लिपट पड़ीं। वह प्रेम में मग्न हो गईं। मुख से वचन तक नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलों में सिर नवा रही हैं। फिर उन्हें जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाईयों के चरण कमल धोये और फिर उन्हें सुन्दर आसनों पर बैठाया।)
इसके बाद शबरी जल्दी से जंगली कंद-मूल और बेर लेकर आईं और अपने परमेश्वर को सादर अर्पित किए। पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार, बेर कहीं खट्टे न हों, इसलिए अपने इष्ट की भक्ति की मदहोशी से ग्रसित शबरी ने बेरों को चख-चखकर श्रीराम व लक्ष्मण को भेंट करने शुरू कर दिए। श्रीराम शबरी की अगाध श्रद्धा व अनन्य भक्ति के वशीभूत होकर सहज भाव एवं प्रेम के साथ झूठे बेर अनवरत रूप से खाते रहे, लेकिन लक्ष्मण ने झूठे बेर खाने में संकोच किया। उसने नजर बचाते हुए वे झूठे बेर एक तरफ फेंक दिए। माना जाता है कि लक्ष्मण द्वारा फेंके गए यही झूठे बेर, बाद में जड़ी-बूटी बनकर उग आए। समय बीतने पर यही जड़ी-बूटी लक्ष्मण के लिए संजीवनी साबित हुई। श्रीराम-रावण युद्ध के दौरान रावण के पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाथ) के ब्रहा्रास्त्र से लक्ष्मण मुर्छित हो गए और मरणासन्न हो गए। विभिषण के सुझाव पर लंका से वैद्यराज सुषेण को लाया गया। वैद्यराज सुषेण के कहने पर बजरंग बली हनुमान संजीवनी लेकर आए। श्रीराम की अनन्य भक्त शबरी के झूठे बेर ही लक्ष्मण के लिए जीवनदायक साबित हुए।
भगवान श्रीराम ने शबरी द्वारा श्रद्धा से भेंट किए गए बेरों को बड़े प्रेम से खाए और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं:
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।

इसके बाद श्रीराम ने शबरी की भक्ति से खुश होकर कहा, ‘‘भद्रे! त्ुमने मेरा बड़ा सत्कार किया। अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार आनंदपूर्वक अभीष्ट लोक की यात्रा करो।’’ इस पर शबरी ने स्वयं को अग्नि के अर्पण करके दिव्य शरीर धारण किया और अपने प्रभु की आज्ञा से स्वर्गलोक पधार गईं। महर्षि वाल्मीकी ने शबरी को सिद्धा कहकर पुकारा, क्योंकि अटूट प्रभु भक्ति करके उसने अनूठी आध्यात्मिक उपलब्धि हासिल की थी। यदि शबरी को हमारी भक्ति परम्परा का प्राचीनतम प्रतीक कहें तो कदापि गलत नहीं होगा।
इन्हीं श्रीराम भक्त सिद्धा शबरी का धाम दक्षिण-पश्चिमी गुजरात के डांग जिले में सापुतारा से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर है। शबरी धाम तक पहुंचने का रास्ता बेहद खूबसूरत है। इस रास्ते में सागौन और बांस के झुण्ड मौजूद हैं। यहां से थोड़ी दूरी पर पम्पा सरोवर है। ऐसा माना जाता है कि यह वही स्थान है, जहां बजरंग बली हनुमान की तरह शबरी माता ने भी स्नान किया था। यहां पर मौजूद वन को दंडकारण्य माना जाता है। इस स्थान पर मौजूद शबरी धाम के दर्शन करने के लिए पर्यटक प्रतिदिन सैंकड़ों की तादाद में पहुंचते हैं।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

संपर्क सूत्र :
राजेश कश्यप
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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

कश्यप राजपूत धर्मशाला, महम (रोहतक) का विधायक श्री आनंद सिंह दांगी ने किया शिलान्यास

कश्यप राजपूत धर्मशाला, महम (रोहतक) का विधायक श्री आनंद सिंह दांगी ने किया शिलान्यास

कश्यप धर्मशाला का शिलान्याश पत्थर 
 कश्यप राजपूत धर्मशाला, महम (रोहतक) के निर्माण के लिए कश्यप समाज का लंबे समय से चला आ रहा गत 20 फरवरी, 2012 को कामयाबी के मुकाम पर पहुँचा और महम के विधायक माननीय श्री आनंद सिंह दांगी ने अपने कर कमलों से इस धर्मशाला का शिलान्यास किया।

  इस अवसर पर कश्यप सेवा समिति की तरफ से एक सांस्कृतिक एवं शिलान्यास  कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता महम नगर पार्षद की प्रधान श्रीमती प्रकाशो देवी ने की और बतौर मुख्य अतिथि महम के विधायक श्री आनंद सिंह दांगी थे। कार्यक्रम में पहुंचने पर कश्यप समाज ने विधायक आनंद सिंह दांगी को फूल मालाएं पहनाकर भव्य स्वागत किया। 
कश्यप धर्मशाला का शिलान्यास करते महम के विधायक श्री अन्नंद सिंह दांगी, उनके साथ हैं नगर परिषद् महम की प्रधान श्रीमती प्रकाशो देवी और हरियाणा कश्यप राजपूत सभा रोहतक के प्रधान श्री राजेश कश्यप

महम के विधायक श्री अन्नंद सिंह दांगी का स्वागत करते हरियाणा कश्यप राजपूत सभा रोहतक के प्रधान श्री राजेश कश्यप
  इसके बाद विधायक आनंद सिंह दांगी ने पर्दा हटाकर कश्यप धर्मशाला, महम (रोहतक) का शिलान्यास किया।
इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में विधायक श्री आनंद सिंह दांगी ने सबसे पहले कश्यप समाज को धर्मशाला के शिलान्यास के लिए बधाई और शुभकामनाएं दीं। 

अपना संबोधन देते महम के विधायक श्री अन्नंद सिंह दांगी
 उन्होंने धर्मशाला के लिए तीन लाख रूपये आर्थिक सहायता देने के साथ-साथ भविष्य में भी यह सहयोग जारी रखने का वायदा भी किया। उन्होंने कहा कि यह ग्रान्ट जारी होने में काफी देर हो गई, इसलिए पूर्व घोषित दो लाख रूपये की राशि को बढ़ाकर तीन लाख रूपये किया गया है। श्री आनंद सिंह दांगी ने कहा कि चौपालें व धर्मशालाएं भाईचारा को बढ़ावा देती हैं। ये छत्तीस बिरादरी की जगह होती हैं, जहां सभी भाई आपस में मिल-बैठकर दुःख-सुख सांझा करते हैं। उन्होंने कहा कि चौधरी भूपेन्द्र हुड्डा के नेतृत्व में हरियाणा सरकार ने छत्तीस बिरादरी को सम्मान देते हुए चौपाल व धर्मशालाओं का निर्माण करवाया है। उन्होंने आगे कहा कि विकास के कार्यों के लिए धन की कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी। विधायक श्री आनंद सिंह दांगी ने अपने संबोधन में समाज से आह्वान किया कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में जरूर पढ़ाने भेजें। उन्होंने स्कूलों में मिलने वाली सरकारी सुविधाओं के बारे में विस्तार से भी बताया। उन्होंने कहा कि मैं चौबीस घण्टे आपकी सेवा में तत्पर हूँ और भविष्य में भी रहूंगा।

मुख्य अतिथि विधायक श्री आनंद सिंह दांगी का आभार व धन्यवाद् प्रकट करते हुए हरियाणा कश्यप राजपूत सभा रोहतक के प्रधान श्री राजेश कश्यप
 कार्यक्रम के अंत में हरियाणा कश्यप राजपूत सभा, रोहतक के प्रधान श्री राजेश कश्यप ने कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि विधायक श्री आनंद सिंह दांगी का कश्यप धर्मशाला का शिलान्यास करने और तीन लाख रूपये की सहायता देने के लिए कश्यप समाज की तरफ से हार्दिक धन्यवाद एवं आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में बाबा नरेन्द्र ने 51000 रूपये धर्मशाला के निर्माण के लिए दान देने की घोषणा भी की। उनके अलावा अनेक दानी सज्जनों ने धर्मशाला निर्माण के लिए 500 से लेकर 51000 तक की राशि का दान दिया। इन सब दानी सज्जनों का धन्यवाद एवं आभार व्यक्त किया गया।

मुख्य अतिथि विधायक श्री आनंद सिंह दांगी को महर्षि कश्यप की तस्वीर भेंट करते हुए हरियाणा कश्यप राजपूत सभा रोहतक के प्रधान श्री राजेश कश्यप
 कार्यक्रम में कश्यप समाज ने पगड़ी भेंट करके विधायक आनंद सिंह दांगी को सम्मानित किया। इसके साथ ही उन्हें स्मृति-चिन्ह भी भेंट किए गए। हरियाणा कश्यप राजपूत सभा, रोहतक के प्रधान श्री राजेश कश्यप ने महर्षि कश्यप की तस्वीर मुख्य अतिथि विधायक आनंद सिंह दांगी और कार्यक्रम की अध्यक्षा श्रीमती प्रकाशो देवी को भेंट कीं। 


कार्यक्रम की अध्यक्षा श्रीमती प्रकाशो देवी, प्रधान नगर परिषद् महम को महर्षि कश्यप की तस्वीर भेंट करते हुए हरियाणा कश्यप राजपूत सभा रोहतक के प्रधान श्री राजेश कश्यप
 इस अवसर पर प्रसाद बांटा गया और लंगर लगाया गया।
लंगर व प्रसाद वितरण का दृश्य
  कार्यक्रम में कश्यप सेवा समिति महम की कार्यकारिणी के सदस्य, हरियाणा कश्यप राजपूत सभा, रोहतक के प्रधान श्री राजेश कश्यप, महम नगर परिषद के सदस्य व अधिकारी, कश्यप समाज के गणमान्य व्यक्ति, भारी संख्या में महिलाएं एवं बच्चे भी उपस्थित थे। कार्यक्रम का मंच संचालन श्री अजमेर सिंह ने किया।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

21 फरवरी / महाशिवरात्रि विशेष

शिवमयी है हरियाणा का जन-जन और कण-कण 
-राजेश कश्यप
 

‘शिव शंकर’, ‘महादेव’, ‘महाकाल’, ‘नीलकण्ठ’, ‘विश्वनाथ’, ‘आदिदेव’, ‘उमापति’, ‘सृष्टि-संहारक’ आदि अनेक नामों से पुकारे जाने वाले ‘देवों के देव’ भगवान शिव सबका उद्धार करते हैं। उनकी महिमा अपार है। भगवान शिव के प्रति असंख्य भक्तों की अगाध श्रद्धा, विश्वास और आस्था बस देखते ही बनती है। देश व दुनिया में भगवान शिव के असंख्य अनन्य भक्त हैं। लेकिन, इस सन्दर्भ में हरियाणा प्रदेश की अपनी विशिष्ट प्रतिष्ठा और पहचान है। यदि हरियाणा को ‘शिवमयी हरियाणा’ कहकर पुकारा जाए तो संभवतः कदापि गलत नहीं होगा। क्योंकि हरियाणा प्रदेश का कण-कण में भगवान शिव की स्तुति करता है। इतिहासकारों के अनुसार इस  प्रदेश का नामकरण ही भगवान शिव के उपनाम ‘हर’ से हुआ है। ‘हर’ का सामान्यतः अर्थ ‘भगवान’ होता है। यहां प्रदेश के नामकरण का ‘हर’ भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करता है।
आचार्य भगवान देव जी ने शिव संबंधी आलयों, मेलों, मन्दिरों आदि को आधार मानकर निष्कर्ष निकाला कि यह सत्य है  िकइस प्रान्त के निवासियों का शिवजी महाराज के प्रति अतिशय प्रेम पाया जाता है, जो अनेक रूपों में देखने को आता है और पुरातात्विक खुदाईयों से प्राप्त सामग्री से यह सिद्ध होता है कि शिवजी के प्रसिद्ध नाम ‘हर’ के कारण ही इस प्रदेश का नाम ‘हरियाणा’ पड़ा। इस सन्दर्भ में श्री बलदेव शास्त्री जी के निष्कर्ष के अनुसार, प्राचीन समय में इस प्रदेश पर ‘हर’ नामक राजा का राज्य था। इसी ‘हर’ को संस्कृत के प्राचीन ग्रन्थों में ‘शिव’, ‘महादेव’ आदि अनेक नामों से संबोधित किया गया है।
पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार आदिकाल से ही हरियाणा पर शिव परिवार का वरदहस्त रहा है। इतिहासकारों के अनुसार यह प्रदेश शिव व शिव के पुत्रों का स्थान रहा है। इसीलिए इस प्रदेश का नाम ‘हरियाणा’ पड़ा है। महाभारत के रचियता महर्षि वेदव्यास जब पाण्डव पुत्र नकुल के विजयी अभियान का वर्णन करते हैं तो वे हरियाणा के रोहतक जिले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का बखान करना बिल्कुल नहीं भूलते हैं। महर्षि वेदव्यास के अनुसार,
‘‘ततो बहुधानं रम्यं गवाढ़ंय धन्धावत्।
कार्तिकेय दपितं रोहितक्रमया द्रवत्।।’’

