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गुरुवार, 26 जुलाई 2012

राजेश कश्यप ‘शहीद चन्द्रशेखर आजाद अवार्ड’ से सम्मानित

राजेश कश्यप ‘शहीद चन्द्रशेखर आजाद अवार्ड’ से सम्मानित

   राजेश कश्यप को अखिल भारतीय प्रतिमा रक्षा सम्मान समिति ने ‘शहीद चन्द्रशेखर आजाद अवार्ड-2012’ से सम्मानित किया है। उन्हें यह अवार्ड चन्द्रशेखर आजाद की जयंति के अवसर पर एसबीएस सीनियर सेकेण्डरी स्कूल, करनाल में आयोजित एक भव्य समारोह में मुख्य अतिथि कांग्रेस विधायिका श्रीमती सुमिता सिंह के हाथों प्रदान किया गया। श्री कश्यप को यह सम्मान देशभक्त शहीदों और क्रांतिकारियों पर रचनात्मक व उल्लेखनीय लेखन कार्य करने और देश व समाज में देशभक्ति को बढ़ावा देने के लिए दिया गया है। समिति के चेयरमैन नरेन्द्र अरोड़ा ने इस अवसर पर कहा कि राजेश कश्यप एक आदर्श युवा हैं, जो निरंतर अपने देशभक्तों, शहीदों और क्रांतिकारियों के जीवन मूल्यों, सिद्वान्तों और उनके दिखाए मार्गों से नई पीढ़ी को बखूबी रूबरू करवा रहे हैं। उन्होंने कहा कि श्री कश्यप रचनात्मक लेखन के साथ-साथ सक्रिय समाजसेवा से भी जुड़े हुए हैं और राष्ट्रीय एकता, अखण्डता व सद्भावना को मजबूत बनाने में अपना अहम् योगदान दे रहे हैं। इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष बलजीत सल्याण, महासचिव महेश शर्मा, संरक्षक कृष्ण अरोड़ा के अलावा लाला लाजपतराय रेजीमेंट, शहीद भगत सिंह रेजीमेंट एवं रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट के समस्त पदाधिकारी, वरिष्ठ गणमान्य लोग और प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद थे।
    उल्लेखनीय है कि राजेश कश्यप रोहतक जिले के टिटौली गाँव से संबंध रखते हैं और पिछले एक दशक से रचनात्मक लेखन एवं सक्रिय समाजसेवा के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। उनके एक हजार से अधिक लेख प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं और कई किताबें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से दर्जन भर वार्ताएं, बातचीत एवं परिसंवाद प्रसारित हो चुके हैं। इसके साथ ही सामाजिक कुरीतियों व समस्याओं पर आधारित तीन हरियाणवी नाटक भी प्रसारित हो चुके हैं। इससे पहले भी उन्हें उत्कृष्ट लेखन व समाजसेवा के लिए दर्जनों विशिष्ट सम्मान व पुरस्कार हासिल हो चुके हैं। श्री कश्यप को वर्ष 2000 में 52वें गणतंत्र दिवस पर तत्तकालीन शिक्षामंत्री बहादुर सिंह द्वारा ‘विशिष्ट सम्मान’, भारतीय दलित साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा ‘डॉ. अम्बेडकर फैलोशिप सम्मान 2003’, हरियाणा अम्बेडकर संघर्ष समिति द्वारा ‘सन्त कबीर सम्मान-2006’ और वर्ष 2010 में सीएसआर नई दिल्ली द्वारा ‘मिस्टर इंटेलेक्चूअल अवार्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है।

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

खाप पंचायतों का असली नकली चेहरा !

