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गुरुवार, 31 मई 2012

धूम्रपान एवं तम्बाकू सेवन: खुशहाल जीवन का अजेय दुश्मन

धूम्रपान एवं तम्बाकू सेवन: खुशहाल जीवन का अजेय दुश्मन 
 राजेश कश्यप 

धूम्रपान का सेवन करना, स्पष्टतः जीवन को नरक से भी बदत्तर बनाना है। इससे आर्थिक, शारीरिक और सामाजिक आदि हर स्तर पर नुकसान ही नुकसान होता है। एक तरह से धूम्रपान एवं तम्बाकू का सेवन, खुशहाल जीवन का अजेय दुश्मन कहा जा सकता है। यदि विशेषज्ञों की शोध रिपोर्टों का अवलोकन और धूम्रपान एवं तम्बाकू के कुप्रभावों का आकलन किया जाए तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक विश्व में लगभग डेढ़ अरब लोग धूम्रपान करते हैं और लगभग 50 लाख लोग प्रतिवर्ष धूम्रपान के घातक प्रभावों के कारण अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन धूम्रपान करने वालों के सम्पर्क में रहने के कारण प्रतिवर्ष धूम्रपान न करने वाले 6 लाख अतिरिक्त व्यक्ति भी काल की भेंट चढ़ जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2030 तक तम्बाकू सेवन से होने वाली मृत्यु की संख्या बढ़कर 80 लाख प्रतिवर्ष हो जाएगी। एक ब्रिटिश शोधकर्ता डॉ. जॉन मूरेगिलान के अनुसार वर्ष 2050 तक धूम्रपान के कारण होने वाली बिमारियों से मरने वालों की संख्या 4 करोड़ तक पहुँच जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 18 लाख लोग तम्बाकू और सिगरेट के सेवन करने से होती हैं। एक अनुमान के अनुसार धूम्रपान के कारण होने वाले कैंसर से कुल 5.35 लाख लोगों की मौतें प्रतिवर्ष हो रही हैं, जिनमें 30 से 69 वर्ष की आयु के लोगों की संख्या 3.95 लाख है। इनमें 42 प्रतिशत पुरूष और 18 फीसदी महिलाएं शामिल हैं। तम्बाकू के कारण सिर, मुंह और गले के 30 फीसदी टूयूमर होने का अनुमान भी लगाया गया है। एक अन्य अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक भारत में तम्बाकू से होने वाले कैंसर के कारण मरने वालों की संख्या एक करोड़ 15 लाख को पार कर जाएगी।
ये घातक स्थिति तम्बाकू में मौजूद अत्यन्त हानिकारक तत्व निकोटिन की वजह से है। निकोटिन से कैंसर व उच्च रक्तचाप जैसे गंभीर रोग पैदा होते हैं। तम्बाकू का विषैला प्रभाव मनुष्य के रक्त को बुरी तरह दूषित कर देता है। धूम्रपान करने वाले के चेहरे के मुख का तेज समाप्त हो जाता है। तम्बाकू से हमारी सूंघने की शक्ति, आँखों की ज्योति और कानों की सुनने की शक्ति बहुत प्रभावित होती है। निकोटिन विष के कारण चक्कर आने लगते हैं, पैर लड़खड़ाने लगते हैं, कानों में बहरेपन की शिकायत पैदा हो जाती है, पाचन क्रिया बिगड़ जाती है और कब्ज व अपच जैसी बिमारी का जन्म हो जाता है। निकोटीन से ब्लडप्रेशर (उच्च रक्तदाब) बढ़ता है, रक्त-नलियों में रक्त का स्वभाविक संचार मंद पड़ जाता है और त्वचा सुन्न सी होने लगती है, जिससे त्वचा की अनेक तरह की बिमारियां पैदा हो जाती हैं। निकोटीन का धुँआ जीर्ण-खाँसी का रोग पैदा कर देता है। खाँसी का रोग बढ़ता-बढ़ता दमा, श्वाँस और तपैदिक का भयंकर रूप धारण कर लेता है।
एक पौण्ड तम्बाकू में निकोटीन नामक जहर की मात्रा लगभग 22.8 ग्राम होती है। इसकी 1/3800 गुनी मात्रा (6 मिलीग्राम) एक कुत्ते को तीन मिनट में मार देती है। ‘प्रेक्टिशनर’ पत्रिका के मुताबिक कैंसर से मरने वालों की संख्या 112 प्रति लाख उनकी है, जो धूम्रपान करते हैं। सिगरेट-बीड़ी पीने से मृत्यु संख्या, न पीने वालों की अपेक्षा 50 से 60 वर्ष की आयु वाले व्यक्तियों में 65 प्रतिशत अधिक होती है। यही संख्या 60 से 70 वर्ष की आयु में बढ़कर 102 प्रतिशत हो जाती है। धूम्रपान करने वालों में जीभ, मुँह, श्वाँस, फेफड़ों का कैंसर, क्रानिक बोंकाइटिस एवं दमा, टीबी, रक्त कोशिकावरोध जैसी अनेक व्याधियां पैदा हो जाती हैं। भारत में मँुह, जीभ व ऊपरी श्वाँस तथा भोजन नली (नेजोरिंक्स) का कैंसर सारे विश्व की तुलना में अधिक पाया जाता है। इसका कारण बताते हुए एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका लिखता है कि यहाँ तम्बाकू चबाना, पान में जर्दा, बीड़ी अथवा सिगरेट को उल्टी दिशा में पीना (रिवर्स स्मोकिंग) एक सामान्य बात है। तम्बाकू में विद्यमान कार्सिनोर्जिनिक्र एक दर्जन से भी अधिक हाइड्रोकार्बन्स जीवकोशों की सामान्य क्षमता को नष्ट कर उन्हें गलत दिशा में बढ़ने के लिए विवश कर देते हैं, जिसकी परिणति कैंसर की गाँठ के रूप में होती है। भारत में किए गए अनुसंधानों से पता चला है कि गालों में होने वाले कैंसर का मुख्य कारण खैनी अथवा जीभ के नीचे रखी जाने वाली, चबाने वाली तम्बाकू है। इसी प्रकार गले के ऊपरी भाग में, जीभ में और पीठ में होने वाला कैंसर बीड़ी पीने से होता है। सिगरेट से गले के निचले भाग में कैंसर होता पाया जाता है, इसी से अंतड़ियों का भी कैंसर संभव हो जाता है।