पौराणिक सन्दर्भों में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव के बड़े सुपुत्र महासेनापति स्कन्द स्वामी कार्तिकेय की सैन्य छावनी व राजभवन रोहितकम् अर्थात् रोहतक (हरियाणा) में था। यह नगर कार्तिकेय का न केवल निवास स्थान था, अपितु, यह उनका सबसे प्रिय नगर भी था। शायद यही मूल कारण है कि यहां के प्राचीन मन्दिरों, शिवालयों, धार्मिक स्थानों और हवेलियों में शिव पुत्र कार्तिकेय व उसके प्रिय वाहन ‘मोर’ के चित्र बहुतायत में अंकित हुए मिलते हैं।
हरियाणा की धरती बड़ी पावन मानी गई है। एक प्राचीन शिलालेख में बड़े सुनहरी अक्षरों में अंकित है:
‘‘देशोअस्ति हरिणाण्यः पृथ्वीयं स्वर्ग सन्निभः’’
(अर्थात्  इस धरती पर स्थित हरियाणा नामक प्रदेश स्वर्ग के समान है।)
इस धरती की पवित्रता की तुलना परम-पवित्र गंगा के साथ की जाती है। एक बानगी देखिए:
‘‘गंगा सी पावन सुखकारी।
हरियाणा की धरती न्यारी।।’’

हरियाणा में परमपिता परमात्मा के प्रति अटूट आस्था विद्यमान है। यहां पर हर गाँव, नगर व शहर में मन्दिर, समाधि और तीर्थ मौजूद मिलेंगे। इस तथ्य का खुलासा इन लोकपंक्तियों में बखूबी झलकता है:
‘‘प्रभु चरण पखारे जहां जहां।
हमारे तीर्थ वहां वहां।।’’

हरियाणा प्रदेश में भगवान शिव ही ऐसे इष्टदेव हैं, जिनके मन्दिर व शिवालय अन्य देवी-देवताओं से कहीं अधिक हैं। प्रदेश के हर गाँव, नगर व शहर में ऊँची चोटियों वाले शिवालय जरूर मिलते हैं। इसके पीछे यहां के लोगों की मूल धारणा है कि जहां पर भगवान शिव-पार्वती की कृपा हो, उसका मन्दिर/आलय हो और भजन-कीतर्न हो, वहां पर समृद्धि का हर हालत में वास होता है और निर्धनता, दुःख व कष्टों का नाश होता है। इस लोकगीत में यह धारणा बखूबी स्पष्ट हो रही है:
‘‘जित महादेव पार्वती का जोड़ा।
कदै ना आवै तोड़ा।।’’

यदि यह कहा जाए कि हरियाणा प्रदेश के जनमानस में भगवान शिव आत्मिक रूप से रचे बसे हैं तो कदापि गलत नहीं होगा। यहां के लोगों की जीवन शैली में भगवान शिव के प्रति आस्था के कई अनूठे व उल्लेखनीय प्रमाण मिलेंगे। यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक शिव को स्मरण किया जाता है। विवाह व मांगलिक उत्सवों पर शिव-शंकर से जुड़े गीत व भजन गाए जाते हैं।
विवाह जैसे मांगलिक उत्सव पर भात गाते हुए ग्रामीण औरतें अपने सभी इष्ट देवी-देवताओं का गीतों के माध्यम से स्मरण करती हैं और उनसे सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना करती हैं। इस अवसर पर गाया जाने वाले गीत में भगवान शिव को इस प्रकार स्मरण व नमन किया जाता है:
‘‘पाँच पतासे पानां का बिड़ला,
ले शिवजी पै जाईयो जी।
जिस डाली म्हारा शिवजी बैठ्या,
वा डाह्ली झुक जाईयो जी।।’’

हरियाणा प्रदेश का जन-जन नित्य भगवान शिव का पावन स्मरण करता है। बड़े सवेरे शिवालयों से शंख, घण्टे, नाद और भजनों की सुर लहरियां कानों में रस घोलना शुरू कर देती हैं। ग्रामीण महिलाएं शिवालयों में भगवान शिव की स्तुति में अक्सर इस भजन को गुनगुनाती हैं:
‘‘शिव शंकर तेरी आरती,
मैं बार-बार गुण गावंती।
ताता पाणी तेल उबटणा,
‘हर’ मैं मसल नहावंती।।’’

ग्रामीण बालाएं कार्तिक स्नान के दौरान भगवान राम, श्रीकृष्ण के साथ-साथ अपने इष्टदेव शिव के भजन भी बड़ी श्रद्धा के साथ गाती हैं। एक बानगी देखिए:
‘‘छोटी सी लाडो पार्वती, शिव शंकर की पूजा करती है।
वो तो रोज फूलवारी जाती है और फूल तोड़कर लाती है।।
वो तो नदी से पानी लाती है, शिवलिंग को स्नान कराती है।
वो तो बाग से फल लाती है, शिव शंकर को चढ़ाती है।।’’

इस प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में जोगी सारंगी पर भजन सुनाने से पहले अपने इष्टदेव भगवान शिव-शम्भू का स्मरण कुछ इस प्रकार से करते आए हैं:
‘‘सुमरू साहिब अपणा।
सिम्भू सत भाणा।।’’

जब यहां के लोककवि अनेक कार्यक्रमों, उत्सवों और पर्वों के प्रारम्भ में प्रख्यात ‘बम लहरी’ शंख, खड़ताल व इकतारे की मनोहारी ताल पर गाते हैं तो पूरा वातावरण शिवमयी हो जाता है।
हरियाणा प्रदेश के लोककवियों ने अपनी रचनाओं में भगवान शिव से जुड़े पौराणिक प्रसंग समाहित किए हैं। सूर्यकवि पंडित लखमीचन्द ने अपने साँग ‘शाही लकड़हारा’ में शिव-पार्वती प्रसंग को अनुकरणीय रूप देते हुए इस अन्दाज में पिरोया है:
‘‘जो पतिव्रता धर्म देख ल्यूंगा तेरा।
दक्ष भूप की सुता सती, उस हर हर में ध्यान धरे गई।
पतिव्रत बन धर्म निभाऊं, सच्चा भजन करे गई।
शिव-शिव रटे गई और ले-ले जन्म मरे गई।
जितनी बार जन्म लिया हटकै, शिव-शंकर को बरे गई।
सती पतिव्रता बनती हो तै, ल्या देख ल्यूं ब्रह्म तेरा।।’’

लोककवि भगवान शिव को भव सागर से पार करने वाले और हर कष्ट और संकट को हरने वाले इष्ट देव के रूप में सादर स्मरण करते हैं। पंडित मांगेराम ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘खाण्डेराव परि’ में शिव का जिक्र कुछ इस प्रकार किया है:
‘‘के शिवजी कैलाश छोड़ कै पार उतारण आगे।’’
पुराणों में भगवान शिव के अनेक नामों का उल्लेख है। हरियाणा के लोकवियों ने अपने स्तर पर शिव के विभिन्न रूपों की गणना इस प्रकार से की है:
‘‘पार्वती इक्कीस देखी, शंकर भोले अड़तीस।’’
हरियाणा के लोग गौ माता के प्रति भी अगाध श्रद्धा रखते हैं और नित्य उसकी पूजा करते हैं। क्योंकि पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार गाय में तैंतीस करोड़ देवी-देवता निवास करते हैं। हरियाणा के प्रख्यात गन्धर्व कवि ने इस पौराणिक तथ्य के आधार पर गाय के विभिन्न अंगों में बसने वाले देवी-देवताओं का उल्लेख करते हुए बताया है:
‘‘गणेश नाक मं, शिव शंकर मस्तक मं बास करै।’’
हरियाणा का जनमानस गौ के साथ-साथ भगवान शिव की जटाओं में विराजने वाली गंगा के प्रति भी अटूट आस्था रखता है। यहां की लोक रचनाओं में गंगा की स्तुति प्रचूर मात्रा में मिलती है। कवि शिरोमणी पंडित मांगेराम ने अपनी एक प्रसिद्ध लोक रचना में गंगा जी की स्तुति में भगवान शिव का जिक्र कुछ इस प्रकार से किया है:
‘‘गंगा जी तेरे खेत में पड़े हिंडोले चार।
कन्हैया झूलते रूकमण झुला रही।।
शिवजी के करमण्डल मं विष्णु जी का लाग्या पैर।
पवन पवित्र अमृत बणकै पर्वत ऊपर गई ठहर।।’’

‘हर’ के प्रति अपनी अगाध एवं अटूट आस्था के चलते यहां के लोगों के नाम भी ‘हर’ से युक्त मिलते हैं। उदाहरण के तौरपर, ‘हरनारायण’, ‘हरदेव’, ‘हरचन्द’, ‘हरिसिंह’, ‘हरद्वारी’, ‘हरदत्त’, ‘हरकेराम’, ‘हरदयाल’, ‘हरफूल’, ‘हरबंस लाल’ आदि नाम लिए जा सकते हैं। इतना ही नहीं, भगवान शिव के नाम से युक्त भी काफी लोगों के नाम देखने का मिलते हैं। उदाहरणतः, ‘शिव कुमार’, ‘शिव प्रसाद’, ‘शंकर’, ‘शिवलाल’, ‘शिवनाथ’, ‘शंकर सिंह’, ‘शंकरदयाल’, ‘शिवकृष्ण’, ‘शिवराम’, ‘शिवदत्त’, ‘शंकरानंद आदि।’
हरियाणा के लोग प्रत्येक सोमवार को शिव व्रत के साथ-साथ प्रतिवर्ष फाल्गुन व श्रावण मास में आने वाली महाशिवरात्रियों को व्रत, पूजा-पाठ, भजन, जागरण आदि बड़ी श्रद्धा एवं विश्वास के साथ करते हैं। इसके साथ ही भक्तजन हरिद्वार से शिव की कांवड़ लाकर शिववालयों में चढ़ाते हैं और शिवलिंगों को गंगा के पानी से स्नान करवाते हैं। यहां के लोगों की जुबान पर ‘नमः शिवाय’, ‘ओउम् नमः शिवाय’ और ‘हर हर महादेव’ जैसे शिव-मंत्र जिव्हा पर रहते हैं। सेना में जवान भी ‘हर हर महादेव’ को बड़े जोश के साथ जयघोष करते हैं और दुश्मनों के छक्के छुड़ा देते हैं। कुल मिलाकर हरियाणा का जन-जन और कण-कण शिवमयी है। प्रदेश के नामकरण से लेकर यहां के जन-जीवन तक शिव की भक्ति का समावेश है। भगवान शिव शंकर सबकी मनोकामना पूरी करे, ‘‘जय हो शिव शंकर भोलेनाथ!’’
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक में शोध सहायक हैं।)

