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रविवार, 31 जनवरी 2016

वर्तमान परिपेक्ष्य में चौधरी रणबीर सिंह की प्रासंगिकता

1 फरवरी  / पुण्यतिथि  विशेष
वर्तमान परिपेक्ष्य में चौधरी रणबीर सिंह की प्रासंगिकता
-राजेश कश्यप* 
 चौधरी रणबीर सिंह एक महान स्वतंत्रता सेनानी, संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य, सच्चे गाँधीवादी, विशिष्ट समाजसेवी, आर्यमाजी और प्रबुद्ध शख्सियत के साथ-साथ एक अनूठे दूरदृष्टा भी थे। यही वह मूल कारण है जिसके कारण उनकी प्रासंगिकता आज भी कायम है। चौधरी साहब ने दशकों पहले ही राष्ट्र को उन सभी समस्याओं और विकट परिस्थितियों से अवगत करवा दिया था, जिनसे आज देश बुरी तरह से जूझ रहा है। आजकल देश में जनप्रतिनिधियों के प्रति जनता में बढ़ता अविश्वास, जातिपाति-धर्म-मजहब की संकीर्ण राजनीति, राज्यों के विभाजन, जमीन अधिग्रहण पर बवाल, आरक्षण की संकीर्ण सियासत, ऑनर किलिंग, किसानों की आत्महत्या, फसलों का उचित मुआवजा न मिलना, काला धन आदि अनेक समस्याएं विकट चुनौती बनी खड़ी हैं और उनका समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा है। देश के बहुत बड़े चिन्तक, विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री एवं नीति-निर्माता इन समस्याओं के समाधान के लिए माथापच्ची कर रहे हैं, लेकिन परिणाम शून्य है। लेकिन, देश में एक ऐसे दूरदृष्टा इंसान भी थे, जिन्होंने देश को स्वतंत्रता प्राप्ति की भोर में ही इन सभी चिन्ताओं एवं चुनौतियों से अवगत करवा दिया था। 
चौधरी रणबीर सिंह एकमात्र ऐसे नेता हुए, जिन्होंने सात अलग-अलग सदनों में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करके लोकतांत्रिक इतिहास में एक नया रिकार्ड़ बनाया। वे 1947 से 1950 तक संविधान सभा के सदस्य, 1948 से 1949 संविधान सभा विधायिका के सदस्य, 1950 से 1952 अस्थाई लोकसभा के सदस्य, 1952 से 1962 पहली तथा दूसरी लोकसभा के सदस्य, 1962 से 1966 संयुक्त पंजाब विधानसभा के सदस्य, 1966 से 1967 और 1968 से 1972 तक हरियाणा विधानसभा के सदस्य और 1972 से 1978 तक राज्य सभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए। उन्होंने इन सात विभिन्न सदनों में ठोस तर्कों के साथ खासकर ग्रामीण भारत से जुड़े मुद्दों पर बहस की और दूरगामी नीतियों के निर्माण पर जोर दिया। चौधरी साहब का स्पष्ट रूप से मानना था कि देश की 80 प्रतिशत जनता गाँवों में निवास करती है और देश की आत्मा गाँवों में ही बसती है। इसीलिए, वे ग्रामीण भारत की नींव से लेकर निर्माण तक की मजबूती के लिए आवाज बुलन्द करना अपने जीवन का मुख्य ध्येय मानते थे।
एक आदर्श जनप्रतिनिधि में कौन-कौन से गुण होने चाहिएं? यह सवाल आज के दौर में ही नहीं, बल्कि पाँचवें दशक में भी उठ चुका है। इस सन्दर्भ में 4 अपै्रल व 23 नवम्बर, 1950 को चौधरी रणबीर सिंह ने अंतरिम संसद में जो विचार व्यक्त किए, वो आज की जनता की कसौटी पर एकदम खरे उतरते हैं। तब चौधरी साहब ने सुझाव दिए थे कि ‘‘सांसद अथवा विधायक बनने के लिए आवश्यक योग्यता देश की सेवा होनी चाहिए। सदन का सदस्य होने से पहले देश और उन लोगों की सेवा करनी चाहिए, जिसका प्रतिनिधित्व वह करना चाहता है। संसद को ऐसे आदमी की आवश्यकता है, जो प्रशासनिक क्षमता रखता हो, बुद्धि रखता हो, मामले को जल्द समझ सकता हो और अभिव्यक्ति की काबलियत रखता हो। यदि सांसद अथवा विधायक की योग्यता यह रख दी जाए कि जो कोई कम से कम पाँच, सात या दस एकड़ नई जमीन को आबाद न करे और काश्त में न लाए तो वह सदन का सदस्य नहीं बन सकता तो इससे देश का भी बहुत भला होगा।’’
चौधरी रणबीर सिंह जनप्रतिनिधियों के लिए आवश्यक योग्यता देश व समाजसेवा के जज्बे को मानते थे। वे जनप्रतिनिधि बनने के लिए शिक्षित होने की शर्त अथवा योग्यता निर्धारण के एकदम खिलाफ थे। उन्होंने 4 अपै्रल, 1950 को संसदीय बहस के दौरान दो टूक कहा कि ‘‘अनपढ़ लोगों ने देश को बहुत कुछ समृद्ध किया है।’’ उन्होंने अनपढ़ों की पैरवी करते हुए 23 नवम्बर, 1950 को संसदीय बहस के दौरान एक बार फिर कहा कि ‘‘यह जरूरी नहीं है कि विद्या की बड़ी-बड़ी उपाधियां लेने वाला संसद के या सभा के सदस्य के काम में अवश्य ही कामयाब हो। बल्कि, इतिहास इस बात का साक्षी है कि हिन्दुस्तान में कई ऐसे महानुभाव, जैसे प्रताप, रणजीत सिंह और अकबर जैसे पैदा हुए, जिनके पास न कोई बड़ी उपाधियां थीं और न वे कोई पढ़े-लिखे ही थे।’’
चौधरी रणबीर सिंह ने संकीर्ण, जातिपाति, धर्म-मजहब एवं वर्ग विशेष की राजनीति करने वालों को कई बार लताड़ा और नसीहतें दीं।  उन्होंने 24 नवम्बर, 1972 को राज्यसभा में स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘यह धर्म के नाम पर जो राजनीति चलाते हैं, वह कोई अच्छा काम नहीं करते हैं।’’ इसी तरह उन्होंने 6 मार्च, 1973 को सबको नसीहत देते हुए कहा कि ‘‘सस्ते नारे से तो देश का काम नहीं चल सकता है।’’ उन्होंने राज्यसभा में कहा कि 24 जून, 1977 को कहा कि ‘‘इस देश की सेवा ही आदर्श होना चाहिए।’’ उन्होंने आगे कहा कि ‘‘मैं चाहता हूँ कि इस देश में राजनीति को भी ठीक विधि के मुताबिक चलाया जाये। अगर, आप ठीक रास्ते पर चलेंगे तो इस देश में लोकतंत्र ठीक प्रकार से कायम हो सकेगा।’’ उन्होंने राजनीतिक पार्टियों का देशहित में 28 मार्च, 1973 को आह्वान करते हुए कहा कि ‘‘इस देश की जो कांस्टीट्यूशनल परिपाटियां हैं, उनके मुताबिक चलें।’’
चौधरी रणबीर सिंह ने संसद में विभिन्न अवसरों पर वर्गविहिन समाज के निर्माण पर बल दिया। 6 नवम्बर, 1948 को उन्होंने भारतीय विधान-परिषद की बैठक में वाद-विवाद के दौरान स्पष्ट तौरपर कहा कि, ‘‘हम देश के अन्दर वर्गविहिन समाज बनाना चाहते हैं। यदि किसी को संरक्षण (आरक्षण) देना है तो उन्हीं आदमियों को देना है, जोकि किसान हैं, मजदूर हैं और पिछड़े हुए हैं।’’ उन्होंने 24 फरवरी, 1978 को राज्यसभा में स्पष्ट तौरपर कहा कि ‘‘हमारे देश में संरक्षण और आरक्षण के बगैर गरीब कभी चल नहीं सकता।’’ उन्होंने 25 अगस्त, 1961 को लोकसभा में दोहराया कि ‘‘मैं मानता हूँ कि यह जो धर्म और जातिपांत की बातें की जाती हैं, छोटी गिनती वाली जाति और बड़ी गिनती वाली जाति की बात कही जाती है, इससे देश की तरक्की होने वाली नहीं है।’’ उनका स्पष्ट तौरपर कहना था कि ‘‘जिन छोटी जातियों को उनका हक नहीं मिलता है, उनको वह मिलना चाहिये। चाहे टैक्सेशन की नीति हो या देश की दूसरी नीति हो, उसमें उनका ध्यान रखना चाहिये।’’ चौधरी साहब ने 11 दिसम्बर, 1973 को राज्यसभा के पटल पर कड़वी सच्चाई बयां करते हुए कहा कि ‘‘संविधान में यह बात मानी गयी है कि पेशे, लिंग या मजहब की बिना पर कोई पक्षपात नहीं किया जा सकता। लेकिन, इस देश में जिस तरीके से हम चल रहे हैं, उसमें मुझे ऐसा लगता है कि कुछ भेदभाव होता रहता है।’’ उन्होंने 24 अगस्त, 1961 को लोकसभा में कहा कि ‘‘हमने जब इस देश का संविधान बना था, उस वक्त हमारी कोशिश थी कि इस देश के अन्दर जो मत मतान्तर या कास्टीज्म या धर्म के नाम पर झगड़े होते हैं, वे खत्म हों। हिन्दुस्तान का वासी अपने आपको भारतीय समझना सीखे।’’
चौधरी रणबीर सिंह ने हमेशा किसानों के हितों की जबरदस्त पैरवी की। दूरदृष्टा चौधरी रणबीर सिंह ने 23 नवम्बर, 1948 को भारतीय विधान परिषद में इसी मुद्दे पर चेताया था कि, ‘‘जब तक हम उपज की कोई इकोनोमिक प्राइस मुकर्रर नहीं करेंगे, तब तक किसान के साथ बड़ा भारी अन्याय होता रहेगा। एग्रीकल्चर की चीजों की इकानामिक प्राइस मुकर्रर किये बिना किसान के आर्थिक जीवन में स्थायित्व नहीं आ सकता और उसको स्थायित्व देना बेहद जरूरी है।’’ इससे पूर्व 6 नवम्बर को इसी परिषद में किसानों पर टैक्स मसले पर बहुत बड़ा सवाल खड़ा किया था कि, ‘‘किसानों के साथ यह बहुत बड़ा अन्याय है और ऐसे देश में जिसके अन्दर किसानों का प्रभुत्व है और जो देश किसानों का ही है, उसके अन्दर उनके साथ यह अन्याय जारी रहेगा तो यह कैसा मालूम देगा?’’
चौधरी रणबीर सिंह किसान, कृषि और देहात की उपेक्षा को लेकर बेहद आक्रोशित रहते थे। उन्होंने राज्य सभा में 19 दिसम्बर, 1973 को दो टूक शब्दों में कहा कि ‘‘जिन लोगों की इस देश में 30 फीसदी आबादी है, आज उनकी हमदर्दी करने वाले सब यहां पर बैठे हैं। लेकिन, जिन लोगों की 70 फीसदी आबादी है, उनकीं हमदर्दी करने वाला कोई नहीं है।’’ 8 मई, 1974 को राज्यसभा में साफ तौर पर कहा कि ‘‘हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी इंडस्ट्री खेती है।’’ चौधरी साहब ने किसानों की बदहालत के मूल कारणों से अवगत करवाते हुए 1 अगस्त, 1975 को राज्यसभा में कहा कि ‘‘किसान की सबसे बड़ी बदकिस्मती है कि उसके लिए नीति-निर्धारण करने वाले भाई वे हैं, जो तनख्वाहदार हैं। जो वेतन लेने वाले भाई हैं, उनकी एक ही नीति है कि अगर पहली तारीख को मिलने वाली तनख्वाह, 5 तारीख तक न मिले तो वे आवाज लगाकर आसमान और जमीन एक कर सकते हैं। उन्हें ज्ञान नहीं कि कृषि की हालत क्या है?’’ इसके साथ ही उन्होंने खिन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘जो हमारे खेती के कर्णधार हैं, उन्हें देश की खेती का ज्ञान नहीं है। देश में खेती में क्या नुकसान और फायदा होता है, इसका ज्ञान उन्हें नहीं है।’’ उन्होंने 7 अपै्रल, 1951 को संसदीय बहस के दौरान बेहद कटू शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि ‘‘देश के अन्दर आज अनाज ज्यादा पैदा करने का काम उन आदमियों के जिम्मे होता है, जो यह नहीं जानते कि गेहूं का पेड़ कितना बड़ा होता है और चने का पेड़ कितना बड़ा होता है?’’  चौधरी साहब ने 1 अगस्त, 1975 को राज्यसभा में बेहद गम्भीरता के साथ कहा कि ‘‘खेती में कर्ज की हालत यह है कि दादा का लिया हुआ कर्ज पोता अदा करता है।’’
चौधरी रणबीर सिंह ने किसान एवं किसानी के प्रति सरकार द्वारा गम्भीरता न दिखाने के लिए कई बार कटु शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने 26 मार्च, 1976 को राज्यसभा में बेझिझक कहा कि ‘‘कृषि मंत्रालय में जो खेती करने वाले हैं, वे मंत्रालय के सरकारी कागजों में इतने फंस जाते हैं कि उनको कई दफा किसानों के हित की बात करते हुए शर्म आती है।’’ उन्होंने 17 अगस्त, 1976 को राज्यसभा में किसानों की दयनीय दशा से अवगत करवाते हुए कहा कि ‘‘देश में जो किसान गर्मी और सर्दी में खून व पसीना एक करके मेहनत करके कमाता है, वह खुद झोपड़ी में रहता है और जो उसके सामान की बिक्री करते हें, वे महलों में रहता है और जो कोई चीज पैदा नहीं करते हैं, वे महलों में रहते हैं। पैदा करने वाला भूखा रहता है, पैदा करने वाले के बच्चे के लिए कोई तालीम नहीं। कोई आराम नहीं। जो व्यापार करता है, सिर्फ इधर से उधर कुछ घटाता है, कुछ बढ़ाता है, कुछ गलत तोलता है, काली डंडी रखता है, काने बाट रखता है। उसके मकान और महल बनते हैं। इसके लिए सरकार को जागृत रहना जरूरी है।’’
