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मंगलवार, 9 जनवरी 2018

शौर्य और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति महान स्वतंत्रता सेनानी मास्टर मोता सिंह कश्यप

9 जनवरी/पुण्यतिथि विशेष
Master Mota Singh Ji

शौर्य और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति
महान स्वतंत्रता सेनानी मास्टर मोता सिंह कश्यप
-राजेश कश्यप 

 शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।।
     भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करवाने के लिए असंख्य जाने-अनजाने शूरवीर स्वतंत्रता सेनानियों ने असीम त्याग, बलिदान और शहादतें दीं। देश के अनेक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी रहे, जिनका राष्ट्रप्रेम, शौर्य, साहस, संघर्ष, स्वाभिमान और देश के लिए मर-मिटने का जज्बा हर भारतवासी के लिए पे्ररणा स्त्रोत हैं। ऐसे ही पे्ररणादायक स्वतंत्रता सेनानी थे मास्टर मोता सिंह कश्यप। मास्टर मोता सिंह कश्यप का जन्म पंजाब प्रान्त के गांव पतारा (जालंधर) में 28 फरवरी 1888 श्री गोपाल कश्यप जी के घर श्रीमती रेल्ली देवी जी की कोख से हुआ था । इनकीं प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल से पूरी हुई। जब वे दसवीं कक्षा में थे, उन्होंने निजी विद्यालयों में अध्यापन कार्य भी शुरू कर दिया। वे बेहद अनुशासनशील, मेहनती एवं कुशाग्र बुद्धि के थे। उनमें राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। 
     मास्टर मोता सिंह कश्यप जी ने स्नातक की डिग्री हासिल की और साथ ही पंजाबी भाषा में ‘ज्ञानी’ एवं फारसी भाषा में ‘मुंशा-ए-फाज़िल’ की उपाधि भी हासिल की। उन्होंने वर्ष 1914-15 में अमृतसर के ‘संत सुक्खा सिंह मिडल स्कूल’ में बतौर मुख्याध्यापक अपनी सेवाएं दीं। मास्टर मोता सिंह जी ने हाई स्कूल मालवा, खालसा हाई स्कूल दमदम साहिब, खालसा स्कूल फिरोजपुर आदि में भी एक शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। 
     मास्टर मोता सिंह कश्यप न केवल एक शिक्षक थे, बल्कि एक सच्चे राष्ट्रभक्त थे। इसीलिए, जब देश में स्वतंत्रता आन्दोलन चल रहे थे, वे किसी न किसी रूप में अपनी भागीदारी जरूर सुनिश्चित करते थे। वे 1918-19 में दमनकारी रॉलेट एक्ट के विरोध में खुलकर आजादी की जंग में कूद पड़े। उन्होंने 11 अप्रैल 1919 को शाही मस्जिद लाहौर में हुई एक बड़ी जनसभा में अंग्रेजो की दमनकारी नीतियों के विरोध में आवाज बुलन्द की। अंग्रेजी सरकार ने वर्ष 1919 के जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार के उपरांत उन्हें जनता को सरकार के प्रति भड़काने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया। जब उन्हें जेल में पहुंचाया गया तो उनसे पगड़ी उतारने के लिए कहा गया, क्योंकि उन दिनों जेल में सिखों को पगड़ी पहनने की इजाजत नहीं दी जाती थी। लेकिन, शौर्य और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति मास्टर मोता सिंह जी ने जेल अधिकारियो को पगड़ी को हाथ तक नहीं लगाने दिया और इसके विरोध में जेल में भूख हड़ताल शुरू कर दी। 105 दिन की सतत भूख हड़ताल के उपरांत अंततः अंग्रेजो को उनके सामने झुकना पड़ा और न केवल उन्हें पगड़ी बांधे रखने की अनुमती मिली, बल्कि इसके बाद से सभी सिख  बंदियों को पगड़ी पहनने की इजाजत दे दी गई।
     मास्टर मोता सिंह कश्यप जी अपने संकल्प एवं सिद्धांतों पर हमेशा अडिग रहते थे। उनके साथ वे कोई समझौता नहीं करते थे। राष्ट्रभक्त मास्टर मोता सिंह जी ने अक्टूबर 1920 में हुए ‘सेन्ट्रल सिख लीग’ के सम्मलेन में कठोर संकल्प लिया कि जब तक हमारा भारत देश आजाद नहीं होगा, तब तक वे पैरो में जूते नहीं डालंेगे। इसके उपरांत संकल्प एवं सिद्धांतों के धनी मास्टर मोता सिंह जी ने स्वतंत्रता प्राप्ति तक 27 साल नंगे पैर आजादी की अटूट लड़ाई लड़ी।

