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मंगलवार, 2 अगस्त 2016

प्रतिभा का पैमाना अंग्रेजी क्यो?

मुद्दा /
प्रतिभा का पैमाना अंग्रेजी क्यो?
-राजेश कश्यप

‘‘हमारा देश भी अजीब है यार! मतलब अपनी भाषा की कद्र ही नहीं है, जिसको देखो अंगे्रजीपंती झाड़ रहा है। अंग्रेजी नहीं आती तो मतलब कुछ नहीं आता? ये जो जापानी, चीनी, रशियन, जर्मन हैं, इन लोगों को गर्व है अपनी भाषा पर। वे प्यार करते हैं अपनी भाषा से। इनके स्टूडैन्टस, साईंटिस्ट, नेता हों, सब अपनी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। इनके नेता छोड़ो, अपने ले लो। जिस देश में सिर्फ अंग्रेजी बोली और समझी जाती है, वहां पर भी हिन्दी में सीना ठोंक कर भाषण दिया है। ये तो कुछ लोगों ने चलन बना दिया है कि जो अंगे्रजी झाड़ेगा, वही झंडे गाड़ेगा। अंगे्रजी बोलो, लेकिन उसे दीवार मत बनाओ यार! जब हुनर चमकता है तो यह अंग्रेजीपंती फीकी पड़ जाती है।’’ यह अनूठा सन्देश है जाने माने हास्य अभिनेता कपिला शर्मा के वायरल हुए विडियो का। दो मिनट तीन सैकिण्ड के ‘अंग्रेजीपंती को अंगूठा’ शीर्षक से वायरल हुआ हुए इस  विडियो के जरिए अभिनेता कपिल शर्मा के हिन्दी के प्रति इन भावनाओं और जज्बातों को अनूठा इजहार किया और जहां हिन्दी के सम्मान को ठेस पहुंचाने वालों की जमकर खबर ली है, वहीं अप्रत्यक्ष रूप से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा हाल ही में विदेश यात्राओं के दौरान हिन्दी में भाषण देने की जमकर तारीफ भी की है। हास्य अभिनेता का हिन्दी के सम्मान में इस विडियो के जरिए किया गया करारा कटाक्ष एकदम सटीक, तथ्यपरक एवं सराहनीय है। जो लोग हिन्दी होकर भी हिन्दी का अपमान करते हैं, उन्हें कपिल शर्मा ने बेहद अनूठे ढ़ंग से झाड़ा है और हिन्दी पर गर्व करने की पैरवी की है। 
अंग्रेजी को प्रतिभा का पैमाना समझने का दर्द भले ही आज कपिल शर्मा के जरिए चर्चित हुआ है। लेकिन, इस दर्द से हमारे देश की असंख्य प्रतिभाएं लंबे समय से जूझ रही हैं। विडम्बना देखिए कि देश की सबसे सर्वोच्च संस्था ‘संघ लोकसेवा आयोग’ (यूपीएससी) में भी प्रतिभा का पैमाना अंग्रेजी ही बना हुआ है। पिछली यूपीए सरकार के दौरान संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) की आईएएस, आईपीएस, आईएफएस एवं आईआरएस आदि की परीक्षा के नवीनतम संशोधन के तहत अंग्रेजी भाषा की परीक्षा को अनिवार्य कर दिया गया। केवल इतना ही नहीं, अब अंग्रेजी भाषा के अंक भी मैरिट सूची में जोड़े जाने का प्रावधान भी बनाया गया। इससे पहले अंगे्रजी के साथ-साथ किसी एक भारतीय भाषा की परीक्षा में न्यूनतम अंक पाना अनिवार्य था और उनके अंक मैरिट सूची में नहीं जुड़ते थे। परीक्षा पद्धति में हुए इन बदलावों को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपनी स्वीकृति दे थी। जैसे इस परीक्षा पद्धति के बदलावों का समाचार आया, सियासी गलियारों से लेकर आम आदमी तक खलबली मच गई। इस तरह अंग्रेजी को प्राथमिकता देने से निश्चित तौरपर हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के हितों पर कुठाराघात हुआ। 
स्वतंत्रता प्राप्ति के तीन दशक से अधिक समय तक तो लोकसेवा आयोग परीक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही रहा। भारी विरोध एवं आक्रोश के बाद बाद ही अन्य विकल्प जोड़े गए। वर्ष 1977 में डॉ . दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित हुआ, जिसने संघ लोक सेवा आयोग तथा कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग आदि के  दृष्टिगत यह सिफारिश की थी कि परीक्षा का माध्यम भारत की प्रमुख भाषाओं में से कोई भी भाषा हो सकती है। वर्ष 1979 में संघ लोक सेवा आयोग ने कोठारी आयोग की सिफारिशों को लागू किया और भारतीय प्रशासनिक आदि सेवाओं की परीक्षा के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में से किसी भी भारतीय भाषा को परीक्षा का माध्यम बनाने की छूट दी गई। इसका लाभ उन उम्मीदवारों को मिलना सम्भव हुआ जो गाँव-देहात से सम्बन्ध रखते थे, अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ़ सकते थे और अनूठी प्रतिभा एवं योग्यता होते हुए भी अंग्रेजी के अभिशाप से अभिशप्त थे। 
वर्ष 2008 से मुख्य परीक्षा में अंगे्रजी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रश्रपत्रों को अनिवार्य किया गया। इसके बावजूद अंग्रेजीयत दुर्भावना का कुचक्र समाप्त नहीं हुआ। अंग्रेजी प्रश्रपत्रों को हिन्दी में इस प्रकार से अनुवादित किया गया कि हिन्दी परीक्षार्थियों के लिए उसे समझना टेढ़ी खीर साबित हो जाये। वर्ष 2011 में लोकसेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा में एक बड़ा बदलाव करते हुए वैकल्पिक विषय को हटाकर सामान्य अध्ययन के दो अनिवार्य प्रश्रपत्र शुरू किये। इनसें से एक प्रश्रपत्र पूर्णतरू सामान्य अध्ययन का है तो दूसरे पत्र को ‘सीसैट’ की संज्ञा दी गई। इस ‘सीसैट’ का मतलब है ‘सिविल सर्विस एप्टीट्यूड टैस्ट’। ‘सीसैट’ में कुल 80 प्रश्रों में से 40 प्रश्र गद्यांश (कान्प्रहेंसिव) के होते हैं। इन गद्यांशों का हिन्दी अनुवाद शक एवं षडयंत्र के दायरे में हैं। इस हिन्दी अनुवाद को समझने में बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छूट जाते हैं। इसके चलते हिन्दी भाषी प्रतिभाओं का पिछडना स्वभाविक है। जबसे ‘सीसैट’ प्रणाली लागू की गई है, हिन्दी माध्यम के प्रतियोगी निरन्तर हाशिये पर खिसकते चले गये।