खाप पंचायतों  का असली नकली चेहरा !
-राजेश कश्यप


पिछले कुछ समय से ‘खाप पंचायतें’ अपने तुगलकी फरमान सुनाने और ‘ऑनर किलिंग’ के आरोपों में घिरा होने के कारण ‘खौफ पंचायतों’ में तब्दील हो चुकी हैं। इन खाप पंचायतों का दबदबा अधिकतर उत्तरी भारत में है। इन खाप पंचायतों ने एक के बाद एक कई बेतुके और गैर-कानूनी फैसले सुनाकर अपनी छवि को स्वयं धूमिल किया है। हरियाणा की खाप पंचायतें ‘जोणधी-प्रकरण’, ‘ढ़राणा प्रकरण’, ‘वेदपाल हत्याकाण्ड’, ‘बलहम्बा हत्याकाण्ड’ और ‘मनोज-बबली हत्याकाण्ड’ जैसे कई मामलों में अच्छी खासी बदनाम हुई हैं। एक के बाद एक कानून की धज्जियां उड़ाने वाली घटनाओं ने खापों को खलनायक बनाकर रख दिया। इस समय हरियाणा में लगभग 110 खापें अस्तित्व में हैं, जिनमें से 72 खापों की सक्रियता दर्ज की गई है।
आजकल खापों की मनःस्थिति एकदम विचित्र हो चली है। एक तरफ जहां उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में महिलाओं पर कई तरह की पाबन्दियों वाले फरमान सुनाने के बाद खाप पंचायतें एक बार फिर भारी बदनामी का सामना कर रही हैं। दूसरी तरफ, हरियाणा में जीन्द जिले के बीबीपुर गाँव की महिलाओं ने कन्या-भू्रण हत्या को रोकने के अपने अनूठे आन्दोलन में खाप चौधरियों को अपने साथ जोड़कर खापों को एक नया रूप देने की अनूठी कोशिश की है। दरअसल, बीबीपुर गाँव की महिलाएं तब राष्ट्रीय सुर्खियों में आईं थीं, जब गत 18 जून को उन्होंने अपने गाँव में देश की प्रथम महिला ग्राम सभा करने का श्रेय हासिल किया था और कन्या-भू्रण हत्या रोकने के अभियान का झण्डा बुलन्द किया था। इस अभियान को व्यापक रूप देने के लिए उन्होंने सभी खापों को गत 14 जुलाई की महापंचायत में आने और कन्या-भू्रण हत्या को रोकने का महा-ऐलान करने का आमंत्रण दिया था। लगभग सौ खापों ने इस सर्वखाप महापंचायत में हाथ उठाकर कन्या-भू्रण हत्या को रोकने के लिए जागरूकता आन्दोलन चलाने और सरकार से कन्या-भू्रण हत्या के दोषियों पर धारा 302 के तहत केस चलाने की माँग को समर्थन दिया। खापों के इस नए रूप को देखकर हर कोई अचम्भित था।
इसी महापंचायत में खापों को ‘सच का सामना’ करवा चुके आमिर खान व उसकी पत्नी को भी आमंत्रित करने का प्रस्ताव भी रखा गया था, ताकि उन्हें खापों की सामाजिक कार्यप्रणाली से अवगत करवाया जा सके और खापों के प्रति उनके विचारों को बदला जा सके। लेकिन, आखिरी समय में इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया गया। हुआ यूं कि जैसे ही गत 3 जून को देशभर में नासूर बनती जा रही ‘ऑनर किलिंग’ के परिपेक्ष्य में ‘इज लव ए क्राइम’ (क्या प्यार करना गुनाह है?) मुद्दे पर आधारित ‘सत्यमेव जयते’ का प्रसारण हुआ, खाप चौधरियों के तेवर तीखे हो गए। इसके अगले ही दिन इस मुद्दे पर आमिर को बुरी तरह कोसने के लिए बैठकों का दौर शुरू हो गया। हालांकि ‘ऑनर किलिंग’ जैसी अपराधिक घटनाओं में खाप पंचायतों की संदेहास्पद भूमिका को स्पष्ट करने और खापों के पक्ष को देश व समाज के सामने रखने के उद्देश्य से आमिर खान ने ‘सर्वजातीय महम चौबीसी खाप’ के पाँच सदस्यीय टीम को आमंत्रित भी किया था। लेकिन, आमिर खान के सीधे और सटीक सवालों के चक्रव्युह में खाप के पाँचों सदस्य बुरी तरह फंसते चले गए और वे देशभर में सामने आई खापों की नकारात्मक छवि को बदलने में पूरी तरह नाकाम रहे।

खाप पंचायतों की कार्यशैली पर आमिर के करारे कटाक्षों से घायल खाप चौधरियों ने अपने चिरपरिचित अन्दाज में आनन-फानन में बैठकें करनीं शुरू कीं और ‘सत्यमेव जयते’ पर रोक लगाने, कानूनी कार्यवाही करने व इस कार्यक्रम का बहिष्कार करने जैसे प्रस्तावों पर चर्चाएं की जानें लगीं। एक बार तो कुछ चौधरियों की तरफ से इस मुद्दे को साम्प्रदायिकता का रंग देने की भी कोशिशें शुरू हो गईं थीं। खाप बैठकों में आमिर खान को मुस्लिम बताकर हिन्दू संस्कृति पर सुनियोजित हमला तक बताया जाने लगा था। वैसे अधिकतर खाप चौधरियों की इस संदर्भ में आमिर को यह सलाह रही कि चूंकि आमिर मुस्लिम है, उसे हिन्दू संस्कृति और खाप संस्कृति का जरा भी ज्ञान नहीं है। ऐसे में उन्हें खाप पंचायतों पर कटाक्ष करने का कोई अधिकार नहीं है और अपनी गलती के लिए सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगनी चाहिए। हालांकि आमिर खान ने यह कहकर खापों की इस मांग को ठुकरा दिया कि हमने कुछ भी नहीं किया है। हमने केवल सच्चाई सामने रखी है।
कई खाप बैठकों में कई रचनात्मक सुझाव भी रखे गए। एक सुझाव के अनुसार, किसी सामाजिक मुद्दे पर खाप पंचायत आयोजित की जाए और उसमें आमिर खान को आमंत्रित किया जाए। इससे आमिर खान खाप पंचायत की कार्यप्रणाली से पूर्णतः रूबरू हो सकेंगे और खाप पंचायतों के प्रति अपनी गलत धारणाओं को बदलेंगे। इस सुझाव को कुछ खाप पंचायतों ने अमलीजामा पहनाने के लिए कमर कसी और ऐसे आयोजन के लिए संभावनाएं तलाशनें लगीं। उन्हें तब सफलता मिली जब जीन्द जिले के गाँव बीबीपुर की महिलाएं ‘कन्या-भू्रण हत्या’ को रोकने के लिए देश की प्रथम महिला ग्राम सभा आयोजित करके राष्ट्रीय सुर्खियों में पहुंचीं और इस अभियान को व्यापक बनाने के लिए 14 जुलाई को आयोजित महापंचायत में प्रदेश की खापों को भी आमंत्रित किया गया। नौगामा खाप पंचायत ने ‘कन्या भ्रूण हत्या’ जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दे पर आयोजित होने वाली इस महापंचायत में खापों की सकारात्मक तस्वीर पेश करने के लिए आमिर खान व उनकीं पत्नी किरण को भी आमंत्रण पत्र भेजने की जबरदस्त पैरवी की। आमंत्रण पत्र भेजने के लिए बीबीपुर गाँव के युवा सरपंच सुनील जागलान को अधिकृत किया गया। आमंत्रण पत्र तैयार भी हो गए। लेकिन, ऐन वक्त पर कई खापों ने आमिर खान को महापंचायत में न बुलाने का फरमान सुना दिया। इस फरमान के आगे सरपंच सुनील जागलान को भी घुटने टेकने पड़े और आमिर खान को महापंचायत में न बुलाने के फरमान पर अपनी मुहर लगानी पड़ी।