तम्बाकू में निकोटिन के अलावा कार्बन मोनोक्साइड, मार्श गैस, अमोनिया, कोलोडॉन, पापरीडिन, कोर्बोलिक ऐसिड, परफैरोल, ऐजालिन सायनोजोन, फॉस्फोरल प्रोटिक एसिड आदि कई घातक विषैले व हानिकारक तत्व पाए जाते हैं। कार्बन मोनोक्साइड से दिल की बीमारी, दमा व अंधापन की समस्या पैदा होती है। मार्श गैस से शक्तिहीनता और नपुंसकता आती है। अमोनिया से पाचन शक्ति मन्द व पित्ताशय विकृत हो जाता है। कोलोडॉन स्नायु दुर्बलता व सिरदर्द पैदा करता है। पापरीडिन से आँखों में खुसकी व अजीर्ण की समस्या पैदा होती है। कोर्बोलिक ऐसिड अनिद्रा, चिड़चिड़ापन व भूलने की समस्या को जन्म देता है। परफैरोल से दांत पीले, मैले और कमजोर हो जाते हैं। ऐजालिन सायनोजोन कई तरह के रक्त विकार पैदा करता है। फॉस्टोरल प्रोटिक ऐसिड से उदासी, टी.बी., खांसी व थकान जैसी समस्याओं का जन्म होता है।
जर्नल आर्काव्स ऑफ जनरल फिजिक्स के ऑन लाइन संस्करण में फरवरी, 2012 में एक नया अध्ययन प्रकाशित हुआ। इस अध्ययन के अनुसार धम्रपान करने से दिमाग पर बेहद घातक असर होता है। खासकर 45 वर्ष की उम्र में अधिक होता है। कई विशेषज्ञों ने शोध के बाद दावा किया है कि तम्बाकू के कारण करीब 40 प्रकार के कैंसर होने का खतरा बना रहता है। एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार भारत में लगभग 36 प्रतिशत लोग तम्बाकू का सेवन करते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें 20.3 प्रतिशत संख्या महिलाओं की है। विशेषज्ञों के अनुसार धूम्रपान पुरूषों की तुलना में महिलाओं को त्वचा का कैंसर, गले का कैंसर और इसी तरह की घातक बिमारियां अधिक होती हैं। धूम्रपान करने वाली गर्भवती महिलाओं के लिए तो धूम्रपान और भी घातक होता है। इससे गर्भपात का भयंकर खतरा बना रहता है। धूम्रपान से समय से पहले बच्चा पैदा हो सकता है और बच्चे के अन्दर रक्त कैंसर की संभावनाएं भी प्रबल रहती हैं। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार धूम्रपान से महिलाओं को स्तन कैंसर होने का खतरा सामान्य महिलाओं के मुकाबले 30 प्रतिशत अधिक होता है।
यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि विश्व में हर 8 सेकिण्ड में धूम्रपान की वजह से एक व्यक्ति की मौत हो रही है। भारत में 20 करोड़ लोग धूम्रपान की चंगुल में हैं। देश में धूम्रपान के कारण 50 प्रतिशत पुरूष और 20 प्रतिशत महिला कैंसर का शिकार हैं। 90 प्रतिशत मुंह का कैंसर, 90 प्रतिशत फेफड़े का कैंसर और 77 प्रतिशत नली का कैंसर धूम्रपान सेवन करने से हुआ है। 45 लाख लोग दिल की बीमारी से ग्रसित हैं। 8 लाख लोगों की हर वर्ष तम्बाकू उत्पादों का सेवन करने के कारण मौतें होती हैं। देश में प्रतिवर्ष 1.5 लाख व्यक्ति धूम्रपान जन्य रोगों से ग्रसित हो जाते हैं।
शायद कम लोगों को पता होगा कि एक सिगरेट पीने से व्यक्ति की 5 मिनट आयु कम हो जाती है। 20 सिगरेट अथवा 15 बीड़ी पीने वाला एवं करीब 5 ग्राम सुरती, खैनी आदि के रूप में तंबाकू प्रयोग करने वाला व्यक्ति अपनी आयु को 10 वर्ष कम कर लेता है। इससे न केवल उम्र कम होती है, बल्कि शेष जीवन अनेक प्रकार के रोगों एवं व्याधियों से ग्रसित हो जाता है। सिगरेट, बीड़ी पीने से मृत्यु संख्या, न पीने वालों की अपेक्षा 50 से 60 वर्ष की आयु वाले व्यक्तियों में 65 प्रतिशत अधिक होती है। यही संख्या 60 से 70 वर्ष की आयु में बढ़कर 102 प्रतिशत हो जाती है। सिगरेट, बीड़ी पीने वाले या तो शीघ्रता से मौत की गोद में समा जाते हैं या फिर नरक के समान जीवन जीने को मजबूर होते हैं। भारत में किए गए अनुसन्धानों से पता चला है कि गालों में होने वाले कैंसर का प्रधान कारण खैनी अथवा जीभ के नीचे रखनी जाने वाली, चबाने वाली तंबाकू है। इसी प्रकार ऊपरी भाग में, जीभ में और पीठ में होने वाला कैंसर बीड़ी पीने के कारण होता है। सिगरेट गले के निचले भाग में कैंसर करती है और अंतड़ियों के कैंसर की भी संभावना पैदा कर देती है।