चौधरी साहब ने खेद जताते हुए 22 जून, 1977 को राज्यसभा में कहा कि ‘‘खेती 80 प्रतिशत आदमियों का धन्धा है और उसके लिये बोलेने वाला मेरे जैसा इस सदन में अभी तक कोई नहीं उठा।’’ उन्होंने 21 नवम्बर, 1950 को संसदीय बहस के दौरान पूरी गम्भीरता के साथ कहा कि ‘‘मुझे यह कहने में शर्म नहीं है कि इस देश में जिनके हाथ में ताकत है, उनका काश्तकारों के साथ सीधा सम्बंध नहीं है।’’
 उन्होंने 3 फरवरी, 1949 को संविधान सभा (विधायी) में स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘जो शहर के रहने वाले हैं, उन्हें खेती से न कोई प्रेम है और न कोई वास्ता।’’उन्होंने 24 फरवरी, 1961 को लोकसभा में संसदीय बहस के दौरान सबको चेताया कि ‘‘आगे भी कोई ऐसा वक्त न आ जाये, जब किसानों को बचाने की जरूरत पड़े।’’चौधरी साहब ने 26 नवम्बर, 1976 को राज्यसभा में साफ तौरपर कहा कि ‘‘बिचौलियों के हाथ से हमें किसान को बचाना चाहिए।’’उन्होंने 10 मई, 1974 को राज्यसभा में किसानों के हित में सुझाव देते हुए कहा कि ‘‘आज देश के अन्दर जरूरत इस बात की है कि जितने लोग खेती पर निर्भर हैं, उनमें से कुछ आदमियों को दूसरा धन्धा दिया जाये।’’
चौधरी साहब ने फसलों के न्यूनतम मूल्य निर्धारण के लिए जमकर वकालत की। उन्होंने राज्यसभाम में 1 अपै्रल, 1976 को कहा कि ‘‘जो किसान मेहनत करता है, मजदूरी करता है, उसको हिसाब से पैसा न मिले, यह अच्छी बात नहीं है।’’उन्होंने 19 अपै्रल, 1961 को लोकसभा में कहा कि ‘‘एक तरह से देखा जाये तो काश्तकार जो पैदा करता है, उसका भाव तो घटा है और जिन चीजों को काश्तकार इस्तेमाल करता है, उनका भाव बढ़ा है।  एक तरीके से अगर, कोई घाटे में रहा है तो हिन्दुस्तान की 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी ही घाटे में रही है।’’ उन्होंने 22 अपै्रल, 1961 को बेहद गम्भीरता के साथ कहा कि ‘‘काश्तकार सर्दियों में सख्त सर्दी में और गर्मियों में इतनी गर्मी में काम करते हैं, जिसमें वे लोग नहीं कर सकते, जो सस्ता अनाज खाना चाहते हैं।’’चौधरी रणबीर सिंह ने बाजार में किसानों की फसल को उचित दाम न मिलने के मुद्दे को 2 अगस्त, 1950 में संविधान सभा में बड़ी प्रखरता के साथ इन शब्दों में उठाया था, ‘‘किसान गेहूं मण्डी में ले जाते हैं। लेकिन, उसे खरीदने वाला कोई नहीं है और वे इसे अपने घरों में वापस ले जाते हैं या कम कीमत पर व्यपारियों को बेचने को विवश होते हैं। केन्द्र सरकार हो या प्रान्तीय सरकार, मार्केट को कन्ट्रोल करने में सफल नहीं हुई हैं व व्यापारियों पर अपना दबाव नहीं बना पाई हैं। मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि एकमुश्त नीति अपनाई जाए।’’इसके साथ ही चौधरी साहब ने खेतीहर मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी तय करने के लिए भी संसद में आवाज उठाई। उन्होंने 17 अपै्रल, 1951 को स्पष्ट तौरपर कहा कि ‘‘जब खेत के मजदूर की मजदूरी तय हो तो आपको इस बात पर भी गौर करना पड़ेगा कि खेत की पैदावार के लिये भी ऐसा भाव तय करें कि जिससे उसके लिये वह फायदेमन्द हो।’’
देश में अनाज भण्डार गृहों की भारी कमी के चलते लाखों-करोड़ों का अनाज प्रतिवर्ष खराब होता है। चौधरी रणबीर सिंह ने इस मुद्दे को बेहद गम्भीरता के साथ 23 फरवरी, 1951 को संसद में उठाते हुए कहा कि ‘‘आज हमारे देश की हालत है, यहां पर भण्डार गृह भी नहीं हैं। हमारी बड़ी इच्छा है कि हम देश के अन्दर लगभग हर एक जिले में भण्डार गृह बनवा सकें।’’उन्होंने 15 मार्च, 1976 को राज्यसभा में एक बार फिर कहा कि ‘‘आज हमारे देश में अनाज को भण्डारों में रखने की बहुत ही आवश्यकता है। आप किसानों को विश्वास दिलायें कि उनके अनाज को भण्डारों में सुरक्षित रखा जायेगा। क्योंकि, उन्होंने खून पसीना एक करके और मेहनत करके इस अनाज को पैदा कर रहे हैं।’’ चौधरी साहब ने 22 जून, 1977 को बड़ी गम्भीरता के साथ दोहराया कि ‘‘कम से कम भगवान के लिए इस अनाज (भण्डारित) को चूहों को मत खिलाईये, कीड़े-मकोड़ों से इस नष्ट न होनें दें।’’
चौधरी रणबीर सिंह कालाबाजारी के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने 24 फरवरी, 1948 की बहस में साफ तौरपर कहा कि, ‘‘व्यापारी कुछ भी मेहनत नहीं करता, वह सारा मुनाफा ले जाता है और इसी वजह से ब्लैक मार्केट बढ़ता है।’’चौधरी साहब कालाबाजारी को देश के लिए कलंक मानते थे। उन्होंने 15 फरवरी, 1951 को अंतरिम संसद सबको चेताया था कि, ‘‘जितना हमारे देश को कालाबाजारी करने वालों से खतरा है, उतना शायद दूसरे किसी आदमी से नहीं है। जहां तक कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ आम कानून इस्तेमाल करने का सवाल है, अदालत में वकील लोग अधिकतर अपराधियों को बेकसूर साबित करन में कामयाब हो जाते हैं और वे रिहा हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें कोई दण्ड नहीं मिल पाता। मैं समझता हूँ कि मौजूदा कानून कालाबाजारी को रोकने में नाकाफी है।’’उन्होंने 15 फरवरी,1951 को संसदीय बहस के दौरान दो टूक शब्दों में देश को आगाह किया कि ‘‘कालाबाजारी करने वालों के पास बडे-बड़े अखबार हैं, दूसरी बड़ी-बड़ी चीजें हैं, उनके पास रूपया काफी होता है।’’
16 मार्च, 1948 की संसदीय बहस में चौधरी साहब ने स्पष्ट चेताया कि, ‘‘हमारा देश देहाती और किसानों का देश है। अगर, देहातियों और किसानों की आर्थिक हालत खराब होती है तो तमाम हिन्दुस्तान की आर्थिक स्थिति खराब समझनी चाहिए।’’उन्होंने 24 नवम्बर, 1949 को भारतीय संविधान सभा में बहस करते हुए कहा कि, ‘‘किसानों को आर्थिक आजादी तभी मिल सकती थी, जब ऐसा कायदा बनाया जाता कि जिस चीज को वह पैदा करते हैं, उसे उसकी लागत से कम कीमत पर बेचने के लिए विवश न किया जा सकता होता।’’चौधरी साहब ने किसानों के मामले में छल-फरेब की राजनीति करने वाले लोगों को आड़े हाथों लेते हुए 21 नवम्बर, 1950 को संसदीय बहस के दौरान दो टूक शब्दों में कहा कि ‘‘आप सस्ती लोकप्रियता के साधन इस्तेमाल करने चले हैं, उन्हें छोड़ दे और सही मायनों में देश की उन्नति करें, काश्तकार को ऊंचा उठायें और उसके द्वारा अपने देश को खुशहाल बनायें।’’
चौधरी रणबीर सिंह ने हमेशा देहात के विकास को प्राथमिकता देने की पैरवी की। 6 नवम्बर, 1948 को उन्होंने भारतीय विधान-परिषद की बैठक में वाद-विवाद के दौरान स्पष्ट तौरपर कहा, ‘‘इस देश के निर्माण में जितना बड़ा योगदान देहातियों का है, उतना हक उन्हें मिलना चाहिए और हर चीज में देहात का प्रभुत्व होना चाहिए।’’इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होंने 22 अगस्त, 1949 की बहस में देहात के विद्यार्थियों के लिए लोक सेवा आयोग की परीक्षा में आरक्षण की जोरदार वकालत की। उन्होंने कहा कि, ‘‘जब लोक सेवा आयोग द्वारा कोई प्रतियोगिता आयोजित की जाती है, तब एक ही प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं और निर्णय करने की कसौटी वही होती है। हमारा देश गांवों का देश है और ग्रामीण जनता अधिक है। लेकिन, तथ्यों के आधार पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि शहर के लोगों का विकास अपेक्षाकृत तीव्र गति से हुआ है और वे ग्रामीण जनता की अपेक्षा बहुत अधिक उन्नत हैं और इन परिस्थितियों में यदि ग्रामीण क्षेत्र के किसी व्यक्ति का शहरी क्षेत्र के व्यक्ति के साथ मुकाबला करवाया जाता है और उनसे एक ही प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं तो इस बात में संदेह नहीं कि ग्रामीण व्यक्ति, शहरी व्यक्ति के साथ सफलतापूर्वक अथवा समानता के आधार पर मुकाबला नहीं कर सकेगा।’’
इस समस्या के सरल समाधान भी चौधरी साहब ने सुझाए। उन्होंने कहा कि, ‘‘इस स्थिति के समाधान के दो तरीके हैं। एक यह है कि ग्रामवासी उम्मीदवारों के लिए सरकारी सेवाओं में कुछ अनुपात आरक्षित कर दिया जाए और सेवाओं में उन्हें आरक्षित संख्या के पद आबंटित किये जाएं। उन पदों के लिए केवल ग्रामीण जनता के उम्मीदवारों को ही मुकाबला करने के लिए केवल ग्रामीण जनता के उम्मीदवारों को ही मुकाबला करने की अनुमति दी जाए। दूसरा तरीका यह है कि लोक सेवा आयोग के सदस्यों को नियुक्त करते समय इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए कि उनमें 60-70 प्रतिशत सदस्य ऐसे होने चाहिएं, जो ग्रामवासियों की कठिनाईयों को समझते हों और उनके साथ सहानुभूति रखें।’’
आजकल नए राज्यों के निर्माण के लिए कई तरह की सियासती चालें देश में चल रही हैं। इस मुद्दे पर चौधरी रणबीर सिंह सबसे हटकर विचार रखते थे। 1 अगस्त, 1949 को भारतीय संविधान सभा में उन्होंने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि, ‘‘छोटे-छोटे टुकड़ों को अलहदा सूबों की शक्ल में रखना देश के हित में नहीं है। अगर हम इन्हें अलहदा रखेंगे तो हमें इतना ही भारी प्रशासनिक ढ़ाचा खड़ा करने के लिए भी मजबूर होना पड़ेगा।’’हालांकि उन्होंने 2 अगस्त, 1949 की बहस में यह स्वीकार किया था कि, ‘‘उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा प्रान्त है और इतने बड़े प्रान्त का राज्य आसानी से नहीं चल सकेगा। इसलिए एक न एक दिन उनको उसके दो हिस्से करने ही होंगे।’’उनकी यह भविष्यवाणी पूर्णतरू सही साबित हुई हो चुकी है और उत्तर प्रदेश का दूसरा हिस्सा उत्तराखण्ड बन चुका है।
गाँव में स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी चौधरी साहब ने जो स्थिति बयां की वह आज भी जस की तस नजर आती है। उन्होंने 10 मार्च, 1948 को संविधान सभा में इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा था कि, ‘‘देहातों के अन्दर हजारों ऐसे आदमी हैं, जो अपने आपको वैद्य कहते हैं और देहातियों की जिन्दगियों से खेलते हैं। हर कोई आदमी किसी वैद्य के पास जाता है और एक दिन में ही देहात के लोगों के लिए वैद्य बनकर बैठ जाता है। एलोपैथ डाक्टरों की तर्ज पर उन वैद्यों को रजिस्टर्ड किया जाना चाहिए और आपसे सर्टिफाइड वैद्यों को ही चिकित्सा की इजाजत मिले।’’