     मास्टर मोता सिंह ने 26 जनवरी 1921 को तरनतारन में संगत पर हुए हमले और फिर 20 फरवरी 1921 ननकाना साहब में हुए दंगो के बाद आक्रोशित होकर स्वतंत्रता की लड़ाई का अहिंसक तरीका बदल दिया और उन्होंने सशस्त्र जंग लड़ने का चैंकाने वाला निर्णय ले लिया। मार्च, 1921 में होशियारपुर में हुई ‘सिख  एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस’ में मास्टर मोता सिंह जी ने गरम दल के नेताआंे के साथ मिलकर सहमति बनाई कि बिना हथियार आजादी नहीं मिल सकती। इसके उपरांत, मास्टर मोता सिंह जी ने जत्थेदार किशन सिंह जी के साथ मिलकर ‘बब्बर अकाली लहर’ के नाम से एक मोर्चा तैयार किया और गाँव से लेकर शहर तक प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया। यह मोर्चा जहाँ भी जाता सशस्त्र होता था। मास्टर मोता सिंह जी व उनका मोर्चा पुलिस के लिए खौफ का पर्याय बन गए। ऐसे में पुलिस ने मास्टर जी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर 1000 रुपये ईनाम देने का ऐलान कर दिया। 
     ‘प्रथम बब्बर अकाली षड्यंत्र केस’ में मास्टर मोता सिंह जी का नाम इतिहास में प्रमुखता से दर्ज है। दरअसल, मार्च, 1921 में ‘सिख एजुकेशनल कांफ्रेस’, होशियारपुर के अधिवेशन में सरदार किशन सिंह गड़गज्ज ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ आवाज बुलन्द की, जिसमें मास्टर मोता सिंह जी शीर्ष पर थे। मास्टर मोता सिंह सहित 14 सिख नौजवानों ने ननकाना साहब में जो नरसंहार हुआ, उससे सम्बंधित 6 दोषी व्यक्तियों की सूची बनाई और निर्णय लिया कि उनकीं हत्या कर दी जाए, ताकि जी-हूजुरों की आंखें खुल जाएं और अंग्रेजी सरकार भी सिखों की भावनाओं के प्रति सचेत हो। योजनानुसार उन्होंने मई 1921 में 7 रिवाॅल्वर अम्बाला एयरफोर्स आर्मरी से चुरा ली। लेकिन, जब मास्टर मोता सिंह के दो साथी सरदार बेला सिंह और सरदार गेंडा सिंह सराय निवासी मिस्टर बोरिंग की हत्या करने के लिए लाहौर उनकीं कोठी पर गए तो वे वहां नहीं मिले। बाद में वे सड़क पर संदिग्धावस्था में घूमते हुए पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उन्हें पुलिस ने ऐसी भयंकर यातनाएं दीं कि वे टूट गए और उन्होंने एक-एक करके सारी योजना एवं उसमें शामिल लोगों के नामों का खुलासा कर दिया। मिस्टर पी.जे. रस्ट स्पेशल मजिस्टेªट ने 19 मई, 1922 को 6 माह तक लगातार केस की सुनवाई के बाद फैसला सुनाया। दोनों को 5-5 वर्ष सख्त कैद की सजा सुनाई गई। मामले में 11 सिख नौजवानों को अभियुक्त बनाया गया था, जिसमें मास्टर मोता सिंह सहित 5 लोगों को फरार बताते हुए मफरूर घोषित किया गया। 
     एक गुप्त सूचना के आधार पर अंग्रेजी पुलिस मास्टर मोता सिंह जी को गिरफ्तार करने में कामयाब हो गई। जैसे ही ये सूचना उनके मोर्चे के लोगों को लगी तो उन्होंने हथियारों के साथ पूरे गाँव को घेर लिया। पुलिस और मोर्चे की सीधी टक्कर में निर्दोष लोग न मारे जाएं, इसीलिए मास्टर मोता सिह जी ने मोर्चे को अपने कदम पीछे हटाने के लिए कह दिया।  एक माह पश्चात मास्टर मोता सिंह जी रिहा होकर घर आ गए। लेकिन, इसके उपरांत उनके जेल जाने और आने का अनवरत सिलसिला चल पड़ा। इस कड़ी में उन्हें 15 जून 1922 को अंग्रेज पुलिस ने फिर से गिरफ्तार कर लिया और उन्हें 7 साल के लिए जेल भेज दिया। 7 साल बाद वे 23 जून 1929 जेल से रिहा हुए। लेकिन, अंग्रेजी सरकार के लिए दहशत का पर्याय बने मास्टर मोता सिंह जी को फिर से 23 जुलाई 1929 को ब्रिटिश शाशन के विरुद्ध लोगों को भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। एक सुनियोजित साजिश के तहत उन्हें 16 सितम्बर 1929 को आजीवन कारावास की सजा सुनाकर जेल की काल कोठरी में डाल दिया गया। वे वर्ष 1931 में लार्ड इरविन एवं महात्मा गाँधी जी के बीच हुए एक समझौते के तहत जुलाई, 1931 में अन्य कैदियों के साथ रिहा हुए।
     अंग्रेजी सरकार के दमन एवं अत्याचार मास्टर मोता सिंह कश्यप जी को उनके संकल्प, साहस और सिद्धान्तों से तनिक भी नहीं हिला पाई। जेल से रिहा होने के उपरांत भी उन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना सक्रिय योगदान निरंतर जारी रखा। परिणामस्वरूप, उन्हें वर्ष 1938 में उन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया और जेल में डाल दिया गया। इस तरह वे जेल में जाते रहे और रिहा होते रहे। मास्टर मोता सिंह जी जैसे असंख्य देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों के असीम त्याग, बलिदान, शौर्य, संघर्ष के बलबूते 15 अगस्त, 1947 को देश को आजादी मिली। ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानियों का हम सदैव ऋणी रहेंगे। 
     आज 9 जनवरी को महान स्वतंत्रता सेनानी मास्टर मोता सिंह कश्यप जी की पुण्यतिथि है। वे वर्ष 1952 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी से विधायक बने। एक जनप्रतिनिधि के रूप में मास्टर मोता सिंह कश्यप जी ने आम जनता की आवाज बुलन्द की और उनके लिए अटूट संघर्ष किया। उन्होंने 9 जनवरी, 1960 को जालन्धर के सिविल अस्पताल में अंतिम सांस ली। इस महान देशभक्त स्वतंत्रता सेनानी, संघर्षशील नेता एवं सच्चे समाजसेवक को उनकीं पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन है। 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

 (राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
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(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में 3500 से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)