आंकड़ों के नजरिये से देखें तो ‘सीसैट’ लागू होने से पहले सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले हिन्दी भाषी प्रतियोगियों का प्रतिशत दस से अधिक ही होता था। वर्ष 2009 में तो यह 25.4 प्रतिशत तक जा पहँुचा था। लेकिन, वर्ष 2013 में यह प्रतिशत घटकर मात्र 2.3 पर आ गया। जबकि, इसके विपरीत इंजीनियरिंग एवं मैनेजमैंट की अंग्रेजी पृष्ठभूमि के प्रतियोगियों का एकछत्र साम्राज्य स्थापित होता चला गया। इस तथ्य की पुष्टि करने वाले आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011 में मुख्य परीक्षा में बैठने वाले प्रतियोगियों का प्रतिशत 82.9 और वर्ष 2012 में 81.8 प्रतिशत था। वर्ष 2009 की प्रारंभिक परीक्षा में सफल होने वाले कुल 11,504 परीक्षार्थियों में से 4,861 हिन्दी माध्यम के थे। इसी तरह वर्ष 2010 में मुख्य परीक्षा देने वाले कुल 11,865 में 4,194 हिन्दी भाषा के परीक्षार्थी थे। जबकि वर्ष 2010 में मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 11,237 परीक्षार्थियों में से हिन्दी के मात्र 1,700 परीक्षार्थी ही थे, वहीं अंगे्रजी के परीक्षार्थियों की संख्या 9,316 थी। वर्ष 2012 की मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 12,157 परीक्षार्थियों में से जहां अंग्रेजी के 9,961 परीक्षार्थी थे तो वहीं हिन्दी के मात्र 1,976 ही थे। इसके साथ ही वर्ष 2013 में सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण कुल 1122 प्रतियोगियों में से हिन्दी भाषा के छात्रों की संख्या मात्र 26 ही थी। 
आंकड़ों से स्पष्ट है कि ‘सीसैट’ लागू होने से पूर्व संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में उत्तरोत्तर हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थियों की संख्या में निरन्तर इजाफा हो रहा था। हिन्दी माध्यम से उच्चाधिकारी बनने वालों ने स्वयं को साबित करके दिखाया है कि वे अंगे्रजी वालों से किसी भी मामले में कमत्तर नहीं हैं। ऐसे में जब हिन्दी माध्यम वाले युवा अंगे्रजी वालों से किसी मायने में कम नहीं हैं तो फिर उनकों राष्ट्र सेवा से क्यों वंचित करने की कोशिश की जा रही है? 
सर्वविद्यित है कि देश में सत्तर फीसदी से अधिक लोग गाँव-देहात में निवास करते हैं और अत्यन्त गरीबी का जीवन जीते हैं। वे अपने बच्चों को बड़ी मुश्किल से सरकारी स्कूलों में पढ़ा पाते हैं। देश के सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत किसी से छिपी हुई नहीं है। बच्चों को समुचित संसाधनों के अभावों के बावजूद पढने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कुछ लोग कर्ज लेकर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए शहरों में भेजते हैं और आर्थिक मजबूरियों के चलते अंगे्रजी संस्थानों और कोचिंग सैन्टरों में नहीं भेज पाते हैं। इन सब विपरित परिस्थितियों के बावजूद एक आम आदमी का बालक यदि अपनी मातृभाषा अथवा राष्ट्रभाषा के माध्यम से उच्चाधिकारी बनने का संपना संजोता है और अपनी अटूट मेहनत और अनूठी प्रतिभा के बल पर अपना लक्ष्य हासिल करने की कोशिश करता है तो उसकी कोशिशों और सपनों पर पानी क्यों फेरा जाता है? 
विडम्बना का विषय है कि लार्ड मैकाले के दावे को आज भी हम चुनौती देने में सक्षम नहीं हो पाये हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि हम ऐसा भारत बना देंगे, जो रंग-रूप में तो भारतीय होगा, लेकिन भाषा और संस्कार में अंग्रेजीयत का गुलाम होगा। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी नई केन्द्र सरकार से तब नई उम्मीदों ने जन्म लिया, जब उसने हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय भाषाओं को पूर्ण मान-सम्मान देने का संकल्प लिया। सरकार के सभी विभागों में हिन्दी को प्राथमिकता देने के आदेश भी जारी किये गये। इसी से उत्साहित होकर यूपीएससी की परीक्षा में बैठने वाले हिन्दी भाषी प्रतियोगियों ने ‘सीसैट’ के खिलाफ आवाज बुलन्द की और परीक्षा प्रणाली में बदलाव की मांग की। इसके मद्देनजर सरकार ने अरविन्द वर्मा कमेटी गठित कर दी। आज यक्ष प्रश्र यह है कि आखिर अंग्रेजी को प्रतिभा का पैमाना कब तक समझा जाता रहेगा और हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को कब तक उपेक्षा का शिकार बनाया जाता रहेगा? 
(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
स्थायी सम्पर्क सूत्र: 
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)