उम्मीद के मुताबिक गत 14 जुलाई को खाप के चौधरी महापंचायत में पहुंचे और अपनी नकारात्मक छवि को बदलने की लाख कोशिश भी की। लेकिन, खाप चौधरी अपनी सकारात्मक छाप छोड़ने में नाकायाब रहे। यह दूसरी बात है कि मीडिया के माध्यम से प्रायोजित तरीके से गाँव के सरपंच व हरियाणा सरकार ने खापों को एक नया मुखौटा पहनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। लेकिन, असलियत को लाख दबाने के बावजूद, सबके सामने आ ही जाती है। इस महापंचायत में भी खापों की असलियत को बुद्धिजीवियों ने बखूबी भांप लिया। मंच से खाप चौधरियों को हाथ उठाकर कन्या भ्रूण हत्या रोकने के नाम पर समर्थन देना, एक तरह से विवश किया गया था। दिल से खाप चौधरियों ने कन्या-भू्रण हत्या के खिलाफ कोई रचनात्मक प्रस्ताव अथवा सुझाव पेश नहीं किया। मीडिया में सुनियाोजित तरीके से भ्रामक प्रचार करवाया गया कि खाप चौधरियों ने महिलाओं के साथ पहली बार मंच सांझा किया। जबकि, हकीकत यह थी कि खाप पंचायत में महिलाओं को बुरी तरह दरकिनार करके रखा गया और एक कोने में घूंघट (पर्दा) में मुंह ढ़ंककर दुबकी बैठी रहीं और खाप चौधरी पूरे गर्व के साथ सीना फुलाए और मुंछों पर ताव देते नजर आए। मंच से चंद ही महिलाओं को चंद मिनट ही अपने विचार देने का मौका दिया गया। घूंघट से मुंह ढ़के एक-दो वृद्ध महिलाओं को बंद माईक हाथ में पकड़ाकर अपने विचार व्यक्त करने के स्थान पर मूक अभिनय करने और समाचार-पत्रों में अच्छी छवि बनाने के लिए फोटो करवाने जैसी गुस्ताखियां सबके सामने परोसी गई।
महापंचायत में खाप चौधरियों के चेहरों पर यह साफ दिखाई दे रहा था कि महिलाओं के बुलावे पर उन्हें यहां आना पड़ा है और न चाहते हुए भी उन्हें खाप पंचायत में महिलाओं की उपस्थिति को सहन करना पड़ रहा है। मंच से जितने भी खाप चौधरी बोले, सभी ने कन्या-भू्रण हत्या के लिए सिर्फ और सिर्फ महिलाओं को दोषी ठहराने का राग अलापा। पहले एक घण्टे के दौरान ही खाप चौधरियों ने कन्या-भू्रण हत्या को रोकने के सन्दर्भ में ठोस निर्णय लेने के लिए खापों की ग्यारह सदस्यीय कमेटी की घोषणा की, जिसमें एक भी महिला प्रतिनिधि का नाम नहीं था। कमेटी की घोषणा के तुरंत बाद ही खाप चौधरियों में तू-तू, मैं-मैं हो गई और निर्णय हुआ कि यहीं पर प्रस्ताव रखा जाए और हाथ उठाकर उस प्रस्ताव को स्वीकृति दी जाए। महापंचायत में दो पंक्तियों का प्रस्ताव रखा गया कि कन्या-भ्रूण हत्या को रोकने के लिए अभियान चलाया जाएगा और सरकार को इसके लिए कठोर कार्यवाही करनी चाहिए। सभी ने हाथ उठाए और बस हो गया कन्या-भू्रण हत्या रोकने में खापों का विशिष्ट योगदान! सभी बुद्धिजीवी, शोधकर्ता, महिलाएं, समाजसेवी, मीडिया आदि सब अवाक् रह गए। सभी को उम्मीद थी कि खाप चौधरी अपनी शैली के मुताबिक इस सामाजिक मुद्दे पर कोई ठोस और कड़े फैसले लेंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