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

समाज के महादिग्दर्शक स्वामी दयानंद सरस्वती

188वीं जयन्ति पर विशेष

समाज के महादिग्दर्शक स्वामी दयानंद सरस्वती
-राजेश कश्यप


महर्षि दयानंद आर्य समाज के संस्थापक, महान समाज सुधारक, राष्ट्र-निर्माता, प्रकाण्ड विद्वान, सच्चे सन्यासी, ओजस्वी सन्त और स्वराज के संस्थापक थे। उनका जन्म गुजरात के राजकोट जिले के काठियावाड़ क्षेत्र में टंकारा गाँव के निकट मौरवी नामक स्थान पर भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, नवमी, गुरूवार, विक्रमी संवत् 1881 (फरवरी, 1824) को साधन संपन्न एवं श्रेष्ठ ब्राहा्रण परिवार में  हुआ था। कुछ विद्वानों के अनुसार उनके पिता का नाम अंबाशंकर और माता का नाम यशोदा बाई था। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। वे तीन भाईयों और दो बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने मात्र पाँच वर्ष की आयु में ‘देवनागरी लिपि’ का ज्ञान हासिल कर लिया था और संपूर्ण यजुर्वेद कंठस्थ कर लिया था। बचपन में घटी कुछ घटनाओं नेे उन्हें मूलशंकर से स्वामी दयानंद बनने की राह पर अग्रसित कर दिया। पहली घटना चौदह वर्ष की उम्र में घटी। उनके पिता शिव के परम भक्त थे। वर्ष 1837 के माघ माह में पिता के कहने पर बालक मूलशंकर ने भगवान शिव का व्रत रखा। जागरण के दौरान अर्द्धरात्रि में उनकी नजर मन्दिर मंे स्थित शिवलिंग पर पड़ी, जिस पर चुहे उछल कूद मचा रहे थे। एकाएक बालक मूलशंकर के मन में विचार आया कि यदि जिसे हम भगवान मान रहे हैं, वह इन चूहों को भगाने की शक्ति भी नहीं रखता तो वह कैसा भगवान?
इसी तरह जब मूलशंकर 16 वर्ष के थे तो उनकीं चौदह वर्षीय छोटी बहन की मौत हो गई। वे अपनी बहन से बेहद प्यार करते थे। पूरा परिवार व सगे-संबंधी विलाप कर रहे थे और मूलशंकर भी गहरे सदमे व शोक में भाव-विहल थे। तभी उनके मनोमस्तिष्क में कई तरह के विचार पैदा हुए। इस संसार में जो भी आया है, उसे एक न एक दिन यहां से जाना ही पड़ेगा, अर्थात् सबकी मृत्यु होनी ही है और मौत जीवन का शाश्वत सत्य है। अगर ऐसा है तो फिर शोक किस बात का? क्या इस शोक और विलाप की समाप्ति का कोई उपाय हो सकता है? उनके मन में बिल्कुल इसी तरह के भाव और प्रश्न एक बार फिर तब जागे, जब विक्रमी संवत् 1899 में उनके प्रिय चाचा ने उनके सामने बेहद व्यथा एवं पीड़ा के बीच दम तोड़ा। युवा मूलशंकर के मनोमस्तिष्क में अब सिर्फ एक ही विचार बार-बार कौंध रहा था कि जब जीवन मिथ्या है और मृत्यु एकमात्र सत्य है। ऐसे में क्या मृत्यु पर विजय नहीं पाई जा सकती? क्या मृत्यु समय के समस्त दुःखों से बचा नहीं जा सकता?
क्या मृत्यु पर विजय पाई जा सकती है? यदि हाँ तो कैसे? इस सवाल का जवाब पाने के लिए युवा मूलशंकर खोजबीन में लग गया। काफी मशक्त के बाद उन्हें एक आचार्य ने सुझाया कि मृत्यु पर विजय ‘योग’ से पाई जा सकती है और ‘योगाभ्यास’ के जरिए ही अमरता को हासिल किया जा सकता है। आचार्य के इस जवाब ने युवा मूलशंकर को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने ‘योगाभ्यास’ के लिए घर छोड़ने का फैसला कर लिया। जब पिता को उनकीं इस मंशा का पता चला तो उन्होंने मूलशंकर को मालगुजारी के काम में लगा दिया और इसके साथ उन्हें विवाह-बन्धन में बांधने का फैसला कर लिया ताकि वह विरक्ति से निकलकर मोह-माया में बंध सके।
जब उनके विवाह की तैयारियां जोरों पर थीं तो मूलशंकर ने घर को त्यागकर सच्चे भगवान, मौत और मोक्ष का रहस्य जानने का दृढ़संकल्प ले लिया। जेष्ठ माह, विक्रमी संवत् 1903, तदनुसार मई, 1846 की सांय को उन्होंने घर त्याग दिया। इसके बाद वे अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए दर-दर भटकते रहे। इस दौरान उन्हें समाज में व्याप्त कर्मकाण्डों, अंधविश्वासों, कुरीतियों, पाखण्डों और आडम्बरों से रूबरू होने का पूरा मौका मिला। वे व्यथित हो उठे। उन्होंने सन्यासी बनने की राह पकड़ ली और अपना नाम बदलकर ‘शुद्ध चैतन्य ब्रहा्राचारी’ रख लिया। वे सन् 1847 में घूमते-घूमते नर्मदा तट पर स्थित स्वामी पूर्णानंद सरस्वती के आश्रम मंे जा पहुंचे और उनसे 24 वर्ष, 2 माह की आयु में ‘सन्यास-व्रत’ की दीक्षा ले ली। ‘सन्यास-दीक्षा’ लेने के उपरांत उन्हें एक नया नाम दिया गया, ‘दयानंद सरस्वती’।
अब दयानंद सरस्वती को आश्रम में रहते हुए बड़े-बड़े साधु-सन्तों से अलौकिक ज्ञान प्राप्त करने, वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अन्य धार्मिक साहित्यों के गहन अध्ययन करने, अटूट योगाभ्यास करने और योग के महात्म्य को साक्षात् जानने का भरपूर मौका मिला। उन्होंने अपनी योग-साधना के दृष्टिगत विंध्याचल, हरिद्वार, गुजरात, राजस्थान, मथुरा आदि देशभर के अनेक महत्वपूर्ण पवित्र स्थानों की यात्राएं कीं।
इसी दौरान जब वे कार्तिक शुदी द्वितीया, संवत् 1917, तदनुसार, बुधवार, 4 नवम्बर, सन् 1860 को यम द्वितीया के दिन मथुरा पहुंचे तो उन्हें परम तपस्वी दंडी स्वामी विरजानंद के दर्शन हुए। वे एक परम सिद्ध सन्यासी थे। पूर्ण विद्या का अध्ययन करने के लिए उन्होंने स्वामी जी को अपना गुरू बना लिया। सन् 1860-63 की तीन वर्षीय कालावधि के दौरान दयानंद सरस्वती ने अपने गुरू की छत्रछाया मंे संस्कृत, वेद, पाणिनीकृत अष्टाध्यायी आदि का गहन अध्ययन पूर्ण किया।
पूर्ण विद्याध्ययन के बाद दयानंद सरस्वती ने अपने गुरू की पसन्द को देखते हुए ‘गुरू-दक्षिणा’ में आधा सेर लोंग भेंट करनी चाहीं। इसपर स्वामी विरजानंद ने दयानंद सरस्वती से बतौर गुरू-दक्षिणा, कुछ वचन मांगते हुए कहा कि देश का उपकार करों, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मतमतान्तरों की अविद्या को मिटाओ और वैदिक धर्म का प्रचार करो। तब स्वामी दयानंद ने अपने गुरू के वचनों की आज्ञापालन का संकल्प लिया और गुरू का आशीर्वाद लेकर आश्रम से निकल पड़े। उन्होंने देशभर का भ्रमण और वेदों के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया।
इसके बाद स्वामी दयानंद सरस्वती ने ही देशभर में सर्वप्रथम स्वराज्य, स्वभाषा, स्वभेष और स्वधर्म की अलख जगाई थी। इसी दौरान देश में ब्रिटिश सरकार का दमनचक्र चल रहा था और देश की जनता स्वतंत्रता की पुकार कर रही थी। ऐसे माहौल में दयानंद सरस्वती ने देश की रक्षा को ‘स्वधर्म’ और सर्वोपरि मानते हुए स्वाधीनता संघर्ष की राह पकड़ी ली। बड़े-बड़े देशभक्त उनसे मार्गदर्शन और आशीर्वाद लेने आने लगे।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने सन् अपै्रल, 1867 में हरिद्वार के कुम्भ मेले में श्रद्धालुओं को अपनी ओजस्वी वाणी और वैदिक ज्ञान से तृप्त किया तो हर कोई उनका भक्त बन गया। सन् 1869 में काशी में मूर्ति पूजा के पाखण्ड के सन्दर्भ में ऐतिहासिक शास्त्रार्थ करके उन्होंने अपने तप, ज्ञान और वाणी की देशभर में तूती बोलने लगी। इसके बाद तो वे जहां भी जाते लोगों का सैलाब उमड़ आता और स्वामी दयानंद सरस्वती के वैदिक ज्ञान से अभिभूत होकर स्वयं को धन्य पाता।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेद-शास्त्रों के आधार पर आध्यात्मिक ज्ञान, योग, हवन, तप और ब्रह्मचर्य की शिक्षा प्रदान की। उन्होंने अलौकिक ज्ञान, समृद्धि और मोक्ष का अचूक मंत्र दिया, ‘वेदों की ओर लौटो’। उन्होंने बताया कि ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है। जिस प्रकार तिलों में तेल समाया रहता है, उसी प्रकार भगवान सर्वत्र समाए रहते हैं। आत्मा में ही परमात्मा का निवास है। परमेश्वर ने ही इस संसार (प्रकृति) को बनाया है। उन्होंने ‘मुक्ति’ के रहस्य बताते हुए कहा कि जितने दुःख हैं, उन सबसे छूटकर एक सच्चिदानंदस्वरूप् परमेश्वर को प्राप्त होकर सदा आनंद में रहना और फिर जन्म-मरण आदि दुःखसागर में न गिरना, ‘मुक्ति’ है। ‘मुक्ति’ पाने का मुख्य साधन सत्य का आचरण है।
स्वामी दयानंद सरस्वती का कहना था कि एक धर्म, एक भाव और एक लक्ष्य बनाए बिना भारत का पूर्ण हित और उन्नति असंभव है। उन्होंने स्त्री शिक्षा और स्त्री-पुरूष समानता पर प्रमुखता से जोर दिया। इसके साथ ही उन्होंने समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए अभियान चलाया और देशभर में वैदिक स्कूल खोलने के लिए लोगों को प्रेरित किया। इतिहासकारों के अनुसार पहला वैदिक स्कूल सन् 1869 में फर्रूखाबाद में खोला गया। उसके बाद उनके प्रताप और मार्गदर्शन के चलते ही देश के कोने-कोने में वैदिक स्कूलों और गुरूकुलों की स्थापना हुईं।
स्वामी दयानंद ने देश में रूढ़ियों, कुरीतियों, आडम्बरों, पाखण्डों आदि से मुक्त एक नए स्वर्णिम समाज की स्थापना के उद्देश्य से 10 अपै्रल, सन् 1875 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत 1932) को गिरगांव मुम्बई व पूना में ‘आर्य समाज’ नामक सुधार आन्दोलन की स्थापना की। 24 जून, 1877 (जेष्ठ सुदी 13 संवत् 1934 व आषाढ़ 12) को संक्राति के दिन लाहौर में ‘आर्य समाज’ की स्थापना हुई, जिसमें आर्य समाज के दस प्रमुख सिद्धान्तों को सूत्रबद्ध किया गया। ये सिद्वान्त आर्य समाज की शिक्षाओं का मूल निष्कर्ष हैं।
इसके बाद देश के कोने-कोने में आर्य समाज की इकाईयां गठित हुईं और वैदिक धर्म का व्यापाक प्रचार-प्रसार हुआ। देशभर में जाति-पाति, ऊँच-नीच, छूत-अछूत, सती प्रथा, बाल-विवाह, नर-बलि, गौहत्या, धार्मिक संकीर्णता, अंधविश्वास, कुरीति, कुप्रथा आदि हर सामाजिक समस्या के खिलाफ सशक्त जागरूकता अभियान चले और एक नए समाज के निर्माण का मार्ग प्रस्शस्त हुआ। इसके साथ ही आर्य समाज के इस अनंत अभियान ने पं. राम प्रसाद बिस्मिल, लाला लाजपतराय, अशफाक उल्लां खां, दादा भाई नारौजी, स्वामी श्रद्धानंद, भगत फूल सिंह, श्यामा कृष्ण वर्मा, भारी परमांनंद दास, वीर सावरकर, सरदार भगत सिंह, मदन लाल धींगड़ा, लाला हरदयाल, मैडम भीकामा जी, सरदार अजीत सिंह, चौधरी मातूराम आदि न जाने कितनी ही महान राष्ट्रीय शख्सियत पैदा की।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिन्दी को आर्यभाषा माना। हालांकि उन्होंने प्रारंभिक पुस्तकंे संस्कृत में लिखीं। लेकिन, बाद में उन्हांेने हिन्दी को आर्य भाषा का दर्जा देकर लेखन किया। उन्होंने सन् 1874 में हिन्दी में ही अपने कालजयी ग्रन्थ ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ की रचना की। वर्ष 1908 में इस ग्रन्थ का अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किया गया। इसके अलावा उन्होंने हिन्दी में ‘ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका’, ‘संस्कार-विधि’, ‘आर्याभिविनय’ आदि अनेक विशिष्ट ग्रन्थों की रचना की। स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘आर्योद्देश्यरत्नमाला’, ‘गोकरूणानिधि’, ‘व्यवाहरभानू’ ‘पंचमहायज्ञविधि’, ‘भ्रमोच्छेदल’, ‘भ्रान्तिनिवारण’ आदि अनेक महान ग्रन्थों की रचना की। विद्वानों के अनुसार, कुल मिलाकर उन्होंने 60 पुस्तकें, 14 संग्रह, 6 वेदांग, अष्टाध्यायी टीका, अनके लेख लिखे।
स्वामी दयानंद सरस्वती के तप, योग, साधना, वैदिक प्रचार, समाजोद्धार और ज्ञान का लोहा बड़े-बड़े विद्वानों और समाजसेवियों ने माना। डा. भगवानदास ने उन्हंे ‘हिन्दू पुनर्जागरण के मुख्य निर्माता’ की संज्ञा दी तो पट्टाभि सीतारमैया ने ‘राष्ट्र-पितामह’ की उपाधि से अलंकृत किया। सरदार पटेल के अनुसार भारत की स्वतंत्रता की नींव वास्वत में स्वामी दयानंद ने डाली थी। लोकमान्य तिलक ने स्वामी जी को ‘स्वराज्य का प्रथम संदेशवाहक’ कहा तो नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ कहा।
स्वामी दयानंद जी वर्ष 1883 में महाराजा के निमंत्रण पर जोधपुर पहुंचे। वहां पर उन्होंने महाराजा के महल में नर्तकी को अमर्यादित आचरण में पाया तो उन्होंने उसे अनैतिक व अमर्यादित आचरण छोड़कर आर्य धर्म की पालना का उपदेश दिया तो नर्तकी नाराज हो गई। 25 सितम्बर, 1883 को उसने मानसिक द्वेष के चलते रसाईए के हाथों स्वामी जी के भोजन में विष मिलवा दिया। विष-युक्त भोजन करने के उपरांत स्वामी जी रात्रि को विश्राम के लिए अपने कक्ष मंे चले गए। विष ने अपना प्रभाव दिखाया और स्वामी जी तड़पने लगे। रसाईये को भयंकर पश्चाताप हुआ और उसने स्वामी जी के चरण पकड़कर अपने अक्षम्य अपराध के लिए क्षमा-याचना की। इस परम सन्यासी ने रसोईये को न केवल क्षमा किया, अपितु धन देकर राज्य से बाहर भेज दिया, ताकि सच का पता लगने पर महाराजा उसे कठोर दण्ड न दे दें। स्वामी जी के जीवन को बचाने के लिए बड़े-बड़े डॉक्टर, वैद एवं हकीम बुलाए गए। लेकिन विष स्वामी जी के पूरे शरीर में फैल चुका था। पापिनी नर्तकी के महापाप के चलते विष की भयंकर पीड़ा में तड़पते हुए अंततः कार्तिक मास, अमावस्या, मंगलवार, विक्रमी संवत् 1940 (31 अक्तूबर, सन् 1883) को दीपावली की संध्या को 59 वर्ष की आयु में यह परम दिव्य आत्मा हमेशा के लिए यह कहकर, ‘‘हे दयामय हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर ! तेरी यही इच्छा है। तेरी इच्छा पूर्ण हो’’, परम पिता परमात्मा के चरणों में विलीन हो गई। इस दिव्य परम आत्मा का अलौकिक प्रकाश आज भी विभिन्न रूपों में देश को आलोकित किए हुए है। इस महादिव्य आत्मा को कोटि-कोटि नमन। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक में शोध सहायक हैं।)