देशभर में जमीन अधिग्रहहण के मसले पर देशभर में बवाल मच रहा है। इस मुद्दे पर किसान व सरकार के बीच सीधा टकराव सामने आ चुका है। जमीन अधिग्रहण से विस्थापित होने वाले लोग अपने दर्द को बयां करने के लिए धरनों, प्रदर्शनों और रैलियों का सहारा ले रहे हैं। जमीन अधिग्रहण के कारण विस्थापित होने वाले लोगों के प्रति चौधरी रणबीर सिंह के हृदय में अत्यन्त सहानुभूति थी। इस मसले पर उन्होंने 6 सितम्बर, 1948 को संविधान सभा (विधायी) में विस्थापितों की पैरवी करते हुए दो टूक शब्दों में कहा था, ‘‘मैं एक किसान और खेती करने वाला होने के नाते इस बात को अच्छी तरह समझता हूँ कि जमीन का मुआवजा क्या होता है? आप उसको मुआवजा दीजियेगा, मगर उसका जो पेशा है, वह इन रूपयों से पूरा नहीं होगा। अगर आप उसको दूसरा पेशा नहीं देते हैं तो आप उसे जमीन के बदले जमीन दें। बिल के अन्दर जो पैसे की शर्त है, उसको छोड़ दिया जाए और उसकी जगह यह रख दिया जाए कि उसको जमीन के बदले में उसी कीमत के बराबर की जमीन दी जाएगी।’’
चौधरी रणबीर सिंह ने जमीन अधिग्रहण से संबंधित मुद्दे पर अपनी बेबाक राय प्रस्तुत करते हुए सुझाव दिए थे कि, ‘‘जहां तक हो सके कृषि भूमि को छोड़ दें, क्योंकि, वहां काफी अन्न पैदा होता है। उसके बदले, जहां तक हो सके परती भूमि में से जमीन लें और उपजाऊ जमीन को छोड़ दें। परती जमीन पर जो सरकारी चीज बनाना हो वहां बनायें। अगर, किसी जरूरत के लिए वह समझें कि वे उस उपजाऊ कृषि भूमि को नहीं छोड़ सकते, तभी वे ऐसी जमीन पर अपना हाथ रखें या डालें, अन्यथा नहीं। लेकिन, उसके साथ-साथ, जैसाकि अधिग्रहण कानून में दर्ज है, बहुत मामूली सा मुआवजा देकर काश्तकार से अपना पल्ला छुटाना कोई अच्छी नीति नहीं है।’’यदि चौधरी साहब के इन सुझावों पर गंभीरता से गौर किया जाए तो जमीन अधिग्रहण के विवादों को सहज हल किया जा सकता है।
आजकल सगोत्र विवाह और ऑनर किलिंग का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चिंता एवं चुनौती का विषय बना हुआ है। देहात के लोग इस मुद्दे के हल के लिए ‘हिन्दू विवाह अधिनियम’ में संशोधन करने का अभियान चलाए हुए हैं और दूसरी तरफ  सरकार इस रूख पर उदासीन नजर आ रही है। हिन्दू कोड’ के प्रस्ताव पर 22 सितम्बर, 1951 को बहस करते हुए चौधरी रणबीर सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि, ‘‘यह हिन्दू कोड बिल देश के अन्दर कुछ सुधार करने के लिये या सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिये, उनमें तबदीली करने के लिये, लाया जाता रहा है। आज जिस तरीके से जिस बैक डोर से यह बढ़ा है, वह कोई बहुत अच्छा ढ़ंग नहीं है। हमारा समाज इतनी उन्नति नहीं कर पाया है कि हम मान जायें कि यह सगोत्र विवाह ठीक है। इसको आप दस साल के लिये अपनी किताब में जमा रखें। दस साल बाद उस पर फिर गौर कर लिया जाएगा। अगर ठीक होगा तो मान लेंगे और अगर उस समय तक समाज की उतनी तरक्की नहीं हुई तो वह कायदा किताब में ही रहेगा।’’
आज देश के कई राज्यों में नशाखोरी की समस्या चरम पर है। चौधरी रणबीर सिंह ने नशाखोरी के खिलाफ देश व समाज को निरन्तर चेताया। वे देश में बढ़ती जा रही शराब की लत को बेहद घातक मानते थे। उन्होंने इस सन्दर्भ में 30 जनवरी, 1969 को हरियाणा विधानसभा में दो टूक शब्दों में कहा कि ‘‘जहां हमारे देश और हर क्षेत्र में आगे बढ़े हैं। लेकिन, कुछ बातों में देश पीछे भी गया है। जिन कारणों से देश पीछे रहा है, उनमें से एक कारण शराब का प्रयोग करना है।’’उन्होंने साफ तौर पर कहा कि ‘‘मैं इस हक में हूँ कि शराबबंदी होनी चाहिए, ताकि, समाज का सामाजिक स्तर ऊंचा हो।’’ चौधरी साहब ने सुझाव देते हुए कहा कि ‘‘हमें चाहिए कि हम समाज को शराबबन्दी की बात को मानने के लिए तैयार करें।’’ उन्होंने आगे कहा कि ‘‘जब तक हम अपने भाईयों का जीवन स्तर, चरित्र निर्माण नहीं करते हैं तब तक यह शराबबन्दी नहीं हो सकती।’’
चौधरी रणबीर सिंह समाज में निरन्तर गिरते नैतिक मूल्यों के प्रति भी बेहद चिंतित रहते थे। उन्होंने देश व समाज का इस विषय पर ध्यान आकर्षित करते हुए 16 फरवरी, 1970 को हरियाणा विधानसभा में कहा था कि ‘‘आज प्रदेश के अन्दर जो बात होती है, वह बड़े बूढ़ों की सलाह से नहीं होती है। आज जो करने वाले हैं, वे शक्तिशाली बच्चे हैं और बच्चे भी वे हैं जो बगैर रोमांस के कोई बात नहीं करना चाहते हैं। वे तो सिनेमा की फिल्म देखना चाहते हैं, वे शिक्षा लेना नहीं चाहते।’’उन्होंने बच्चों में गिरते मूल्यों से अवगत करवाते हुए कहा था कि ‘‘बच्चे अपनी माँ को प्रातरू उठकर नमस्कार नहीं कहते। वे तो फिल्म एक्टै्रस देखना चाहते हैं।’’चौधरी साहब बच्चों में गिरते नैतिक मूल्यों के लिए हमारी शिक्षा पद्धति को अहम दोषी मानते थे। उन्होंने इस सन्दर्भ में राज्यसभा में 4 अगस्त, 1975 को बेहद कड़े शब्दों में कहा था कि ‘‘जिन विश्वविद्यालयों को हम अनुदान दे रहे हैं, वे हिन्दुस्तान में कैसे नौजवान पैदा कर रहे हैं? आया उनके जीवन में हिन्दुस्तान की सभ्यता का कोई नामोनिशान बाकी रह गया है या सब हिप्पी बन गए हैं। अनुशासन जैसी चीज, जो भारत की सभ्यता में थी, वह बाकी रही है या नहीं? अगर अनुशासनहीन स्नातिका, स्नातक पैदा किए तो वह देश की सेवा सही नहीं कर पायेंगे। वे देश के हितों के खिलाफ जायेंगे।’’उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि ‘‘हमारे देश में जो शिक्षा शास्त्री माने जाते हैं, वे पुराने जमाने की सोच के चले आ रहे हैं। अब देश की शिक्षा की बागडोर उन शिक्षा शास्त्रियों के हाथों में सौंप देनी चाहिये, जो देश को आगे ले जा सकते हैं और बदलते हुए जमाने के साथ देश को आगे बढ़ा सकते हैं।’’उन्होंने 16 दिसम्बर, 1977 को अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘‘मैं समझता हूँ कि बेसिक एजुकेशन अगर, हम इस देश में चलाते तो हमारे देश में इतनी बड़ी गड़बड़ी नहीं होती।’’इसके साथ ही चौधरी साहब विद्यार्थी जीवन में राजनीति के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने इस बारे में राज्यसभा में 30 जनवरी, 1976 को अपने सुझाव देते हुए कहा कि ‘‘अगर, हमें इस देश को बनाना है, विद्यार्थियों को बनाना है और आप चाहते हैं कि वे विद्या हासिल करें तो आपको विद्यार्थियों में राजनीति नहीं लानी चाहिये। हम सभी आनते हैं कि विद्यार्थी जब राजनीति में पड़ जाते हैं तो पढ़ाई नहीं कर सकते हैं।’’चौधरी रणबीर सिंह शिक्षा के व्यवसायीकरण के एकदम खिलाफ थे। उन्होंने 10 अगस्त, 1973 को सख्त लहजे में कहा कि ‘‘मेरा कहना है कि शिक्षकों के लिए दुकान नहीं खोलिए।’’
देश में चल रहे हिन्दी-अंग्रेजी के विवादों और क्षेत्रीय भाषाओं की उपेक्षाओं पर भी चौधरी रणबीर सिंह की सोच वर्तमान परिपेक्ष्य में अनुकरणीय है। उन्होंने 3 सितम्बर, 1959 को लोकसभा में बहस के दौरान बड़ी गम्भीरता के साथ कहा था कि ‘‘मैं चाहता हूँ कि यह हिन्दी का और दूसरी जबानों का झगड़ा अंग्रेजी के साथ खत्म हो। उस झगड़े को ज्यादा देर तक न बढने दिया जाए और उसके लिए जरूरी है कि हिन्दुस्तान की सरकार की और उसके अफसरों की नीति सही लाईन पर चले।’’उन्होंने कहा कि ‘‘मैं तो चाहता हूँ कि जितनी भी अन्य भाषाएं हैं, वे आगे आएं और इस सदन के अन्दर उनका भी हिन्दी में तर्जुमा हो। इसी तरह विभिन्न प्रान्तों में भी जो बिल एक्ट वगैरह छपें, वे वहां की प्रादेशिक भाषाओं में छपें।’’चौधरी साहब ने 11 फरवरी, 1969 को हरियाणा विधानसभा में बोलते हुए हिन्दी को सरकारी भाषा बनाने के विषय पर दो टूक शब्दों में कहा कि ‘‘जिस ढ़ंग से हम हिन्दी भाषा को एक सरकारी भाषा बनाने जा रहे हैं, वह इस प्रकार से नहीं बन सकती। सरकारी भाषा बनाने के लिए हमें काफी प्रबन्ध करना पड़ेगा और काफी सूझबूझ से काम करना होगा।’’उनका मानना था कि ‘‘जितने भी कानून हैं, वे सभी हिन्दी में हों और उनका तर्जमा अंग्रेजी में हो। लेकिन, होता यह है कि मसला अंग्रेजी में बनकर आता है और हिन्दी में तर्जमा होता है। इसलिए, इसके उलट होना चाहिए।’’ चौधरी रणबीर सिंह ने 3 सितम्बर, 1959 को लोकसभा में बेहद खिन्न होकर कहा कि ‘‘आज मुझे यह बड़े दुरूख के साथ कहना पड़ता है कि अंग्रेजी के पढ़े लिखे विधायकों, प्रशासकों, न्यायधीशों और वकीलों ने देश में अंग्रेजी को बनाये रखने की साजिश कर दी है।’’चौधरी साहब ने अंग्रेजी को प्रतिभा मापने का पैमाना बनाने पर सख्त ऐतराज जताते हुए लोकसभा में 9 मई 1959 को स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘‘अक्सर जो तरीका काबिलियत को नापने का है, वह यह है कि अंग्रेजी के ज्ञान से उसे नापा जाता है। अच्छा होगा कि जितनी जल्दी हो सके हिन्दी या जो इलाकाई भाषाएं हैं, उनमें इम्तहानों को जारी करें।’’चौधरी साहब ने देश की एकता के लिए हिन्दी को बेहद जरूरी बताते हुए 24 फरवरी, 1961 को स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘देश की एकता के लिए जरूरी है कि इस देश की कोई एक भाषा बने, जो हिन्दी ही हो सकती है।’’
चौधरी रणबीर सिंह प्रजातंत्र प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने 16 फरवरी, 1970 को हरियाणा विधानसभा में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘प्रजातंत्र के अन्दर लोगों को चलाने की जिम्मेवारी प्रजातंत्र के नेताओं पर होती है, चाहे वे विरोधी दल के नेता हों या चाहे सरकार दल के नेता हों।’’उन्होनें 26 अगस्त, 1970 को हरियाणा विधानसभा में साफ शब्दों में कहा कि ‘‘प्रजातंत्र में पैसे का सही तरीके से इस्तेमाल हो।’’चौधरी साहब ने 28 अगस्त, 1970 को हरियाणा विधानसभा में बेहद सख्त लहजे में कहा कि ‘‘चुपचाप टैक्स लगाना प्रजातंत्र की भावना के विरूद्ध है।’’उन्होंने 16 फरवरी, 1971 को हरियाणा विधानसभा में दो टूक शब्दों में कहा कि ‘‘हमें कोशिश करनी चाहिए कि संविधान के पीछे जो धारणा है, उस धारणा को सामने रखकर हम चलें।’’चौधरी साहब ने प्रजातंत्र को मजबूत करने के लिए सामाजिक संगठनों को मंजूरी देने की पैरवी करते हुए 15 मार्च, 1961 को लोकसभा में कहा कि ‘‘अगर, हमको अपना काम सही ढ़ंग पर चलाना है तो उन यूनियन्स को मंजूरी देनी चाहिए, जो देश के हित का ध्यान रखती हैं।’’चौधरी साहब ने 24 जून, 1977 को राज्यसभा में कहा कि ‘‘हमारा आदर्श क्या है? हमारा आदर्श है, जनता की सेवा करना। देश का उत्थान करना और देश में प्रजातंत्र ही लोगों का राज रहे, लोकलाज रहे। इस सबको कायम रखना है।’’उन्होंने 12 फरवरी, 1971 को हरियाणा विधानसभा में दो टूक शब्दों में कहा कि ‘‘सच्चाई को छिपाने की कोशिश करना, प्रजातंत्र के सूत्र के खिलाफ है।’’उन्होंने कहा कि ‘‘बात हमारे हक में हो, वही बात हम कहें, यह अच्छी बात नहीं है और जो हमारे खिलाफ पड़ती है, उस बात को छिपाया जाये, यह तरीका अच्छा नहीं है।’’