देश में बीड़ी, सिगरेट के साथ-साथ गुटखा भी खूब खाया जाता है। गुटखा भी सेहत के लिए बेहद हानिकारक होता है। हाल ही में पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीच्यूट ऑफ मैडीकल एजुकेशन एण्ड रिसर्च, चण्डीगढ़ के एक अध्ययन के अनुसार गुटखा खाने से हमारे शरीर के विभिन्न अंगों पर बेहद घातक असर होता है। इससे हमारी सैक्स लाईफ बुरी तरह से प्रभावित होती है और हमारे डीएनए का भारी नुकसान पहुंचता है। जबलपुर (मध्य प्रदेश) में खाद्य एवं औषधि विभाग द्वारा गत जून माह में लिए गए कुछ ब्रांडेड और लोकल कंपनियों के गुटखों के नमूनों की जांच में खतरनाक जहर मैग्निशियम कार्बोनेट की मिलावट (2.09 से 4.2 प्रतिशत) तक पाई गई। यह मिलावट इसीलिए की जाती है, ताकि इसे एक बार खाने वाला व्यक्ति इसकी लत का हमेशा के लिए शिकार हो जाए। विशेषज्ञों के मुताबिक इस जहर से शरीर के अन्दर की म्यूकस मेम्बेन में अल्सर पैदा करता है। इससे तम्बाकू में मौजूद निकोटिन और भी घातक हो जाता है और कैंसर का कारण बन जाता है। गुटखे के बेहद घातक प्रभावों को देखते हुए भारत सरकार द्वारा गुटखे पर प्रतिबन्ध की अधिसूचना जारी की जा चुकी है और उस पर अमल करते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने गत 1 अपै्रल से राज्य में गुटखे की बिक्री पर पूर्णतः प्रतिबंध भी लगा दिया है। केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हल्फनामा दायर करके कहा है कि ‘खाद्य संरक्षा और मानक अधिनियम-2011’ की धारा 2.1.3 में तम्बाकू युक्त पदार्थों पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है। अधिसूचना के मुताबिक गुटखा एक खाद्य पदार्थ है, इसलिए इसमें तम्बाकू और निकोटिन नहीं मिलाए जा सकते।
काफी बुजुर्गों का मानना है कि हुक्के में पानी के जरिए तंबाकू का धुंआ ठण्डा होकर शरीर में पहुंचता है। इसलिए हुक्के से तंबाकू पीने पर हमें कोई नुकसान नहीं होता है। हाल ही में जयपुर में हुए एक विषेष शोध में इस तथ्य का पता चला है कि हमारा पंरपरागत हुक्के का सेवन सिगरेट से दस गुणा अधिक हानिकारक है। जयपुर एसएमएस अस्पताल मेडिकल कॉलेज और अस्थमा भवन की टीम की रिसर्च के मुताबिक हुक्का और चिलम भी बेहद घातक है और इसे छोड़ देने में ही भलाई है, क्योंकि हुक्के में कार्बन मोनोक्साइड सिगरेट की तुलना में ज्यादा घातक है। बेहद चौंकाने वाली बात यह है कि हरियाणा में हुक्के की परंपरा के नाम पर शहरों में बड़ी संख्या में हुक्का बार खोले गए हैं। इन हुक्का बारों में दुबई, मुंबई और मुरादाबाद की मण्डियों का जहरीला तम्बाकू प्रयोग किया जाता है। प्रदेश की फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्टेªशन (एफडीए) विभाग के निरन्तर छापों के बाद यह सब चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इन हुक्का बारों में इलैक्ट्रिक हुक्के में तम्बाकू के बीच निकोटिन 0.3 से 0.5 प्रतिशत तक बढ़ाकर दिया जाता है। खासकर युवा पीढ़ी में इसका घातक असर देखने को मिला है।
2 अक्तूबर, 2008 को गाँधी जयन्ती से पूरे देशभर में अधिसूचना जीएसआर 417 (ई) दिनांक 30 मई, 2008 के अनुरूप केन्द्र सरकार ने ‘सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान’ से संबंधित नियम संशोधित करके पूर्णत लागू कर दिया गया था। इन संशोधित नियमों के अन्तर्गत धूम्रपान सभी सार्वजनिक स्थानों पर सख्ती से निषिद्ध है। ‘सार्वजनिक स्थलों’ में आडिटोरियम, अस्पताल भवन, स्वास्थ्य स्थान, मनोरंजन केन्द्र, रेस्टोरेंट, सार्वजनिक कार्यालय, न्यायालय भवन, शिक्षण संस्थान, पुस्तकालय, सार्वजनिक यातायात स्थल, स्टेडियम, रेलवे स्टेशन, बस स्टॉप, कार्यशाला, शॉपिंग मॉल, सिनेमा हॉल, रिफ्रेशमेंट रूम, डिस्को, कॉफी हाऊस, बार, पब्स, एयरपोर्ट लॉज आदि शामिल किए गए हैं। इस एक्ट के तहत जो भी व्यक्ति उल्लंखन करेगा उस पर 200 रूपये के आर्थिक दण्ड के साथ दंडात्मक कार्यवाही करने का प्रावधान किया गया है। निश्चित तौरपर इस तरह के कानून की देश में सख्त आवश्यकता थी। भारत सरकार ने 18 मई, 2003 को तम्बाकू नियन्त्रण कानून का निर्माण किया था। मई, 2004 में देश में पहली बार धूम्रपान पर प्रतिबन्ध लगाया गया। इस प्रतिबंध के नियमों में मई, 2005 में संशोधन किया गया। वैसे तम्बाकू सेवन पर रोक लगाने के मामले में भारत का हमेशा अग्रणीय स्थान रहा है। इसी के चलते भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के फ्रेमवर्क कनवेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल (एफसीटीसी) पर भी भारत ने हस्ताक्षर किए हुए हैं।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे कि ‘‘अब तक मैं यह न समझ पाया कि तंबाकू पीने का इतना जबरदस्त शौक लोगों को क्यों है? नशा हमारे धन को ही नष्ट नहीं करता, वरन स्वास्थ्य और परलोक को भी बिगाड़ता है।’’ कुल मिलाकर धूम्रपान से स्वास्थ्य, आयु, धन, चैन, चरित्र, विश्वास और आत्मबल खो जाता है और इसके विपरीत दमा, कैंसर, हृदय के रोग, विविध बिमारियों का आगमन हो जाता है। यदि हमें एक स्वस्थ एवं खुशहाल जिन्दगी हासिल करनी है तो हमें तंबाकू का प्रयोग करना हर हालत मेें छोड़ना ही होगा। ऐसा करना कोई मुश्किल काम नहीं है। तंबाकू का प्रयोग दृढ़ निश्चय करके ही छोड़ा जा सकता है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

