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सोमवार, 24 दिसंबर 2012

खतरे में पड़ती नारी अस्मिता !!

विडम्बना 
 खतरे में पड़ती नारी अस्मिता !! 
-राजेश कश्यप 
भाजपा की शीर्ष नेत्री स्मृति-ईरानी और कांग्रेस सांसद संजय निरूपम के बीच हुए विवाद की जितनी भी निन्दा की जाए, कम है। इस विवाद ने कई गंभीर सवालों को न केवल जन्म दिया है, बल्कि एक नारी के प्रति असंवेदनशील होती राजनीति के काले चेहरे को भी बेनकाब कर दिया है। इस विषय पर गहराई में जाने से पहले, ताजा मामले पर प्रकाश डालना सर्वथा उचित होगा। दरअसल, मामला 20 दिसम्बर की शाम का है। हाल ही में हुए गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावांे के परिणामों पर टेलीविजन चैनलों पर राजनीतिकों के बीच विश्लेषणात्मक बहस हो रही थी। इनमें से एक टेलीविजन चैनल एबीपी न्यूज पर भी इसी विषय पर लाईव बहस जारी थी, जिसमें भाजपा की तरफ से स्मृति ईरानी, कांग्रेस की तरफ से संजय निरूपम, स्वतंत्रत विश्लेषक के तौरपर सपा के पूर्व महासचिव और पत्रकार शाहिद सिद्दकी चर्चा में भाग ले रहे थे। इसी बीच कांग्रेस के प्रवक्ता और सांसद संजय निरूपम आपा खो बैठे और उन्होंने स्मृति ईरानी पर अशोभनीय व्यक्तिगत कटाक्ष करने शुरू कर दिए। बहस के संचालक ने बार-बार संजय से इस तरह के व्यक्तिगत व अशोभनीय आक्षेप न लगाने की गुजारिश की। इसके बावजूद, संजय निरूपम नहीं संभले और उन्होंने एक नारी के प्रति बरती जाने वाली मर्यादा को भी तार-तार करते हुए उनके निजी चरित्र पर ही बेहद गंभीर सवालिया निशान लगा दिये। स्मृति ईरानी ने इस पर सख्त ऐतराज जताया। मामले की गंभीरता को देखते हुए एबीपी न्यूज के संचालक ने तत्काल इस बहस को विराम देने की आड़ में समाप्त कर दिया और संजय निरूपम की टिप्पणियों पर चैनल के इत्तफाक न रखने का स्पष्ट ऐलान भी कर दिया।
इस नवीनतम विवाद ने सभ्य समाज को सकते में डालकर रख दिया है और कई गंभीर और सुलगते सवालों को जन्म दे दिया है। क्या संजय निरूपम ने इस तरह के अमर्यादित, अनैतिक, गैरकानूनी और अशोभनीय आक्षेप पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लगाए हैं या फिर गुजरात में नरेन्द्र मोदी द्वारा हैट्रिक जमाने और कांग्रेस की करारी हार के कारण बौखलाहट का परिणाम थीं? कारण चाहे जो भी हांे, क्या यह प्रकरण एक जनप्रतिनिधि के लिए बेहद शर्मनाक नहीं है? क्या इससे स्पष्ट नहीं झलकता कि संजय निरूपम की नारी के प्रति क्या इज्जत, मर्यादा और मानसिकता हो सकती है? वे आखिर यह क्यों भूल गए कि वे जिस नारी को अपने आवेश और आक्रोश का शिकार बनाते हुए मर्यादा की हर हद पार कर रहे हैं और उनके इस आचरण से एक सभ्य समाज को शर्मिन्दा भी होना पड़ सकता है? क्या संजय के इस असभ्य आचरण ने कांग्रेस पार्टी के लिए भी गंभीर नैतिक संकट नहीं खड़ा कर दिया है। इससे पहले संजय निरूपम में बिग बॉस प्रतिभागी संभावना सेठ पर भी टेलीविजन पर बातचीत के दौरान उनके कैरियर के संदर्भ में आक्षेप लगाए थे। इसका मतलब, क्या यह नहीं निकलता कि कहीं न कहीं संजय निरूपम की मानसिकता नारी विरोधी है? यदि ऐसा है तो क्या उन्हें एक जन-प्रतिनिधि के दायरे में रखना चाहिए?