देश व प्रदेश में विकास मामले में भेदभाव की राजनीति निरन्तर चर्चित रही है। चौधरी रणबीर सिंह विकास के मामले में भेदभाव बरतने के सख्त विरोधी थे। उन्होंने 26 अगस्त, 1970 को नसीहत देते हुए कहा कि ‘‘आप पिछड़े हुए इलाकों के अन्दर ज्यादा से ज्यादा पैसा खर्च करो। लेकिन, पक्षपात न करो।’’उन्होनें विकास के लिए एकता बनाने की अपील करते हुए 16 फरवरी, 1970 को हरियाणा विधानसभा में अपील करते हुए कहा कि ‘‘सारे हरियाणा की इसी में भलाई है कि एक होकर चलें।’’चौधरी साहब भाई-भतीजावाद के खिलाफ भी थे। उन्होंने इस सन्दर्भ में 31 अगस्त, 1949 को संविधान सभा में कहा कि ‘‘भाई-भतीजावाद को तभी रोका जा सकता है, जब उनका अन्तरूकरण निर्मल व मजबूत हो जाये और उनके विचारों में परिवर्तन आ जाये।’’
देश में बढ़ती हिंसा और अपराधों के आलोक में चौधरी रणबीर सिंह ने कई बार गम्भीर विशखेषण प्रस्तुत किए, जोकि वर्तमान परिपेक्ष्य में भी प्रासंगिकता रखते हैं। उन्होनें 8 फरवरी,1971 को हरियाणा विधानसभा में कहा कि ‘‘हिंसा आदमी तब करता है, जब वह समझता है कि अहिंसा का हथियार वह नहीं चला सकता।’’ उनका साफ तौरपर कहना था कि ‘‘यह तो देखना चाहिये कि अगर एक आदमी को इंसाफ नहीं मिलता तो वह जाये कहां? इन्साफ का रास्ता बन्द नहीं होना चाहिए।’’लोगों का कानून पर भरोसा कायम रहे, इसके लिए चौधरी साहब ने सुझाव दिया कि ‘‘एक्शन ऐसा होना चाहिए जो न्यायोचित दिखाई दे, न्याय के मुताबिक हो और देखने में भी ऐसा लगे कि न्यायोचित है।’’
चौधरी रणबीर ङ्क्षसह ग्रामीण भारत के सच्चे पैरोकार थे। उनका स्पष्ट दृष्टिकोण था कि ‘‘गाँव बचेगा तो देश बचेगा।’’ उन्होंने 16 मार्च, 1948 को संविधान सभा (विधायी) में बोलते हुए कहा कि ‘‘हमारा देश देहाती और किसानों का देश है। अगर एग्रीकलचरिस्टस और देहातियों की इकोनमी खराब हो जाती है तो तमाम हिन्दुस्तान की इकोनमी खराब समझनी चाहिये।’’उन्होंने 21 मार्च, 1949 को दोहराया कि ‘‘यह देश एक कृषि प्रधान देश है। इसके अन्दर 85 फीसदी आदमियों की रोटी का वास्ता सीधे खेती से है।’’ इसके साथ ही चौधरी साहब ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि ‘‘अगर हमने अपनी कृषि की आलत को नहीं सुधारा, उत्पादन को नहीं बढ़ाया और ठीक नहीं किया तो हमारा देश जो आजाद हुआ है, वह आर्थिक दृष्टि से आजाद नहीं रहेगा।’’चौधरी साहब ने 22 जनवरी, 1976 को गाँव की देहातियों पर लगाये जाने वाले टैक्स नीतियों पर हल्ला बोलते हुए कहा कि ‘‘हमारे देश में जो अर्थशास्त्री हैं और जो किताबें पढ़कर टैक्स लगाने की बात करते हैं, वे ठण्डे और गरम कपड़ों में बैठकर विचार करते हैं। उनको गाँव की वास्तविकताओं का पता नहीं है।’’
चौधरी रणबीर सिंह ने देहात में रहने वाले गरीबों की आवाज को सड़क से लेकर संसद तक बुलन्द किया। उन्होंने 24 फरवरी, 1978 को राज्यसभा में दो टूक शब्दों में कहा कि ‘‘जब तक गाँवों में रहने वाले गरीब लोगों की तरफ ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक इस देश का विकास नहीं हो सकता है।’’उन्होंने 30 मार्च, 1977 को राज्यसभा में कहा कि ‘‘अगर, आप चाहते हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था सही हो, देश की अर्थव्यवस्था सही हो, यह जो तनख्वाहदार भाई हैं, इनके दबाव में आना छोड़ दें। यह देश तनख्वाहदारों का देश नहीं है। यह देश गरीबों का देश है, जिन गरीबों की आमदनी 30 रूपये महीना भी नहीं है।’’उन्होंने 17 मई, 1976 को बेहद कटू शब्दों में कहा कि ‘‘हिन्दुस्तान में जो भी योजनाएं बनीं, ऊंचे लोगों की सुविधा को ध्यान में रखकर बनाईं गईं।’’इसके साथ ही उन्होंने 26 मई, 1976 को राज्यसभा में जोर देते हुए कहा कि ‘‘आज आवश्यकता इस बात की है कि जो हमारी योजनाएं हैं, उन पर हम गम्भीरतापूर्वक विचार करें और हमारी जो पंूजीवादी सोच है, उसको समाप्त करें।’’उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि ‘‘हमारी विचारधारा यह होनी चाहिए, जिससे देश को फायदा हो, गरीब जनता को फायदा हो।’’चौधरी साहब का 14 मार्च, 1978 को राज्यसभा में साफ तौरपर कहना था कि ‘‘देश की तरक्की 60 करोड़ भाईयों की तरक्की है, यह चन्द बड़े बड़े कारखानेदारों से नहीं होगी।’’
उन्होंने 10 मई, 1974 को बेलाग होकर कहा कि ‘‘देहात को आगे बढ़ाये बिना यह देश आगे नहीं बढ़ेगा।’’ उन्होंने बेघरों के हितों की पैरवी करते हुए कहा राज्यसभा में 7 मार्च, 1975 को कहा कि ‘‘जिनके पास मकान नहीं हैं, उन सबको मकान के लिए भूमि मिलनी चाहिए।’’उन्होंने 26 अपै्रल, 1960 को लोकसभा में कहा कि ‘‘जो रियायत बड़ी-बड़ी मिलों को और बड़ी-बड़ी कम्पनियों और बड़े-बड़े सरमायेदारों को है, वही रियायत उतने ही हिसाब से एक गरीब आदमी को भी मिले।’’
चौधरी रणबीर सिंह ने देश की तरक्की के लिए इन्डस्ट्री को बढ़ावा देने की वकालत करते हुए 26 अपै्रल, 1960 को लोकसभा में स्पष्ट तौरपर कहा कि ‘‘अपने देश की तरक्की करने के लिये इंडस्ट्रीज को बढ़ाना बहुत जरूरी है। इंडस्ट्रीज को बढ़ावा देने के लिये खास तौर से हिन्दुस्तान जैसे विशाल देश में जहां बेकारी बहुत ज्यादा फैली हुई है, छोटे-छोटे धंधों को बढ़ावा देना बहुत जरूरी हो जाता है।’’उन्होंने 7 मार्च, 1975 को राज्यसभा में अपना दृष्टिकोण पेश करते हुए कहा कि ‘‘हमारे देश में तरक्की तभी हो सकती है, जब कपड़ा बनाने की छोटी-छोटी खड्डियां बिजली से गाँव-गाँव में चलें, बजाय इसके कि हम बड़े-बड़े कारखानों की तरफ देखें।’’
चौधरी रणबीर सिंह ने दुधारू पशुओं के वध पर प्रबल विरोध किया। वे पशु हत्या के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने 12 दिसम्बर, 1950 को संसदीय बहस के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘भारतवर्ष में एक नही, लाखों नहीं, करोड़ों आदमी ऐसे हैं, जिनकी यह प्रबल भावना है कि हर एक जानवर का कत्ल होना बन्द हो।’’उन्होंने पशु हत्या के विरोध में भावनात्मक टिप्पणी करते हुए संसद में कहा कि ‘‘जिन्होंने एक साल के अन्दर इस और पन्द्रह सेर दूध रोजाना दिया हो, ऐसे दूध देने वाले पशुओं की अगर रक्षा नहीं कर सकते हैं, तो मैं कहता हूँ कि वे अपनी रक्षा भी नहीं कर सकते हैं।’’उन्होंने 25 नवम्बर, 1960 को लोकसभा में एक बार फिर कहा कि ‘‘आज यह बड़ी चिंता का विषय है कि हमारे देश में पशुधन का हा्रस निरंतर होता जा रहा है।’’उन्होंने विडम्बना जताते हुए 7 अपै्रल, 1961 को लोकसभा में कहा कि ‘‘एक जमाना था, तब दूध की पैदावार इतनी अधिक नहीं थी, जब हमारे देश के बारे में कहा जाता था कि यहां घी और दूध की नदियां बहतीं बहा करती थीं। अब हमारे देश के अन्दर घी और दूध की पैदावार क्यों कम हुई? उसके ऊपर हमें गम्भीरतापूर्वक  सोचना है।’’
चौधरी रणबीर सिंह देशहित में कानूनों के निर्माण के पक्षधर थे। वे जनता का शोषण करने वाले अंग्रेजी कानूनों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने राज्यसभा में 11 नवम्बर, 1976 को साफ तौरपर कहा कि ‘‘जो हमारे कायदे-कानून हैं, वे हमारे देश की जरूरत के मुताबिक हों और ऐसे कायदे-कानून हम न बनायें जो अंग्रेजी तरीके से चलते हों। इनको हम जितना जल्दी छोड़ेंगे, उतनी ही देश की भलाई है।’’उन्होंने 24 नवम्बर, 1972 को कहा कि ‘‘कानून से सारी बुराई रूक जाने वाली है, यह बात सही नहीं है।’’कानून में तब्दीली करने के सन्दर्भ में चौधरी साहब ने 24 नवम्बर, 1972 को दो टूक शब्दों में कहा कि ‘‘कानून में तबदीली करके आप समझें कि आपका इलाज हो जायेगा तो वह मुमकिन नहीं होगा। इलाज तो इलाज करने से होता है।’’इससे पूर्व उन्होंने 22 अपै्रल 1961 को चेताते हुए कहा था कि ‘‘खाली कानून से ही देश आगे चलने वाला नहीं है। देश आगे चलता है देश का दिमाग बदलने से, देश का स्वभाव बदलने से और देश का स्वाद बदलने से।’’ उनका स्पष्ट तौरपर मानना था कि ‘‘जब तक हम कुर्बानी अदा नहीं करेंगे, तब तक देश का हित कैसे हो सकेगा? हर एक देश कुर्बानी से बढ़ता है। कोई भी देश केवल कायदे और कानून बनाने से आगे नहीं बढ़ सकता है।’’
चौधरी रणबीर सिंह सकारात्मक पत्रकारिता के पक्षधर थे। उन्होंने 28 नवम्बर, 1974 राज्यसभा में दो टूक कहा कि ‘‘समाचार पत्रों में सही समाचार नहीं छपते। लड़ाई-भिड़ाई के समाचार छपते हैं।’’उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ‘‘अखबार वालों और पत्रकारों को ठीक बात कहनी चाहिए। मैं चाहता हूँ कि हमारे पत्रकार इस बात को नोट करें और चार हजार को दस हजार न कहें और दो हजार को पचार हजार न कहें। जो सही बात है, उसी की खबर दें।’’चौधरी साहब ने श्रमजीवी पत्रकारों की पैरवी करते हुए कहा कि ‘‘श्रमजीवी पत्रकारों को संरक्षण देना चाहिये।’’
चौधरी रणबीर ङ्क्षसह ने देश की राजधानी दिल्ली से सम्बंधित मुद्दों पर भी कई बार दूरगामी सुझाव दिये। उन्होंने राज्यसभा में 9 अगस्त, 1977 को दिल्ली के हित में सुझाव दिया कि ‘‘अगर आपको दिल्ली को बाढ़ से बचाना है तो किसाऊ बांध बनाना शुरू करें। साहिबी नदी के ऊपर डैम बनाना शुरू कीजिए, वरना दिल्ली शहर डूबता रहेगा और दिल्ली को बचाने के नाम पर हरियाणा को डूबोते रहेंगे।’’चौधरी साहब दिल्ली को राज्य का दर्जा दिये जाने के पक्षधर नहीं थे। इस सन्दर्भ में उन्होंने 28 अगस्त, 1951 को संसदीय बहस के दौरान दो टूक शब्दों में सुझाव दिया था कि ‘‘मैं समझता हूँ कि दिल्ली को अलग दर्जा देना गलती होगी। इस सरकार में और दिल्ली राज्य की सरकार के बीच हमेशा झगड़ा पैदा करेंगे।’’उनके इस तरह के अनेक सुझाव आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।
कुल मिलाकर, चौधरी रणबीर सिंह देश व देहात से जुड़े हर मुद्दे पर बेहद गहरी सोच व समझ रखते थे। वे समय की नब्ज पहचानने वाले थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि वे एक स्पष्टवादी, निष्पक्ष और सच्चाई के पक्षधर थे। उन्होंने सड़क से लेकर संसद तक आम आदमी के हितों के लिए संघर्ष किया और उनके हित में बड़ी बेबाकी से आवाज बुलन्द की। उन्होंने निजी स्वार्थपूर्ति अथवा निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को हमेशा दूर रखा। वे एक योगी पुरूष और सच्चे राष्ट्रचिन्तक थे। उन्होंने ग्रामीण भारत के जीवन को आत्मसात किया और हर समस्या का डटकर मुकाबला किया। वे संघर्ष की घोर अग्रि में तपे हुए थे। ग्रामीण पृष्ठभूमि का उनका गहरा अनुभव ही उन्हें असाधारण शख्सियत का बना गया। उन्होंने जो भी कहा, वह अक्षरशः खरा होता था, क्योंकि वह कड़े अनुभव और गहन अध्ययन पर आधारित होता था। इसी बदौलत ही, आज भी उनके विचार और सुझाव आज भी एकदम प्रासंगिक और अचूक हैं। जब तक उनके विचारों और सुझावों पर अमल नहीं होगा, निरूसन्देह तब तक चौधरी रणबीर सिंह प्रासंगिक ही बने रहेंगे। 
*(नोट: लेखक महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक में स्थापित चौधरी रणबीर सिंह शोधपीठ में बतौर शोध सहायक पद पर कार्यरत हैं।)
-राजेश कश्यप ‘टिटौली’