बुधवार, 23 मई 2012


सोमवार, 21 मई 2012

‘सृष्टि सृजक‘ महर्षि कश्यप का पौराणिक स्वरूप

24 मई/जयन्ति विशेष 
सृष्टि सृजक महर्षि कश्यप
 ‘सृष्टि सृजक‘ महर्षि कश्यप का पौराणिक स्वरूप 
 -राजेश कश्यप

हमारे लगभग सभी पौराणिक ग्रन्थों में सृष्टि की रचना का बखूबी उल्लेख मिलता है। पौराणिक ग्रन्थ ‘सुख सागर’ में श्री शुकदेव मुनि जी पाण्डव वंशज एवं प्रतापी राजा परीक्षित को सृष्टि की रचना के बारे में विस्तार से बताते हैं। इस पौराणिक ग्रन्थ के अनुसार, श्री शुकदेव मुनि परीक्षित से कहते हैं:
“हे परीक्षित! अब मैं आपके ज्ञानवर्धन के लिये आपको इस सृष्टि के उत्पत्ति के विषय में बताता हूँ। सृष्टि के आरम्भ में यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जलमग्न था। केवल भगवान नारायण ही शेष शैया पर विराजमान योग निद्रा में लीन थे। सृष्टिकाल आने पर काल शक्ति ने उन भगवान नारायण को जगाया। उनके नाभि प्रदेश से सूक्ष्म तत्व कमल कोष बाहर निकला और सूर्य के समान तेजोमय होकर उस अपार जल को प्रकाशमान करने लगा। उस देदीप्यमान कमल में स्वयं भगवान विष्णु प्रविष्ट हो गये और ब्रह्मा के रूप में प्रकट हुये। कमल पर बैठे ब्रह्मा जी को भगवान नारायण सम्पूर्ण जगत की रचना करने की आज्ञा दी।
ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने का दृढ़ संकल्प किया और उनके मन से मरीचि, नेत्रों से अत्रि, मुख से अंगिरा, कान से, पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भृगु, प्राण से वशिष्ठ, अँगूठे से दक्ष तथा गोद से नारद उत्पन्न हुये। इतनी रचना करने के बाद भी ब्रह्मा जी ने यह विचार करके कि मेरी सृष्टि में वृद्धि नहीं हो रही है अपने शरीर को दो भागों में बाँट लिया जिनके नाम ‘का’ और ‘या’ (काया) हुये। उन्हीं दो भागों में से एक से पुरुष तथा दूसरे से स्त्री की उत्पत्ति हुई। पुरुष का नाम स्वयम्भुव मनु और स्त्री का नाम शतरूपा था। स्वयम्भुव मनु और शतरूपा से दो पुत्र प्रियव्रत तथा उत्तानपाद और तीन कन्यायें आकूति, देवहूति एवं प्रसूति की उत्पत्ति हुई। मनु ने आकूति का विवाह रुचि प्रजापति और देवहूति का विवाह कर्दम जी के साथ कर दिया। इन्हीं तीन कन्याओं से सारे जगत की रचना हुई।’’
आगे चलकर ब्रहा्रा जी के मन से उत्पन्न हुए मरीचि ऋषि, जिन्हें ‘अरिष्टनेमि’ के नाम से भी जाना जाता है, का विवाह देवी कला से हुआ। देवी कला कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी। उनकी कोख से महातेजस्वी बालक कश्यप का जन्म हुआ।
श्रीमद्भागवत के छठे अध्याय के अनुसार ब्रहा्रा जी के अंगूठे से पैदा हुए दक्ष प्रजापति ने ब्रहा्रा जी के कहने पर अपनी पत्नी के गर्भ से 60 कन्याएं पैदा कीं। उन्होंने इन 60 कन्याओं मंे से 10 कन्याओं का विवाह धर्म के साथ, 13 कन्याओं का विवाह महर्षि कश्यप के साथ, 27 कन्याओं का विवाह चन्द्रमा के साथ, दो कन्याओं का विवाह भूत के साथ, दो कन्याओं का विवाह अंगीरा के साथ, दो कन्याओं का विवाह कश्यप के साथ और शेष चार कन्याओं का विवाह भी तार्क्ष्यधारी कश्यप के साथ ही कर दिया। इस प्रकार महर्षि कश्यप की अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सुरसा, तिमि, विनता, कद्रू, पतांगी और यामिनि आदि पत्नियां बनीं। मुख्यतः इन्ही से ही सृष्टि का सृजन हुआ और जिसके परिणामस्वरूप महर्षि कश्यप जी ‘सृष्टि के सृजक’ कहलाए।
महर्षि कश्यप ने अपनी पत्नी अदिति के गर्भ से बारह आदित्य पैदा किए, जिनमें सर्वव्यापक देवाधिदेव नारायण का वामन अवतार भी शामिल था। श्री विष्णु पुराण के अनुसार:
  मन्वन्तरेऽत्र सम्प्राप्ते तथा वैवस्वतेद्विज।
वामनः कश्यपाद्विष्णुरदित्यां सम्बभुव ह।।
त्रिमि क्रमैरिमाँल्लोकान्जित्वा येन महात्मना।
पुन्दराय त्रैलोक्यं दत्रं निहत्कण्टकम्।। 
  (अर्थात-वैवस्वत मन्वन्तर के प्राप्त होने पर भगवान् विष्णु कश्यप जी द्वारा अदिति के गर्भ से वामन रूप में प्रकट हुए। उन महात्मा वामन जी ने अपनी तीन डगों से सम्पूर्ण लोकों को जीतकर यह निष्कण्टक त्रिलोकी इन्द्र को दे दी।)
पौराणिक सन्दर्भो के अनुसार चाक्षुष मन्वन्तर में तुषित नामक बारह श्रेष्ठगणों ने बारह आदित्यों के रूप में महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से जन्म लिया, जोकि इस प्रकार थे -विवस्वान, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरूण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)। महर्षि कश्यप के पुत्र विवस्वान् से मनु का जन्म हुआ। महाराज मनु को इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रान्शु, नाभाग, दिष्ट, करूष और पृषध्र नामक दस श्रेष्ठ पुत्रों की प्राप्ति हुई।
महर्षि कश्यप ने दिति के गर्भ से परम् दुर्जय हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री पैदा की। श्रीमद्भागवत् के अनुसार इन तीन संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जोकि मरून्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र निःसंतान रहे। देवराज इन्द्र ने इन्हें अपने समान ही देवता बना लिया। जबकि हिरण्याकश्यप को चार पुत्रों अनुहल्लाद, हल्लाद, परम भक्त प्रहल्लाद, संहल्लाद आदि की प्राप्ति हुई।
महर्षि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरूण, अनुतापन, धुम्रकेश, विरूपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान् पुत्रों की प्राप्ति हुई। रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए। पत्नी अरिष्टा से गन्धर्व पैदा हुए। सुरसा नामक रानी की कोख से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए। इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी में उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ। मुनि के गर्भ से अप्सराएं जन्मीं। कश्यप की क्रोधवशा  नामक रानी ने साँप, बिच्छु आदि विषैले जन्तु पैदा किए। ताम्रा ने बाज, गीद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपनी संतान के रूप में जन्म दिया। सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पति की। रानी सरसा ने बाघ आदि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जन्तुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया।
महर्षि कश्यप ने रानी विनता के गर्भ से गरूड़ (भगवान विष्णु का वाहन) और वरूण (सूर्य का सारथि) पैदा किए। कद्रू की कोख से अनेक नागों का जन्म हुआ। रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ। यामिनी के गर्भ से शलभों (पतिंगों) का जन्म हुआ। ब्रहा्रा जी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की दो पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नाम के साठ हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ जोकि कालान्तर में निवातकवच के नाम से विख्यात हुए।
महर्षि कश्यप पिंघले हुए सोने के समान तेजवान थे। उनकी जटाएं अग्नि-ज्वालाएं जैसी थीं। महर्षि कश्यप ऋषि-मुनियों में श्रेष्ठ माने जाते थे। सुर-असुरों के मूल पुरूष मुनिराज कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर था, जहां वे पर-ब्रह्म  परमात्मा के ध्यान में मग्न रहते थे। मुनिराज कश्यप नीतिप्रिय थे और वे स्वयं भी धर्म-नीति के अनुसार चलते थे और दूसरों को भी इसी नीति का पालन करने का उपदेश देते थे। उन्होने अधर्म का पक्ष कभी नहीं लिया, चाहे इसमें उनके पुत्र ही क्यों न शामिल हों। महर्षि कश्यप राग-द्वेष रहित, परोपकारी, चरित्रवान और प्रजापालक थे। वे निर्भिक एवं निर्लोभी थे। कश्यप मुनि निरन्तर धर्मोपदेश  करते थे, जिनके कारण उन्हें ‘महर्षि’ जैसी श्रेष्ठतम उपाधि हासिल हुई। समस्त देव, दानव एवं मानव उनकी आज्ञा का अक्षरशः पालन करते थे। उन्ही की कृपा से ही राजा नरवाहनदत्त चक्रवर्ती राजा की श्रेष्ठ पदवी प्राप्त कर सका।
महर्षि कश्यप अपने श्रेष्ठ गुणों, प्रताप एवं तप के बल पर श्रेष्ठतम महाविभूतियों में गिने जाते थे। महर्षि कश्यप सप्तऋषियों में प्रमुख माने गए। सप्तऋषियों की पुष्टि श्री विष्णु पुराण में इस प्रकार होती है:- 
 वसिष्ठः काश्यपोऽयात्रिर्जमदग्निस्सगौतमः। विश्वामित्रभरद्वाजौ सप्त सप्तर्षयोऽभवन्।। 
 (अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं, वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र  और भारद्वाज।)