इसी के साथ महापंचायत से अधिकतर लोग रवाना हो गए। लेकिन, फिर किसी ने खाप चौधरियों को अहसास करवाया कि चंद मिनटों में अपने कर्त्तव्य की इतिश्री करके उनकी छवि सुधरने वाली नहीं हैं। इसके लिए कम से कम कुछ घंटे तो भाषणबाजी चलनी ही चाहिए। तदुपरांत फिर से थोड़े से दर्शकों की उपस्थिति में ही भाषणबाजी का क्रम शुरू कर दिया गया। इसी बीच मौका देखकर सभी खाप चौधरी मंच से खिसक लिए और स्कूल के एक कमरे में जाकर गुप्त मंत्रणा में जुट गए। इस मंत्रणा में खापों की वास्तविक मनःस्थिति से साक्षात्कार हुआ, जोकि बड़ा ही चौंकाने वाला रहा। इस मंत्रणा में खाप चौधरियों के बीच सिर्फ इसी विषय को लेकर विचार-मन्थन चलता रहा कि आखिर वे अपने वर्चस्व व अस्तित्व को कैसे बचाए रखें? खाप चौधरियों ने इस बात पर खुलकर चिंता जाहिर की, कि उनके बाद खाप पंचायतें समाप्त हो जाएंगी, क्योंकि नई पीढ़ी खापों में जरा भी विश्वास नहीं करती और आज भी कोई तवज्जो नहीं देती। इसके साथ ही खाप चौधरियों ने हाल ही में उत्तर प्रदेश के बागपत जिले की पंचायत द्वारा महिलाओं पर बेतुका पाबंदियों के मसले पर रणनीति बनाई। खाप चौधरियों को इस बात का अहसास था कि इस तरह के फरमान आज संभव भी नहीं हैं और सही भी नहीं हैं। चूंकि, मामला खाप पंचायतों की इज्जत का है तो हमें एकजूटता का परिचय देना चाहिए। इसी के साथ खाप चौधरियों ने अपनी इज्जत और वर्चस्व को बनाए रखने के लिए किसी भी हालत में खापों के साथ खड़ा होने की ही प्रतिबद्धता जताई और किसी भी खाप पर कानूनी शिकंजा कसने की सूरत में एकजूट होने का संकल्प दोहराया।
लेकिन, इस संकल्प में भी खाप चौधरियों में भारी संशय लग रहा था। क्योंकि खाप चौधरी इस तथ्य से भी भारी चिंतित थे कि अब उनके बीच पहले जैसी एकजूटता नहीं रही। सुप्रीम कोर्ट व मीडिया की सख्ती से सरकार भी खापों पर कानून का कठोर कोड़ा चलाने के लिए बाध्य हो गई है। ऐसे में, कहीं उनकी चौधराहट जेल की सलाखों के पीछे बिखरती न दिखाई दे, इसी डर के मारे कई खापों में दहशत व्याप्त हो चुकी है। इसके साथ ही इस गुप्त मंत्रणा में खाप चौधरियों ने निकट भविष्य में एक बड़ी सर्वखाप महापंचायत बुलाने का निर्णय भी लिया, जिसमें खापों के संविधान में कुछ संशोधन किए जा सकें। दरअसल कुछ खापों के चौधरी इस बात से सख्त नाराज थे कि कन्या-भू्रण हत्या के मसले पर जिस तरह से गाँव के सरपंच ने महिलाओं के माध्यम से इक्कठा किया है और उनका इस्तेमाल किया है, वह भविष्य में न हो। कुछ खाप चौधरियों ने तो यहां तक भी कहा कि कन्या-भ्रूण हत्या जैसा मुद्दा खाप पंचायतों के स्तर का ही नहीं है।

खापों की यह असली तस्वीर है। इस तस्वीर को प्रस्तुत करने का मूल मकसद यह बताने का है कि हरियाणा में जिस प्रायोजित तरीके से मीडिया के माध्यम से खापों की असली तस्वीर को छुपाया जा रहा है, वह सिर्फ दिखावा भर है। वास्तविकता यह है कि समाज के प्रबुद्ध लोगों, मीडिया व माननीय न्यायालायों ने सरकार को तुगलकी फरमान सुनाने वाली इन खाप पंचायतों पर कड़ी कार्यवाही करने व कठोर कानून बनाने के लिए बाध्य किया हुआ है, इसी लिए खाप पंचायतें राजनीतिकों को वोटों के नाम पर ब्लैकमेल करने से चूक नहीं रही हैं। कोई भी राजनीतिक दल इन खापों की खिलाफत करके अपने वोट बैंक को दांव पर नहीं लगाना चाहता है। इसी मंशा के चलते ही गत दिनों हरियाणा सरकार के मुखिया भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने खापों के सामाजिक पक्ष की जबरदस्त पैरवी की थी। मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि ‘‘वे राज्य में ‘ऑनर किलिंग’ के बेहद खिलाफ हैं, लेकिन इसका दोष पंचायतों पर मढ़ना उचित नहीं है। खाप पंचायत अपने अधिकार व सामाजिक मर्यादा से बाहर जाकर फैसला नहीं लेतीं।’’ मुख्यमंत्री की इस प्रतिक्रिया के बारे में बुद्धिजीवियों कयास लगा रहे हैं कि संभवतः अपना वोट बैंक खो जाने के डर से वे ऐसा कह रहे हैं, अर्थात् कहीं न कहीं वे भी खापों के हाथों ब्लैकमेल हो रहे हैं! कमाल बात यह है कि अभी खापों ने अभी सिर्फ कन्या-भू्रण हत्या रोकने का समर्थन भर किया है, अभी इस समस्या के समाधान में कोई अह्म भूमिका नहीं निभाई है और न ही कोई सकारात्म परिणाम सामने आया है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री ने आनन-फानन में खाप चौधरियों के नाम से बीबीपुर की ग्राम पंचायत को एक करोड़ रूपये देने का ऐलान कर दिया है। इसके उलट जिन ग्राम पंचायतों ने बिना किसी दिखावे और तामझाम के वास्तव में कन्या-भू्रण हत्या रोककर लिंगानुपात को संतुलित किया है और कन्याओं की संख्या को अप्रत्याशित तरीके से बढ़ाया है, उन्हें इतना बड़ा पुरस्कार आज तक मुख्यमंत्री ने नहीं दिया है। मुख्यमंत्री के इस दोहरे रवैये पर प्रश्नचिन्ह उठना स्वभाविक है।