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मंगलवार, 26 जनवरी 2016

कब आएंगे ‘गणतंत्र’ के ‘अच्छे दिन’?

मुद्दा /

 कब आएंगे ‘गणतंत्र’ के ‘अच्छे दिन’?
-राजेश कश्यप

       साढ़े छह दशक पार कर चुके गणतंत्र के समक्ष गम्भीर चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। ये गम्भीर चुनौतियां दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए शर्मसार करने वाली हैं। देश में आर्थिक सुधारों के 25 साल बाद अमीर-गरीब के बीच की अंतर अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। सवा सौ करोड़ देशवासियों की दौलत गिने-चुने लोगों की तिजौरी में कैद होकर रह गई है। अभी हाल ही में विश्व की तीन बड़ी एजेन्सियों ऑक्सफैम, वर्ल्ड वेल्थ एवं क्रेडिट सुइस की शोध रिपोर्टों के निष्कर्ष आँखें खोलने व रौंगटे खड़े करने वाले हैं। देश की कुल संपत्ति का 53 फीसदी हिस्सा मात्र 1 फीसदी परिवारों में सिमटकर रह गया है। केवल इतना ही नहीं, देश की कुल सम्पत्ति का 76.3 प्रतिशत हिस्सा देश के 10 प्रतिशत अमीर परिवारों की बपौती बन चुका है और शेष 90 प्रतिशत के हिस्से मात्र 23.7 फीसदी सम्पत्ति ही रह गई है। एक सुनियोजित तरीके से अमीर बड़ी तेजी से अमीर बनते चले गए और गरीब निरन्तर गरीब बनते चले गए हैं। आज देश में 36 करोड़ से अधिक लोग मात्र 50 रूपये प्रतिदिन में गुजारा करने को विवश हैं। दुनिया के कम से कम साढ़े बीस फीसदी गरीब लोग हमारे देश के हैं। 
      स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत सत्तातंत्र का प्रमुख नारा ‘गरीबी हटाओ’ था। गरीबी हटाओ का यह नारा आज आजादी के लगभग सात दशक बाद भी महज ‘नारा’ ही बना हुआ है। रेल-सड़क की पटरियों पर रेहड़ी लगाने वाले छह करोड़ से अधिक लोग आर्थिक मदद के मोहताज बने हुए हैं। इनमें 61 फीसदी लोग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग शामिल हैं। देश में पिछले एक दशक में स्लम यानी झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या में 34 फीसदी इजाफा दर्ज किया गया है। इस हिसाब से देश में कम से कम 1 करोड़ 80 लाख तक झुग्गी-झोपड़ियां हैं, जिनमें लोग नारकीय जीवन जीने को बाध्य हैं। जनगणना 2011 के अनुसार देश के कुल 24.39 करोड़ परिवारों में से 73 फीसदी यानी 17.91 करोड़ परिवार गाँवों में रहते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इन ग्रामीण परिवारें में 49 फीसदी यानी 8 करोड़ 69 लाख परिवार बेहद गरीब हैं।  इन गरीब परिवारों में 44.84 लाख परिवार तो दूसरे के घरों में गुजारा करने को विवश हैं। केवल इतना ही नहीं, 4 लाख परिवार तो कचरा बिन कर अपना जीवन जीने को बाध्य हैं। बेहद विडम्बना का विषय है कि साढ़े छह दशक पार करने वाले गौरवमयी गणतांत्रिक देश में कम से कम साढ़े चार लाख परिवार बेघर हैं और वे गन्दे नालों, रेल-सड़क फूटपाथों, पुलों आदि के नीचे रहने को विवश हैं। जनगणना के ताजा आंकड़ों के अनुसार जिन लोगों के सिर पर है छत हैं, उनमें भी 5.35 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जिनके मकान अति जर्जर हो चुके हैं। इनमें आधे से अधिक यानी 53 फीसदी मकान शौचालय विहिन हैं।
      इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीच्यूट के अनुसार वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न उत्पादन के मामले में दूसरे स्थान पर रहने के बावजदू भारत में 20 करोड़ से ज्यादा लोग भूख पेट सोते हैं, जोकि वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ फूड इनसिक्युरिटी इन द वर्ल्ड-2015’ के अनुसार भारत में 19.4 करोड़ लोग भूखमरी का शिकार हैं। यह संख्या चीन से भी अधिक है। कितने बड़े खेद का विषय है कि एक तरफ देश में लाखों टन खाद्यान्न सड़ जाता है और दूसरी तरफ भूख एवं कुपोषण के चलते एक बड़ी आबादी भरपेट रोटी के लिए तरसती रहती है। नैशनल सैंपल सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल 40 प्रतिशत आबादी कुपोषण की शिकार है। देश में कुपोषण की दर 55 प्रतिशत आंकी गई है। देश में 60 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। ‘सेव द चिल्ड्रन’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रतिदिन 5000 से अधिक बच्चे कुपोषण के कारण दम तोड़ देते हैं। देश में प्रतिवर्ष 25 लाख से अधिक शिशुओं की अकाल मौत होती है, इनमें 42 फीसदी गम्भीर कुपोषण के शिकार होते हैं।
      सबसे बड़ी विडम्बना का विषय है कि एक तो बड़े पैमाने पर देश में प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं और दूसरे, देश से पलायन करने वाली प्रतिभाओं में बढ़ौतरी होती चली जा रही है। हाल ही में जारी ग्लोबल टैलेंट कंपटीटिव इंडेक्स के अनुसार देश में कुशल कामगारों की कमी बढ़ गई है। इस मामले में वैश्विक स्तर पर भारत 11 पायदान फिसलकर 89वें स्थान पर पहुंच गया है। कौशल प्रतिस्पर्धा में पिछले साल भारत 78वें स्थान पर था। बेरोजगारी और बेकारी के कारण युवा अपराध मार्ग पर अग्रसित हो चला है। बेहद शर्मसार करने वाली बात तो यह है कि देश के पोस्ट ग्रेजुएट लोग भी भीख मांगने को विवश हैं। हाल ही में जनगणना 2011 के आधार पर जारी ‘नॉन वर्कर्स बाय मेन एक्टिविटी एण्ड एजुकेशन’ के आंकड़ों के अनुसार देश में 410 भिखारी ऐसे हैं, जिनके पास पोस्ट ग्रेजुएशन या समकक्ष तकनीकी डिग्री है। इनमें 137 महिलाएं और 273 पुरूष हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश के 3.72 लाख भिखारियों में लगभग 3000 भिखारी ग्रेजुएट व टेक्निीकल या प्रोफेशलन डिप्लोमाधारी हैं। क्या सुपर पॉवर के रूप मंे तेजी से उभर रहे देश के लिए विधि व न्याय के हिसाब से सबसे गहरा कलंक नहीं हैं? 
      देश का अन्नदाता कर्ज के चक्रव्युह में फंसकर मौत को गले लगाने को विवश है। क्या इससे बढ़कर देश के लिए अन्य कोई विडम्बना हो सकती है? नैशनल क्राइम रेकार्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में प्रतिदिन 46 किसान आत्महत्या करते हैं। रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 1995 में 10,720, वर्ष 1996 में 13,729, वर्ष 1997 में 13,672, वर्ष 1998 में 16,015, वर्ष 1999 में 16,082, वर्ष 2000 में 16,603, वर्ष 2001 में 16,415, वर्ष 2002 में 17,971, वर्ष 2003 में 17,164, वर्ष 2004 में 18241, वर्ष 2005 में 17,131, वर्ष 2006 में 17,060, वर्ष 2007 में 16,632, वर्ष 2008 में 16,196, वर्ष 2009 में 17,368, वर्ष 2010 में 15,694, वर्ष 2011 में 14,027, वर्ष 2012 में 13,754 और वर्ष 2013 में 11,772  किसानों को कर्ज, मंहगाई, बेबसी और सरकार की घोर उपेक्षाओं के चलते आत्महत्या करने को विवश होना पड़ा। हाल ही में एक नैशनल सैम्पल सर्वे की रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि देश का हर दूसरा किसान कर्ज के बोझ के नीचे दबा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार देश के 9 करोड़ किसान परिवारों में से 52 फीसदी किसान कर्ज के नीचे सिसक रहे हैं और हर किसान पर औसतन 47,000 रूपये का कर्ज है। कृषि मंत्रालय और राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड़ ब्यूरो के आंकड़े कर्ज से दबे पड़े किसानों के अभिशप्त जीवन की दास्तां चीख-चीखकर कह रहे हैं। बेहद चिन्ता का विषय है कि देश में किसानों की संख्या में भारी कमी आती जा रही है। एक आंकड़े के मुताबिक वर्ष 2001 में किसानों की संख्या 12 करोड़ 73 लाख थी, जोकि वर्ष 2011 में घटकर मात्र 11 करोड़ 87 लाख रह गई। चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 1990 से वर्ष 2005 के बीच 20 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में भी कमी दर्ज हो चुकी है। यह आंकड़ा कितना खतरनाक सिद्ध होने वाला है, इसका अनुमान इस तथ्य से बड़ी सहजता से लगाया जा सकता है कि यदि 1000 हेक्टेयर कृषि भूमि कम होती है तो कम से कम 100 किसानों और 760 कृषि मजदूरों की आजीविका छीन जाती है, अर्थात वे बेरोजगार व बेकार हो जाते हैं। कमाल की बात तो यह भी है कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बीच कृषि गौण हो चली है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1950-51 में देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की भागीदारी 51.9 प्रतिशत थी, जो वर्ष 1990-91 में 34.9 फीसदी पर आ गई। यह गिरावट बड़ी तेजी के साथ वर्ष 2012-13 में मात्र 13.7 फीसदी पर आ गई। निःसन्देह, एक कृषि प्रधान देश के लिए ये आंकड़े बेहद शर्मनाक हैं
      देश में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध भी बेहद विडम्बना का विषय हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड़ ब्यूरो के अनुसार देश में प्रतिदिन 92 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। पिछले वर्ष दहेज हत्या के कुल 8,083 मामले दर्ज हुए। एक अनुमान के अनुसार हर तीन मिनट में एक महिला किसी भी तरह के अत्याचार का शिकार हो रही है। देश में हर 29वें मिनट में एक महिला की अस्मत को लूटा जा रहा है। हर 77 मिनट में एक लड़की दहेज की आग में झोंकी जा रही है। हर 9वें मिनट में एक महिला अपने पति या रिश्तेदार की क्रूरता का शिकार हो रही है। हर 24वें मिनट में किसी न किसी कारण से एक महिला आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रही है। नैशनल क्राइम ब्यूरो के अनुमानों के अनुसार ही प्रतिदिन देश में 50 महिलाओं की इज्जत लूट ली जाती है, 480 महिलाओं को छेड़खानी का शिकार होना पड़ता है, 45 प्रतिशत महिलाएं पति की मार मजबूरी में सहती हैं, 19 महिलाएं दहेज की बलि चढ़ जाती हैं, 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं हिंसा का शिकार होती हैं और हिंसा का शिकार 74.8 प्रतिशत महिलाएं प्रतिदिन आत्महत्या का प्रयास करती हैं। महिलाओं के मामले में स्वास्थ्य सेवाएं और भी बदतर हैं। एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष एक लाख महिलाएं खून की कमी यानी ‘एनीमिया’ की वजह से मौत का शिकार हो जाती हैं, जबकि 83 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी से जूझ रही हैं। देश में 5 साल से कम उम्र के 42 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं और 69.5 फीसदी बच्चों में खून की कमी है।
      कहने की आवश्यकता नहीं है कि ये सब आंकड़े एवं परिस्थितियां गौरवमयी गणतंत्र पर बदनुमा दाग हैं, जिन्हें जड़ से मिटाना बेहद अनिवार्य है। जब इन दागों से हमारा गणतंत्र मुक्त हो जाएगा, तभी हकीकत में गणतंत्र के अच्छे दिन आ आयेंगे। 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)