इन सवालों के साथ-साथ इस प्रकरण के बाद बहस में शामिल सपा के पूर्व महासचिव और पत्रकार शाहिद सिद्दी की दो टूक और बेलाग टिप्पणियां भी विषय की गंभीरता का सहज अहसास कराती हैं। शाहिद सिद्दकी ने बहस के दौरान भी संजय निरूपम की भाषा पर ऐतराज जताया था। बाद में उन्होंने स्पष्ट तौरपर कहा कि संजय निरूपम की टिप्पणी अनुचित थी। उन्हें माफी मांगनी चाहिए। अगर संसद सदस्य इस तरह का व्यवहार करेंगे तो हम दूसरों से क्या उम्मीद करेंगे? अगर संसद सदस्य महिलाओं का सम्मान नहीं करेगा तो जिस तरह के रेप केस होते रहे हैं, वे आगे भी होते रहेंगे। शाहिद सिद्दकी की यह प्रतिक्रिया निश्चित तौरपर जन-प्रतिनिधियों को बहुत बड़ा संदेश देती है।
इस प्रकरण के अगले ही दिन भाजपा ने प्रेस कांफ्रेंस करके संजय निरूपम के इस आचरण पर सख्त रूख अपनाने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही श्रीमती सोनिया गांधी को आवश्यक कार्यवाही करने और माफी मांगने के लिए कहा गया। प्रेस कांफ्रेंस में भाजपा के वरिष्ठ नेता रवि शंकर प्रसाद द्वारा ऐसा न होने पर संजय का हर स्तर पर विरोध करने के साथ-साथ सोनिया गांधी के खिलाफ भी अभियान चलाने और उसका बहिष्कार करने की घोषणा की गई। यह सब स्वभाविक तो था ही, साथ ही बहुत जरूरी भी था। इस प्रकरण में केवल स्मृति ईरानी से माफी मांगने से काम नहीं चलना चाहिए। यह मसला पूरी नारी जाति की गरिमा से जुड़ा हुआ है। इसलिए पूरी नारी जाति से माफी मांगी जानी चाहिए और कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को देश को यह विश्वास भी दिलाना चाहिए कि भविष्य में उसके किसी सदस्य द्वारा इस तरह का असभ्य आचरण बिल्कूल नहीं होगा। यह विश्वास कांग्रेस को संजय निरूपम पर सख्त अनुशासनात्मक कार्यवाही करके दिलाना चाहिए।
बेहद विडम्बना का विषय है कि देश में नारी सशक्तिकरण के नाम पर निरन्तर छलावा हो रहा है। संसद में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के नाम पर संकीर्ण सियासत चलाई जा रही है। महिलाओं के नेतृत्व में ही महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चत नहीं हो पा रही है। एक तरफ तो देश में लड़कियों की संख्या कन्या-भू्रण हत्या के अभिशाप के चलते तेजी से कम होती जा रही है और दूसरी तरफ उनकें साथ छेड़छाड़ और बलात्कारों के मामलों में भारी वृद्धि होती चली जा रही है। सबसे दुर्भाग्य की बात तो यह है कि एक महिला ही महिला के दर्द को नहीं समझ पा रही है। जब वर्ष 2011 मंे उत्तर प्रदेश में सुश्री मायावती की सरकार थी तो प्रतिदिन दलित महिलाओं व लड़कियों के साथ बलात्कार के मामले प्रकाश में आ रहे थे। यू.पी. में होने वाले बलात्कारों की संख्या ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। जब इस मसले पर मायावती से प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने तपाक से कहा कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। उनसे बढ़कर तो दिल्ली में बलात्कार हो रहे हैं। क्या यह प्रतिक्रिया एक नारी के प्रति दूसरी नारी की संवेदनहीनता को नहीं दर्शाता? पिछले दिनों हरियाणा में एक बाद एक होने वाले बलात्कारों ने पूरे देश का ध्यान आकृष्ट किया। हरियाणा में प्रतिदिन औसतन दो से तीन बलात्कारों की घटनाओं ने स्थिति को बेहद गंभीर बना दिया और लॉ एण्ड ऑर्डर पर भी सवालिया निशान लगा दिया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी हरियाणा के जीन्द जिले के सच्चा खेड़ा में बलात्कार का शिकार एक दलित लड़की का हालचाल जानने पहुँची। पीड़ित परिवार से मिलने के बाद श्रीमती सोनिया गाँधी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि यह कोई गंभीर बात नहीं है, इस तरह के मामले तो देशभर में हो रहे हैं। श्रीमती सोनिया गाँधी की इस टिप्पणी से न केवल पीड़ित परिवार के प्रति जताई गई सहानुभूति संदेह के दायरे में आ गई, बल्कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के प्रति उनकीं संवेदनहीनता भी स्पष्ट हो गई। जब उनकीं इस प्रतिक्रिया के संदर्भ में योगगुरू बाबा रामदेव ने पूछा कि यदि पीड़िता की तरह ही उसकी बेटी के साथ ऐसा व्यवहार (बलात्कार) हुआ होता तो क्या तब भी वे यही बयान देती? कमाल की बात यह रही कि इसके प्रत्युत्तर में भी कांग्रेस की एक महिला सांसद ने अशोभनीय टिप्पणी करते हुए कहा कि बाबा से पूछना चाहिए कि उसकी कौन सी बेटी है? उसकी कौन सी बेटी से बलात्कार हुआ है? क्या यह नारी के प्रति नारी की उपेक्षा का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण नहीं है?