महर्षि कश्यप ने समाज को एक नई दिशा देने के लिए ‘स्मृति-ग्रन्थ’ जैसे महान् ग्रन्थ की रचना की। इसके अलावा महर्षि कश्यप ने ‘कश्यप-संहिता’ की रचना करके तीनों लोकों में अमरता हासिल की। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार ‘कस्पियन सागर’ एवं भारत के शीर्ष प्रदेश कश्मीर का नामकरण भी महर्षि कश्यप जी के नाम पर ही हुआ। महर्षि कश्यप द्वारा संपूर्ण सृष्टि की सृजना में दिए गए महायोगदान की यशोगाथा हमारे वेदों, पुराणों, स्मृतियों, उपनिषदों एवं अन्य अनेक धार्मिक साहित्यों में भरी पड़ी है, जिसके कारण उन्हें ‘सृष्टि के सृजक’ उपाधि से विभूषित किया जाता है। ऐसे महातेजस्वी, महाप्रतापी, महाविभूति, महायोगी, सप्तऋषियों में प्रमुख व सृष्टि सृजक महर्षि कश्यप जी को कोटि-कोटि वन्दन एवं नमन!!!
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।) 

सम्पर्क सूत्र 
 राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.न. 1229, निकट शिव मन्दिर,
गाँव. टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005

मोबाईल नं. 09416629889
e-mail : rkk100@rediffmail.com, rajeshtitoli@gmail.com

शनिवार, 12 मई 2012

जननी तेरी जय है !

13 मई/मातृ-दिवस विशेष
Happy Mother's Day
जननी तेरी जय है !
-राजेश कश्यप


‘‘माँ !’’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘माँ’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘माँ’ की ममता और उसके आँचल की महिमा का को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। नौ महीने तक गर्भ में रखना, प्रसव पीड़ा झेलना, स्तनपान करवाना, रात-रात भर बच्चे के लिए जागना, खुद गीले में रहकर बच्चे को सूखे में रखना, मीठी-मीठी लोरियां सुनाना, ममता के आंचल में छुपाए रखना, तोतली जुबान में संवाद व अटखेलियां करना, पुलकित हो उठना, ऊंगली पकड़कर चलना सिखाना, प्यार से डांटना-फटकारना, रूठना-मनाना, दूध-दही-मक्खन का लाड़-लड़ाकर खिलाना-पिलाना, बच्चे के लिए अच्छे-अच्छे सपने बुनना, बच्चे की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी चुनौती का डटकर सामना करना और बड़े होने पर भी वही मासूमियत और कोमलता भरा व्यवहार.....ये सब ही तो हर ‘माँ’ की मूल पहचान है। इस सृष्टि के हर जीव और जन्तु की ‘माँ’ की यही मूल पहचान है।
हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब ‘माँ’ की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी ‘माँ’ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बावजूद ‘माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई शब्दों में नहीं पिरो पाया है।
हमारे देश भारत में ‘माँ’ को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है और वेदों में ‘माँ’ को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम ‘माँ’ के रूप में की उद्बोधित किया गया है:
‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वमम देव देवः।।’