नारी अस्मिता के प्रति संवेदनहीनता

विडम्बना
नारी अस्मिता के प्रति संवेदनहीनता
-राजेश कश्यप

बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान ने अपनी आने वाली फिल्म की शूटिंग की थकावट को सामूहिक रेप की शिकार महिला की होने वाली हालत से तुलना करके एक नारी की अस्मिता के प्रति घोर संवेदनहीनता, संकीर्ण मानसिकता एवं अनैतिकता का परिचय दिया है। ऐसी अभद्र एवं अमर्यादित टिप्पणी करके सलमान ने नारी अस्मिता को तो चोट पहुंचाई ही है, साथ ही रेप पीडि़त महिलाओं की आत्माओं को भी अनंत एवं अहसनीय पीड़ा पहुंचाई है। निश्चित तौरपर एक सेलीब्रिटी हस्ती के लिए यह कृत्य न केवल निन्दनीय एवं अशोभनीय है, बल्कि अक्षम्य भी है। पूरे देश में नारी अस्मिता के प्रति अशोभनीय टिप्पणी की घोर निन्दा हो रही है, इसके बावजूद सलमान ने अभी तक अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगने की जरूरत तक नहीं समझी है। बेहद विडम्बना का विषय है कि नारी की अस्मिता के प्रति घोर संवेदनहीनता के मामले रूकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। सबसे बड़ी विडम्बना का विषय तो यह है कि देश के सेलिब्रिटी हों या जनप्रतिनिधि, महिलाओं के प्रति अशोभनीय एवं अमर्यादित टिप्पणी किए बिना नहीं रहते हैं। 
गत लोकसभा चुनावों के दौरान समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने तो बलात्कारों के लिए महिलाओं को ही दोषी ठहराते हुए कह डाला था कि आज किसी के घर के जानवर को भी कोई जबरदस्ती नहीं ले जा सकता है। इसके साथ ही मुलायम ने यहां तक कह दिया कि लडक़े हैं, गलती हो जाती है। दिल्ली की निर्भया-काण्ड ने हर किसी को हिलाकर रख दिया था। राष्ट्रव्यापी आक्रोश एवं आन्दोलन के दौरान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे और कांगे्रस सांसद अभिजीत मुखर्जी ने विवादित बयान देते हुए कहा कि हर मुद्दे पर कैंडल मार्च करने का फैशन चल पड़ा है। लड़कियां दिन में सज धज कर कैंडल निकालती हैं और रात में डिस्को जाती हैं। इसी तरह मुंबई आतंकी हमले के बाद भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने गैर-मर्यादित बयान देते हुए कहा कि कुछ महिलाएं लिपस्टिक पाउडर लगाकर क्या विरोध करेंगीं? 
हरियाणा में कांगे्रस के प्रवक्ता धर्मवीर ने बलात्कार के लिए लड़कियों को ही दोषी ठहराते हुए कह दिया था कि नब्बे फीसदी मामलों में बलात्कार नहीं, बल्कि लड़कियां सहमति से संबंध बनाती हैं। तृणमूल कांगे्रस विधायक चिरंजीत भी बलात्कार मामले में विवादास्पद बयान देते हुए कह चुके हैं कि वारदात के लिए कुछ हद तक लड़कियां भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि हर रोज उनकीं स्कर्ट छोटी हो रही हैं। बलात्कार के मामले में बेहद शर्मनाक बयान देते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय भी यहां तक कह चुके हैं कि औरतें अपनी सीमाएं लांघती हैं तो उन्हें दंड मिलना तय है। एक ही शब्द है, मर्यादा। मर्यादा का उल्लंघन होता है तो सीता हरण हो जाता है। लक्ष्मण रेखा हर व्यक्ति की खींची गई है। उस लक्ष्मण रेखा को कोई भी पार करेगा, तो रावण सामने बैठा है, वह सीता का हरण करके ले ही जायेगा। सीपीएम के वरिष्ठ नेता ने तो मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से यहां तक पूछ लिया था कि वह रेप के लिए कितना चार्ज लेंगी? 
वर्ष, 2013 में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने एक आम सभा में नारी अस्मिता को ताक पर रखकर स्वयं को राजनीति का पुराना जौहरी बताते हुए कह डाला कि मुझे पता है कि कौन फर्जी है और कौन सही है। इस क्षेत्र की सांसद मिनाक्षी नटराजन सौ टंच माल है। भाजपा सांसद राजपाल सैनी कह चुके हैं कि गृहणियों और स्कूली छात्राओं को मोबाइल फोन रखने की क्या जरूरत है? इससे बाहरी लोगों से उनकी जान-पहचान बढ़ती है और यौन अपराधों को बढ़ावा मिलता है। इसी तर्ज पर पिछले दिनों पांडिचेरी की सरकार ने स्कूलों में पढऩे वाली लड़कियों को आदेश दे डाला कि वो ओवरकोट पहनें। इतना हीं नहीं, सरकार ने लड़कियों को अलग स्कूल बसों में जाने के लिए भी कह दिया। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ननकी राम कंवर भी अजीब तरह का बयान देते हुए कह चुके हैं कि उन महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, जिनका भाग्य खराब चल रहा है।  
पिछले दिनों हड़ताल पर बैठी नर्सों ने आरोप लगाया कि जब वे अपनी मांगों को लेकर गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर से मिलीं तो मुख्यमंत्री ने उन्हें कहा कि लड़कियों को धूप में बैठकर भूख हड़ताल नहीं करनी चाहिये, इससे उनका रंग काला होगा और अच्छा दूल्हा मिलने में दिक्कत आयेगी। इससे पहले आदर्श सांसद का सम्मान हासिल कर चुके जेडीयू नेता शरद यादव ने दक्षिण भारत की महिलाओं के सांवलेपन पर बेतुकी एवं अमर्यादित टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘साउथ की महिला जितनी ज्यादा खूबसूरत होती है, जितना ज्यादा उसका बॉडी...जो पूरा देखने में...यानी इतना हमारे यहां नहीं होती हैं...वह नृत्य जानती हैं...।’ जब यादव ने यह टिप्पणी की तो राज्यसभा में बैठे अधिकतर जनप्रतिनिधि खिलखिलाकर नारी जाति की अस्मिता का चीरहरण करने में सहयोगी बन रहे थे। जब मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमती स्मृति इरानी ने ऐतराज जताया तो शरद यादव दो कदम और आगे बढ़ गये और खेद जताने के बजाय उलटा तंज कस दिया कि ‘मैं जानता हूँ कि आप क्या हैं?’ इससे पहले भी शरद यादव इसी तरह नारी अस्मिता को चोट पहुँचा चुके हैं। जब संसद में पहली बार महिला आरक्षण विधेयक रखा गया था, तब उन्होंने कहा था कि ‘क्या आप परकटी महिलाओं को संसद में लाना चाहते हैं?’ 
वर्ष 2010 में महिला आरक्षण के सन्दर्भ में नारी अस्मिता से खिलवाड़ करने के मामले में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भी पीछे नहीं रहे थे। उन्होंने कहा था कि महिला आरक्षण बिल पास होने से संसद ऐसी महिलाओं से भर जायेगी, जिन्हें देखकर लोग सीटियां बजायेंगे। उन्होंने एक अन्य बयान में यहां तक कह डाला था कि बड़े घर की लड़कियां और महिलाएं ही ऊपर तक जा सकती हैं, क्योंकि उनमें आकर्षण होता है। इसलिए महिला आरक्षण बिल से ग्रामीण महिलाओं को कोई फायदा नहीं होगा। देश के राष्ट्रीय समाचार चैनल एबीपी न्यूज की लाईव बहस के दौरान कांग्रेस सांसद संजय निरूपम भी नारी अस्मिता को ताक पर रख चुके हैं। वर्ष 2011 में हुए गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावों के परिणामों के बाद जारी बहस के दौरान संजय निरूपम ने आपा खोते हुए भाजपा नेत्री श्रीमती स्मृति ईरानी पर अशोभनीय टिप्पणी करते हुए कह डाला कि ‘कल तक टेलीविजन पर ठुमके लगा रहीं थीं, आज राजनीतिज्ञ बनकर घूम रही हैं आप! आपके संस्कार बहुत अच्छे हैं! शटअप, क्या करेक्टर है आपका?’ 
सबसे बड़ी विडम्बना का विषय तो यह है कि केवल पुरूष जनप्रतिनिधि ही नहीं एक महिला जनप्रतिनिधि भी नारी अस्मिता को ताक पर रखकर बयानबाजी करती रहती हैं। कभी कभी एक जिम्मेदार महिला ही नारी अस्मिता को ताक पर रखकर गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी कर बैठती हैं। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ महिला आयोग की अध्यक्ष विभा राव ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हो रहे क्राइम के लिए वह खुद भी जिम्मेदार हैं। महिलाएं वेस्टर्न कल्चर को अपनाकर पुरूषों को गलत संदेश दे रही हैं। उनके कपड़े, उनके व्यवहार से पुरूषों को गलत सिग्नल मिलते हैं। वर्ष 2008 में युवा टीवी पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की हत्या के बाद दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने बेहद चौंकाने वाला बयान दिया कि इतना अडवेंचरस नहीं होना चाहिए। वह एक ऐसे शहर में सुबह के तीन बजे अकेली गाड़ी चलाकर जा रही थी, जहां रात के अंधेेरे में महिलाओं का निकलना सुरक्षित नहीं माना जाता। मुझे लगता है कि थोड़ा ऐतिहात बरतना चाहिए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो यह कहकर कि लडक़े-लड़कियों को माता-पिता द्वारा दी गई आजादी से ही बलात्कार जैसी घटनाएं हो रही हैं, दो कदम आगे बढ़ गईं। इसी तरह राष्ट्रवादी कांगे्रस पार्टी की महिला नेत्री आशा मिर्जे भी अमर्यादित बयान देते हुए कह चुकी हैं कि महिलाएं ही एक हद तक बलात्कार के लिए जिम्मेदार हैं और उनके कपड़े एवं व्यवहार भी इसमें एक भूमिका अदा करते हैं। 
कहना न होगा कि नारी अस्मिता के प्रति संवेदनहीनता अथवा किसी भी तरह की अमर्यादित टिप्पणी करना, नारी अस्मिता के साथ सरेआम खिलवाड़ है और यौन अपराधों से किसी भी मायने में कम नहीं है। इसके लिए सख्त से सख्त कानूनी प्रावधान बनाने चाहिएं और नारी अस्मिता के प्रति संवेदनहीनता दिखाने वालों पर सख्त कार्यवाही की जानी चाहिए।

हरियाणा में कब रूकेगा दलित महिला उत्पीड़न?