देश के महानगरों में महिलाओं की सुरक्षा पर भी कई बार गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। हाल ही में दिल्ली में पैरा-मैडीकल छात्रा के साथ चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार ने एक सभ्य समाज को न्याय माँगने और राजनीतिकों को जगाने के लिए सड़कों पर उतरने के लिए विवश होना पड़ा है। विडम्बना देखिए, दिल्ली में भी श्रीमती शीला दीक्षित के रूप में एक महिला मुख्यमंत्री हैं, इसके बावजूद दिल्ली में लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा निरन्तर तार-तार हो रही है। उससे बढ़कर दुर्भाग्य का विषय है कि सत्तारूढ़ केन्द्रीय सरकार यूपीए-दो का नेतृत्व भी एक महिला, श्रीमती सोनिया गाँधी ही कर रही हैं। इसके बावजूद देश में महिलाओं के अपहरण, छेड़छाड़, यौनाचार, बलात्कार, ब्लैक-मेलिंग के मामले निरन्तर बढ़ते ही चले जा रहे हैं।
यदि आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो एक बेहद भयानक और डरावनी तस्वीर उभरकर सामने आती है। इस समय देश में हर बीस मिनट में एक दुष्कर्म और हर 25 मिनट में छेड़छाड़ हो रही है और हर 76 मिनट में एक नाबालिग से बलात्कार हो रहा है। दुर्भाग्यवश देश की राजधानी में हर 18 मिनट में एक बलात्कार की घटना घट रही है। सबसे बड़ी विडम्बना की बात यह है कि मात्र 26 प्रतिशत दुष्कर्म दोषियों को ही सजा मिल पा रही है। वर्ष 2011 में देशभर में कुल 7112 मामले दर्ज हुए, जबकि वर्ष 2010 में 5484 मामले दर्ज हुए थे। इस तरह से बलात्कारों में 29.7 वार्षिक बढ़ौतरी हुई। यह तो वे मामले हैं जो पुलिस थानों में दर्ज हुए हैं। इससे अधिक तो भारी सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक दबाओं और शर्म व इज्जत के चलते दर्ज ही नहीं हो पाते। ऐसे में स्थिति की गंभीरता को सहज समझा जा सकता है। 
सबसे बड़ी गंभीर बात तो यह है कि जिन जन-प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसी अभेद, अचूक व कड़ी कानूनी व्यवस्था बनाएं कि नारी की गरिमा और उसकी इज्जत पर हाथ डालने वाले वहशी दरिन्दे सौ बार नहीं, हजार बार सोचें। उन्हीं जन-प्रतिनिधियांे में भी ऐसे वहशी दरिन्दे शामिल हैं, जिन पर बलात्कार और यौन शोषण जैसे गंभीर आरोप लगे हुए हैं। नैशनल इलेक्शन वॉच के आंकड़ों के अनुसार इस समय देश में छह विधायक ऐसे भी हैं, जिनपर बलात्कार जैसे संगीन आरोप हैं। इसके साथ ही 35 विधायकों और दो सांसदों पर भी महिलाओं से छेड़छाड़ करने और मारपीट करने के आरोप हैं। ऐसे में क्या जन-प्रतिनिधियों की निष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वभाविक नहीं है? क्या बलात्कारों के मसले पर नेताओं के गैर-जिम्मेदाराना बयान किसी अमानवीय बलात्कार से कम कहे जा सकते हैं? ऐसे ही असंख्य ज्वलंत सवाल हैं, जिनके जवाब पूरा देश जानना चाहता है। 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

‘कन्या दिवस’ को समर्पित किया 12.12.2012


‘कन्या दिवस’ को समर्पित किया 12.12.2012

कन्या दिवस मनाता कश्यप परिवार।

कन्या दिवस की शुरूआत करते हुए राजेश कश्यप, अपनी पत्नी सीमा के साथ।

कन्या दिवस कार्यक्रम में अपनी बिटिया स्वाति के साथ राजेश कश्यप।


12.12.2012, रोहतक।