वेदों में ‘माँ’ को ‘अंबा’, ‘अम्बिका’, ‘दुर्गा’, ‘देवी’, ‘सरस्वती’, ‘शक्ति’, ‘ज्योति’, ‘पृथ्वी’ आदि नामों से संबोधित किया गया है। इसके अलावा ‘माँ’ को ‘माता’, ‘मात’, ‘मातृ’, ‘अम्मा’, ‘अम्मी’, ‘जननी’, ‘जन्मदात्री’, ‘जीवनदायिनी’, ‘जनयत्री’, ‘धात्री’, ‘प्रसू’ आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है।
ऋग्वेद में ‘माँ’ की महिमा का यशोगान कुछ इस प्रकार से किया गया है, ‘हे उषा के समान प्राणदायिनी माँ ! हमें महान सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करो। तुम हमें नियम-परायण बनाओं। हमें यश और अद्धत ऐश्वर्य प्रदान करो।’
सामवेद में एक प्रेरणादायक मंत्र मिलता है, जिसका अभिप्राय है, ‘हे जिज्ञासु पुत्र! तू माता की आज्ञा का पालन कर, अपने दुराचरण से माता को कष्ट मत दे। अपनी माता को अपने समीप रख, मन को शुद्ध कर और आचरण की ज्योति को प्रकाशित कर।’
प्राचीन ग्रन्थों में कई औषधियों के अनुपम गुणों की तुलना ‘माँ’ से की गई है। एक प्राचीन ग्रन्थ में आंवला को ‘शिवा’ (कल्याणकारी), ‘वयस्था’ (अवस्था को बनाए रखने वाला) और ‘धात्री’ (माता के समान रक्षा करने वाला) कहा गया है। राजा बल्लभ निघन्टु ने भी एक जगह ‘हरीतकी’ (हरड़) के गुणों की तुलना ‘माँ’ से कुछ इस प्रकार की है:
‘यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरितकी।’
(अर्थात, हरीतकी (हरड़) मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली होती है।)
श्रीमदभागवत पुराण में उल्लेख मिलता है कि ‘माताओं की सेवा से मिला आशिष, सात जन्मों के कष्टों व पापांे को भी दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा का कवच का काम करती है।’ इसके साथ ही श्रीमदभागवत में कहा गया है कि ‘माँ’ बच्चे की प्रथम गुरू होती है।‘
रामायण में श्रीराम अपने श्रीमुख से ‘माँ’ को स्वर्ग से भी बढ़कर मानते हैं। वे कहते हैं कि:
‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।’
(अर्थात, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।)
महाभारत में जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि ‘भूमि से भारी कौन?’ तब युधिष्ठर जवाब देते हैं:
‘माता गुरूतरा भूमेः।’
(अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।)
महाभारत में अनुशासन पर्व में पितामह भीष्म कहते हैं कि ‘भूमि के समान कोई दान नहीं, माता के समान कोई गुरू नहीं, सत्य के समान कोई धर्म नहीं और दान के समान को पुण्य नहीं है।’
इसके साथ ही महाभारत महाकाव्य के रचियता महर्षि वेदव्यास ने ‘माँ’ के बारे में लिखा है कि:
‘नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।’

(अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।)
तैतरीय उपनिषद में ‘माँ’ के बारे में इस प्रकार उल्लेख मिलता है:
‘मातृ देवो भवः।’
(अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है।)
संतो का भी स्पष्ट मानना है कि ‘माँ’ के चरणों में स्वर्ग होता है।’ आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी कालजयी रचना ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रारंभिक चरण में ‘शतपथ ब्राहा्रण’ की इस सूक्ति का उल्लेख कुछ इस प्रकार किया है:
‘अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामः
मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेदः।’

(अर्थात, जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा।)
‘माँ’ के गुणों का उल्लेख करते हुए आगे कहा गया है कि:
‘प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।’

(अर्थात, धन्य वह माता है जो गर्भावान से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।)
‘चाणक्य-नीति’ के प्रथम अध्याय में भी ‘माँ’ की महिमा का बखूबी उल्लेख मिलता है। यथा:
‘रजतिम ओ गुरू तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।’

(अर्थात, जिस प्रकार संसार में पाँच प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार पाँच प्रकार की माँ होती हैं। जैसे, राजा की पत्नी, गुरू की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता।)
‘चाणक्य नीति’ में कौटिल्य स्पष्ट रूप से कहते हैं कि, ‘माता के समान कोई देवता नहीं है। ‘माँ’  परम देवी होती है।’
महर्षि मनु ने ‘माँ’ का यशोगान इस प्रकार किया है:
 ‘दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य होता है। सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हजार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण ‘माँ’ होती है।’
विश्व के महान साहित्यकारों और दार्शनिकों ने ‘माँ’ की महिमा का गौरवपूर्ण बखान किया है। एच.डब्लू बीचर के अनुसार, ‘जननी का हृदय शिशु की पाठशाला है।’ कालरिज का मानना है, ‘जननी जननी है, जीवित वस्तुओं में वह सबसे अधिक पवित्र है।’ इसी सन्दर्भ में विद्या तिवारी ने लिखा है, ‘माता और पिता स्वर्ग से महान् हैं।’ विश्व प्रसिद्ध नेपोलियन बोनापार्ट के अनुसार, ‘शिशु का भाग्य सदैव उसकी जननी द्वारा निर्मित होता है।’ महान भारतीय कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना में ‘माँ’ की महिम कुछ इस तरह बयां की:
‘स्वर्ग से भी श्रेष्ठ जननी जन्मभूमि कही गई।
सेवनिया है सभी को वहा महा महिमामयी’।।

(अर्थात, माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ कही गई हैं। इस महा महिमामयी जननी और जन्मभूमि की सेवा सभी लोगों को करनी चाहिए।)
इसके अलावा श्री गुप्त ने ‘माँ’ की महिमा में लिखा है:
‘जननी तेरे जात सभी हम,
जननी तेरी जय है।’

इसी क्रम में रामचरित उपाध्याय ने अपनी रचना ‘मातृभूमि’ में कुछ इस प्रकार ‘माँ’ की महिमा का उल्लेख किया है:
‘है पिता से मान्य माता दशगुनी, इस मर्म को,
जानते हैं वे सुधी जो जानते हैं धर्म को।’

(जो बुद्धिमान लोग धर्म को मानते हैं, वे जानते हैं कि माता पिता से दस गुनी मान्य होती है।)
इसके साथ ही ‘माँ’ के बारे में एक महाविद्वान ने क्या खूब कहा है, ‘कोमलता में जिसका हृदय गुलाब सी कलियों से भी अधिक कोमल है तथा दयामय है। पवित्रता में जो यज्ञ के धुएं के समान है और कर्त्तव्य में जो वज्र की तरह कठोर है-वही दिव्य जननी है।’सिनेमा में भी ‘माँ’ पर आधारित बहुत सारी फिल्में और गाने बनाए गए हैं। कई गीत तो इतने मार्मिक बन पड़े हैं, जिनको सुनकर व्यक्ति एकदम द्रवित हो उठता है। मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा फिल्म ‘दादी माँ’ (1966) के लिए लिखा गया यह गीत आज भी लोगों के हृदय पटल पर अपनी अमिट छाप बनाए हुए है:
‘उसको नहीं देखा हमने कभी,
पर इसकी जरूरत क्या होगी!
ऐ माँ...ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग,
भगवान की सूरत क्या होगी!!’