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

ढ़ाई आखर प्रेम के....

14 फरवरी / ‘वेलेंटाइन डे’ विशेष

ढ़ाई आखर प्रेम के....
-राजेश कश्यप

‘प्रेम’ ! दिल की कितनी अथाह गहरी भावनाओं को झंकृत करता है, यह शब्द। इस शब्द के उच्चारण मात्र से ही दिल के तार मधुर झंकार करने लगते हैं। ‘प्रेम’ की अनुभूति दिल को गुदगुदा जाती है। ‘प्रेम’ के बारे में जितना भी लिखा या कहा जाए, कम ही रहेगा। ‘प्रेम’ की महत्ता को दर्शाती संत कबीर की ये विख्यात पंक्तियां दिल से स्वतः प्रस्फूटित हो उठती हैं:

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय !
ढ़ाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय !!

‘प्रेम’ को कभी भी भौतिक पैमाने पर नहीं आंका जा सकता और न ही ‘प्रेम’ की संपूर्ण परिभाषा को शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है। ‘प्रेम’ को तो बस दिल की कोमल और गहरी भावनाओं से सहज रूप में अनुभव किया जा सकता है। ‘प्रेम’ के बारे में शाश्वत सत्य यह है कि ‘प्रेम’ किया नहीं जाता, हो जाता है! कुछ विद्वानों ने अपने दिल की अनुभूतियों के आधार पर ‘प्रेम’ की सुंदर अभिव्यक्तियां की हैं। यथा:

विक्टर हा्रगो के अनुसार, “जीवन एक पुष्प है और ‘प्रेम’ उसका मधु”। सर्वदानंद का मानना है, “प्रेम करना पाप नहीं है, पर प्रेम को लेकर पागल हो जाना अनुचित है। जो क्षणिक है और इसीलिए वासना पागलपन के साथ दूर हो जाती है। प्रेम गंभीर है और उसका अस्तिव कभी नहीं मिटता।” कहानी एवं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के अनुसार, “प्रेम जब आत्म-समर्पण का रूप लेता है, तभी प्यार है, उसके पहले अय्याशी।” आचार्य रजनीश का मानना है, “प्रेम एक दान है, भिक्षा नही। प्रेम मांग नहीं है, भेंट है। प्रेम भिखारी नहीं, सम्राट है। जो मांगता है, उसे प्रेम नहीं मिल सकता। जो बांटता है, उसे ही ‘प्रेम’ मिलता है।” शरतचन्द्र मानते हैं, “प्रेम दिल का सौदा है, बस की बात नहीं।” कुशवाहाकान्त मानते हैं, “प्रेम की भंगिमाएं छिपाए नहीं छिपतीं।” वाल्टर स्कॉट के मुताबिक, “अश्रुपूर्ण प्रेम अत्यंत लुभावना होता है।” जे.रूक्स के विचारानुसार, “सच्चा प्रेम तो वहीं है, जहां शरीर दो हों और मन एक।” बेली का मानना है, “जीवन का मधुरतम आनंद और कटुतम वेदना ‘प्रेम’ ही है।”
सन्त कबीर का मानना था कि, ‘सच्चा प्रेम कभी प्रति-प्रेम नहीं चाहता’। मीर तकी मीर के विचार में, “जिस प्यार में प्यार करने की कोई हद नहीं होती और किसी तरह का पछतावा भी नहीं होता, वहीं उसका सच्चा रूप है।” राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी कहते थे कि, “प्रेम कभी दावा नहीं करता, वह हमेशा देता है। प्रेम हमेशा कष्ट सहता है, न कभी झुंझलाता है और न ही कभी बदला लेता है।” महान दार्शनिक अरस्तु ने प्रेम के मूल तत्व को समझाते हुए बताया कि, “जहाँ प्रेम है, वहीं जीवन का सही रूप है।” कन्फ्यूशियस ने तो यहां तक कहा कि, “प्यार आत्मा की खुराक है।” महान विचारक बेकन की नजरों में, “प्यार समर्पण और जिम्मेदारी का दूसरा नाम है।” इसी प्रकार जॉर्ज बनार्ड शॉ का भी यही मानना रहा कि, “जीवन में प्रेम का महत्व वही है, जो फूल में खूशबू का होता है।”
शायरों ने भी प्रेम’ की अनुभूतियों को अपनी शायरियों में बखूबी पिरोया है। कुछ बानगियां देखिए:

मुहब्बत के लिए कुछ खास दिल मखसूस होते हैं!
ये वो नगमा है, जो हर साज पर गाया नहीं जाता!! (मखमूर देहलवी)
चाहत नहीं छुपेगी, इसे लाख छुपाओ !
खुशबू पे किसी फूल के पहरा नहीं होता !! (नरोत्तम शर्मा)
ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे !
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है !! (जिगर मुरादाबादी)
मुहब्बत की नहीं जाती, मुहब्बत हो जाती है !
ये शोला खुद भड़क उठता है, भड़काया नहीं जाता !! (मखमूर देहलवी)
इश्क ने ‘गालिब’ निकम्मा कर दिया !
वरना हम भी आदमी थे काम के !! (मिर्जा गालिब)