‘12.12.2012’ के ऐतिहासिक तिथि से प्रतिवर्ष इस दिन ‘कन्या दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। ये घोषणा हरियाणा कश्यप राजपूत सभा के सांस्कृतिक एवं साहित्यक सैल के चेयरमैन एवं जिला रोहतक के प्रधान राजेश कश्यप ने करते हुए कहा कि कन्या सृष्टि का आधार हैं और देश व प्रदेश में निरन्तर कन्याओं की घटती संख्या अत्यन्त चिन्ता एवं चुनौती का विषय है। श्री कश्यप ने कहा कि बेटियां किसी भी क्षेत्र में बेटों से कम नहीं हैं। हमें लड़के-लड़की के प्रति अपनी रूढ़िवादी सोच को बदलना होगा और लड़कियों के अभाव के कारण पैदा होने जा रहे भावी भयंकर खतरों से समाज को बचाना होगा। युवा समाजसेवी राजेश कश्यप ने अपनी नन्हीं बिटिया स्वाति कश्यप के तीसरे जन्मदिन के अवसर पर टिटौली में आयोजित ‘कन्या दिवस’ के कार्यक्रम में समाज से आह्वान किया कि वे प्रतिवर्ष 12 दिसम्बर को ‘कन्या दिवस’ के रूप में कन्याओं को समर्पित करें और उनके कल्याण से संबंधित विभिन्न पहलूओं पर गंभीर विचार-मन्थन करें। इसके साथ ही उन्होंने कन्याओं की कोख में हो रही हत्याओं को रोकने में सबको अपना योगदान देने के लिए प्रेरित किया।

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

दलितों और पिछड़ों के मसीहा थे डॉ भीमराव अम्बेडकर

6 दिसम्बर / महापरिनिर्वाण दिवस विशेष


 दलितों और पिछड़ों के मसीहा थे डॉ भीमराव अम्बेडकर 
-राजेश कश्यप 
जाति-पाति, छूत-अछूत, ऊँच-नीच आदि विभिन्न सामाजिक कुरीतियों के दौर में एक ऐसी असाधारण शख्सियत का अवतरण इस धरती पर हुआ, जिसने समाज में एक नई क्रांतिकारी चेतना व सोच का सूत्रपात किया। वह महान शख्सियत थी, डा. भीमराव रामजी अम्बेडकर। उन्नीसवीं सदी में देश में छूत-अछूत, जाति-पाति, धर्म-मजहब, ऊँच-नीच आदि कुरीतियों का स्थापित साम्राज्य चरम सीमा पर जा पहुंचा था। देश में मनुवादी व्यवस्था के बीच समाज को ब्राहा्रण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में विभाजित था। शूद्रों में निम्न व गरीब जातियों को शामिल करके उन्हें अछूत की संज्ञा दी गई और उन्हें नारकीय जीवन जीने को विवश कर दिया गया। उन्हें छुना भी भारी पाप समझा गया। अछूतों को तालाबों, कुंओं, मंदिरों, शैक्षणिक संस्थाओं आदि सभी जगहों पर जाने से एकदम वंचित कर दिया गया। इन अमानवीय कृत्यों की उल्लंघना करने वाले को कौड़ों, लातों और घूसों से पीटा जाता, तरह-तरह की भयंकर यातनाएं दी जातीं। निम्न जाति के लोगों से बेगार करवाई जातीं, मैला ढुलवाया जाता, गन्दगी उठवाई जाती, मल-मूत्र साफ करवाया जाता, झूठे बर्तन साफ करवाए जाते और उन्हें दूर से ही नाक पर कपड़ा रखकर अपनी जूठन खाने के लिए दी जाती व बांस की लंबी नलिकाओं से पानी पिलाया जाता। खांसने व थूकने के लिए उनके मुंह पर मिट्टी की छोटी कुल्हड़ियां बांधने के लिए विवश किया जाता। जिस स्थान पर कथित अछूत बैठते उसे बाद में उस स्थान को पानी से कई बार धुलवाया जाता।
अत्यन्त कुटिल व मानवता को शर्मसार कर देने वाली परिस्थितियों के बीच दलितों, पिछड़ों और पीड़ितों के मुक्तिदाता और मसीहा बनकर अवतरित हुए डा. भीमराव रामजी अम्बेडकर जी का जन्म 14 अपै्रल, 1891 को मध्य प्रदेश में इंदौर के निकट महू छावनी में एक महार जाति के परिवार में हुआ। उनका पैतृक गाँव रत्नागिरी जिले की मंडणगढ़ तहसील के अंतर्गत आम्ब्रावेडे था। उनके पिता का नाम रामजी राव व दादा का नाम मालोजी सकपाल था। वे अपने पिता की चौदह संतानों, 11 लड़कियों व 3 लड़कों में चौदहवीं संतान थे। उस समय पूर्व के 13 बच्चों में से केवल चार बच्चे बलराम, आनंदराव, मंजुला व तुलासा ही जीवित थे। शेष बच्चों की अकाल मृत्यु हो चुकी थी। समाज जाति-पाति, ऊँच-नीच और छूत-अछूत जैसी भयंकर कुरीतियों के चक्रव्युह में फंसा हुआ था, जिसके चलते महार जाति को अछूत समझा जाता था और उनसे घृणा की जाती थी। ऐसे विकट और बुरे दौर में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम भीमराव एकपाल उर्फ ‘भीमा’ था। उनके पिता जी फौज में नौकरी करते थे और कबीर पंथ के बहुत बड़े अनुयायी थे। उनकीं माता श्रीमती भीमाबाई भी धार्मिक प्रवृति की घरेलू महिला थीं। 20 नवम्बर, 1896 में मात्र 5 वर्ष की आयु में ही माता का साया उनके सिर से उठ गया था। इसके बाद उनकी बुआ मीरा ने चारों बहन-भाईयों की देखभाल की।