‘माँ’ के बारे में लिखी गई ये हृदयस्पर्शी पंक्तियां हर किसी को प्रभावित किए बिना नहीं रहतीं:
‘कौन सी है वो चीज जो यहां नहीं मिलती।
सबकुछ मिल जाता है, लेकिन,
 हाँ...! ‘माँ’  नहीं मिलती।’

जो नारी ‘माँ’ नहीं बन पाती, वह जीवन भर स्वयं को अधूरा मानती है और जीवन भर तड़पती रहती है। समाज में ऐसी औरत को ‘बांझ’ कहा जाता है और उसकी कदम-कदम पर उपेक्षा की जाती है। नारी की इसी मनोदशा को हरियाणा के ‘सूर्यकवि’ पं. लखमीचन्द ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘पूर्ण भगत’ में कुछ इस तरह चित्रित किया है:
‘बांझ दोष की बीर नै के बेरा,
सन्तान होण का किसा दर्द हो सै।’

(अर्थात, जो औरत ‘माँ’ न बनी हो यानी जो बांझ हो, भला उसे प्रसव-पीड़ा का क्या पता हो सकता है।)
नारी इस सृष्टि और प्रकृति की ‘जननी’ है। नारी के बिना तो सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी शाश्वत सत्य को हरियाणा के सिरमौर कवि पं. मांगे राम ने अपने प्रख्यात साँग ‘शकुन्तला-दुष्यन्त’ में कुछ इस प्रकार समाहित किया है:
‘स्त्री ना होती जग म्हं, सृष्टि को रचावै कौण।
ब्रहा्रा विष्णु शिवजी तीनों, मन म्हं धारें बैठे मौन।
एक ब्रहा्रा नैं शतरूपा रच दी, जबसे लागी सृष्टि हौण।’

(अर्थात, यदि नारी नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। स्वयं ब्रहा्रा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ बैठे थे। जब ब्रहा्रा जी ने नारी की रचना की, तभी से सृष्टि की शुरूआत हुई।)
कुल मिलाकर, संसार का हर धर्म जननी ‘माँ’ की अपार महिमा का यशोगान करता है। हर धर्म और संस्कृति में ‘माँ’ के अलौकिक गुणों और रूपों का उल्लेखनीय वर्णन मिलता है। हिन्दू धर्म में देवियों को ‘माँ’ कहकर पुकारा गया है। धार्मिक परम्परा के अनुसार धन की देवी ‘लक्ष्मी माँ’, ज्ञान की देवी ‘सरस्वती माँ’ और शक्ति की देवी ‘दुर्गा माँ’ मानीं गई हैं। नवरात्रों में ‘माँ’ को नौ विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। मुस्लिम धर्म में भी ‘माँ’ को सर्वोपरि और पवित्र स्थान दिया गया है। हजरत मोहम्मद कहते हैं कि ‘‘माँ’  के चरणों के नीचे स्वर्ग है।’ ईसाईयों के पवित्र ग्रन्थ में स्पष्ट लिखा गया है कि ‘माता के बिना जीवन होता ही नहीं है।’ ईसाई धर्म में भी ‘माँ’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसके साथ ही भगवान यीशु की ‘माँ’ मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है। बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया गया है। यहुदी लोग भी ‘माँ’ को सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं। यहुदियों की मान्यता के अनुसार उनके 55 पैगम्बर हैं, जिनमें से सात महिलाएं भी शामिल हैं। सिख धर्म में भी ‘माँ’ का स्थान सबसे ऊँचा रखा गया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि चाहे कोई भी देश हो, कोई भी संस्कृति या सभ्यता हो और कोई भी भाषा अथवा बोली हो, ‘माँ’ के प्रति अटूट, अगाध और अपार सम्मान देखने को मिलेगा। ‘माँ’ को अंग्रेजी भाषा में ‘मदर’ ‘मम्मी’ या ‘मॉम’, हिन्दी में ‘माँ’, संस्कृत में ‘माता’, फारसी में ‘मादर’ और चीनी में ‘माकून’ कहकर पुकारा जाता है। भाषायी दृष्टि से ‘माँ’ के भले ही विभिन्न रूप हों, लेकिन ‘ममत्व’ और ‘वात्सल्य’ की दृष्टि में सभी एक समान ही होती हैं। ‘मातृ दिवस’ संसार भर में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। यूरोपीय देशों में ‘मदरिंग सनडे’ के रूप में मनाया जाता है। चीन में दार्शनिक मेंग जाई की माँ के जन्मदिन को ‘मातृ-दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। नेपाल में वैशाख कृष्ण पक्ष में ‘माता तीर्थ उत्सव’ मनाया जाता है। अमेरिका व भारत सहित कई कई अन्य देशों में मई के दूसरे रविवार को ‘मातृ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इंडोनेशिया में प्रतिवर्ष 22 दिसम्बर को ‘मातृ-दिवस’ मनाने की परंपरा है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार है।)
(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com, rkk100@rediffmail.com.