हरियाणा के मुख्यमंत्री की तर्ज पर ही राष्ट्रीय लोकदल के युवा नेता और मथुरा से सांसद जयंत चौधरी ने बागपत में खाप पंचायत के उस तालीबानी फरमान का समर्थन किया है, जिसमें 40 साल से कम महिलाओं को घर से बाहर अकेले न निकलने, महिलाओं व युवतियों को मोबाईल इस्तेमाल न करने और प्रेम विवाह न करने जैसी हिदायतें शामिल थीं। रालोद सुप्रीमो चौधरी अजीत सिंह के सुपुत्र जयंत चौधरी द्वारा इन बेतुके फरमानों का समर्थन करने के पीछे सियासी मजबूरियां स्पष्ट झलकती हैं। क्योंकि जाटों के नाम पर राजनीति करने वाले चौधरी अजीत सिंह के लिए चुनौती बनकर उभरे कथित जाट नेता प्रो. यशपाल मलिक ने इस खाप पंचायत में शिरकत की थी और जाटों के बीच अपनी पैठ मजबूत बनाने के लिए कोई कमी नहीं छोड़ी थी। अपने जाट वोट बैंक को खिसकते देखकर चौधरी अजीत सिंह ऐसा कोई भी कदम उठाने से परहेज कर रहे हैं, जिससे उनका वोट बैंक प्रभावित हो। इसी के मद्देनजर वे जाटों के आरक्षण की मांग को लेकर गृहमंत्री के दरबार में अपनी हाजरी भी लगा चुके हैं।
वैसे तो देश भर में बड़े पैमाने पर खाप पंचायतें तुगलकी फरमान सुनाने से बाज नहीं आ रही हैं और साथ ही ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएं सामने आ रही हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने भी खाप पंचायतों को कई बार ‘ऑनर किलिंग’ मसले पर खूब झाड़ पिलाई हैं। केन्द्रीय स्तर पर भी खाप पंचायतों पर नकेल डालने के लिए सख्त कानून बनाने पर गंभीरता से विचार हो रहा है। इस मसले पर सरकार के तीन दिग्गज व कानून विशेषज्ञ मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और कानून मंत्री एम. वीरप्पा मोइली खूब विचार-विमर्श कर चुके हैं। वर्ष 2010 में खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों पर नकेल कसने के लिए केन्द्र सरकार ने कानून में संशोधन करने के लिए एक मंत्री समूह गठित करने का निर्णय भी लिया था। लेकिन, राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में यह मामला यूं ही अटका हुआ है। हाल फिलहाल यह मामला जीओएम के अधीन बताया गया जा रहा है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)   

बुधवार, 11 जुलाई 2012

एनजीओ पर नकेल क्यों और कैसे?