भीमराव ने प्रारंभिक शिक्षा सतारा की प्राथमिक पाठशाला में हासिल की। 7 नवम्बर, 1900 को उनका दाखिला सतारा के गवर्नमेंट वर्नाक्यूलर हाईस्कूल में करवाया गया। वे बचपन से ही अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के थे और हर परीक्षा में अव्वल स्थान पर रहते थे। इसके बावजूद सामाजिक कुरीतियों के चलते उन्हें अछूत के नाम पर प्रतिदिन अनेक असहनीय अपमानों और यातनाओं का सामना करना पड़ता था। लेकिन, बालक भीमराव एकदम विपरीत सामाजिक परिस्थितियों के बीच अनवरत रूप से अपने शिक्षा-अर्जन के कार्य में लगे रहे और बहुत अच्छे अंकों के साथ उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्ष 1907 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनकीं अनूठी प्रतिभा से प्रभावित होकर एक चहेते व सामाजिक संकीर्णताओं से मुक्त ब्राहा्रण शिक्षक ने उन्हें ‘अम्बेडकर’ उपनाम दिया, जोकि आगे चलकर उनके मूल नाम का अभिन्न हिस्सा बन गया। वर्ष 1908 में वे मात्र 17 वर्ष की आयु में रमाबाई के साथ विवाह-सूत्र में बंध गए। विवाह बंधन में बंधने के बावजूद उन्होंने मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से एफ.ए. अर्थात इंटरमीडिएट और बड़ौदा के महाराजा द्वारा प्रदत्त 25 रूपये प्रतिमाह छात्रवृति के बलबूते वर्ष 1912 में बी.ए. की परीक्षा बहुत अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण की। 12 दिसम्बर, 1912 को उन्हंे यशवतं नामक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।
2 फरवरी, 1913 को पिता के देहान्त के बाद भीमराव अम्बेडकर को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और पारिवारिक दायित्व के निर्वहन के लिए नौकरी करने को विवश होना पड़ा। लेकिन, थोड़े समय बाद ही उन्हें बड़ौदा के महाराजा की कृपा पुनः प्राप्त हुई और उन्हें उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए विदेश जाने का सौभाग्य मिला। वे एस.एस. अकोना जहाज से अमेरिका के लिए रवाना हुए और 23 जुलाई, 1913 को न्यूयार्क जा पहुंचे। वहां जाकर उन्हांेने कोलम्बिया विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया। उन्होंने वर्ष 1915 में एम.ए. की डिग्री और 10 जून, 1916 को अर्थशास्त्र में अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. पूरी की। हालांकि नियमानुसार उनका शोध धनाभाव के चलते आठ वर्ष बाद प्रकाशित होने के कारण पी.एच.डी डिग्री वर्ष 1924 में ही हासिल हो सकी। वे इसी वर्ष वास्तव में डॉ. भीमराव अम्बेडकर बने।
उन्होंने वर्ष 1916 में प्रख्यात ‘लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिकल एण्ड पॉलीटिकल साइंस’ में दाखिला ले लिया। अचानक छात्रवृति रोक दिए जाने से उन्हें पढ़ाई के बीच में ही 21 अगस्त, 1917 को स्वदेश लौटने को विवश होना पड़ा। भारत लौटकर उन्होंने पूर्व में हस्ताक्षरित अनुबंध के अनुसार महाराजा बड़ौदा की सेना में सैन्य सचिव के पद पर नौकरी करनी पड़ी। इस अत्यन्त सम्मानजनक पद पर रहने के बावजूद उन्हें अछूत के रूप में निरन्तर अपमान और तिरस्कार के दंश को झेलना पड़ा। अंततः उन्होंने इस पद को छोड़ दिया। इसके बाद वे एक निजी ट्यूटर व लेखाकार के रूप में काम करने लगे। बाद में उन्हें परिचित मित्रों के सहयोग से नवम्बर, 1918 में बंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एण्ड इकोनोमिक्स में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गई।