यक्ष प्रश्न /
हरियाणा में कब रूकेगा दलित महिला उत्पीड़न?
-राजेश कश्यप

दलित महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार की रूह कंपा देने वाली घटनाओं के कारण हरियाणा एक बार फिर देश-दुनिया में शर्मसार है, जोकि बेहद चिंता एवं विडम्बना का विषय है। तीन साल पहले सामूहिक बलात्कार की शिकार भिवानी की एक छात्रा को 50 लाख रूपये में समझौता न करने पर फिर से आरोपियों द्वारा रोहतक में सामूहिक दुष्कर्म करने की हृदय विदारक घटना ने हर किसी को दहलाकर रख दिया है और महिला सुरक्षा व कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार तीन साल पहले भिवानी में पाँच दरिन्दों ने छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया था। तब से बलात्कारी उनसे 50 लाख रूपये लेकर समझौता करने और मुकदमा वापिस लेने का कई बार दबाव बना चुके थे। लेकिन, जब वे डराने व दबाव बनाने के हर प्रयास में नाकाम रहे तो उन्होंने छात्रा को पहले जैसा हाल करने की धमकी तक दे डाली। इस बीच छात्रा ने रोहतक के एक काॅलेज में एमकाॅम में दाखिला ले लिया और किराए के कमरे मंे रहने लगी। गत 13 जुलाई, 2016 को कार में आए पाँचों आरोपियों ने छात्रा का काॅलेज के बाहर से अपहरण करके शहर से बाहर ले जाकर फिर से सामूहिक दुष्कर्म का घिनौना कृत्य किया। उसके बाद उसे झाड़ियों में फेंककर भाग गए। बाद मंे लोगों ने उन्हें फटे कपड़ों में बेहद नाजुक व बेसुध स्थिति में देखा तो उसे पीजीआई पहुंचाया गया। मामला संज्ञान में आने के बावजूद पुलिस प्रशासन ने गम्भीरता नहीं दिखाई और लीपापोती की पूरी कोशिश हुई। एक सप्ताह बाद जब सामाजिक संगठनों ने सड़क पर उतरकर विरोध दर्ज करवाया और राजनीतिकों द्वारा दलित उत्पीड़न के मामले में प्रदेश सरकार को घेरा गया तो प्रशासन, पुलिस और सरकार हरकत में आई और तमाम वे सब कार्यवाहियां शुरू कीं, जोकि मामला संज्ञान मंे आते ही शुरू हो जानी चाहिए थीं। इस मामले की गूंज देश की संसद से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक पहुंची है और देश व प्रदेश को भारी शर्मिन्दगी उठानी पड़ी है।
यह घटना कोई अपवाद भर नहीं है, बल्कि प्रदेश में दलित महिलाओं के साथ हो रहे घोर अत्याचारों की एक नई कड़ी भर है। इससे पहले घटी घटनाओं की एक लंबी फेहरिस्त है। गत, 3 जून, 2016 को घरों में साफ-सफाई करके गुजारा करने वाली रोहतक की बाबरा मोहल्ले की दलित महिला नीतू संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हुई और उसकी लाश 12 जून को बुरी हालत में सैक्टर तीन-चार के बीच खाली प्लाट में बरामद हुई। पोस्टमार्टम के दौरान पता चला कि इस जघन्य हत्याकाण्ड की शिकार दलित महिला के प्राईवेट पार्ट को कुत्तों ने नोंच खाया था, जिससे महिला के साथ बलात्कार की पुष्टि नहीं हो पाई। इस घटना के विरोध में दर्जनों सामाजिक संगठनों द्वारा सड़कों पर उतरकर धरने-प्रदर्शन जारी हैं, लेकिन पुलिस आज तक दलित महिला की हत्या का सुराग लगाने में कामयाब नहीं हो पाई है। एक अन्य रौंगटे खड़ा कर देने वाली घटना के तहत रोहतक जिले के कलानौर में स्कूल से लौट रही पहली वर्ष की नन्हीं मासूम बच्ची को खेरड़ी निवासी नौंवी कक्षा में पढ़ने वाले दरिन्दे छात्र ने अपनी हैवानियत का शिकार बना डाला। बेहद नाजुक हालत में नन्हीं बच्ची पीजीआई रोहतक में इस कद्र सदमें में है कि माँ के अलावा किसी भी व्यक्ति की परछाई पड़ती है तो बुरी तरह चीख उठती है। डाॅक्टर भी बच्ची की इस हालत को देखकर बेहद दुःखी एवं व्यथित हैं।
वर्ष 2014 में हिसार जिले के गाँव भगाना की चार दलित लड़कियों के साथ हुए गैंगरेप का मामला भी राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था। 25 मार्च, 2014 को रात आठ बजे दबंग जाति के लोगों ने चार दलित परिवार की लड़कियों को घसीटकर कार में डाल लिया और दो दिन तक दर्जन भर युवक गैंगरेप करते रहे। प्राप्त जानकारी के अनुसार ये पीड़िताएं उन दलित परिवारों की थीं, जिनका गाँव के दबंग लोगों ने वर्ष 2011 से जमीन विवाद के चलते सामाजिक बहिष्कार कर रखा था और न्यायालय, मानवाधिकार आयोग एवं अनसूचित जाति आयोग के निर्देशों के बावजूद इस बहिष्कार तक समाप्त नहीं किया गया था। पीड़ित परिवार ने बहिष्कार के बावजूद गाँव नहीं छोड़ा तो गुस्से से भन्नाये दबंगों ने दलित परिवारों को सबक सिखाने के लिए उनकी चार बेटियों के साथ गैंगरेप के कुकत्र्य को अंजाम दे डाला।
25 अगस्त, 2013 को जीन्द जिले के गाँव बनियाखेड़ा की 19 वर्षीया डीएड दलित छात्रा का दुष्कर्म के बाद हत्या करके नहर के समीप झाडियों में फेंका गया शव मिला। जब पीड़ित पक्ष पुलिस की लापरवाही के खिलाफ सडकों पर उतरा तो उन पर बड़ी बेरहमी से लाठीचार्ज किया गया। अपै्रल, 2013 में भिवानी जिले के रिवासा गाँव में नन्ही बच्ची को दूध पीला रही दलित महिला के साथ दबंगों के सामूहिक बलात्कार करने की शर्मनाक घटना घटी। फरवरी, 2013 में हिसार जिले के सिरसाना गाँव में 13 साल की मासूम बच्ची के साथ कई दबंगों द्वारा सामूहिक बलात्कार जैसा घिनौना कुकत्र्य करने का मामला प्रकाश में आया। फरवरी, 2013 में भिवानी जिले के रत्तेरा गाँव में दबंगों ने एक दलित युवक की घुड़चढ़ी नहीं 3 नवम्बर, 2012 को हिसार के डाया (मंगाली) गाँव में एक दलित लडकी के साथ गैंगरेप किया गया और मामले में बलात्कार की दफा 376 तक हटा दी गई। अक्तूबर, 2012 में जीन्द जिले के सच्चाखेड़ा गाँव में पाँच दबंगों ने एक दलित लडकी के साथ सामूहिक बलात्कार किया। बाद में सभी दोषियों को सजा न मिलने से आहत होकर पीड़िता ने आत्महत्या कर ली। सितम्बर, 2012 में हिसार जिले के डाबड़ा गाँव में दबंगों ने एक दलित लडकी को गैंगरेप का शिकार बनाया। घटना से आहत पीड़िता के पिता ने आत्महत्या कर ली।
ये सब घटनाएं तो सिर्फ बानगी भर हैं। यदि सभी मामलों की सूची तैयार की जाए तो एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो जायेगी। सभी मामलों का यदि बारीकी से अवलोकन किया जाए तो हर किसी की रूह कांप उठती है। बेहद विडम्बना का विषय है कि हरियाणा जैसे पावन एवं प्रगतिशील प्रदेश में इस तरह की अनेक घटनाएं निरन्तर घट रही हैं और पुलिस प्रणाली एवं कानून व्यवस्था पर निरन्तर गहरे सवालिया निशान लगा रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक वर्ष जून, 2015 से जून, 2016 के बीच 520 दुष्कर्म की घटनाएं घटी हैं और औसतन हर महीने 43 महिलाओं की इज्जत लुटी गई। इसके साथ ही छेड़खानी के 863 मामले और 801 महिलाओं के अपहरण के मामले दर्ज हुए हैं। प्रदेश में वर्ष 2009 में दलित महिलाओं के विरूद्ध अत्याचारों की 1346 शिकायतें दर्ज हुईं, जोकि वर्ष 2014 में बढ़कर 2233 हो गईं। इन आंकड़ों की गम्भीरता को सहज समझा जा सकता है।
        हरियाणा में अक्तूबर, 2012 में चले बलात्कार के अनवरत सिलसिले से खफा होकर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष पी.एल. पूनिया ने हरियाणा को ‘बलात्कार प्रदेश की संज्ञा देने को विवश होना पड़ा था। बेहद विडम्बना का विषय है कि यह स्थिति जस की तस है। गौर करने लायक बात तो यह है कि दलितों पर जब भी कोई अत्याचार होता है तो उस घटना को दबाने की भरसक कोशिश की जाती है। जिन मामलों पर सियासत गर्म होती है, उन्हीं मामलों में पीड़ित दलितों की सुध ली जाती है। शेष मामलों में पीड़ित दलित अन्याय एवं अव्यवस्था के आगे घुटने टेकने को विवश हो जाते हैं। यह परिपाटी बेहद चिंताजनक एवं विडम्बनापूर्ण है। जब तक यह परिपाटी नहीं बदलती है, तब तक दलितों की स्थिति में सुधार आना असंभव लगता है।


(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

स्थायी सम्पर्क सूत्र :
राजेश कश्यप
(स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक)
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
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विशेष साक्षात्कार / पिछड़ों की बदौलत ही भारत प्रबुद्ध देश कहलायेगा : रामचन्द्र जांगड़ा

मुझे गत दिनों हरियाणा पिछड़ा वर्ग एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग कल्याण निगम के चेयरमैन आदरणीय श्री रामचन्द्र जांगड़ा जी से गोहाना (सोनीपत) स्थित उनके निवास पर विशेष साक्षात्कार करने का परम सौभाग्य मिला। मैंने पिछड़ा वर्ग कल्याण निगम के चेयरमैन के रूप में उनकीं नई जिम्मेदारी से लेकर, पिछड़ा वर्ग के हकों से जुड़े मुद्दों तक और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से लेकर भावी सामाजिक परिस्थितियों तक अनेक गम्भीर सवाल किए। आदरणीय रामचन्द्र जांगड़ा जी ने इस विशेष साक्षात्कार में जितनी सरलता, सहजता व जिम्मेदारी के साथ सभी सवालों के ठोस जवाब दिए, उतनी ही गम्भीरता से कई चौंकाने वाली बातों का भी खुलासा किया, जिनपर देश व समाज को ईमानदारी से चिंतन-मंथन करना चाहिए।  आपके लिए पेश है यह ख़ास  साक्षात्कार। (राजेश कश्यप)

रामचंद्र जांगड़ा के साथ राजेश कश्यप 

सवाल :  सर, आप अपनी नई जिम्मेदारी को किस रूप में देखते हैं? क्या आप इस जिम्मेदारी से संतुष्ट हैं या आपको लगता है कि इससे बड़ी और अन्य कोई जिम्मेदारी आपको मिलनी चाहिए थी?