मुद्दा

एनजीओ पर नकेल क्यों और कैसे? 
 -राजेश कश्यप

देश में एनजीओ (गैर सरकारी संगठन) का मकड़जाल चरम पर पहुंच चुका है। इन एनजीओ की प्रकृति परजीवी अमरबेल की तरह हो चुकी है, जो ऊपरी तौरपर तो सुनहरी दिखाई देती है, लेकिन वास्तव में वह उसी पेड़ की शाखाओं को चूसती रहती है और धीरे-धीरे अपना तिलिस्मी मकड़जाल बढ़ाते हुए, पूरे पेड़ को अपने शिकंजे में लेकर बिल्कुल सुखा डालती है। एनजीओ भी एक तरह से परजीवी संस्थाएं हैं। ये गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) सरकारी अनुदान (ग्रान्ट) और सामाजिक दान व चन्दा लेकर अपनी गतिधियां संचालित करती हैं। ऊपरी तौरपर इन एनजीओ के कार्य समाजहित में अत्यन्त अनुकरणीय एवं कल्याणकारी होते हैं। इनके संविधान में समाज उत्थान से संबंधित शायद ही कोई पहलू अछूता रहता है। लगभग हर एनजीओ के प्रमुख कार्यों व उद्देश्यों में महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, वृद्ध सेवा, बाल कल्याण, युवा कल्याण आदि दो दर्जन के करीब दावे सामान्यतः देखे जा सकते हैं। लेकिन, वास्तविकता इन दावों से लाखों कोस दूर होती है।
अभी हाल में रोहतक का ‘अपना घर’ राष्ट्रीय सुर्खियों में है। इसमें मासूम, बेसहारा, गरीब, शोषित, निराश्रित और विपरीत परिस्थितयों की शिकार महिलाएं, युवतियां और बच्चे आश्रय लिए हुए थे। गत 9 मई को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसी) द्वारा छापा डालने के बाद पता चला कि यहां हर तरह का महापाप होता था। जबरन देह व्यापार से लेकर बाल यौन शोषण तक, निर्मम पिटाई से लेकर बाल मजदूरी तक और बच्चों को बेचने से लेकर युवतियों को उम्रदराज लोगों को विवाह के नाम पर सौदा करने तक, ऐसे महापाप आरोपी संचालिका व उसके सगे संबधियों द्वारा अंजाम दिए जा रहे थे, जिन्हें सुनकर रौंगटे खड़े हो जाते हैं। समाजसेवा के नाम पर काम करने वाली ‘अपना घर’ जैसी गैर सरकारी समाजसेवी संस्थाओं के इन कुकर्त्यों की जितनी भी निन्दा की जाए, उतनी ही कम है। बड़ी विडम्बना का विषय है कि इस तरह की गैर सरकारी सामाजिक संस्थाएं पूरे देश व समाज के लिए नासूर बन चुकी हैं। इस नासूर का इलाज सहज संभव नहीं है। इसके लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाने की आवश्यकता है।
सबसे पहले इन सामाजिक संस्थाओं के पंजीकरण प्रक्रिया को बदलने की आवश्यकता है। सामान्यतः देश में इन एनजीओ का पंजीकरण सोसाइटीज एक्ट 1860, इंडियन ट्रस्ट एक्ट 1882, पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950, इंडियन कंपनीज एक्ट 1956 (दफा 25), रिलीजियस इनडाउमेंट एक्ट 1863, द चैरिटेबल एण्ड रिलीजियस ट्रस्ट एक्ट 1920, मुसलमान वक्फ एक्ट 1923 आदि के तहत होता है। एनजीओ के पंजीकरण की प्रक्रिया इतनी सरल और सुगम है कि कोई भी व्यक्ति चंद कागजों की खानापूर्ति करके अपनी एनजीओ बना लेता है। कमाल की बात तो यह है कि काफी शातिर लोगों ने तो संस्थाओं का पंजीकरण करवाने की दुकान ही खोल रखी हैं। ये लोग एनजीओ पंजीकरण से लेकर प्रोजेक्ट बनाने तक का ठेका लेते हैं और बदले में मुंहमांगी रकम ऐंठते हैं। बेहद आश्चर्य की बात तो यह है कि ये ठेकेदार प्रत्येक वित्त वर्ष के अंत में पंजीकृत संस्था की वार्षिक गतिविधियों से लेकर उसके खर्च तक के दस्तावेज भी तैयार करके देते हैं, भले ही संस्था ने किसी को मटके का एक गिलास पानी तक न पिलाया हो। ऐसे शातिर लोग अपने पूरे परिवार और सगे संबंधियों के नाम पर दर्जनों एनजीओ का संचालन इसी तरह कागजों में करते रहते हैं।
सबसे हैरत की बात तो यह है कि यदि रिकार्ड़ जांचा जाए तो इन संस्थाओं की मॉनिटरिंग से लेकर चार्टेटेड एंेकाउंटेट तक से वैरिफाईड कागजातों का ढ़ेर मिलेगा, बावजूद इसके कि संस्था ने भले ही कोई काम न किया हो। ऐसा असंभव होते हुए भी कैसे संभव हो सकता है? निःसंदेह यह सब पैसे के बल पर होता है और संबधित स्थानीय प्रशासन इसमें सम्मिलित होता है। अतः संस्थाओं के पंजीकरण की प्रक्रिया को सख्त और पारदर्शी बनाया जाना, अब समय की कड़ी मांग बन चुकी है। संस्थाओं का पंजीकरण करते समय ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषद के जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ स्थानीय विधायक और सांसद की अनुमति भी अनिवार्य कर