स्थायी सम्पर्क सूत्र :
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
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शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

मुल्क की आजादी के लिए आखिरी दम तक लड़े नेताजी

23 जनवरी/जयन्ति विशेष
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
मुल्क की आजादी के लिए आखिरी दम तक लड़े नेताजी
-राजेश कश्यप

        ‘‘जब अपने मुल्क वापिस जाएं तो मुल्क के भाईयों को बताना कि मैं आखिरी दम तक मुल्क की आजादी के लड़ता रहा हूँ। वो जंग-ए-आजादी को जारी रखें। हिन्दुस्तान जरूर आजाद होगा, उसे कोई गुलाम नहीं रख सकता।’’ ये आखिरी शब्द स्वतंत्रता संग्राम के अजर-अमर और आदर्श स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के थे। यह तथ्य नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 18 अगस्त, 1945 को विमान हादसे में हुई मौत से जुड़े रहस्य को सुलझाने का दावा करने वाली इंग्लैण्ड की एक वेबसाईट ‘बोसफाईल डॉट इन्फो’ पर आधारित है। इस तथ्य की आधिकारिक पुष्टि हो या न हो, लेकिन, इसमें कोई सन्देह नहीं कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अपने मुल्क की आजादी के लिए आखिरी दम तक अटूट संघर्ष किया और तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की चूलें हिलाकर रख दीं। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा राज्य के कटक शहर में जानकीनाथ बोस के घर श्रीमती प्रभावती की कोख से हुआ। वे अपने पिता की नौंवी संतान के रूप में पाँचवें पुत्र थे। वे चौदह भाई-बहन थे, जिनमें छह बहनें व आठ भाई शामिल थे। उनके पिता कटक शहर के प्रसिद्ध वकील थे और माता धर्मपरायण गृहणी थीं।
        सुभाष चन्द्र बोस बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने वर्ष 1913 में हाईस्कूल की परीक्षा और वर्ष 1915 में इंटरमीडियट की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने कोलकाता के प्रेंसीडेंसी कॉलेज में दाखिला ले लिया। यहां उन्होंने वर्ष 1919 में दर्शनशास्त्र से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। वे छात्र जीवन से ही अरविन्द घोष और स्वामी विवेकानंद जैसे महान विचारकों से प्रभावित हो चुके थे, जिसके चलते उन्होंने उनके दर्शनशास्त्रों का गहन अध्ययन किया। इसी बीच, देशभक्ति एवं क्रांतिकारी विचारों के चलते उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज के एक अंग्रेज प्रोफेसर की सरेआम पिटाई कर डाली, जिसके कारण उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज में दाखिला लिया और दर्शनशास्त्र से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की।
        सुभाष चन्द्र बोस के पिता जानकीनाथ बोस की हार्दिक इच्छा थी कि उनका बेटा सुभाष आई.सी.एस. (इंडियन सिविल सर्विस) अधिकारी बने। पिता का मान रखने के लिए आई.सी.एस. बनना स्वीकार किया। इसके लिए सुभाष चन्द्र बोस ने इंग्लैण्ड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और वर्ष 1920 में उन्होंने अपनी अथक मेहनत के बलबूते, न केवल अच्छे अंकों के साथ चौथा स्थान हासिल करते हुए उत्तीर्ण की। हालांकि सुभाष चन्द्र बोस अपनी अनूठी प्रतिभा के बल पर भारतीय प्रशासनिक सेवा में तो आ गए थे, लेकिन उनका मन बेहद व्यथित और बैचेन था। उनके हृदय में देश की आजादी के लिए क्रांतिकारी आक्रोश का समुद्री ज्वार आकाश को छू रहा था। अंतत: उन्होंने मात्र एक वर्ष बाद ही, 24 वर्ष की उम्र में मई, 1921 में भारतीय प्रशासनिक सेवा को राष्ट्रहित में त्याग दिया और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों में सक्रिय हो गये।
        सुभाष चन्द्र बोस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत देश में चल रहे असहयोग आन्दोलन से की। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता हासिल की। 20 जुलाई, 1921 को उनकीं मुलाकात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से भी हुई। लेकिन, वैचारिक समानता न होने के कारण उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ मिलकर बंगाल आन्दोलन का नेतृत्व किया। सुभाष चन्द्र बोस क्रांतिकारी विचारों के व्यक्ति थे। उनके अन्दर असीम साहस, अनूठे शौर्य और अनूठी संकल्प शक्ति का अनंत प्रवाह विद्यमान था। उन्हें वर्ष 1921 में अपने क्रांतिकारी विचारों और गतिविधियों का संचालन करने के कारण पहली बार छह माह जेल जाना पड़ा। इसके बाद तो जेल यात्राओं, अंग्रेजी अत्याचारों और प्रताडऩाओं को झेलने का सिलसिला चल निकला। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्हें ग्यारह बार जेल जाना पड़ा। इसके साथ ही उन्हें अंग्रेजी सरकार द्वारा कई बार लंबे समय तक नजरबंद भी रखा गया। लेकिन, सुभाष चन्द्र बोस अपने इरादों से कभी भी टस से मस नहीं हुए। इसके लिए, उन्होंने कई बार अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंकी और अंग्रेजी शिकंजे से निकल भागे।
        वर्ष 1923 में सुभाष चन्द्र बोस चितरंजन दास की ‘स्वराज्य पार्टी’ में शामिल हुए और साथ ही देश के मजदूर, किसानों और विद्यार्थियों के संगठनों से जुड़े। उनकीं क्रांतिकारी गतिविधियों से परेशान होकर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्ष 1925 से वर्ष 1927 तक बर्मा में नजरबन्द करके रखा। उन्होंने वर्ष 1928 के कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन की सफलता में उल्लेखनीय योगदान दिया। अंग्रेजी सरकार ने वर्ष 1933 में उन्हें देश निकाला दे दिया और वे वर्ष 1933 में यूरोप चले गए और ‘इंडिपेंडेंस लीग ऑफ इंडिया’ नामक क्रांतिकारी संगठन के सक्रिय सदस्य बन गये। वे वर्ष 1934 में पिता के देहावसान का दु:खद समाचार पाकर स्वदेश लौट आये। लेकिन, अंग्रेजी सरकार ने उन्हें फिर से देश से बाहर भेज दिया। इसके बाद वे वर्ष 1936 में लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने आये, लेकिन इस बार भी उन्हें अंग्रेजी सरकार ने पुन: देश से बाहर भेज दिया। इस तरह से वर्ष 1933 से लेकर वर्ष 1936 के बीच उन्हें आस्ट्रिया, बुल्गारिया, चेकोस्लाविया, फ्रांस, जर्मनी, हंगरी, आयरलैण्ड, इटली, पोलैण्ड, रूमानिया, स्विटजरलैण्ड, तुर्की और युगोस्लाविया आदि कई देशों की यात्राएं करने व उनकीं स्थिति व परिस्थितियों का अध्ययन करने का सुनहरी मौका मिला। इसके साथ ही उन्हें मुसोलिनी, हिटलर, कमालपाशा और डी. वलेरा जैसी वैश्विक चर्चित हस्तियों के सम्पर्क में भी आने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने बैंकाक में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती मिस ऐमिली शैंकल से प्रेम विवाह किया, जिनसे उन्हें अनीता बोस नामक पुत्री हुई। उनकीं पुत्री अनीता बोस इन दिनों सपरिवार जर्मनी में रहती हैं।
        सुभाष चन्द्र बोस ने ‘भारतीय शासन अधिनियम’ का जबरदस्त विरोध किया और भारी प्रदर्शन किया, जिसके कारण अंग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्ष 1936 से वर्ष 1937 तक यरवदा जेल में डाल दिया। इस समय सुभाष चन्द्र बोस देश का जाना माना चेहरा बन चुके थे। इसके परिणामस्वरूप, फरवरी, 1938 में ‘हीरपुर’ (गुजरात) में हुए कांग्रेस के 52वें वार्षिक अधिवेशन में अध्यक्ष चुन लिए गए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने ‘राष्ट्रीय योजना आयोग’ का गठन किया। हालांकि, महात्मा गांधी को सबसे पहले ‘राष्ट्रपिता’ सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था, इसके बावजूद, कभी उनके साथ वैचारिक मतभेद समाप्त नहीं हुए। इसी कारण, उन्हें राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से जल्दी ही त्यागपत्र देना पड़ा। लेकिन, अगले ही वर्ष 1939 में उन्होंने गांधी जी के प्रबल समर्थक और कांग्रेस में वामपंथी दल के उम्मीदवार डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या को पराजित करके त्रिपुरा कांग्रेस का अध्यक्ष पद हासिल कर लिया। नेताजी की शख्सियत की ऊँचाई का सहज अन्दाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि उन्होंने राष्ट्रपिता के खुले समर्थन के बलपर चुनाव लडऩे वाले डॉ. सीतारमैय्या को 1377 के मुकाबले 1580 वोटों से हराकर जीत दर्ज की थी। इसके बाद तो उनका राजनीतिक उत्कर्ष शिखर पर पहुँचना स्वभाविक ही था। राष्ट्रपिता ने सुभाष चन्द्र बोस की जीत को अपनी व्यक्तिगत हार के रूप में महसूस किया, जिसके कारण बहुत जल्द नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का मन कांग्रेस से उब गया और उन्होंने स्वयं ही कांग्रेस को अलविदा कह दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक गतिविधियों और स्वतंत्रता आन्दोलन की गतिविधियों के संचालन के लिए 3 मई, 1939 को ‘फारवर्ड ब्लॉक’ नामक वामपंथी विचारधारा वाले दल की स्थापना की। इसके साथ ही, वर्ष 1940 में ‘वामपंथी एकता समिति’ की स्थापना की और समाजवादी एवं साम्यवादी संगठनों को संगठित करने का भरपूर प्रयास किया, लेकिन, इसमें वे कामयाब नहीं हो पाये।
        नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अपनी अनवरत क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अंग्रेजी सरकार की आँखों की किरकिरी बन चुके थे। इसी के चलते, अंग्रेजी सरकार ने उन्हें 27 जुलाई, 1940 को बिना कोई मुकदमा चलाये, अलीपुर जेल में डाल दिया। उन्होंने इस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलन्द की और 29 दिसम्बर, 1940 को जेल में ही अनशन शुरू कर दिया। अन्याय के खिलाफ चले इस अनशन के बाद अंग्रेजी सरकार ने सुभाष चन्द्र बोस को 5 जनवरी, 1940 को जेल से रिहा तो कर दिया, लेकिन उन्हें कोलकाता में उन्हीं के घर में नजरबन्द कर दिया। कुछ समय पश्चात ही नेताजी अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से 16 जनवरी, 1941 की रात 1:30 बजे मौलवी का वेश बनाकर अंग्रेजी सरकार की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गए और वे अपने साथी भगतराम के साथ 31 जनवरी, 1941 को काबुल जा पहुँचे। इधर योजनाबद्ध तरीके से परिजनों ने उन्हें 26 जनवरी, 1941 को लापता घोषित कर दिया और उधर नेताजी काबुल पहुँचने के बाद 3 अपै्रल, 1941 को जर्मन मंत्री पिल्गर के सहयोग से मास्को होते हुए हवाई जहाज से बर्लिन पहुँच गये। उन्होंने यहां पर जर्मन सरकार के सहयोग से ‘वर्किंग गु्रप इंडिया’ की स्थापना की, जोकि कुछ ही समय बाद ‘विशेष भारत विभाग’ में तब्दील हो गया।  नेताजी ने 22 मई, 1942 को जर्मनी के सर्वोच्च नेता हिटलर से मुलाकात की।
        सुभाष चन्द्र बोस ने 17 जनवरी, 1941 को बर्लिन रेडियो से अपना ऐतिहासिक सम्बोधन दिया और भारत की ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खुली जंग का ऐलान कर दिया। जर्मन सरकार ने उनके साहस और शौर्य को देखते हुए उन्हें ‘फ्यूहरर ऑफ इण्डिया’ के खिताब से नवाजा। सुभाष 16 मई, 1943 को टोकियो पहुंचे और 16 जूनको जापानी प्रधानमंत्री तोजा से भेंट की और जापानी आकाशवाणी से ब्रिटिश के विरूद्ध चल रहे इण्डियन इन्डेपेंडेस आन्दोलन का समर्थन करने का ऐलान किया। जुलाई, 1943 में रास बिहारी बोस ने ‘इण्डियन इन्डेपेंडेस लीग’ के प्रधान पद से इस्तीफा देकर इसकी बागडौर सुभाष चन्द्र बोस को सौंप दी। यहीं पर पहली बार सुभाष चन्द्र बोस को ‘नेताजी’ के नाम से पुकारा गया और यहीं से ‘जयहिन्द’ का नारा बुलन्द हुआ।
        नेताजी ने 5 जुलाई, 1943 को कैप्टन मोहन सिंह द्वारा गठित ‘आई.एन.ए.’ की कमान अपने हाथों में ले ली और इसके ‘आजाद हिन्द फौज’ नाम दिया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस की सहायता से 60,000 भारतीयों की ‘आजाद हिन्द फौज’ पुनर्गठित की और यहीं से ऐतिहासिक नारा ‘दिल्ली चलो’ बुलन्द किया। इसके साथ ही नेताजी ने 21 अक्तूबर, 1943 को ‘अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद हिन्द’ के रूप में अस्थायी सरकार स्थापित कर दी। इस अस्थायी सरकार के ध्वज पर दहाड़ते हुए शेर को अंकित किया गया। नेताजी ने महिला ब्रिगेड ‘झांसी रानी रेजीमेंट’ और बालकों की ‘बाल सेना’ भी गठित कर दी। उन्होंने रानी झांसी रेजीमेंट की कैप्टन लक्ष्मी सहगल को बनाया। इस आजाद हिन्द फौज का आदर्श एवं प्रेरक गीत ‘‘कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाये जा, ये जिन्दगी है कौम की, कौम पे लुटाये जा’’ था। उन्होंने ‘दिल्ली चलो’ के ऐतिहासिक उद्घोष के साथ आजाद हिन्द फौज को भारत में ब्रिटिश सेना से टक्कर लेने के लिए रवाना करते हुए कहा-‘‘हमारे सामने भयंकर युद्ध है। यह आजादी की ओर हमारा अंतिम प्रयास है, जिसमें हमें हर हाल में सफल होना है। इसमें आप लोगों को भूख, कष्ट और मृत्यु तक सहनी पड़ेगी। यदि आप इस परीक्षा में सफल हो गए तो याद रखो, एक सुनहरा और सुखी भविष्य आपकी प्रतीक्षा में है।’’  21 अक्तूबर, 1943 को इण्डियन इन्डेेंपेंडेस लीग की पांचवी बैठक में अस्थायी ‘आजाद हिन्द सरकार’ का गठन करने के बाद ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध बिगुल फूंक दिया गया। 
        नेताजी ने 5-6 नवम्बर, 1943 को प्रधानमंत्री तोजा द्वारा बुलाई गई इम्पीरियल सरकार की बैठक में भाग लिया। अण्डेमान-निकोबार द्वीप पर जापान का कब्जा था, इसे स्वतंत्र भारत की भूमि मानते हुए यहां अस्थाई आजाद हिन्द सरकार गठित की गई और तिरंगा फहराया गया। नेताजी ने इन द्वीपों का नया नामकरण अण्डेमान को ‘शहीद द्वीप’ और निकोबार को ‘स्वराज्य द्वीप’ के रूप में किया।  यहीं पर इंडियन वार कौंसिल का गठन किया गया। सिंगापुर सुप्रीम कमाण्ड का मुख्यालय रंगून में बदल दिया गया। यहां पर नेताजी ने ऐतिहासिक आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’’
        7 जनवरी, 1944 को जापानी सेनाओं ने भारत की ब्रिटिश सरकार पर हमला बोल दिया। आजाद हिन्द फौज ने इम्फाल, कोहिमा को निशाना बनाकर कूच किया। 7 नवम्बर, 1944 को सुभाष ब्रिगेड कैप्टन शाहनवाज की कमान में अराकार की ओर कूच कर गई, जहां आजाद हिन्द फौज की भारी जीत हुई। इजनरल शाहनवाज के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ाते हुए भारत में लगभग 20,000 वर्गमील के क्षेत्र पर अपना कब्जा जमा लिया और भारत माता की भूमि को चूमकर तिरंगा फहराया।  दुर्भाग्यवश, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों द्वारा 6 अगस्त, 1945 को जापान के प्रमुख शहर हिरोशिमा और इसके तीन दिन बाद 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिरा दिये गए, जिससे जापान, इटली आदि देशों को घुटने टेकने को विवश होना पड़ा और इसी वजह से आजाद हिन्द फौज को भी अपने मिशन में विफलता का सामना करना पड़ा। हालांकि, इस विफलता से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बेहद निराशा हुई, इसके बावजूद उन्होंने आजादी हासिल करने के लिए निरन्तर नये-नये प्रयास जारी रखे। इन्हीं प्रयासों के तहत वे सहायता मांगने के लिए रूस भी गए, लेकिन उन्हें कामयाबी हासिल नहीं हो सकी। इसके बाद वे 17 अगस्त, 1945 को हवाई जहाज से मांचूरिया के लिए रवाना हुए। 23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को बेहद दु:खद एवं चौंकाने वाली सूचना दी कि पाँच दिन पूर्व 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का विमान मांचूरिया जाते हुए ताईवान के पास दुर्घटना का शिकार हो गया, जिसमें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई। इस समाचार को सुनकर हर कोई शोक के अनंत सागर में डूब गया। लेकिन, इसके साथ ही उनकीं मौत पर भी सवाल खड़े हो गये।
        आज भी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का रहस्य ज्यों का त्यों बना हुआ है। इस रहस्य को सुलझाने के लिए केन्द्र सरकार और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार ने भी कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जारी किए हैं। इसके बावजूद भी नेताजी की विमान हादसे में हुई मौत रहस्य बनी हुई है। अब इंग्लैण्ड की एक वेबसाईट ‘बोसफाईल डॉट इन्फो’ क्रमबद्ध तरीके से प्रत्यक्षदर्शियों की गवाहियों वाले प्रमाणिक दस्तावेजों के आधार पर नेताजी की मौत के रहस्य को सुलझाने में लगी हुई है। लेकिन, उन तथ्यों की आधिकारिक रूप से पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है और नेताजी की मौत का रहस्य अभी भी ज्यों का त्यों बना हुआ है। लेकिन, नेताजी का नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में अजर-अमर स्वतंत्रता सेनानी के रूप में दर्ज है। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के रहस्यमयी हवाई दुर्घटना का शिकार होने के दो वर्ष बाद ही 15 अगस्त, 1947 को देश में स्वतंत्रता का सूर्योदय हो गया। एक तरह से नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आजादी की जंग को आखिरी दम तक लड़ा और अंतत: देश को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाकर ही दम लिया। समस्त राष्ट्र स्वतंत्रता के इस अमर सेनानी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के असीम त्याग, अनूठे बलिदान, अनंत शौर्य, अद्भूत पराक्रम और अटूट संघर्ष के लिए सदैव ऋणी रहेगा। इसके साथ ही ‘जय हिन्द’ का नारा और गौरवमयी ऐतिहासिक अभिवादन देने के लिए भी हिन्दुस्तान हमेशा कृतज्ञ रहेगा। भारत सरकार ने इस महान शख्सियत को वर्ष 1992 में देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा। लेकिन, नेताजी के परिजनों इस सम्मान को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि देर से दिये गये इस सम्मान का कोई औचित्य नहीं है। स्वतंत्रता के अमर सेनानी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को कोटि-कोटि नमन है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में तीन हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