रामचन्द्र जांगड़ा : प्रदेश संगठन ने और प्रदेश की सरकार ने जो कुछ सोचकर मुझे जिम्मेदारी दी है, उसके बारे में मैं समझता हूँ कि जिम्मेदारी कोई छोटी बड़ी नहीं होती है। जिम्मेदारी निभाने का जो इंसान का जज्बा होता है, उसके साथ ही जिम्मेदारी की कीमत होती है। मुझे जिम्मेदारी दी गई है हरियाणा पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर श्रेणी के कल्याण की। मेरे निगम के तहत माईनोरीटीज, कन्वीक्ट सैक्शंस और विकलांगों को भी जोड़ा गया है। हमारी निगम एक चैनेलाइजिंग एजेन्सी है, जो केन्द्र की निगमों के साथ जुडक़र, वहां से पैसा लाकर, यहां पर इन वर्गों के कल्याण के लिए देती है। कोई भी स्वयं रोजगार स्थापित करने के लिए निगम से पैसा ले सकता है। 
पिछली सरकारों की जो उदासीनता रही इन निगमों के प्रति, उसका यह हाल था कि जब मैंने इस निगम का कार्यभार संभाला, तब इसमें 26 प्रतिशत कर्मचारी थे। इसमें निगम की टीम भी आ गई और प्रदेश के मुख्यालय की टीम भी आ गई। सन 2013 में हुड्डा सरकार ने कॉपरेटिव ऋण माफ किए थे और बिजली के बिल माफ किए थे तो उस समय निगम के लोगों ने कहा कि हमारे ऋण भी माफ करो। उन्होंने कह दिया कि तुम्हारे भी ऋण माफ किए जाते हैं। इसके बाद लोगों ने किस्तें देनी बन्द कर दीं। लेकिन, उनको यह मालूम नहीं था कि यह स्टेट का पैसा नहीं है। यह केन्द्र के निगमों द्वारा प्रदेश की गारंटी पर आया हुआ पैसा है। इसको लौटाना लाजिमी है। जब निगमों ने पैसा लौटाया ही नहीं तो केन्द्रीय निगमों ने पैसा देना बन्द कर दिया। हालात यह आ गए कि निगम के पास अपने लोगों को पैसा देने के लिए बजट शून्य हो गया। अल्पसंख्यक और विकलांग के पास भी शून्य बजट था। मैंने पिछले साल 11 दिसम्बर को चार्ज लिया था। उसके बाद मैंने निगम के सारे आंकड़े मंगाए, फाईलें मंगाई। मैं यह देखकर हैरान था कि इस निगम के पिछड़े वर्ग के लोग ही चेयरमैन थे, जैसे कि रामनिवास घोड़ेला, कुम्हार जाति से थे, इसी प्रकार अन्य लोग थे। वे लोग अपने निगम के प्रति इतने उदासीन थे कि वे कभी ऑफिस ही नहीं आए। वे महीने में एक बार आए, अपना टी.ए./डी.ए. लिया, पेट्रोल के पैसे लिए और चम्पत हो गए। कोई किसी का ध्यान ही नहीं था। मैंने जब मुख्यमंत्री जी के सामने सारे आंकड़े प्रस्तुत किए तो वे भी हैरान थे कि क्या हाल हो गया था निगम का।  
चार्ज संभालने के बाद मैंने निगम से संबंधित जितने विभाग थे, सभी से सम्पर्क किया। मैं केन्द्रीय पिछड़ा वर्ग कॉरपोरेशन, विकलांग कॉरपोरेशन, अल्पसंख्यक कॉरपोरेशन आदि सभी जगह गया तो उन्हें भी यह हैरानी हुई कि आज हरियाणा से पहली बार कोई चेयरमैन आया है। उन्होंने मुझे बताया कि दक्षिण भारत के लोग, गुजरात के लोग इतना पैसा यहां से ले जाते हैं, स्टेट सरकारें गारंटी देती हैं। हरियाणा से ऐसा कोई आदमी नहीं आता। आप हरियाणा से पहले ऐसे चेयरमैन हो जो यहां आए हो। मेरी अपील पर उन्होंने तुरन्त 3.5 करोड़ रूपया विकलांगों के बजट में, 7.5 करोड़ रूपया अल्पसंख्यक बजट में हरियाणा प्रदेश के लिए जारी कर दिया। लेकिन, पिछड़े वर्ग के बजट में दिक्कत यह थी कि जितनी पिछली बकाया किस्तें थीं, जो देनी बन्द कर दी गईं थीं, जब तक वो पेमेंट नहीं होंगी, तब तक नई धनराशि नहीं दी जानी थी। मैंने इस सन्दर्भ में हमारे संबंधित आईएएस अधिकारी और हमारे मंत्री कृष्ण बेदी के सामने सारे आंकड़े व तथ्य प्रस्तुत किए तो हमारा काफी अच्छा बजट इस बार पास हो पाया। जल्द ही पिछड़े वर्ग के लोगों को देने के लिए पैसा आ जाएगा। 
इसके साथ-साथ मेरा निगम मोदी जी के स्कील इंडिया कार्यक्रम के तहत ट्रेनिंग दिलवाने का काम करती है। लेकिन मैं तब बेहद हैरान हुआ कि जब मैंने यह पूछा कि आप हरियाणा के कितने लोगों को टे्रनिंग करवा सकते हो तो उन्होंने मुझे जो सूची दी, वो 16 से 90 सीटों की सूची थी। 600 सीटें सीपेड इंस्टीच्यूट मुरथल, सेन्टर इन्स्टीच्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीरियरिंग, प्लंबरिंग, टैक्सटाईल सैक्टर और हारट्रोन कम्प्यूटर सैंटर की थीं। लेकिन, कोई आदमी ऊपर जाता ही नहीं था। कागजों में खानापूर्ति की और सब पैसा हजम कर लिया अधिकारियों से मिलकर। कभी किसी को ट्रेनिंग दिलवाई नहीं जाती थी। मैंने तमाम इंस्टीच्यूट से सम्पर्क किया और उनसे कहा कि मैं तुम्हें स्टूडैंट दूंगा और प्रशिक्षण के लिए वास्तविक खर्च दूंगा। मुझे इस बात की खुशी है कि मैंने अभी तक 200 से 300 बच्चों को विभिन्न प्रकार की टे्रनिंग दिलवाई हैं और आगे भी ये टे्रनिंग जारी रखने के दिशा-निर्देश दे दिए हैं। क्योंकि अपना हाथ, जगन्नाथ होता है। 
मुझे तब बेहद पीड़ा होती है, जब कोई आर्टिजन श्रेणी का व्यक्ति चपड़ासी या फिर हैल्पर की नौकरी मांगने आता है। अगर, उनके हाथ में कारीगरी हो तो वे अपने स्वयं के रोजगार स्थापित करके अपने जीवन को उच्च स्तर पर ले जा सकते हैं। मैंने इस ओर पूरा ध्यान दिया है। इन टे्रनिंग्स के लिए मैंने तमाम डीम्स को आदेश दे दिए हैं। वे बच्चों को इन टे्रनिंग्स को लेने के लिए प्रेरित करें। उन्हें टे्रनिंग देने के बाद स्वरोजगार स्थापित करने के लिए निगम से ऋण दिलवाएं। मेरा मानना है कि हर काम में चुनौती होती है। हर काम में गुंजाईश होती है। हर काम में एक मौका होता है। यह तो काम करने वाले पर निर्भर होता है। मैं तो किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं मानता। सरकार और मुख्यमंत्री का साथ हमारे साथ है। उन्होंने कहा है कि आप स्कीम बनाकर हमें दीजिए, पिछड़ों के कल्याण के लिए आप जितना कर सकते हैं, करिए, बजट हम देंगे। ऐसे में मुझे उम्मीद है कि हरियाणा में मैं इस निगम का अच्छा काम चला पाऊंगा। यह सब सरकार के आशीर्वाद से चलेगा। 

सवाल : आपके इन रचनात्मक प्रयासों के सकारात्मक परिणाम समाज में कब तक देखने को मिलने लग जाएंगे?