‘प्रेम दिवस’/‘वेलेंटाइन डे’ के प्रति पश्चिमी अधारणाएं

‘प्रेम’ अब एक ‘पर्व’ के रूप में भी मनाया जाने लगा है। ‘होली’, ‘दीपावली’, पर्वों की भांति जवां दिलों का ‘प्रेम-पर्व’, ‘वेलेन्टाईन-डे’ भी पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश के युवा वर्ग में काफी लोकप्रिय हो चला है। ‘वेलेन्टाईन-डे’ मनाने के पीछे अनेक धारणाएं प्रचलित हैं। एक धारणा के अनुसार ‘प्रेम’ के नाम पर वेलेन्टाईन नामक पादरी को इस दिन फांसी की सजा दी गई थी। उसी पादरी की स्मृति में उसके नाम से ‘वेलेन्टाईन-डे’ पर्व मनाया जाने लगा।
यूनानियों का एक अति लोकप्रिय देवता था, ‘क्यूपिड’, जिसे ‘प्रेम का देवता’ माना जाता है। यह प्रेम का देवता एक सुन्दर शिशु के रूप में धनुष बाण लिए चित्रित किया मिलता है। किवदंती के अनुसार, ईसा मसीह की मृत्यु के तीन सौ साल बाद तक रोम के शासकों की यह जिद्द थी कि लोग पुराने युनानी देवी-देवताओं को मानें, ईसाईयत को बिल्कुल नहीं। लेकिन वेलेंटाइन डे नामक पादरी ने यह सब स्वीकार न किया। इसी आरोप में रोमन सम्राट क्लाडियस ने उसे मृत्यु दण्ड की सजा सुना दी।
जब वेलेंटाइन जेल में था तो उसने एक अनोखा चमत्कार कर दिखाया। वेलेंटाइन जिस जेल में कैद था, उसी जेल में जेलर की बेटी से प्रेम करने लगा। आश्चर्य की बात यह थी कि जेलर की बेटी बिल्कुल अंधी थी। वेलेंटाइनने चमत्कार करके अपनी अंधी प्रेमिका की आंखों की ज्योति वापस ला दी और अगले ही दिन वेलेंटाइन को मृत्युदण्ड की सजा दे दी गई। माना जाता है कि उसी वेलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के एक दिन पहले अपनी प्रेमिका को पहला प्रेम-पत्र लिखकर अपने प्यार का इजहार किया था। उस अभागे प्रेम वेलेंटाइन की स्मृति में ‘वेलेंटाइन डे’ मनाया जाने लगा।
‘वेलेंटाइन’ मनाने की एक अन्य धारणा भी ईसाई पादरी से ही जुड़ी है। लेकिन यह पादरी इटली से संबंध रखता था। वह चोरी-छिपे उस समय की प्रचलित परंपरा एवं रीति-रिवाज के विरूद्ध रोमन युवक-युवतियों की शादी करवाया करता था। किवदंती है कि उस पादरी को इस जुर्म के लिए 14 फरवरी के दिन जिन्दा जला दिया गया था।
एक अन्य धारणा के मुताबिक, प्राचीन रोम में एक अनोखा त्यौहार मनाया जाता था। यूनानी लोग इस पर्व के दिन खूब सज-धजकर इकट्ठे होते और सबके सामने अपने प्रेम का इजहार करते। युवक अपनी-अपनी प्रेमिका का नाम बोलते और अपने दिल की मलिका बना लेते। इस तरह यह त्यौहार युवा लोगों में खूब प्रचलित होता चला गया।

भारतीय अवधारणाएं

अगर ‘वेलेन्टाईन-डे’ मनाने के पीछे भारतीय धारणा का अवलोकन करें तो यह सबसे अलग है। भारतीय धारणा प्रकृति के परिवर्तन से जुड़ी हुई है। भारतीय परंपरानुसार फरवरी माह में बसंत ऋतु जैसी सुनहरी मनोहारी ऋतु अपने चरमोत्कर्ष पर होती है। साहित्यकारों ने भी इस समय को ‘प्रेम का समय व ऋतु को ‘प्रेम-ऋतु’ का नाम दिया है’। हमारे समाज में भी मान्यता है कि इस समय ‘प्रेम’ का उन्माद भी खूब चढ़ जाता है। इसलिए विवाह आयोजनों में भी तेजी आ जाती है। चूंकि ‘वेलेन्टाईन-डे’ को ‘प्रेम-पर्व’ का नाम दिया गया है, तो इसे युवा प्रेमियों ने पश्चिमी संस्कृति का अंग होने के बावजूद दिल से स्वीकार किया है। कहना न होगा कि हमारे यहां ‘प्रेम’ की अविरल धारा हमेशा बहती रही है। ‘हीर-रांझा’, ‘सोनी-महीवाल’, ‘लैला-मजनूं’, ‘सीरी-फरहाद’ आदि बहुत से प्रेमी अपने अटूट प्रेम के दम पर ‘प्रेम’ के इतिहास में अमर एवं अमिट हो गए।

‘प्रेम-पथ’ के अमर ‘पथिक’

प्रेम-ग्रन्थ के अमर प्रेमियों में एक ‘हीर-रांझा’ की जोड़ी प्रमुख है। तख्त हजारा के सरदार का आशिक मिजाज बेटा रांझा बारह वर्ष की उम्र में ही अपने सपनों की मल्लिका को ढूंढ़ने लग गया था। उसकी तलाश ‘हीर’ को देखकर, जो कि राजा की लड़की थी, पूरी हो गई। किसी तरह रांझा ‘हीर’ के घर नौकरी पाने में सफल हो गया। उसने मुलाकातों ही मुलाकातों में ‘हीर’ को अपने प्रेम में बांध लिया। जब ‘हीर’ के चाचा को इसकी भनक लगी तो उसने ‘हीर’ की शादी किसी दूसरे गाँव में जबरदस्ती कर दी। अब तो ‘हीर’ भी तड़प उठी और ‘रांझे’ का तो बुरा हाल ही हो गया। वह अपने प्रेम के वशीभूत फकीर बन ‘हीर’ की ससुराल में जा पहुंचा। भिक्षा लेने के नाम पर वह ‘हीर’ से मिलने लगा। ‘हीर’ के ससुरालियों ने उसे ‘हीर’ सहित गाँव निकाला दे दिया। जब वहां के राजा को हकीकत का पता चला तो उसने ‘हीर’ के ससुरालियों को ‘हीर’ रांझा को देने का आदेश दे डाला। राजा के डर से ससुरालियों ने राजा का आदेश तो मान लिया, लेकिन उन्होंने ‘हीर’ को जहर दे दिया। ‘हीर’ के मरने की खबर सुनकर रांझा भी तड़प-तड़प् कर प्राण छोड़ गया।

 प्रेम के अमर ग्रन्थ के पन्नों में ‘लैला-मजनूं’ का अटूट प्रेम भी दर्ज है। अरब देश के ये प्रेमी पहली बार एक मदरसे में मिले थे और पहली ही नजर में प्यार कर बैठे। उनके घरवालों को यह नागवारा गुजरा। परिणास्वरूप ‘लैला’ की शादी किसी अन्य के साथ कर दी गई। ‘लैला’ की जुदाई में ‘कैस’ मारा-मारा फिरने लगा और लोगों में ‘मजनूं’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। उधर ‘लैला’ के यह बताने पर कि वह केवल और केवल ‘कैस’ यानि ‘मजनूं’ से प्रेम करती है और उसके सिवाय वह किसी को छूएगी भी नही ंतो उसके शौहर ने उसे तलाक दे दिया। ‘लैला’ के गम में जंगल में भटकते ‘मजनूं’ के पास लैला जा पहुंची और इस तरह उनका मिलन हो गया। लेकिन उनकी किस्मत में यह मिलन ज्यादा समय तक नहीं लिखा था। ‘लैला’ की माँ उसे ‘मजनूं’ से छुड़ाकर घर ले गई और उसे घर में कैद कर दिया। इसके बाद दोनों सच्चे प्रेमियों को भारी वियोग सहना पड़ा। बाद में वे दोनों तड़पते-तड़पते दम तोड़ गए।

‘वेलेंटाइन डे’ का विरोध और बदलता दृष्टिकोण

आधुनिकता के इस दौर में भी भारतीय संस्कृति में ऐसे प्रेमियों को पश्चिमी संस्कृति का दास व अपनी संस्कृति का दुश्मन करार दिया जा रहा है। कुछ राजनीतिक लोगों द्वारा ‘वेलेंटाइन डे’ मनाने वाले प्रेमी-प्रेमिकाओं के साथ मारपीट व अभद्र व्यवहार भी किया जा रहा है। इसके बावजूद प्रेमी बेधड़क अपने प्रेम का इजहार किसी न किसी तरह इस दिन कर जाते हैं। ‘वेलेंटाइन डे’ का जहां हमारे यहां विरोध हुआ है, वहीं धीरे-धीरे ‘वेलेंटाइन डे’ के प्रति सकारात्मक विचारधारा भी बढ़ती चली जा रही है। यह कटु सत्य है कि काफी युवा लोग ‘प्रेम’ के नाम पर अच्छे खासे भटके हुए हैं. ‘प्रेम’ के नाम पर वे सिर्फ शारीरिक आकर्षण में बंधते हैं। काफी युवा लोग सिर्फ ‘सेक्स’ की भूख को शांत करने के लिए ही ‘प्रेम’ का ढ़ोंग रचते हैं। अधिकतर युवाओं के लिए ‘प्रेम-प्यार’ सब ‘टाईम-पास’ बन गया है। इन्हीं भावनाओं के चलते युवा ‘प्रेम’ से छल करके अपना विश्वास तो खोते ही हैं, साथ ही ‘प्रेम’ की पाक-पवित्र भावना को भी अपमानित करते हैं। कुछ युवा लोग ‘वेलेंटाइन डे’ के दिन प्रेम का इजहार करने के साथ ही मर्यादा की सभी सीमाएं लांघने के लिए उतावले नजर आते हैं।
युवा प्रेमियों में इस तरह की प्रवृत्ति निश्चय ही पश्चिमी संस्कृति की उपज है। इसके अलावा अश्लील साहित्य, सिनेमा एवं अन्य सामग्री भी युवाओं को ‘प्रेम’ के नाम पर ‘सेक्स’ के भूखे भेड़िये तैयार कर रही है। अश्लील सामग्री केवल काम-पिपासा की प्रवृत्ति को ही जन्म देती है। काम-पिपास के चलते ही आज ‘प्रेम’ एक फरेब बनकर रह गया है और सिर्फ शारीरिक भूख मिटाने का जरिया सा बन गया है। इन्हीं कुप्रवृत्तियों के चलते आज छेड़खानियां, बलात्कार, दैहिक शोषण जैसे मामलों में बाढ़-सी आई हुई है। इन सबके चलते ही भारतीय समाज ‘वेलेंटाइन डे’ को स्वीकार नहीं कर पा रहा है।
कुल मिलाकर युवा प्रेमी ‘प्रेम’ तो करें, ‘प्रेम’ करना पाप अथवा अपराध नहीं है, लेकिन पवित्र एवं सच्चा प्रेम करें। युवा लोग ‘प्रेम’ को ‘प्रेम’ ही रहने दें। ‘प्रेम’ को छल, फरेब, विश्वासघात, वासना आदि से एकदम दूर रखें। सच्चा प्रेम ईश्वर की आराधना है। इसलिए अति उन्मुकत्ता, स्वछन्दता एवं अमर्यादित आचरण आपकी इस आराधना को आलोचना का पात्र बना सकता है। इसलिए आप अपने प्रेम का इजहार करें लेकिन सामाजिक मर्यादाओं और सीमाओं का सम्मान रखते हुए । आपका सच्चा एवं सात्विक पवित्र ‘प्रेम’ अत्यन्त प्रगाढ़ हो ! ‘हैप्पी-वेलेन्टाईन डे’!!! (नोट: लेखक स्वतंत्र पत्रकार है।)

(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक

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राजेश कश्यप
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सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