Rajesh Kashyap Awarded By RAJA NAHAR SING AWARD 2016


सोमवार, 11 जनवरी 2016

राजेश कश्यप ‘अमर शहीद राजा नाहर सिंह अवार्ड-2016’ से सम्मानित

राजेश कश्यप को राजा नहर सिंह अवार्ड से सम्मानित करते हुए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बिरेन्द्र सिंह 
राजेश कश्यप ‘अमर शहीद राजा नाहर सिंह अवार्ड-2016’ से सम्मानित

     युवा पत्रकार एवं समाजसेवी राजेश कश्यप को रचनात्मक लेखन व उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए इंटरनेशनल जाट महान आर्गेनाइजेशन ने ‘अमर शहीद राजा नाहर सिंह अवार्ड-2016’ से सम्मानित किया है। उन्हें यह अवार्ड गत 9 जनवरी को महाराजा सूरजमल शिक्षण संस्थान, नई दिल्ली के सभागार में सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महायोद्धा राजा नाहर सिंह के बलिदान दिवस पर आयोजित विशेष समारोह में मुख्य अतिथि केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बिरेन्द्र सिंह ने प्रदान किया। इस अवसर पर इंटरनेशनल जाट महान आर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष राजबीर राज्याण, जाट तख्त के चेयरमैन हनमत सिंह, हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेशाध्यक्ष संजय राठी, महालक्ष्मी मीडिया नेटवर्क के एम.डी. रवि मलिक, पूर्व डी.जी.पी. महेन्द्र सिंह मलिक, आकाशवाणी के सेवानिवृत निदेशक धर्मपाल मलिक, प्रख्यात हरियाणवी अभिनेता रघविन्द्र मलिक, चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति मेजर जनरल डॉ. रणजीत सिंह, महाराजा सूरजमल शिक्षण संस्था के अध्यक्ष एस.पी. सिंह आदि अनेक बड़ी हस्तियां उपस्थित थीं।
     उल्लेखनीय है कि राजेश कश्यप रोहतक जिले के गाँव टिटौली के निवासी हैं और पिछले डेढ़ दशक से स्वतंत्र पत्रकारिता एवं समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनके अब तक 3500 से अधिक लेख एवं रचनाएं विभिन्न समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं और वे कई विशिष्ट सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। राजेश कश्यप को रचनात्मक लेखन एवं उल्लेखनीय समाजसेवा के लिए दर्जनों प्रतिष्ठित सम्मान एवं पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है। इससे पहले उन्हें वर्ष 2000 में ‘गणतंत्र दिवस विशिष्ट सम्मान’, वर्ष 2003 में ‘डॉ. अम्बेडकर फैलोशिप सम्मान’, वर्ष 2006 में ‘सन्त कबीर सम्मान’, वर्ष 2009 में ‘सीएसआर मिस्टर इंटेलेक्चूअल अवार्ड’, वर्ष 2012 में ‘शहीद चन्द्रशेखर अवार्ड’ एवं ‘भास्कर ग्रीन आईडल अवार्ड’, वर्ष 2013 में ‘ब्लॉग मित्र अवार्ड’, वर्ष 2014 में ‘सिम्मी मरवाह अवार्ड’ एवं ‘भारत मित्र मंच सम्मान’ और वर्ष 2015 में ‘प्रज्ञा साहित्य सम्मान’ आदि से नवाजा जा चुका है। 
     राजेश कश्यप के उत्कृष्ट लेखन एवं समाजसेवी कार्यों के मद्देनजर ही हाल ही में हरियाणा कश्यप राजपूत सभा का प्रदेश मीडिया प्रभारी, प्रवक्ता एवं सूचना अधिकारी नियुक्त किया गया है।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह

9 जनवरी / राजा नाहर सिंह शहीदी दिवस विशेष

शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह
-राजेश कश्यप


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।
वतन पे मिटने वालों का यही बांकी निशां होगा।।