इसी दौरान वर्ष 1920 में ही सौभाग्यवश उन्हें महाराजा कोल्हापुर द्वारा प्रदत्त छात्रवृति हासिल हो गई और उन्होंने 5 जुलाई, 1920 को प्रोफेसर के पद को छोड़ दिया। वे पुनः ‘लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिकल एण्ड पॉलीटिकल साइंस’ में अपनी अधूरी पढ़ाई पूर्ण करने मे लिए लंदन जा पहुंचे और सितम्बर, 1920 से अपनी पढ़ाई शुरू कर दी। जनवरी, 1923 में उन्हें डी.एस.सी. अर्थात डॉक्टर ऑफ साईंस की उपाधि प्रदान की गई। लंदन के ‘गेज इन’ से उन्होंने बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे 3 अपै्रल, 1923 में डॉक्टर ऑफ साईंस, पी.एच.डी. और बार एट लॉ जैसी कई बड़ी उपाधियांे के साथ स्वदेश लौटे। स्वदेश लौटकर उन्होंने मुंबई में वकालत के साथ-साथ अछूतों पर होने वाले अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाना शुरू कर दिया। अपने आन्दोलन को अचूक, कारगर व व्यापक बनाने के लिए उन्होंने ‘मूक नायक’ पत्रिका भी प्रकाशित करनी शुरू की। उनके प्रयासों ने रंग लाना शुरू किया और वर्ष 1927 में उनके नेतृत्व में दस हजार से अधिक लोगों ने एक विशाल जुलूस निकाला और ऊँची जाति के लिए आरक्षित ‘चोबेदार तालाब’ के पीने के पानी के लिए सत्याग्रह किया और सफलता हासिल की। इसी वर्ष उन्होंने ‘बहिष्कृत भारत’ नामक एक पाक्षिक मराठी पत्रिका का प्रकाशन करके अछूतों में स्वाभिमान और जागरूकता का अद्भूत संचार किया। देखते ही देखते वे दलितों व अछूतों के बड़े पैरवीकार के रूप में देखे जाने लगे। इसी के परिणास्वरूप डॉ. भीमराव अम्बेडकर को वर्ष 1927 में मुंबई विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया। इसी तरह उन्हें पुनः 1932 में भी परिषद का मनोनीत सदस्य चुना गया। विधान परिषद में उन्होंने दलित समाज की वास्तविक स्थिति को न केवल उजागर किया, बल्कि शोषित समाज की आवाज को बखूबी बुलन्द किया।
वर्ष 1929 में उन्होंने ‘समता समाज संघ’ की स्थापना की। अगले वर्ष 1930 में उन्होंने नासिक के कालाराम मंन्दिर में अछूतों के प्रवेश की पाबन्दी को हटाने के लिए जबरदस्त सत्याग्रह किया। इसके साथ ही दिसम्बर, 1930 में ‘जनता’ नाम से तीसरा पत्र निकालना शुरू किया। वर्ष 1931 में उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के विरोध के बावजूद दूसरी गोलमेज कांफ्रेंस में दलितों के लिए अलग निर्वाचन का अधिकार प्राप्त करके देशभर में हलचल मचा दी। गांधी जी के अनशन के बाद डॉ. अम्बेडकर व कांग्रेस के बीच 24 सितम्बर, 1932 को ‘पूना पैक्ट’ के नाम एक समझौता हुआ और डॉ. अम्बेडकर को भारी मन से कई तरह के दबावों के चलते दलितों के लिए अलग निर्वाचन की माँग वापस लेना पड़ा। लेकिन, इसके जवाब में उन्होंने वर्ष 1936 में ‘इंडिपेंडंेट लेबर पार्टी’ की स्थापना करके अपने घोषणा पत्र में अछूतों के उत्थान का स्पष्ट एजेण्डा घोषित कर दिया। अब शोषित समाज डॉ. अम्बेडकर को अपने मसीहा के रूप में देखने लग गया था। इसी के परिणास्वरूप वर्ष 1937 के आम चुनावों में डॉ. अम्बेडकर को भारी बहुमत से अभूतपूर्व विजय हासिल हुई और कुल 17 सुरक्षित सीटों में से 15 सीटें नवनिर्मित ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ के खाते में दर्ज हुईं। वे 12 वर्ष तक बम्बई में विधायक रहे। इसी दौरान वे बम्बई कौंसिल से ‘साईमन कमीशन’ के सदस्य चुने गए। उन्होंने लंदन में हुई तीन गोलमेज कांफ्रेंसों में भारत के दलितों का शानदार प्रतिनिधित्व करते हुए दलित समाज को कई बड़ी उपलब्धियां दिलवाईं।