रामचन्द्र जांगड़ा : देखिए, जैसे छोटी सी छोटी टे्रनिंग एनएलटी की है, नैशनल टू ग्रो टे्रनिंग सैन्टर हैं हापुड़ और गाजियाबाद के बीच में। उनकीं सबसे कम अवधि की टे्रनिंग 3 महीने की है। प्लेसमेंट की गारंटी है। उनमें हमें अभी कुछ बच्चे भेजे हैं। सीपेड टे्रनिंग के लिए 40 बच्चों का एक बैच भेजा है, जोकि 4 महीने का है। दो बैच 6 महीने की टे्रनिंग के लिए चल रहे हैं। ये दोनों ही इंस्टीच्यूट ऐसे हैं, इसमें टे्रनिंग प्लेसमेंट गारंटी के साथ के साथ होती है। टे्रनिंग पूरी होते ही वहीं से कम्पनियां इन बच्चों को ले जाती हैं। डिमाण्ड हो जाती है, क्योंकि हाथ का जो कारीगर है, उसकी डिमाण्ड ऑन ओवर वल्र्ड है। हिन्दूस्तान की 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष की उम्र से कम की है। अगर इस देश के लोगों के हाथ में दक्षता दे दी जाए तो मैं कहता हूँ कि हम पूरे विश्व पर छा सकते हैं। विश्व में कहीं भी इस उम्र के इतने काम करने वाले लोग नहीं हैं। इसलिए, पूरे विश्व पर भारत छा सकता है। मैं समझता हूँ कि इसके सकारात्मक परिणाम इस साल के अन्दर आने शुरू हो जाएंगे। बच्चे जैसे-जैसे टे्रनिंग लेकर जाएंगे, वैसे-वैसे उनकीं प्लेसमेंट होगी। वह पड़ौसी को बताएगा, उसके गाँव में पता चलेगा। इस तरह लोगों का इस तरफ  रूझान होगा। इसीलिए मैं समझता हूँ कि एक वर्ष तक बहुत अच्छे परिणाम इसके आ जाएंगे।  

सवाल : पिछड़ों में भी आर्थिक रूप से अति पिछड़े हैं। क्या आपके निगम में उनके लिए कोई खास योजनाएं हैं, जिनका वे लाभ उठा सकें?

रामचन्द्र जांगड़ा : देखिए, वैसे तो पिछली सरकार के कार्यकाल में पिछड़े लोगों के लिए बहुत भारी ज्यादती हुई। बीपीएल सर्वे में इतनी धांधली हुई हैं, बड़ी-बड़ी हवेलियों वाले बीपीएल के राशनकार्ड बनवाए हुए हैं और जो पात्र लोग हैं, वे दर-दर भटक रहे हैं। बीपीएल की एक पात्रता रख दी कि बीपीएल श्रेणी का परिवार ही इस लाभ का ले सकेगा। हमारी सरकार ने उस बीपीएल की कंडीशन को खत्म कर दिया है। गरीब आदमी कोई भी हो, जिसकी सालाना आमदनी 98,000 रूपये है, और शहरी क्षेत्र में सालाना आय 1 लाख 20 हजार रूपये है, वो तहसीलदार से या पटवारी से लिखवाकर कि इसकी आमदनी इतनी है, का सर्टिफिकेट बनवाकर इन योजनाओं का लाभ ले सकता है। अब उनके लिए बीपीएल कार्ड दिखाना जरूरी नहीं है। लेकिन, अभी मैंने काफी जगह ऐसा देखा है कि हरियाणा को हम लें तो एक चपरासी का बच्चा भी 98,000 की सालाना आमदनी की सीमा को पार कर जायेगा। एक क्लर्क का बच्चा भी इस सीमा को पार कर जायेगा। इसीलिए, वह इन योजनाओं का लाभ नहीं ले सकेगा। मैंने तमाम कॉरपोरेशन के जो दस्तावेज मंगवाए, उनसे मुझे अभी पता चला कि पिछली यूपीए सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए 6 लाख की क्रीमिलीयर की सीमा तय कर दी। जिनकीं सालाना 6 लाख रूपये आमदनी है, इन योजनाओं का लाभ ले सकता है। अभी मैं हरियाणा सरकार की तरफ  से भारत सरकार को पत्र भेजने की तैयारी कर रहा हूँ कि जब अल्पसंख्यक समुदाय के लिए यह छूट है, जब 6 लाख सालाना आमदनी वाला व्यक्ति तमाम योजनाओं का लाभ ले सकता है तो पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए ऐसा क्यों नहीं है? इनकों भी आरक्षण का लाभ क्रिमीलेयर से नीचे को ही मिलता है। मैं यह पूरा प्रपोजल बना रहा हूँ। इसके लिए मैंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी से समय मांगा है। थावरचन्द गहलोत, जो केन्द्र में हमारे मंत्री हैं, सोशल जस्टिस एण्ड एम्पावरमैंट मिनिस्टर, उनको हम अपनी यह प्रपोजल देंगे। मेरी यह कोशिश रहेगी कि पिछड़ी श्रेणी के लोगों की भी आमदनी की जो सीमा है, वो भी 6 लाख रूपये तक की हो जाए। इसके बाद नीचे से लेकर, ऊपर तक का आदमी भी इन योजनाओं का लाभ ले सकेगा। मुझे उम्मीद है कि यह मैं बढ़वा लूंगा। इसके बाद हर व्यक्ति तक इस योजना का लाभ पहुंच जाएगा। 

सवाल : आपकी योजनाएं अनपढ़ लोगों के बीच सहज रूप से चली जाए। ऑन लाईन योजनाएं अंग्रेजी में हैं। सरकारी बाबू गरीब लोगों से सीधे मुंह बात नहीं करते हैं। ऐसे में आपकी तरफ  से क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

रामचन्द्र जांगड़ा : अभी हमारे जितने परफोर्मे हमारे कॉरपोरेशन के हैं, उसके डबल पेज हैं। एक तरफ पूरी जानकारी अंग्रेजी में है, दूसरी तरफ हिन्दी में है। मैंने यह प्रावधान करवा दिया है। इसके साथ हमने सभी योजनाओं के पम्पलेट्स छपवा लिए हैं। वो मेरे चण्डीगढ़ के मुख्य कार्यालय में चुके हैं। हम उन्हें जिला स्तर पर बंटवाएंगे। हमारे पास स्टाफ  की कमी थी। मैंने हरियाणा सरकार को स्टाफ की भर्ती के लिखा है। जितनी हमारी सैंक्शंड सीटें हैं, वे जल्दी ही भर देंगे एक महीने के अन्दर। जब हमारे फील्ड ऑफीसर्स की भर्ती हो जाएगी तो पम्पलेट्स देकर हम गाँव स्तर पर हम उन्हें रोजाना लक्ष्य देंगे कि तीन गाँवों में उन्हें जाना है और लोगों को इन योजनाओं की जानकारी देना है। कम से कम मेरे कॉरपोरेशन में लोगों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ेगा। 

सवाल : चेयरमैन बनने से पहले आप अक्सर कहते थे कि पिछड़ा वर्ग कल्याण निगम अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पाया है। आपने बताया था कि इस निगम का टार्गेट 40 फीसदी था, जोकि मुश्किल से 2.5 प्रतिशत भी नहीं हासिल हुआ। क्या आप उस 40 प्रतिशत के टार्गेट को लेकर चल रहे हैं और यदि हाँ तो उसमें कितना टार्गेट आप हासिल कर पाए हैं? आप 40 प्रतिशत टार्गेट कब तक हासिल कर लेंगे?

रामचन्द्र जांगड़ा : देखिए, वर्ष 1980 में इस निगम की स्थापना हुई थी और 2015 तक इन 35 सालों में, जैसाकि आपको पता ही है कि निगम का जो निर्धारित क्षेत्र है, वह 27 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग, 8 प्रतिशत अल्पसंख्यक और 2.5 विकलांग के हिसाब से कुल मिलाकर 37-38 प्रतिशत बनता है। लेकिन, अब तक यह जितने लोगों तक पहुंच पाया है, वो केवल 2.4 प्रतिशत मात्र है, जिनमें 1 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग के लोग, 0.4 प्रतिशत विकलांग श्रेणी के लोग और 1 प्रतिशत अल्पसंख्य के लोगों तक पहुंच पाया है। ये पिछली सरकारों की उदासीनता का साक्ष्य है कि वे कितने इस बात के प्रति गम्भीर थे कि गरीब लोगों को ऊपर उठाया जाए। इस बात से आप अन्दाजा लगा सकते हैं। मैंनें यह सारे आंकड़े मुख्यमंत्री जी को दिए। वे भी यह सब देखकर हैरान थे, हमारे मंत्री भी हैरान थे और आईएएस ऑफीसर भी हैरान थे कि आपने ही ये आंकड़े निकालकर दिए हैं। अब तक तो इन पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया था। जब हम 40 प्रतिशत आबादी को कवर करते हैं और 35 साल में अब तक मात्र 2.4 प्रतिशत को ही पहुंच पाए हैं तो यह क्या दर्शाता है? इस निगम की उपयोगिता क्या है? केवल एक पोलीटिकल आदमी को खुश कर दिया जाए, उसको लाल बत्ती की गाड़ी दे दी जाए, टीए/डीए दे दिया जाए, मानदेय दे दिया जाए और सरकारी सुविधाओं का लाभ लेकर ऐश करता फिरे? केवल मात्र यही उद्देश्य रहा है अब तक। लेकिन, हम जो चेयरमैन बनाए गए हैं तो मुख्यमंत्री का सख्त आदेश है कि आप काम करने के लिए बनाए गए हैं। हमारा भी जीवन में एक उद्देश्य है कि हम लोगों के लिए काम करें। हमें जो जिम्मेदारी दी गई है, उसको बखूबी निभाएं। हमारे सामने प्रमुख दिक्कत थी कि पिछली सरकार ने ऋण तो माफ कर दिए, लेकिन उनकीं किस्तें ऊपर पहुंची नहीं। मैंने 11 करोड़ 70 लाख रूपए की एक किस्त ऊपर पहुंचवा दी और 27 करोड़ की जल्दी ही एक और किस्त वहां पर चली जाएगी। जब सेन्ट्रल कॉरपोरेशन से पैसा आना शुरू हो जाएगा, मैं समझता हूँ कि मैं अपने इस एक ही कार्यकाल में मैं लगभग पूरे हरियाणा के लोगों तक पहुंच बना लूंगा। यह मेरा उद्देश्य है। 