हरियाणा में छाया काले हिरणों के अस्तित्व पर घोर संकट

विडम्बना
 हरियाणा में छाया काले हिरणों के अस्तित्व पर घोर संकट
-राजेश कश्यप


हरियाणा में गत माह दस जनवरी से हिरणों की हत्याओं का सिलसिला शुरू होने के बाद समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है। संज्ञान में आए मामलों के अनुसार 31 जनवरी तक एक दर्जन हिरण शिकारियों एवं आवारा जंगली कुत्तों का शिकार बन चुके हैं। इनमें से तीन हिरण शिकारियों की गोलियों का निशान बने हैं और 9 हिरण आवारा कुत्तों का शिकार बने हैं। इससे हरियाणा में हिरणों के अस्तित्व पर घोर संकट गहरा गया है। यह कितनी बड़ी विडम्बना का विषय है कि प्रदेश में वन्य प्राणी विभाग है, वन्य जीव विभाग  है, वन अधिकारी व कर्मचारी हैं, वन्य अधिनियम लागू हैं और कुरूक्षेत्र स्थित प्रदेश की पर्यावरण अदालत तक कार्य कर रही है, इन सबके बावजूद बड़ी संख्या में निरन्तर दुर्लभ वन्य प्राणी काले हिरणों की मौतों का सिलसिला जारी है। आदमपुर (हिसार) में काले हिरणों की मौतें वन्य जीव विभाग, जिला प्रशासन के साथ-साथ सरकार की कार्यशैली पर बड़े गहरे प्रश्नचिन्ह लगा रही हैं। हिरणों की मौतों का अनवरत सिलसिला कई गंभीर सवाल पैदा कर रहे हैं। इन पर निगाह डालने से पहले इस पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार समझना सर्वथा उचित होगा।  

          हिरणों की मौतों का सिलसिला गत माह 10 जनवरी को तब शुरू हुआ, जब एक काले हिरण को शिकारियों ने अपनी गोली का निशाना बनाया और उसे मौत के घाट उतार दिया। इस समाचार की स्याही सूखी भी नहीं थी कि अगले ही दिन 11 जनवरी को फिर एक अन्य हिरण का शव खेतों में बुरी तरह नोंचा हुआ मिला। जब हुबहू यही वाकया 15 जनवरी को पुनः संज्ञान में आया तो किसी भी संवदेनशील इंसान का सन्न रह जाना स्वभाविक ही था। समाज में हिरणों की मौतों पर आक्रोश पैदा हो गया। वन्य विभाग के अधिकारियों के संज्ञान में भी इस मामले को लाया गया। लेकिन, विभाग का रवैया एकदम उदासीन देखने को मिला। विभाग ने मामले को गंभीरता से लेने की बजाय यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि हिरणों का शिकार कुत्ते कर रहे हैं, जबकि इन तीन हिरणों में से एक हिरण के गोली का शिकार होने के समाचार की पुष्टि भी हो चुकी थी। 
 
जब हिरणों की मौतों के समाचारों ने सुर्खियां बटोंरी और वन्य प्राणी एवं जीव विभाग की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा किया तो अधिकारियों की कुंभकर्णी नींद खुली। इसके बाद आनन फानन में राजस्थान के भनोई गांव में रहने वाले बांवरी समाज के एक व्यक्ति पालाराम पर 10 जनवरी को काले हिरण को गोली मारने का केस दर्ज किया गया। जब तक पुलिस आरोपी को गिरफ्तार करती, तब तक वह बंदूक खेतों में ही छोड़कर फरार हो चुका था। बताया जाता है कि आरोपी अक्सर बंदूक के साथ ही शिकार की टोह में खुलेआम घूमता रहता था और उस पर इसी तरह का एक और केस चल रहा था। आरोपी का शिकार के मकसद से खुलेआम बेरोकटोक खेतों में घूमते देखा जाना,  हिरण का शिकार करने के उपरान्त आसानी से फरार होना और पूर्व के शिकार मामले में नामजद होने के बावजूद आवश्यक कार्यवाही से बचे रहना जैसे अनेक सवाल वन्य प्राणी एवं जीव रक्षा विभाग की कार्यशैली पर कई तरह के गम्भीर सवाल खड़े किए। 

हैरानी की बात यह रही कि हिरणों की मौतों से पेचीदा हुई स्थिति से निपटने के लिए स्थानीय लोगों ने भी कमर कसी और आपात बैठक बुलाकर हिरणों की रक्षा में ठीकरी पहरा देने का भी फैसला किया। प्रशासनिक अधिकारियों ने भी भरोसा दिलाया कि जल्द ही पिंजरे मंगवाने और आवारा जंगली कुत्तों को पकड़ने के जोरदार आश्वासन भी दिए। लेकिन, सब निर्णय और आश्वासन तब भोथरे साबित हो गए जब 17 जनवरी को एक बार फिर तीन काले हिरणों के शव खेतों में नोंचे हुए मिले। इनमें से दो काले हिरणों के शव गाँव आदमपुर में और एक शव गाँव सदलपुर में मिला। इसके बाद बिश्नोई समाज में एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही पर आक्रोश का ज्वार फूट पड़ा। अपनी जिम्मेदारियों पर पर्दा डालते हुए एक बार फिर वन्य विभाग के अधिकारियों ने राग अलापा कि हिरणों का शिकार कुत्ते कर रहे हैं तो उनके इस दावे पर बिश्नोई समाज के जिलाध्यक्ष बनवारी लाल ने यह कहकर सवालिया निशान लगा दिया कि काला हिरण कुत्तों के काबू नहीं आ सकता। हिरणों का तो शिकार हो रहा है। जब इस सिलसिले में राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री कैप्टन अजय सिंह यादव से सवाल किया गया तो उन्होंने हिरणों की मौतों पर चिंता व अफसोस जाहिर करते हुए वन अधिकारियों से रिपोर्ट मंगवाने की बात कही। 
 
कमाल की बात तो यह है कि हरियाणा में आदमपुर वन्य प्राणियों के लिए अत्यन्त सुरक्षित माना जाता था। क्योंकि यहां का बिश्नोई समाज अपने धर्मगुरू श्री जम्भेश्वर भगवान के ज्ञान एवं उपदेशांे के अनुसार जीवों एवं पेड़ों की रक्षा करना अपना परम धर्म मानते हैं। बिश्नोई समाज में जीवों और पेड़ पौधों के रक्षार्थ हंसते-हंसते अपने प्राणों की बलि तक देने की परंपरा है। किवदन्ती है कि विक्रमी संवत 2034 में मिगसर सुदी सप्तमी, शनिवार को राजस्थान के जोधपुर जिले के लोहावट गांव निवासी बीरबल बिश्नोई ने एक हिरण की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान तक दे दिया था। इसी क्रम में जब एक हिरणी अपने दूधमुंहे बच्चे को छोड़कर मर गई तो बिश्नोई समाज की एक महिला ने अपना दूध पिलाकर उसे पाला-पोसा था। इस तरह के अनुकरणीय उदाहरणों से बिश्नोई समाज अलंकृत है। इसी के चलते इस इलाके में जीव जन्तुओं की संख्या प्रदेश के अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक पाए जाते हैं। इतने अनुपम और अनुकरणीय स्थान पर बेजुबान निर्दोष काले हिरणों के शिकार होने और कुत्तों का निशाना बनने के अनवरत सिलसिले ने हर किसी को हैरत में डालकर रख दिया। काले हिरणों की मौतों के सिलसिले में एक और इजाफा 19 जनवरी को तब हो गया, जब आदमपुर-अग्रोहा मार्ग पर गाँव कोहली के पास एक अन्य हिरण का शव पड़ा मिला, जिसके बारे में बताया गया कि इस बार हिरण की मौत गाड़ी की चपेट में आने से हुई है। 

इसी बीच बिश्नोई समाज की तरफ से खेतों में हथियारों के साथ पहरेदार बैठाए गए और वन्य जीव विभाग की तरफ से तीन गार्ड लगाए गए। इन सब प्रयासों को एक बार फिर झटका लगा और 22 जनवरी, रविवार को फतेहाबाद जिले के गाँव झलनियां में दो शिकारियों संतलाल व सतबीर सिंह ने एक काले हिरण को अपना शिकार बना दिया। इन दोनों पर भी पहले से दो हिरणों व एक नील गाय के शिकार करने के केस चल रहे थे। इस घटना के बाद एक बार फिर अधिकारियों ने बयानों के जरिए मामले पर लीपा-पोती की। फतेहाबाद के उपायुक्त एम.एल. कौशिक ने इन घटनाओं को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए सख्त कदम उठाने की बात कही और जिले में किसी भी सूरत में शिकार न होने देने के ठोस दावे भी किए। डीएफओ एसएस श्योराण ने हिरणों की मौतों के बाद अधिकारियों को सतर्क करने और निगरानी बढ़ाने की बात कही। उधर, वन एवं पर्यावरण मंत्री कैप्टन अजय यादव द्वारा हिरणों की मौतों के सन्दर्भ में वन अधिकारियों से तलब की गई रिपोर्ट के सन्दर्भ में किसी ठोस कार्यवाही के सामने न आने पर भी सवाल खड़े हुए। अब तक 13 दिनों में आदमपुर, सिरसा व फतेहाबाद में 9 काले हिरणों की मौतों के समाचारों की पुष्टि हो चुकी थी, इनमें से 2 हिरण गोली और 7 हिरण कुत्तों के शिकार हुए। 23 जनवरी को वन विभाग के अधिकारियों ने राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री कैप्टन अजय सिंह यादव को उनके आदेशानुसार रिपोर्ट बनाकर भेजी गई। इस रिपोर्ट में बताया गया कि हिरणों का शिकार कुत्ते कर रहे हैं। जिस भाग में हिरण रह रहे हैं, वहां इस समय करीब 50 शिकारी कुत्तों के झुण्ड की मौजूदगी की बात भी कही गई। रिपोर्ट के अनुसार ये कुत्ते हिरण को तीन तरफ से घेर लेते हैं। जब हिरण इन कुत्तों से बचने के लिए खेतों की तरफ दौड़ते हैं तो वे खेतों की बाड़ पर लगे कंटीले व जालीदार तारों में फंस जाते हैं और आसानी से कुत्तांे का शिकार हो जाते हैं। इसके साथ ही रिपोर्ट में बताया गया कि इन कुत्तों को पकड़ने के लिए जिला उपायुक्त से अनुमती मांगी गई है और अनुमती मिलते ही कार्यवाही शुरू कर दी जाएगी। तब तक तीन गार्डों को हिरणों की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया है। उधर हजकां सुप्रीमांे एवं सांसद कुलदीप बिश्नोई ने आदमपुर एक सप्ताह में छह हिरणों की मौतों पर चिंता एवं रोष प्रकट करते हुए जिला प्रशासन व सरकार को चेताया कि यदि हिरणों की सुरक्षा के लिए जल्द कोई कड़े कदम नहीं उठाए गए तो हिरण संरक्षण के लिए आन्दोल शुरू करना पडे़गा। इसके साथ ही उन्होंने सरकार को छोटे स्तर पर अभ्यारण बनाने का सुझाव भी दिया। 

25 जनवरी, बुधवार को हिरणों की मौतों की सूची में खैरमपुर गाँव का नाम भी जुड़ गया। इस गाँव में भी एक काले हिरण को कुत्तों ने अपना शिकार बना डाला। 27 जनवरी, शुक्रवार को हिसार के फॉरेस्ट जोन में हिरणों को बचाने के वन्य विभाग के सभी दावे एक बार फिर खोखले साबित हुए। इस बार एक काला हिरण फतेहाबाद के गाँव चिन्दड़ में और एक मादा हिरण के हिसार मण्डी आदमपुर के चौधरीवाली गाँव में कुत्तों का शिकार बनने के समाचार मिले। चिन्दड़ गाँव के हिरण की मौत उसी दिन हो गई, जबकि चौधरीवाली गाँव की मादा हिरण ने पाँचवे दिन 1 फरवरी को दम तोड़ दिया। इस प्रकार दो और  निरीह बेजुबान प्राणी वन्य विभाग की ठोस कार्यवाहियों के अभाव की भेंट चढ़ गए। इसके साथ ही हिरणों की मौतों के मामले पर गाँव के नागपुर की युवा ग्रामीण समाज  सुधार समिति ने मोर्चा खोलने और पर्यावरण अदालत जाने की घोषणा की। समिति के प्रधान राधेश्याम ने वन्य प्राणी विभाग के अधिकारियों द्वारा हिरणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बजाय स्टाफ व संसाधन न होने जैसे बयानों को गैर-जिम्मेदाराना बताया। 