        वतन की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले असंख्य शहीद शूरवीर और रणबांकुरों की शौर्य गाथाएं इतिहास के पन्नों पर बड़े स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं, जिन्हें पढ़ने मात्र से ही देशभक्ति, स्वाभिमान और वतन के लिए मर मिटने का असीम ज़ज्बा पैदा हो जाता है। ऐसे ही एक अनूठे शूरवीर और पराक्रमी देशभक्त थे बल्लभगढ़ रियासत के राजा नाहर सिंह। राजा नाहर सिंह की वीरता, रणकौशलता और वतनपरस्ती ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी राजा नाहर सिंह का जन्म 6 अपै्रल, 1821 को बल्लभगढ़ रियासत में हुआ। यह रियासत दिल्ली से 20 मील दूर दक्षिण में पड़ती थी। सातवीं पीढ़ी पूर्व पैदा हुए उनके पड़दादा राजा बलराम उर्फ ‘बल्लू’ के नाम से ही उनके शहर का नाम ‘बल्लभगढ़’ पड़ा, जोकि हरियाणा प्रदेश के पलवल जिले में पड़ता है। राजा नाहर सिंह के खून में भी अपने पूर्वजों की भांति स्वदेश, स्वराज और स्वाभिमान की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। वे बचपन से ही अत्यन्त वीर, साहसी और कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने अल्पायु मंे ही घर-परिवार और रियासत की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर उठा लिया और उनका बखूबी निर्वहन किया। मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह कपूरथला की राजकुमारी किशन कौर के साथ हो गया। इसके दो वर्ष बाद ही 18 वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहावसान हो गया। इन विपरीत एवं विकट परिस्थितियों के बीच इस पराक्रमी युवा नाहर सिंह ने 20 जनवरी, 1839 को बल्लभगढ़ रियासत की बागडोर अपने हाथों में ली। उस समय बल्लभगढ़ रियासत में कुल 210 गाँव शामिल थे। इतनी बड़ी रियासत की बागडोर किशोरावस्था में संभालना युवा नाहर सिंह के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने बड़े दृढ़-संकल्प के साथ स्वीकार किया।
       राजा नाहर सिंह ने रियासत की बागडोर संभालते ही अपनी सैन्य शक्ति को सशक्त बनाने का सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया। उस समय अंग्रेजी सरकार के जुल्मों और मनमानी नीतियों से देशवासी बुरी तरह त्रस्त थे। रियासती राजाओं को अपना वजूद बनाए रखना, टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध बोलना अथवा बगावत करना, नरक के द्वार खोलने के समान था। क्रूर अंग्रेजों का खौफ देशवासियों पर पूरी तरह हावी था। ऐसे भंयकर हालातों के बीच युवा नाहर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होने का साहस जुटाया और स्वयं को सैन्य दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए अपनी सेना को युरोपीय देशों की तर्ज पर प्रशिक्षित किया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का टैक्स न देने और बल्लगढ़ रियासत में अंग्रेजों के न घूसने का फरमान सुना दिया। इससे अंग्रेजी सरकार तिलमिला उठी। उन्हें राजा नाहर सिंह अंग्रेजी सरकार के लिए बहुत बड़ा खतरा दिखाई देने लगे। 
       राजा नाहर सिंह की वीरता और पराक्रम की कहानियां देशभर में गूंजनें लगीं। राजा नाहर सिंह ने एक घुड़सवारों की अत्यन्त कुशल और मजबूत सेना तैयार की और पलवल से लेकर दिल्ली तक गश्त करवानी शुरू कर दी। ऐसे में उनका अंग्रेजी सरकार से सीधा टकराव एकदम सुनिश्चित था। राजा नाहर सिंह का अंग्रेजी हुकुमत के साथ कई बार टकराव हुआ और हर बार अंग्रेजों को मुँह की खानी पड़ी। अंग्रेज बिग्रेडियर शावर्स को हर बार हार का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि  अंग्रेज कलेक्टर विलियम को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। 10 मई, 1857 को मेरठ और अंबाला में सैनिक विद्रोह ने की चिंगारी ने देशभर में बगावत के शोले भड़का दिए। इसी के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद हो गया। राजा नाहर सिंह इस संग्राम में कूद पड़े और अंग्रेजों के विरूद्ध एकदम सक्रिय हो गए। इन सब घटनाक्रमों के बीच देश के दिल दिल्ली पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया और दिल्ली के तख्त पर बहादुरशाह जफर को सत्ता को बैठाया गया और राजा नाहर सिंह उनके अग्रणी रक्षक एवं सलाहकार बने।
       दिल्ली को फिर से हासिल करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने बहादुरशाह जफर पर हर प्रकार का कड़ा शिकंजा कस दिया और उस पर तख्त छोड़ने के लिए भारी दबाव बना दिया। इन विकट एवं विपरीत परिस्थितियों के बीच बहादुरशाह जफर ने राजा नाहर सिंह को बुलाया और आगरा तथा मथुरा से आई अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। बहादुरशाह जफर का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह तुरंत दिल्ली के लिए चल पड़े। अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः कब्जा करने के लिए एक अभेद चक्रव्युह रचा। दिल्ली पर हमला करने से पूर्व परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन करने के उपरांत कर्नल लारेंस ने गवर्नर को एक पत्र भेजा, जिसमें स्पष्ट तौरपर लिखा कि, ‘‘दिल्ली के दक्षिण-पूर्व में राजा नाहर सिंह की बहुत मजबूत मोर्चाबंदी है। हमारी सेनाएं इस दीवार को तब तक नहीं तोड़ सकतीं, जब तक चीन या इंग्लैण्ड से कुमक न आ जाये।’’ कर्नल लारेंस के इस पत्र की शब्दावली से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय अंग्रेजी सरकार राजा नाहर सिंह की सैन्य और रणकौशलता से किस हद तक खौफ खाती थी। कर्नल लारेंस की सलाह को मानते हुए अंग्रेजी सेना ने दिल्ली पर पूर्व की ओर से आक्रमण करने का साहस नहीं जुटाया और कश्मीरी गेट से 13 सितम्बर, 1857 को हमला बोल दिया।
       इसी बीच अंग्रेजों ने बड़ी कूटनीतिक चाल चली और उसने पीछे से राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर भारी हमला कर दिया। अपने राजा की अनुपस्थिति में बल्लभगढ़ रियासत के वीर सेनापति बड़ी बहादुरी के साथ लड़े और शहादत को प्राप्त हुए। रियासत पर अंग्रेजी सेना के हमले का सन्देश मिलते ही राजा नाहर सिंह वापस दौड़े। अंग्रेजों ने अपने चक्रव्युह में कामयाबी हासिल करते हुए दिल्ली पर पुनः कब्जा कर लिया और बहुत बड़ी साजिश को अंजाम देते हुए धोखे से बहादुरशाह जफर को बन्दी बना लिया। दिल्ली पर पुनः कब्जा करने और बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाने के बाद अंग्रेजी सरकार के हौंसले बुलन्द हो गए। लेकिन, शूरवीर एवं पराक्रमी राजा नाहर सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने बल्लभगढ़ रियासत पहुँचने के बाद नए सिरे से अंग्रेजी सेना के खिलाफ मोर्चेबन्दी की और आगरा व मथुरा से आई अंग्रेजी सेना से भीड़ गए। बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। दोनों तरफ से लाशों के ढे़र लग गए और खून की धाराएं बह निकलीं। इस मुकाबले में अंग्रेजी सेना को भारी हानि उठानी पड़ी। असंख्य अंग्रेजी सिपाहियों को बन्दी बना लिया गया। धीरे-धीरे अंग्रेजी सेना के पाँव उखड़ने लगे। जब अंग्रेजों को साफ तौरपर अपनी हार दिखाई पड़ने लगी तो उन्होंने एक और नया चक्रव्युह राजा नाहर सिंह को फंसाने के लिए रचा। अंग्रेजी सेना ने युद्ध रोककर एकाएक सन्धि के प्रतीक सफेद झण्डा लहरा दिया। अंग्रेजों की इस धुर्तता व चक्रव्युह को राजा नाहर सिंह बिल्कुल नहीं समझ पाये और उन्होंने भी युद्ध बन्द कर दिया।
       एक सुनियोजित षड़यंत्र रचते हुए अंग्रेजी फौज के दो प्रतिनिधियों ने राजा नाहर सिंह को जाकर बताया कि दिल्ली से समाचार आया है कि सम्राट बहादुरशाह जफर से अंग्रेजी सरकार बातचीत कर रही है और उनके साथ सन्धि की जा रही है। चूंकि वे सम्राट के प्रमुख विश्वास पात्र और शुभचिन्तक हैं तो उन्हें सम्राट ने याद किया। इसीलिए युद्ध बन्द किया गया है और सन्धि के लिए सफेद झण्डा लहराया गया षड़यंत्र से अनजान राजा नाहर सिंह अपने पाँच सौ विश्वस्त लड़ाकों के साथ दिल्ली कूच कर गये। अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में अंग्रेजी सैनिकों को घात लगाकर राजा नाहर सिंह को बन्दी बनाने के लिए रास्ते में पहले से ही छिपा दिए थे। जब राजा नाहर सिंह उस रास्ते से गुजरने लगे तो अंग्रेजी सैनिकों ने एकाएक घात लगाकर हमला बोल दिया और वीर पराक्रमी शेर राजा नाहर सिंह को धोखे से कैद कर लिया। इसके अगले ही दिन अंग्रेजों ने भारी फौजी के साथ राजा नाहर सिंह की रियासत बल्लभगढ़ पर हमला बोल दिया। एक बार फिर अपने राजा की अनुपस्थिति में रियासत के शूरवीर रणबांकुरों ने अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। तीन दिन तक चले भीषण संग्राम के बाद रियासत के शूरवीर सैनिक बड़ी संख्या में शहादत को प्राप्त हो गये और रियासत अंग्रेजों के कब्जे में आ गई।
       दिल्ली में बन्दी बनाए गए राजा नाहर सिंह के सामने अंग्रेजी मेजर हड़सन पहुँचे और उन्हें अंग्रेजों से मित्रता करने एवं माफी माँगने का प्रस्ताव सुनाया। उन्होंने यह प्रस्ताव रखते हुए राजा नाहर सिंह से कहा कि ‘‘नाहर सिंह ! मैं आपको फांसी से बचाने के लिए कह रहा हूँ। आप थोड़ा सा झुक जाओ।’’ स्वाभिमान और वतरपरस्ती के जज्बों से भरे राजा नाहर सिंह ने यह प्रस्ताव सुनकर हड़सन की तरफ पीठ फेर ली और दो टूक जवाब दिया, ‘‘राजा नाहर सिंह वो राजा नहीं है, जो अपने देश के शत्रुओं के आगे झुक जाए। ब्रिटिश लोग मेरे देश के शत्रु हैं। मैं उनसे क्षमा नहीं माँग सकता। एक नाहर सिंह न रहा तो क्या? कल लाखों नाहर सिंह पैदा हो जाएंगे।’’ मेजर हड़सन को राजा नाहर सिंह से ऐसे करारे जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी। वह एकदम बौखला उठा। अंग्रेजी सरकार ने राजा नाहर सिंह को फांसी पर लटकाने का निश्चय कर लिया और साथ ही उनके तीन अन्य वीर क्रांतिकारी साथियों खुशहाल सिंह, गुलाब सिंह और भूरे सिंह को भी फांसी पर लटकाने का हुक्म जारी कर दिया गया।
अंग्रेजों ने हिन्दूस्तानियों में भय बैठाने और क्रांतिकारियों में खौफ पैदा करने के उद्देश्य से राजा नाहर सिंह और उनके तीन साथियों को 9 जनवरी, 1857 को दिल्ली के चाँदनी चौक पर सरेआम फांसी पर लटकाने का निर्णय ले लिया। हड़सन ने फांसी पर लटकाने से पहले राजा नाहर सिंह से उनकीं आखिरी इच्छा के बारे में पूछा तो भारत माता के इस शेर ने दहाड़ते हुए कहा था, ‘‘मैं तुमसे और ब्रिटानी राज्य से कुछ माँगकर अपना स्वाभिमान नहीं खोना चाहता हूँ। मैं तो अपने सामने खड़े हुए अपने देशवासियों से कह रहा हूँ कि क्रांति की इस चिंगारी को बुझने न देना।’’ शौर्य, स्वाभिमान और वतनपरस्ती की प्रतिमूर्ति राजा नाहर सिंह के ये अंतिम शब्द हड़सन सहित अंग्रेजी सरकार के नुमाइन्दों के कानों में पिंघले हुए शीशे के समान उतर गए। अंततः भारत माता के इस सच्चे व अजेय लाल को उनके लोगों के सामने ही फांसी के फंदे पर लटका दिया और उनके साथ ही तीन अन्य महान क्रान्तिकारियों ने भी अपनी भारत माँ की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। हर किसी ने उनकीं वीरता, साहस और देशभक्ति के जज्बे को दिल से सलाम किया। आजादी के ऐसे दिवानों और बलिदानियों का यह राष्ट्र हमेशा कृतज्ञ रहेगा। उन्हें हृदय की गहराईयों से कोटि-कोटि नमन।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

 (राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
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(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)