दलितों के मसीहा डॉ. भीमराव अम्बेडकर का भारतीय राजनीति में कद बहुत ऊँचाई पर जा पहुंचा। वर्ष 1942 में उन्हें गर्वनर जनरल की काऊंसिल का सदस्य चुन लिया गया। उन्होंने शोषित समाज को शिक्षित करने के उद्देश्य से 20 जुलाई, 1946 को ‘पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी’ नाम की शिक्षण संस्था की स्थापना की। इसी सोसायटी के के तत्वाधान में सबसे पहले बम्बई में सिद्धार्थ कालेज शुरू किया गया और बाद में उसका विस्तार करते हुए कई कॉलेजों का समूह बनाया गया। ये कॉलेज समूह आज भी शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणीय भूमिका निभा रहे हैं। 15 अगस्त, 1947 को देश को लंबे समय के बाद स्वतंत्रता नसीब हुई। 29 अगस्त, 1947 को डॉ. भीमराव अम्बेडकर को संविधान निर्मात्री सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष पद पर सुशोभित किया गया। अपनी टीस के चलते ही उन्होंने संविधान में यह प्रावधान रखा कि, ‘किसी भी प्रकार की अस्पृश्यता या छुआछूत के कारण समाज में असामान्य उत्पन्न करना दंडनीय अपराध होगा’। इसके साथ ही उन्होंने अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों में आरक्षण प्रणाली लागू करवाने में भी सफलता हासिल की। उन्होंने महिलाओं की सामाजिक व आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने पर पर बराबर बल दिया। 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया और इसे 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया। इस संविधान के पूरा होने पर डॉ. अम्बेडकर के आत्मिक उद्गार थे कि, ‘‘मैं महसूस करता हूँ कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है, पर साथ ही इतना मजबूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था, बल्कि इसका उपयोग करने वाला अधम था।’’
वर्ष 1948 में उनका दूसरा विवाह सविता अम्बेउकर के साथ हुआ। आगे चलकर वर्ष 1949 में उन्हें स्वतंत्र भारत का प्रथम विधिमंत्री बनाया गया। वर्ष 1950 में डॉ. अम्बेडकर श्रीलंका के ‘बौद्ध सम्मेलन’ में भाग लेने के लिए गए और बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों से अत्यन्त प्रभावित होकर स्वदेश लौटे। उन्होंने वैचारिक मतभेदों के चलते वर्ष 1951 में विधिमंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया। डॉ. अम्बेडकर वर्ष 1952 के आम चुनावों में हार गए। इसके बावजूद वे वर्ष 1952 से वर्ष 1956 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। अत्यन्त कठिन व अडिग संघषों के उपरांत, उनके मन में यह मलाल विष का रूप धारण कर चुका था कि वे शोषित समाज के उत्थान व समृद्धि के लिए जो अपेक्षाएं भारत सरकार से रखते थे, उनपर भारत सरकार खरा नहीं उतरीं और अपनी इच्छाओं को पूरा करने में वे पूरी तरह कामयाब नहीं हो सके। इससे बढ़कर, देश मंे कानून बनने के बावजूद दलितों व शोषितों की दयनीय स्थिति देखकर उन्हें बेहद कुंठा व वेदना का गहरा अहसास हुआ। देश व समाज में दलितों, शोषितों व अछूतों को अन्य जातियों के समकक्ष लाने के लिए डॉ. अम्बेडकर ने बहुत लंबा गहन अध्ययन और मंथन किया। इसके उपरांत उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि एकमात्र बौद्ध धर्म ही ऐसा है, जो दलितों को न केवल सबके बराबर ला सकता है, बल्कि अछूत के अभिशाप से भी हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति दिला सकता है।