देनी चाहिए। इसके साथ ही इलाके की किसी प्रमुख शख्सियत को जमानती के तौरपर भी शामिल करने का प्रावधान बनाया जाना चाहिए। जो भी संस्था पंजीकृत हो, उसके कार्यालय, लक्ष्य, सदस्य आदि का पूरा खुलासा सार्वजनिक स्तर पर होना चाहिए। हर संस्था का कार्यक्षेत्र तय कर दिया जाना चाहिए। इससे एक ही स्थान पर एक ही कार्य के लिए दर्जनों एनजीओ के पंजीकरण का कोई औचित्य नहीं है। एक ही छत के नीचे रहने वाले परिवार के एक से अधिक सदस्यों के नाम संस्था पंजीकृत करवाना गैर-कानूनी होना चाहिए। एक एनजीओ को एक समय पर एक ही प्रोजेक्ट देने का प्रावधान करना चाहिए। जब तक एक प्रोजेक्ट पूरा न हो, दूसरे प्रोजेक्ट के लिए अनुदान जारी नहीं किया जाना चाहिए, ताकि एनजीओ संचालकों में अधिक से अधिक पैसा हड़पने की प्रवृति पर अंकुश लग सके। संस्थाओं का पंजीकरण सीमित अवधि पाँच या दस साल के लिए होना चाहिए। संतोषजनक कार्य निष्पादन के आधार पर उन्हें आगामी निश्चित अवधि के लिए नवीनीकृत करने का प्रावधान किया जाना चाहिए।
पंजीकृत संस्थाओं को सरकारी अनुदान व सामाजिक चन्दा व दान देने के मामले में भी पारदर्शिता होनी चाहिए। वर्तमान कानूनी प्रावधानों के तहत उन्हीं संस्थाओं को सरकारी अनुदान दिया जाता है, जो संस्था कम से कम तीन साल से पंजीकृत है और समाजसेवा का अच्छा रिकार्ड़ रखती है। ऐसे में सरकारी अनुदान पास होने से पूर्व किसी स्वतंत्र एजेन्सी से पिछले तीन वर्षों के कार्यों का मूल्यांकन गहराई से करवाना चाहिए और स्थानीय इकाई ग्राम सभा आदि से तसदीक करवानी चाहिए। संस्था द्वारा किया गया कार्य संतोषजनक पाए जाने पर ही उसे सरकारी अनुदान के लिए नामित करना चाहिए।
सरकार अनुदान व सामाजिक चन्दा व दान प्राप्त राशि को भी सार्वजनिक करने के लिए सशक्त, सुलभ और अनिवार्य प्रावधान बनाने की भी कड़ी आवश्यकता है। शातिर लोग समाजसेवा के नाम पर करोड़ों रूपया सरकारी व सामाजिक दान के रूप में प्रतिवर्ष हासिल करते हैं और किसी को कानोंकान तक खबर नहीं लगती है। संस्था द्वारा बनाए गई आगामी समयबद्ध वार्षिक कार्य योजना (एक्शन प्लान) को भी समुचित तरीके से सार्वजनिक किये जाने का प्रावधान होना चाहिए, ताकि आम जनमानस न केवल उन योजनाओं का लाभ उठा सके, अपितु उन गतिविधियों के क्रियान्वयन का साक्षी भी बन सके। इन संस्थाओं की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट को स्थानीय इकाईयों ग्राम सभा आदि से पास करवाने के बाद आगे बढ़ानी चाहिए। तमाम प्रक्रियाओं के बाद वह पूरी रिपोर्ट समस्त दस्तावेजों के साथ प्रमुख कार्यालयों और पुस्तकालयों में भी जरूर उपलब्ध करवाई जानी चाहिए और उस संस्था की समस्त गतिविधियों का अपडेट समयबद्ध तरीके से इंटरनेट पर भी ऑन लाईन होना चाहिए। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, अपितु शोधार्थियों को भी बहुत लाभ मिलेगा।
इसके साथ ही एनजीओ के हस्तांतरण पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए। क्योंकि शातिर लोग अनेकों संस्थाओं का पंजीकरण पंजीकरण केवल इसीलिए करवाते हैं, ताकि बाद मंे उन्हें मुंहमांगी कीमत पर बेचकर मोटी कमाई कर सकें। इस तरह हस्तांतरण के जरीये खरीद-फरोख्त की हुई संस्थाओं का काम सिर्फ कागजों में ही होता है और आगे उनका प्रयोग उनसे भी शातिर लोग पैसे के दम पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हासिल करके सरकार व समाज को करोड़ों का चूना लगाकर ऐशोआराम व अय्याशी का जीवन जीते हैं। इसके अलावा प्रत्येक एनजीओ के मुख्य कार्यालय के बाहर एक विशेष सूचना पट्ट (नोटिस बोर्ड) लगवाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए, जिस पर मुख्यतः संस्था को मिलने वाले सरकारी अनुदानों व चन्दा अथवा दान राशियों का पूरा विवरण, खर्च राशि का विवरण, संस्था के पदाधिकारियों का परिचय, संस्था के उद्देश्य, कार्यक्षेत्र, लाभार्थियों का विवरण, प्रस्ताविक कार्यक्रम, वर्तमान मंे जारी कार्यक्रमों का पूरा विवरण, सूचना अधिकारी का नाम, संस्था का टेलीफोन नंबर व ईमेल आदि सभी प्रमुख जानकारियां अंकित होनी चाहिएं।