शुक्रवार, 4 मई 2012

फिल्म समीक्षा /  
चन्द्रावल-2
 लौटकर भी नहीं लौटी चन्द्रावल ! 
-राजेश कश्यप

जिस ‘चन्द्रावल’ के लौट आने के लिए हरियाणवी सिनेमा बेसब्री से पलकें बिछाए बाट जोह रहा था, वह लौटकर भी नहीं लौटी! 28 वर्ष पहले जिस चन्द्रावल ने बॉलीवुड तक तहलका मचाकर हरियाणवी सिनेमा को एक नया आयाम दिया था, उसी चन्द्रावल से उम्मीद थी कि वह मरणासन्न हरियाणवी सिनेमा के लिए संजीवनी बनकर लौटेगी। इन संभावनाओं को तब और भी पंख लग गए, जब प्रभाकर फिल्मस के बैनर तले ही ‘चन्द्रावल-दो’ बनने की घोषणा हुई। एक बार फिर बहुत सारी उम्मीदें जगीं थीं कि एक बार फिर हरियाणवी सिनेमा फर्श से अर्श पर पहुंचेगा और नई प्रतिभाओं के बलपर एक नए युग की शुरूआत होगी।
काफी चर्चाओं, उम्मीदों और संभावनाओं के बीच 4 मई को अंततः बहुप्रतिक्षित फिल्म ‘चन्द्रावल-दो’ प्रदर्शित हो ही गई। इसी के साथ हरियाणवी सिनेमा के इतिहास में फिल्मों के सिक्वल बनाने की नींव भी रख दी गई। ‘चन्द्रावल-दो’ में पहली चन्द्रावल के नायक सूरज (जगत जाखड़) और नायिका चन्द्रो (उषा शर्मा) के पुनर्जन्म को दिखाया गया है और रवि (कुलदीप राठी) व चाँद (शिखा नेहरा) के रूप में अजीबो-गरीब मिलन करवाकर दर्शकों की भावनाएं जीतने का भरसक प्रयास किया गया है। फिल्म में कई नए प्रयोग अनावश्यक तौरपर किए गए हैं। आधुनिक दर्शकों के दृष्टिकोण की दुहाई देते हुए फिल्म में मुम्बईया फिल्मों के कई तड़के लगाए गए हैं।
फिल्म को सफल बनाने के लिए आईटम गीत ‘मत छेड़ बलम मेरे चुन्दड़ नै, ना तै हो ज्यागी तकरार’ भी रखा गया, जोकि उम्मीदों पर भी खरा नहीं उतर पाया। फिल्म के निदेशन से लेकर उसकी कहानी, पटकथा, संवाद, गीत, संगीत और कॉमेडी आदि सबकुछ लचर है। बड़ा आश्चर्य होता है कि पहली चन्द्रावल की नायिका उषा शर्मा की छत्रछाया में उस फिल्म का सिक्वल तैयार हुआ है। एक भी ऐसा गीत नहीं बन पड़ा है, जो लंबे समय तक दर्शकों के दिल पर अपनी छाप छोड़े रखे। कॉमेडी के नाम पर सूण्डू और भूण्डू को बेकार में थोपा गया है। फिल्म में हरियाणवी बोली के साथ भी न्याय नहीं हो पाया है। हरियाणवी बोली में शहरीकरण की छाप स्पष्ट झलकती है।
फिल्म में नायक कुलदीप राठी और नायिका शिखा नेहरा का अभिनय अत्यन्त सराहनीय है और उनसे हरियाणवी सिनेमा भविष्य में अच्छी उम्मीदें कर सकता है। फिल्म के खलनायक सम्पूर्ण सिंह (दीपक कपूर) के अभिनय कौशल का सदुपयोग नहीं हो पाया है। फिल्म के कई दृश्य और संवाद दर्शकों को प्रभावित करते हैं। फिल्म में कहीं-कहीं युवाओं को कृषि की तरफ आकर्षित करने, समाज में घटती कन्याओं के प्रति सजग रहने और हरियाणवी बोली के प्रति स्वाभिमान जतलाने जैसे कई सामाजिक सन्देश देने की भी कोशिश की गई है, लेकिन प्रभावी अन्दाज नदारद रहा है। फिल्म के कई दृश्य तो एकदम अतार्किक और बचकाने हैं। फिल्म का अंत भी दर्शकों के गले कतई नहीं उतरने वाला है।
फिल्म की शुरूआत जोधा सरदार (गाड़िया लूहार) के बेड़े से शुरू होती है। वे उसी जगह पर डेरा लगाने आते हैं, जहां कभी सूरज व चन्द्रावल की मौत हुई थी। रास्ते में उन्हें चौधरी शमशेर सिंह हादसे का शिकार होकर दम तोड़ता हुआ मिलता है। दम तोड़ने से पहले वह अपनी छोटी सी बच्ची चाँद (शिखा नेहरा) को उनके हवाले कर जाता है। नन्हीं चाँद जोधा सरदार के डेर में ही बड़ी होती है। उधर रवि (कुलदीप राठी) गाँव के जमींदार का बेटा है और कृषि में डिग्री लेने के बाद खेतीबाड़ी करने गाँव आता है। वह गाँव में होने वाली कबड्डी कप्तान है और विपक्षी टीम को हरा देता है, जिसका कप्तान सम्पूर्ण सिंह (दीपक कपूर) है। वह इसे अपनी बेइज्जती समझता है और रवि को अपना दुश्मन समझने लगता है। वह जहरीली शराब का गाँव में धन्धा करता है, जिसे रवि पुलिस की मदद से बन्द करवा देता है। इसके बाद सम्पूर्ण सिंह रवि की जान का दुश्मन बन जाता है और ट्रक के साथ उसका एक्सीडेन्ट करवा देता है। इस सड़क हादसे में रवि अपनी याद गवां बैठता है।
 इसी बीच नाटकीय अन्दाज में उसे पिछले जन्म सूरज की याद हो आती है। वह पिछले जन्म की प्रेमिका चन्द्रो से मिलने के लिए भटकने लगता है। अंततः वह उसे ढूंढ लेता है। बिना किसी रूकावट के रवि के माता-पिता और जोधा सरदार अपने दोनों बच्चों की शादी करवाने के लिए तैयार हो जाते हैं और विवाह का दिन तय कर दिया जाता है। विवाह से पूर्व समाधि पर सम्पूर्ण सिंह अपने साथियों के साथ रवि पर हमला करता है, जिसमें चाँद मारी जाती है। वैद्य भी चाँद को मृत घोषित कर देता है। लेकिन, अंत में मुम्बईया फिल्मों की भांति फिल्म को सुखांत तक पहुंचाने के लिए चाँद को अर्थी पर ही पुनर्जीवित कर दिया जाता है।
फिल्म के साथ एक विवाद और भी जुड़ गया है। फिल्म की पटकथा और संवाद लेखक दिनेश टण्डवाल ने आरोप लगाया है कि उसने फिल्म का निर्देशन भी किया है, लेकिन उसका श्रेय नहीं दिया जा रहा। इसलिए उसके साथ धोखा हुआ है। इन सब आरोप को फिल्म की निर्माता उषा शर्मा सिरे से ही खारिज करती है। कुल मिलाकर, चन्द्रावल-दो उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाई है। नए प्रयोगों के चक्कर में फिल्म न घर की रही और न घाट की। निश्चित तौर पर फिल्म की असफलता हरियाणवी फिल्मकारों और प्रतिभाओं को भारी धक्का पहुंचाएगी। कुल मिलाकर चन्द्रावल लौटकर भी नहीं लौटी। जिस चन्द्रावल की हरियाणवी सिनेमा को जरूरत है, वह जाने कब लौटकर आएगी?

(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।