इसी निष्कर्ष को अमलीजामा पहनाने के लिए उन्होंने 1955 में ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ की स्थापना की और 14 अक्तूबर, 1956 में अपने 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर एक नए युग का सूत्रपात कर दिया। उनका मानना था कि अछूतों के उत्थान और पूर्ण सम्मान के लिए यही एकमात्र अच्छा रास्ता है। इस अवसर पर उन्होंने 22 प्रतिज्ञाएं भी निर्धारित कीं, ये प्रतिज्ञाएं हिन्दू समाज की कुरीतियों व आडम्बरों पर गहरा आघात करने वाली हैं।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर बहुत बड़े युगदृष्टा थे। उन्होंने अछूतों व दलितों की मुक्ति के अभिशाप की थाह और उससे मुक्ति की राह स्पष्ट रूप से देख ली थी। इसीलिए, उन्होंने आजीवन गरीबों, मजदूरों, अछूतों, दलितों, पिछड़ों और समाज के शोषित वर्गों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आदि हर क्षेत्र में बराबर का स्थान दिलाने के लिए अनूठे संघर्ष किए और अनंत कष्ट झेले। उन्होंने समाजसेवक, शिक्षक, कानूनविद्, पदाधिकारी, पत्रकार, राजनेता, संविधान निर्माता, विचारक, दार्शनिक, वक्ता आदि अनेक रूपों में देश व समाज की अत्यन्त उत्कृष्ट व अनुकरणीय सेवा की व अपनी अनूठी छाप छोड़ी। महामानव डॉ. भीमराव अम्बेडकर को देश व समाज के लिए उनके आजीवन समग्र योगदान को नमन करते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1990 में देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत-रत्न’ से अलंकृत किया।
उन्होंने अपने जीवन में दर्जनों महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी पुस्तकों और ग्रन्थों की रचनाएं कीं। इन पुस्तकों में ‘कास्ट्स इन इण्डिया’, ‘स्मॉल होल्डिंग्स इन इण्डिया एण्ड देयर रेमिडीज’, ‘दि प्राबल्म ऑफ दि रूपी’, ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’, ‘मिस्टर गांधी एण्ड दि एमेन्सीपेशन ऑफ दि अनटचेबिल्स’, ‘रानाडे, गांधी एण्ड जिन्ना’, ‘थॉट्स आन पाकिस्तान’, ‘वाह्ट कांग्रेस एण्ड गांधी हैव इन टु दि अनटचेबिल्स’, ‘हू वेयर दि शूद्राज’, ‘स्टेट्स एण्ड माइनारिटीज’, ‘हिस्ट्री ऑफ इण्डियन करेन्सी एण्ड बैंकिंग’, ‘दि अनटचेबिल्स’, ‘महाराष्ट्र एज ए लिंग्विस्टिक स्टेट’, ‘थाट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स’ आदि शामिल थीं। कई महत्पूर्ण पुस्तकें उनके जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हो पाईं। इन पुस्तकों में ‘लेबर एण्ड पार्लियामेन्ट्री डेमोक्रेसी’, ‘कम्युनल डेडलॉक एण्ड ए वे टु साल्व इट’, ‘बुद्ध एण्ड दि फ्ूचर ऑफ पार्लियामेंट डेमोक्रेसी’, ‘एसेशिंयल कन्डीशंस प्रीसीडेंट फॉर दि सक्सेसफुल वर्किंग ऑफ डेमोक्रेसी’, ‘लिंग्विस्टिक स्टेट्स: नीड्स फॉर चेक्स एण्ड बैलेन्सज’, ‘माई पर्सनल फिलॉसफी’, ‘बुद्धिज्म एण्ड कम्युनिज्म’, ‘दि बुद्ध एण्ड हिज धम्म’ आदि शामिल हैं।
युगदृष्टा व दलितों और पिछड़ांे के इस मसीहा ने देश में नासूर बन चुकी छूत-अछूत, जाति-पाति, ऊँच-नीच आदि कुरीतियों के उन्मुलन के लिए अंतिम सांस तक अनूठा और अनुकरणीय संघर्ष किया। उन्होंने 6 दिसम्बर, 1956 को अपने अनंत संघर्ष की बागडोर नए युग के कर्णधारों के हाथों सौंप, महापरिनिर्वाण को प्राप्त हो गए। इस महान आत्मा को कोटि-कोटि नमन।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)