हरियाणा प्रदेश के राज्य पशु काले हिरण की मौतों का सिलसिला यहां भी नहीं रूका। 28 जनवरी, शनिवार को गाँव बोस्ती में शिकारियों ने एक और हिरण को अपनी गोली का शिकार बना डाला। बिश्नोई समाज के लोग हिरण के शव को लेकर बिश्नोई मन्दिर में पहुंचे। यहां वैटर्नरी सर्जन डा. मान सिंह एवं रणधीर सिंह ने इस तथ्य की पुष्टि की कि इस हिरण की मौत गोली लगने से हुई है। समाज में बढ़े आक्रोश के बीच वन्य विभाग ने बोस्ती गाँव के ही ओम प्रकाश बावरिया को बन्दूक सहित गिरफ्तार किया। 
       इस तरह हिसार, सिरसा और फतेहाबाद जिलों में दस जनवरी से शुरू हुआ बेजुबान निरीह काले हिरणों की मौतों का अनवरत सिलसिला रूकने का नाम नहीं ले रहा है। निश्चित तौरपर यह घटनाक्रम बेहद दुःखद, चिन्ता एवं चुनौती का विषय है। इसके साथ ही यह भी विडम्बनापूर्ण तथ्य है कि हरियाणा सरकार अपने राज्य पशु काले हिरण को समुचित सुरक्षा करने में नाकाम और असहाय दिखाई दे रही है। इसके साथ ही हरियाणा से निरन्तर घटते काले हिरणों की संख्या से प्रदेश में हिरणों के अस्तित्व पर ही संकट गहरा गया है।
       इसी प्रकार के सिलेसिले के चलते वर्ष 2009 में महम (रोहतक) के मिनी चिड़ियाघर/हिरण पार्क से एक दर्जन से अधिक हिरणों का खात्मा हो चुका है। उल्लेखनीय है कि महम में एक मिनी चिड़ियाघर बनाया गया था, जिसे बाद में हिरण पार्क के रूप में विकसित किया गया। इस पार्क में एक दर्जन से अधिक हिरण कुलांचे मारते स्वच्छन्द घूमते थे। लेकिन, वर्ष 2009 में विभागीय लापरवाही के चलते ये हिरण एक के बाद एक सभी हिरण कुत्तों के शिकार हो गए और यह हिरण पार्क एकदम सुनसान हो गया। सबसे आश्चर्य की बात यह रही कि इस पार्क के चारों तरफ लोहे की मजबूत जाली भी लगाई गई थी और उसमें किसी तरह का कोई छेद भी नहीं था। वहां पर गार्डों की भी नियुक्ति थी। आसपास के ग्रामीणों ने कभी हिरणों को कुत्तों द्वारा शिकार बनते भी नहीं देखा गया, जिसके कारण इस मामले पर भी कई तरह के सवालिया निशान लगाए गए। समाचार-पत्रों मंे मामले के सुर्खियां बनने पर विभागीय कार्यवाही के नाम पर तत्कालीन डीएफओ जगदीश शर्मा सहित चरण सिंह, मामन राम, सुंदरी, वजीर सिंह व रणधीर सिंह को निलंबित कर दिया गया। मामला ठण्डा पड़ने पर उन्हें
बहाल भी कर दिया गया और हिरण पार्क की लगभग सात एकड़ जमीन को वन्य प्राणी संरक्षण विभाग से टेकओवर करके लकड़ी रखने का स्टोर बना दिया गया है। 
       यदि हिरणों की मौतों का यह अनवरत सिलसिला यूं ही चलता रहा तो कहना न होगा कि महम के मिनी चिड़ियाघर/हिरण पार्क की तर्ज पर ही हरियाणा से हिरणों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। आंकड़ों के अनुसार हरियाणा से हिरणों की संख्या निरन्तर तेजी से घटती चली जा रही है। वर्ष 2007 में जब हरियाणा में काले हिरणों की गिनती की गई थी तो पिछले पाँच वर्षों में हिरणों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई। अब जल्दी ही विभाग द्वारा नए सिरे से हिरणों की गणना करवाने की बात की जा रही है। वैसे इस समय अनुमानित आंकड़ों के अनुसार आदमपुर में 100 हिरण थे और हिरणों की ताजा मौतों के बाद यह संख्या घटकर 90 के करीब रह गई है। आंकड़ों के अनुसार आदमपुर के अलावा मात्र श्याम में 200, चौधरी वाली में 250, ढ़ाणी खासा में 75, सदलपुर में 70, बालसमंद, बुड़ाक व बांझहेड़ी में 80, हिरण पार्क हिसार में 40 हिरण बचे हुए हैं।
       सबसे बड़े आश्चर्य का विषय है कि प्रदेश में कुरूक्षेत्र जिले में पर्यावरण अदालत सुचारू रूप से काम कर रही है और वन्य प्राणी अधिनियम 1972  के अनुसार हरियाणा राज्य में वन्य प्राणियों को मारना, पकड़ना, कब्जे में
रखना, शिकार करना, वन्य प्राणियों से बनी हुई वस्तु अथवा उनका व्यापार करना आदि दंडनीय अपराधों की श्रेणी मंे भी शामिल किया गया है और उसी के अनुसार अधिनियम की धारा 51 के अन्तर्गत तीन से सात वर्ष की कैद और २५ हजार रूपये तक सजा भी तय गई हैं, इन सबके बावजूद हिरणों का शिकार व उनकी मौतों का सिलसिला बदस्तुर जारी है। हिरण पहले तो शिकारियों के निशाने पर थे, लेकिन अब आवारा कुत्तों द्वारा शिकार करने के मामलों ने स्थिति को और भी पेचीदा बना दिया है।
       बड़ी संख्या में हिरणों की मौतों ने वन्य प्राणी एवं जीव विभाग की दयनीय हालत को भी उजाकर करके रख दिया है। हिसार जोन के पांच जिलों में जंगलात और पशुओं की रखवाली के लिए मात्र 13 गार्ड काम कर रहे हैं, जबकि आवश्यकता कम से कम 100 गार्डों की बताई गई है। हिसार, जींद और भिवानी में विभाग में इंस्पेक्टरों के पद खाली होने, गश्त के लिए वाहन व वायरलैस सैट न होने, स्टाफ के पास रिवालवर उपलब्ध न होने और वन्य प्राणियों को आवारा कुत्तों से बचाने के लिए बाड़े तक न होने जैसे समाचारों से सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है कि प्रदेश सरकार वन्य प्राणियों के प्रति कितनी संजीदा है? आदमपुर, अग्रोहा, झलनिया, भूना व इनके आसपास के गाँवों को डेंजर जोन में शामिल किया गया है। इसके बावजूद यहां हिरणों का शिकार निरन्तर जारी है। इससे वन्य प्राणी एवं जीव विभाग की कार्यप्रणाली को सहज आंका जा सकता है।
       वन्य प्राणियों के लिए निरन्तर कम होता वन क्षेत्र भी भारी समस्या का विषय बना हुआ है। इससे न केवल राज्य पशु काले हिरण, बल्कि राज्य पक्षी काले तीतर का भी बड़ी संख्या में शिकार किया जा रहा है। विडम्बना का विषय तो यह है कि हरियाणा प्रदेश के पास अपने राज्य पक्षी की संख्या का भी आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इनके अलावा प्रदेश में राष्ट्रीय पक्षी मोर भी निरन्तर लुप्त होते चले जा रहे हैं। कुल मिलाकर हरियाणा में काले हिरण, तीतर, मोर, खरगोश, गीदड़, नील गाय आदि लगभग हर वन्य प्राणी के अस्तित्व पर घोर संकट छा चुका है। इस संदर्भ में समाज के लोग तो जमीन उपलब्ध करवाने, ठीकरी पहरा देने जैसे सहयोग देने को तत्पर नजर आते हैं, लेकिन विभाग व सरकार की उदासीनता व लापरवाही समाप्त होने का नाम लेती नजर नहीं आ रही है। वन्य प्राणियों का यूं भगवान भरोसे जीवन की जंग लड़ना, वाकई बेहद बड़ी विडम्बना और चिंता का विषय है।
       जनवरी माह में बड़ी संख्या में काले हिरणों की मौतों पर कई तरह के सवालों का जवाब ढू़ंढ़ना अति अनिवार्य हो जाता है। मसलन, इन हिरणों की मौतों का असली दोषी कौन है? क्या वे कथित 50 आवारा कुत्ते हैं? या उस विशेष जाति के लोग हैं, जो शिकार जैसे जघन्य अपराधों से जुड़े हुए हैं? या फिर, जिला प्रशासन व सरकार की कर्त्तव्य के प्रति घोर कोताही व संवेदनहीनता है? अथवा वे किसान भी दोषी है, जिन्होंने अपने खेतों में कंटीले तारों की बाड़ लगाई हुई हैं और अपने प्राणों की रक्षा करने के प्रयास में बुरी तरह घायल हो जाते हैं व कुत्तों के समक्ष घुटने टेकने को विवश हो जाते हैं? या फिर वन्य प्राणी अधिनियम का कड़ाई से लागू न करना है, जिसके चलते शिकारी बेखौफ होकर गैर-कानूनी रूप से शिकार करते हैं? इन सबके साथ क्या प्रदेश के वे लोग भी दोषी हैं, जो वन्य प्राणियों के अस्तित्व पर घोर संकट छाने के बावजूद खामोश हैं? यदि इन सब सवालों पर गंभीरतापूर्वक मंथन करके निष्पक्ष निष्कर्ष निकाला जाए तो इस संकट का समाधान सहजता से हो सकता है, क्योंकि इन्हीं सवालों के ईमानदार जवाबों में ही समस्या का मूल समाधान छिपा हुआ है। (नोट: लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

समाज के सच्चे पथ प्रदर्शक सन्त रविदास

7 फरवरी/ जयन्ति विशेष

समाज के सच्चे पथ प्रदर्शक सन्त रविदास
-राजेश कश्यप 



संत रविदास जी

 हमारे भारत देश की पावन भूमि पर अनेक साधु-सन्तों, ऋषि-मुनियों, योगियों-महर्षियों और दैवीय अवतारों ने जन्म लिया है और अपने अलौकिक ज्ञान से समाज को अज्ञान, अधर्म एवं अंधविश्वास के अनंत अंधकार से निकालकर एक नई स्वर्णिम आभा प्रदान की है। चौदहवीं सदी के दौरान देश में जाति-पाति, धर्म, वर्ण, छूत-अछूत, पाखण्ड, अंधविश्वास का साम्राज्य स्थापित हो गया था। हिन्दी साहित्यिक जगत में इस समय को मध्यकाल कहा जाता है। मध्यकाल को भक्तिकाल कहा गया। भक्तिकाल में कई बहुत बड़े सन्त एवं भक्त पैदा हुए, जिन्होंने समाज में फैली कुरीतियों एवं बुराईयों के खिलाफ न केवल बिगुल बजाया, बल्कि समाज को टूटने से भी बचाया। इन सन्तों में से एक थे, सन्त कुलभूषण रविदास, जिन्हें रैदास के नाम से भी जाना जाता है।
सन्त रविदास का जन्म सन् 1398 में माघ पूर्णिमा के दिन काशी के निकट माण्डूर नामक गाँव में एक चर्मकार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम संतोखदास (रग्घु) और माता का नाम कर्मा (घुरविनिया) था। सन्त कबीर उनके गुरू भाई थे, जिनके गुरू का नाम रामानंद था। सन्त रविदास बचपन से ही दयालू एवं परोपकारी प्रवृति के थे। उनका पैतृक व्यवसाय चमड़े के जूते बनाना था। लेकिन उन्होंने कभी भी अपने पैतृक व्यवसाय अथवा जाति को तुच्छ अथवा दूसरों से छोटा नहीं समझा। वे अपने व्यवसाय एवं जाति से बेहद लगाव रखते थे और सम्मान करते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में भी अपनी जाति का उल्लेख इस प्रकार गौरवमयी अन्दाज में किया है:

ऐसी मेरी जाति भिख्यात चमारं।
हिरदै राम गौब्यंद गुन सारं।।

सन्त रविदास पूरी मेहनत एवं निष्ठा के साथ जूते बनाते और समय मिलते ही प्रभु-भक्ति में तल्लीन हो जाते। इसके साथ ही जब मौका मिलता तो सन्तों का सत्संग भी जरूर करते। अपनी दयालूता एवं परोपकारिता की प्रवृति के कारण वे गरीबों व असहायों को बिना पैसे लिए मुफ्त में ही जूते दे देते थे। इससे उनके माता-पिता बहुत क्रोधित होते थे और रविदास को खूब बुरा-भला कहते थे। लेकिन इसके बावजूद रविदास अपनी इस प्रवृति का त्याग नहीं कर पाते थे। अंत में उन्हें माता-पिता ने खिन्न होकर अलग कर दिया। तब सन्त रविदास ने पड़ौस में ही एक झोंपड़ी डाली और अपनी पत्नी लोना के साथ रहने लगे और चर्मकार का काम बराबर करते रहे। उनकी भक्ति-साधना भी निरन्तर जारी थी। सन्त रविदास परमात्मा के सच्चे भक्त, समाज सुधारक, दार्शनिक तथा सच्चे एवं उच्च कोटि के भक्त कवि थे।
अपनी दिनचर्या में मग्न संत रवि दास
 सन्त रविदास अपने काम के प्रति हमेशा समर्पित रहते थे। वे बाहरी आडम्बरों में विश्वास नहीं करते थे। एक बार उनके पड़ौसी गंगा स्नान के लिए जा रहे थे तो उन्होंने सन्त रविदास को भी गंगा-स्नान के लिए चलने के लिए कहा। इसपर सन्त रविदास ने कहा कि मैं आपके साथ गंगा-स्नान के लिए जरूर चलता लेकिन मैंने आज शाम तक किसी को जूते बनाकर देने का वचन दिया है। अगर मैं तुम्हारे साथ गंगा-स्नान के लिए चलूंगा तो मेरा वचन तो झूठा होगा ही, साथ ही मेरा मन जूते बनाकर देने वाले वचन में लगा रहेगा। जब मेरा मन ही वहां नहीं होगा तो गंगा-स्नान करने का क्या मतलब। इसके बाद सन्त रविदास ने कहा कि यदि हमारा मन सच्चा है तो इस कठौती (चमड़ा भिगोने के लिए पानी से भरा मिट्टी का बर्तन) में भी गंगा होगी अर्थात् ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’। कहते हैं कि पड़ौसी ने जब इस बात का मजाक उड़ाया तो सन्त रविदास ने अपने प्रभु का स्मरण किया और चमड़ा भिगोने वाले पानी के बर्तन को छुआ और पड़ौसी को उसमें झांकने को कहा। जब पड़ौसी ने उस कठौती में झांका तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं, क्योंकि उसे कठौती में साक्षात् गंगा प्रवाहित होती दिखाई दे रही थी। उसने सन्त रविदास के चरण पकड़ लिए और उसका शिष्य बन गया। धीरे-धीरे सन्त रविदास की भक्ति की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई और उनके भक्ति के भजन व ज्ञान की महिमा सुनने लोग जूटने लगे और उन्हें अपना आदर्श एवं गुरू मानने लगे।
सन्त रविदास समाज में फैली जाति-पाति, छुआछूत, धर्म-सम्प्रदाय, वर्ण विशेष जैसी भयंकर बुराईयों से बेहद दुःखी थे। समाज से इन बुराईयों को जड़ से समाप्त करने के लिए सन्त रविदास ने अनेक मधुर व भक्तिमयी रसीली कालजयी रचनाओं का निर्माण किया और समाज के उद्धार के लिए समर्पित कर दिया। सन्त रविदास ने अपनी वाणी एवं सदुपदेशों के जरिए समाज में एक नई चेतना का संचार किया। उन्होंने लोगों को पाखण्ड एवं अंधविश्वास छोड़कर सच्चाई के पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
सन्त रविदास के अलौकिक ज्ञान ने लोगों को खूब प्रभावित किया, जिससे समाज में एक नई जागृति पैदा होने लगी। सन्त रविदास कहते थे कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सभी नाम परमेश्वर के ही हैं और वेद, कुरान, पुरान आदि सभी एक ही परमेश्वर का गुणगान करते हैं। 

कृष्ण, करीम, राम, हरि, राघव, सब लग एकन देखा।
वेद कतेब, कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।

सन्त रविदास का अटूट विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परोपकार तथा सद्व्यवहार का पालन करना अति आवश्यक है। अभिमान त्यागकर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करके ही मनुष्य ईश्वर की सच्ची भक्ति कर सकता है। सन्त रविदास ने अपनी एक अनूठी रचना में इसी तरह के ज्ञान का बखान करते हुए लिखा है:

कह रैदास तेरी भगति दूरी है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।

अर्थात् ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है। जैसे कि विशासलकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है, जबकि लघु शरीर की पिपीलिका (चींटी) इन कणों को सरतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्यागकर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।
एक ऐतिहासिक उल्लेख के अनुसार, चित्तौड़ की कुलवधू राजरानी मीरा, रविदास के दर्शन की अभिलाषा लेकर काशी आई थीं। सबसे पहले उन्होंने रविदास को अपनी भक्तमंडली के साथ चौक में देखा। मीरा ने रविदास से श्रद्धापूर्ण आग्रह किया कि वे कुछ समय चित्तौड़ में भी बिताएं। संत रविदास मीरा के आग्रह को ठुकरा नहीं पाए। वे चित्तौड़ में कुछ समय तक रहे और अपनी ज्ञानपूर्ण वाणी से वहां के निवासियों को भी अनुग्रहीत किया। सन्त रविदास की भक्तिमयी व रसीली रचनाओं से बेहद प्रभावित हुईं और वो उनकीं शिष्या बन गईं। इसका उल्लेख इस पद में इस तरह से है:

वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।
संत रविदास मानते थे कि हर प्राणी में ईश्वर का वास है। इसलिए वे कहते थे:
सब में हरि है, हरि में सब है, हरि आप ने जिन जाना।
अपनी आप शाखि नहीं दूजो जानन हार सयाना।।
 इसी पद में सन्त रविदास ने कहा है:
मन चिर होई तो कोउ न सूझै जानै जीवनहारा।
कह रैदास विमल विवेक सुख सहज स्वरूप संभारा।

सन्त रविदास जी कहते थे कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान् नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान् बनाती है।

जाति-जाति में जाति है, जो केतन के पात।
रैदास मनुष्य ना जुड़ सके, जब तक जाति न जात।।

सन्त रविदास ने मथुरा, प्रयाग, वृन्दावन व हरिद्वार आदि धार्मिक एवं पवित्र स्थानों की यात्राएं कीं। उन्होंने लोगों से सच्ची भक्ति करने का सन्देश दिया। सच्ची भक्ति का उल्लेख करता उनका यह भजन बेहद लोकप्रिय हुआ:

प्रभुजी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग अंग वास समानी।।
प्रभुजी तुम धनबन हम मोरा।
जैसे चितवत चन्द्र चकोरा।।
प्रभुजी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोति बरै दिन राती।।
प्रभुजी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहि मिलत सुहागा।।
प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भक्ति करै रैदासा।।

सन्त रविदास ने मनुष्य की मूर्खता पर व्यंग्य कसते हुए कहा कि वह नश्वर और तुच्छ हीरे को पाने की आशा करता है। लेकिन जो हरि हरि का सच्चा सौदा है, उसे प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करता है।

हरि सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत आषै रविदास।।

कुलभूषण रविदास ने सामाजिक, धार्मिक एवं राष्ट्रीय एकता के लिए भी समाज में जागृति पैदा की। उन्होंने कहा:

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।
हिन्दु तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।
सन्त रविदास ने इसी सन्दर्भ में ही कहा है:
मुसलमान सो दास्ती हिन्दुअन सो कर प्रीत।
रैदास जोति सभी राम की सभी हैं अपने मीत।।

सन्त रविदास ने लोगों को समझाया कि तीर्थों की यात्रा किए बिना भी हम अपने हृदय में सच्चे ईश्वर को उतार सकते हैं।

का मथुरा का द्वारिका का काशी हरिद्वार।
रैदास खोजा दिल आपना तह मिलिया दिलदार।।

सन्त रविदास ने जाति-पाति का घोर विरोध किया। उन्होंने कहा:

रैदास एक बूंद सो सब ही भयो वित्थार।
मूरखि है जो करति है, वरन अवरन विचार।।

सन्त रविदास ने समाज में व्याप्त पाखण्डों पर भी डटकर कटाक्ष किए।

थोथा पंडित, थोथी बानी, थोथी हरि बिन सवै कहानी।
थोथा मंदिर भोग विलासा, थोथी आन देव की आसा।।
थोथा सुमिरन नाम बिसाना, मन वच कर्म कहे रैदासा।

सन्त रविदास अपने उपदेशों में कहा कि मनुष्य को साधुओं का सम्मान करना चाहिए, उनका कभी भी निन्दा अथवा अपमान नहीं करना चाहिए। वरना उसे नरक भोगना पड़ेगा। वे कहते हैं:

साध का निंदकु कैसे तरै।
सर पर जानहु नरक ही परै।।

सन्त रविदास ने जाति-पाति और वर्ण व्यवस्था को व्यर्थ करार दिया और कहा कि व्यक्ति जन्म के कारण ऊँच या नीच नहीं होता। सन्त ने कहा कि व्यक्ति के कर्म ही उसे ऊँच या नीच होता है।

रैदास जन्म के कारणों, होत न कोई नीच।
नर को नीच करि डारि है, ओहे कर्म की कीच।।

इस प्रकार कुलभूषण रविदास ने समाज को हर बुराई, कुरीति, पाखण्ड एवं अंधविश्वास से मुक्ति दिलाने के लिए ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया और असंख्य मधुर भक्तिमयी कालजयी रचनाएं रचीं। उनकीं भक्ति, तप, साधना व सच्चे ज्ञान ने समाज को एक नई दिशा दी और उनके आदर्शों एवं शिक्षाओं का मानने वालों का बहुत बड़ा वर्ग खड़ा हो गया, जोकि ‘रविदासी’ कहलाते हैं। सन्त रविदास की महिमा का बखान करना, सूर्य को दीपक दिखाने के समान है, अर्थात् उनकीं जितना गुणगान किया जाए, उतना ही कम है।

सन्त रविदास द्वारा रचित ‘रविदास के पद’, ‘नारद भक्ति सूत्र’, ‘रविदास की बानी’ आदि संग्रह भक्तिकाल की अनमोल कृतियांे में गिनी जाती हैं।  स्वामी रामानंद के ग्रन्थ के आधार पर संत रविदास का जीवनकाल संवत् 1471 से 1597 है। उन्होंने यह 126 वर्ष का दीर्घकालीन जीवन अपनी अटूट योग और साधना के बल पर जीया।
सन्त रविदास के पद और बानी आज भी उतनी ही कारगर और महत्वपूर्ण हैं, जितनी की चौदहवीं सदी में थीं। यदि मानव को सच्चे ईश्वर की प्राप्ति चाहिए तो उसे कुलभूषण सन्त रविदास के बताए मार्ग पर चलते हुए उनकी शिक्षाओं एवं ज्ञान को अपने जीवन में धारण करना ही होगा। महान् सन्त रविदास के चरणों में सहस्त्रों बार साष्टांग नमन।। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
 
राजेश कश्यप