सवाल : आपने कुछ समय पहले भाजपा के न्याय मोर्चा के अध्यक्ष के रूप में सभी वर्गों को उत्तर प्रदेश की तर्ज पर सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले के तहत हिस्सा देने का सुझाव दिया था। उस सोशल फार्मूले के बारे में कुछ बताएंगे? 

रामचन्द्र जांगड़ा : देखो, एक समय था जब समाज द्वारा शासित अर्थव्यवस्था इस देश में थी। किसान के खलिहान से सबका हिस्सा बंट जाता था। जितने भी भूमिहीन कारीगर लोग थे, चाहे वो मजदूर लोग थे, खेती से सम्बंधित लोग थे, चाहे वे खेत में मजदूरी करते थे या खेती के उपकरण बनाते थे। उन सबका हिस्सा खेत से ही निकल जाता था। इसे समाज द्वारा शासित अर्थव्यवस्था बोलते हैं। लेकिन, आज वो व्यवस्था नहीं रही, अब मशीनी युग आ गया है। इससे ग्रामीण कारीगर की उपयोगिता खत्म हो गई है। मशीनी युग में हमें भी अपनी दक्षता में परिवर्तन करना पड़ेगा। आज अगर हम काठ के घर बनाएं तो कोई नहीं बनवाएगा। कड़ी के घर बनवाएं तो कोई नहीं बनवाएगा। लेंटर का और बीस-बीस मंजिली इमारतों को बनाने की टैक्नोलोजी सीखनी पड़ेगी। आज यह मामला आ गया है कि पिछले काफी दिनों से सत्ता केन्द्रित अर्थव्यवस्था हो गई। सत्ता में जिसकी हिस्सेदारी है, वो लोग लाभ लेते रहे, बाकी लोग वंचित रह गए। इसमें पिछड़े वर्ग के लोगों को सबसे ज्यादा घाटा हुआ। पिछड़ी श्रेणी के लोग काफी बिखरा हुआ समाज है। इसकी आबादी तो बहुत ज्यादा है। लेकिन इक्कठी नहीं है। किसी गाँव में दस घर मिल जाएंगे, किसी में बीस मिल जाएंगे। किसी में पाँच मिल जाएंगे और किसी में पचास मिल जाएंगे। बिखरी हुई वोट हैं। बिखरी हुई वोट के कारण किसी राजनीतिक पार्टी को इनकीं सामूहिक ताकत दिखाई नहीं देती। इसलिए यह टिकटों से वंचित रह जाते हैं। वो अन्दाजा लगा लेते हैं कि इस क्षेत्र में इतनी वोट हैं, इस क्षेत्र में इतनी वोट हैं। अब लोगों में जैसे-जैसे राजनीतिक चेतना आई है, अब लोगों का एक उद्देश्य बना है कि हमारी भी राजनीतिक में हिस्सेदारी हो, ताकि जहां पर हक हो हकूक का बंटवारा होता है विधानसभा या लोकसभा में, हमारा कोई आदमी वहां जाकर आवाज उठाए तो हमारे लिए भी देश के बजट में प्रावधान आएगा। यह एक आम धारण बनी है और यह सत्य भी है। इसमें कोई दो राय नहीं है। पिछले दिनों जिन लोगों का भी वहां प्रतिनिधित्व था, वो अपना बांटकर खाते रहे। जिनकी भागीदारी नगण्य थी, उनको नगण्य लाभ मिला। यह होता रहा है। समाज में जिस प्रकार की चेतना है। सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला देश में है। जो पार्टी इनको प्रतिनिधित्व देती है, जैसे पूरे देश में एक सन्देश गया, पिछड़ी श्रेणी के एक साधारण परिवार का एक आदमी नरेन्द्र मोदी, एक तेली परिवार में जन्म लिया, जिसने चाय बेची बचपन में, उसको प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया भाजपा ने। इसका सकारात्मक सन्देश पूरे देश में गया और पूरे देश की पिछड़ी श्रेणी, जिसकी देश में 52 प्रतिशत आबादी है, उसे यह लगा कि पहली बार हमारा कोई आदमी सत्ता के शिखर पर बैठेगा। इसका लाभ बीजेपी को मिला। इसी प्रकार मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि में जहां-जहां प्रतिनिधित्व दिया, वहां-वहां अच्छे सकारात्मक परिणाम आए। यू.पी. का उदाहरण ले लें। जिस समय कल्याण सिंह का नेतृत्व था, वह जन कल्याण के मामले में भी और सुशासन के मामले में भी प्रदेश में अब तक का सबसे अच्छा शासन रहा। यह सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला जहां भी अपनाया गया, वो कामयाब हुआ है। भारतीय जनता पार्टी जाति-पाति में विश्वास तो नहीं करती, लेकिन उसका अंतिम आदमी तक का यानी अन्त्योदय का सपना है। अंतिम आदमी का जो पैमाना है, उसमें पिछड़ी श्रेणी के लोग ही आते हैं। मैं समझता हूँ कि सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला हरियाणा में कम था, मुझे भी आखिरी में टिकट दी गई थी। लेकिन, लोगों को लगता था कि हमें ऐसी सरकार अपनानी है जो सबका साथ, सबका विकास का सपना पूरा कर सके और जातिवाद व क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर प्रदेश का विकास कर सके। उस पैमाने पर बीजेपी खरी उतरती थी। सबको पता है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल जी न तो वो जाति-समुदाय की तरफ  झुकाव करते हैं, न परिवारवाद के पोषण का कोई मामला है, जीरो टोलरेंस का उनका मकसद है। यह भी एक सोशल इंजीनियरिंग का ही मामला है। जिस समुदाय के लोग कल्पना नहीं कर सकते थे कि हरियाणा जैसे राज्य में कि उनका भी कोई मुख्यमंत्री होगा। लेकिन, जो भी व्यक्ति राष्ट्र के प्रति समर्पित है, बचपन से संघ का एक उद्देश्य लेकर राष्ट्र के लिए लड़ाई लड़ रहा है, वही बीजेपी का उम्मीदवार है। बीजेपी इस बारे में ऐसा ही सोचती है। वह केवल जाति का नहीं सोचती, न वर्ग सोचती। जो राष्ट्र का सोचता है, वही बीजेपी कोटे से आता है। इस मामले में समझता हूँ कि चाहे सोशल इंजीनियरिंग का मामला कह लो या अच्छे लोगों को आगे लाने का मामला कह लो। आगे आने वाले समय में भी बीजेपी में अच्छे लोगों को प्रतिनिधित्व मिलेगा। हम अपनी पार्टी में भी आवाज उठाते रहते हैं। मैं जिस समय बीजेपी में आया, उस समय पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ बनाया गया था। इस प्रकोष्ठ की बीजेपी में कोई ज्यादा मान्यता नहीं होती है। प्रकोष्ठ में एक प्रदेश का संयोजक होता है, एक सह-संयोजक होता है, एक जिले में संयोजक होता है। उसकी कोई टीम नहीं होती। न प्रदेश का पदाधिकारी माना जाता, सिर्फ  कार्य समिति का मेम्बर होता है। मैंने संविधान देखा, मैं बड़ा हैरान था। कैसे सत्ता में आएंगे हम? इतने बड़े वर्ग के प्रति संगठन में यह उदासीनता है? मैंने राजनाथ जी के समक्ष ये मुद्दा उठाया, मैंने राष्ट्रीय संगठन मंत्री रामलाल जी के सामने भी यह मुद्दा उठाया। उनकीं समझ में भी यह बात आई। उन्होंने कहा कि हम पिछड़ापन का नाम हटाना चाहते हैं। इसका कोई दूसरा नाम सुझाओ। सबकी समझ में आया कि इसका कोई मोर्चा बनाया जाए व सामाजिक न्याय मोर्चा नाम रखा जाए। मोर्चे की संगठन में कीमत है। मोर्चे की जो अध्यक्ष है, वो प्रदेश का प्रदेन पदाधिकारी होता है।  मतलब, प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश उपाध्यक्ष, महामंत्रियों की टीम के अन्दर बैठता है। मोर्चे का कोई भी अध्यक्ष, चाहे वो महिला मोर्चा हो, चाहे अनुसूचित जाति मोर्चा हो या युवा मोर्चा हो। अब यह पिछड़ा वर्ग मोर्चा भी बन गया है। इस तरफ मैंने पूरा प्रयास किया। मुझ पर आज तक जो भी जिम्मेदारी आई है, मैं उसकी तह तक गया हूँ कि इसको बखूबी कैसे निभाया जाए? इस बात मैं अपने आप पर फक्र भी कर सकता हूँ कि पार्टी ने इस बात पर ध्यान दिया और आज ओबीसी मोर्चा पूरे देश में है, राष्ट्रीय अध्यक्ष एस.पी.एस. बघेल बने हुए हैं। बाकायादा 11ए अशोका रोड़ पर इसका राष्ट्रीय स्तर का कार्यालय है। इससे पहले बीजेपी कार्यालय में कम से कम पिछड़े वर्ग का कोई अलग से कमरा नहीं था।