संस्थाओं का निरीक्षण यानी मॉनीटरिंग प्रक्रिया एकदम व तुरन्त बदलने की आवश्यकता है। संस्थाओं का समयबद्ध तरीके से औचक निरीक्षण होना चाहिए। क्योंकि निरीक्षणकर्ता पहले ही निरीक्षण का दिन और समय घोषित कर देते हैं। ऐसे में शातिर संस्था संचालक अपने प्रोजैक्ट का आकर्षक डैमो लगाकर तैयार हो जाते हैं। इसके साथ ही निरीक्षणकर्ता के लिए पैसे के साथ-साथ शराब, शबाब और अय्याशी की हर चीज की व्यवस्था कर ली जाती है। निरीक्षण गोपनीय तरीके से औचक किया जाना चाहिए और साथ ही फोटोग्राफी व विडियोग्राफी भी करवाई जानी चाहिए। इसके साथ ही निरीक्षणकर्ता द्वारा परियोजना के लाभार्थियों व स्थानीय लोगों से भी अकेले में बात करनी चाहिए और उनके सभी गिले-शिकवे व सुझाव दर्ज करने चाहिएं। निरीक्षण के दौरान कार्य से संबंधित हर दस्तावेज का बारीकी से निरीक्षण होना चाहिए और उनको तस्दीक व हस्ताक्षरित करने वाले व्यक्तियों की भी पड़ताल करनी चाहिए। काफी संस्थाएं नकली हस्ताक्षर और गैर-कानूनी तौरपर बड़े-बड़े अधिकारियों की मोहरें व पैड बनवाकर दस्तावेज तैयार करती हैं और भारी फर्जीवाड़े को अंजाम देती हैं। निरीक्षणकर्ता की पूरी रिपोर्ट भी यथाशीघ्र सार्वजनिक किए जाने का प्रावधान बनाया जाना चाहिए।
जिन एनजीओ में बच्चों व महिलाओं से संबंधित परियोजनाओं का संचालन होता है अथवा जहां महिलाएं काम करती हैं, उन संस्थाओं पर बारीकी से नजर रखने की आवश्यकता है। ऐसी संस्थाओं में बड़े पैमाने पर एनजीओ संचालक महिलाओं व बच्चों का शारीरिक व मानसिक शोषण करते रहते हैं और उनकी खबर किसी को भी नहीं लग पाती है। ऐसी संस्थाओं में कदम-कदम पर पारदर्शिता की आवश्यकता है और विश्वसनीय एजेन्सियों व अधिकारियों द्वारा प्रतिमाह निरीक्षण किया जाना चाहिए। स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। ऐसी संस्थाओं मंे किसी भी आम व सभ्य आदमी द्वारा वहां के आश्रित बच्चों व महिलाओं की कुशलक्षेम पूछने की अनुमति होनी चाहिए। प्रत्येक त्यौहार व राष्ट्रीय पर्व पर संस्था में रह रहे बेबस व निराश्रित बच्चों व महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। किसी भी संस्था में, किसी भी स्तर पर कोई शिकायत मौखिक अथवा लिखित मिलती है, तुरंत उसका संज्ञान जिला प्रशासन के साथ-साथ राज्य स्तर भी लेने का प्रावधान होना चाहिए।
गैर सरकारी संगठनों को पारदर्शी व कारगर बनाने के लिए कई अन्य कदम भी उठाये जा सकते हैं। मसलन, संस्था के प्रधानों की अवधि भी सुनिश्चित की जा सकती है। इससे संस्था में कई तरह के सकारात्मक परिणाम आएंगे। ऐसे संगठनों की गतिविधियों में मीडिया की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। अधिकतर संस्थाएं पेड न्यूज अथवा विज्ञापनों की ऐवज में अपनी फर्जी गतिविधियां समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाती हैं और उन्हीं कंटिग्स के सहारे वार्षिक रिपोर्ट तैयार होती हैं और उन्हीं को दिखाकर नए-नए प्रोजेक्ट हथियाए जाते हैं। ऐसे में संस्थाओं की खबरें प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित नहीं होनी चाहिएं। यदि ऐसा कोई मामला संज्ञान में आए तो उस पर तुरन्त कड़ी कार्यवाही का प्रावधान होना चाहिए। यदि मीडिया स्वयं ऐसी गतिविधियों की कवरेज करेगा तो योजनाओं में काफी हद तक पारदर्शिता आएगी।
इसके साथ ही एनजीओ को जन लोकपाल और लोकायुक्तों के दायरे में लाया जाना चाहिए। इससे एनजीओ में होने वाले गोलमाल और गैर कानूनी कार्यों पर काफी हद तक अंकुश लग सकेगा और समाज कल्याण के नाम पर प्रतिवर्ष जो लाखांे-करोड़ों रूपया पानी की तरह बहाया जाता है, उसका सदुपयोग भी हो सकेगा। इसके अलावा बनाए जाने वाले नए नियमों की कसौटी पर पुरानी पंजीकृत गैर सरकारी संगठनों को भी आंकना चाहिए और मानकों पर खरा न उतरने वाले संगठनों को तुरन्त हमेशा के लिए प्रतिबन्धित (ब्लैकलिस्ट) कर देना चाहिए। इसके साथ ही प्रतिबंधित (ब्लैकलिस्ट) संगठन के सदस्यों को भी पर भी किसी तरह की कोई संस्था पंजीकृत करवाने के लिए पूर्णतः प्रतिबंधित और गैर-कानूनी कर देना चाहिए। इससे चालबाज लोगों को कड़ा सबक मिलेगा और वे हर कदम फूंक-फूंककर रखेंगे। इसी तरह के अन्य विकल्प एवं सुझाव बुद्धिजीवियों एवं सुधी पाठकों से खुले रूप से आमंत्रित किए जाने चाहिएं और उत्कृष्ट सुझावों पर तुरन्त गौर भी फरमाना चाहिए।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।


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