सवाल : आप पिछले काफी लंबे समय से पिछड़ों की आवाज बुलन्द करते आए हैं। इससे पिछड़ों में आपके प्रति गहरी साख है। आप अन्य सरकारों पर आरोप लगाते आए हैं कि किसी ने भी पिछड़ों को पूरा प्रतिनिधित्व नहीं दिया है। चूंकि, आप बीजेपी में हैं, तो क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि भाजपा सरकार में पिछड़ों को उनका पूरा प्रतिनिधित्व मिल जायेगा?

रामचन्द्र जांगड़ा : मैं यह कह सकता हूँ कि हमारी सरकार में भेदभाव की कोई गुंजायश नहीं है। कोई अपने आपको कितने ही ऊंचे खानदान का कहता हो, कितनी ऊंची जाति का कहता हो, कितना प्रभावशाली अपने आपको मानता हो, यहां पर किसी व्यक्ति को जाति के नाम पर, या उसकी संख्या के नाम पर नहीं भुनाया जा सकता। यहां पर वही होगा, जो न्यायपूर्ण है। पिछले समय में यह होता रहा कि जहां भी जिसका कोई प्रभावशाली आदमी था, चाहे वो जीरो प्रतिशत नंबर लिए हुए था, उसको आगे ला दिया गया, मैरिट का बच्चा पीछे धकेल दिया गया। लेकिन, हमारी सरकार ऐसा कुछ नहीं होगा। मैरिट के आधार पर सारी नियुक्तियां हो रही हैं। सैंटिंग के जरिए जो पीछे लोग लाभ उठाते थे, आज वे बैचेन हैं। आज उनमें व्याकुलाहट है। पीछे जो आरक्षण का जो आन्दोलन था, यह आरक्षण का कम था, सत्ता पलट का ज्यादा था। यह इसीलिए था कि हमारी सरकार ने भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टोलरेंस की नीति अपनाई। तहसीलों की नीलामी बन्द हो गई। थानों की नीलामी बन्द हो गई, जो कामचोर कर्मचारी थे, उन्हें सुबह आते और शाम को जाते समय बायोमीट्रिक मशीन पर जाकर अंगूठा लगाना पड़ गया। ऑनलाईन रजिस्ट्रियां शुरू कर दीं। ऑनलाईन एफआईआर शुरू कर दीं। कितनी बार लोगों को न्याय नहीं मिलता था। अगर कोई एक्सीडेंट हो जाता तो कोई कहता यह हमारा क्षेत्र नहीं और कोई कहता कि यह हमारा क्षेत्र नहीं है। पहले जीरो एफआईआर शुरू कर दी कि पहले एफआईआर शुरू करो, थाने का फैसला बाद में हो जाएगा। महिला थाने शुरू कर दिए। तमाम सरकारी योजनाओं का लाभ था, चाहे पैन्शन को मामला हो, तमाम खातों में पैसा आना शुरू हो गया। चाहे गैस सिलेण्डर का मामला हो, उनकीं सब्सीडी का पैसा तमाम खातों में आना शुरू हो गया। अब आदमी घट गए या गैस बढ़ गई? आज कहीं गैस सिलेण्डरों के लिए लाईनें नहीं लगतीं। किसी समय जाओ, अपना कार्ड दिखाओ और गैस का सिलेण्डर ले आओ। पहले गैस सिलेण्डर के लिए लोग सुबह चार बजे लाईन में खड़े होते थे। तकरीबन 11 बजे नंबर आता था और फिर कहते कि आज सिलेण्डर खत्म हो गए, कल आना। आज किसी भी वक्त जाओ, कार्ड लो, पर्ची कटवाओ और सिलेण्डर लो। ये सब इसीलिए है कि हमने सिस्टम को ठीक कर दिया। इस सिस्टम से पहले जो लोग लाभ उठा रहे थे करप्शन से लाभ उठा रहे थे, वो लोग बैचेन थे, वो लोक सरकार को पलटना चाहते थे। इसीलिए, उन्होंने हिंसा का रास्ता अपनाया, ताकि सरकार अस्थिर हो जाए। लेकिन, वो लोग कामयाब नहीं हो सके। आज सारे समाज को समझ में आ गया है, जाट समाज की समझ में भी आ गया है कि जिसने भी यह रास्ता अपनाया है, वह गलत है। हर आदमी जो देश की सोचता है, प्रदेश की सोचता है, समाज समरसता की सोचता है, वो अब इस बात को सोचने के लिए बाध्य है कि यह सरकार सही रास्ते पर है और यही प्रदेश की प्रगति का रास्ता है। 

सवाल : नौकरियों के मामले में पिछड़े लोगों का बैकलॉग आज तक नहीं भरा गया है। एचपीएससी में भी पिछड़ों को आज तक 27 प्रतिशत की बजाय मात्र 10 प्रतिशत ही आरक्षण दिया जा रहा है। यह बैकलॉग कब भरा जायेगा और कब एपीएससी में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा?

रामचन्द्र जांगड़ा : यह वर्ष 1995 में भजनलाल सरकार ने पिछड़े वर्ग के साथ सबसे बड़ा धोखा किया था। मण्डल कमीशन की रिपोर्ट वर्ष 1990 में ही आ गई थी और वर्ष 1991 तक तकरीबन पूरे देश में यह रिपोर्ट लागू हो गई थी, केवल हरियाणा को छोडक़र। हरियाणा में तत्कालीन मुख्यमंत्री भजनलाल ने इस बारे में एक और नया तीन सदस्यीय आयोग बैठा दिया, जिसके अध्यक्ष देशराज कम्बोज और परमानंद व जयनारायण वर्मा सदस्य थे। इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर भजनलाल ने अपनी मर्जी से पिछड़ों की ‘ए’ और ‘बी’ कैटेगरी बनाई। ‘ए’ कैटेगरी में 16 प्रतिशत रिजर्वेशन क्लास थ्री और फोर तक दे दी गई। ‘बी’ कैटेगरी में 11 प्रतिशत और वह भी क्लास थ्री और फोर तक। लेकिन, जो क्लास वन और टू की पोस्ट थी, उन दोनों को क्लब कर दिया और क्लब करके पुराने 10 प्रतिशत आरक्षण को ही जारी रख दिया। यह बहुत बड़ा अन्याय था। वर्ष 1995 के बाद पिछड़ा वर्ग की गेजेटेड पोस्ट की भर्ती लगभग शून्य हो गई है, क्योंकि दूसरी जो पाँच जातियां शामिल की गईं थीं, वो राजनीतिक रूप से सुदृढ़ थीं, चाहे वे यादव थे, चाहे गुज्जर थे और चाहे सैनी थे। उन तक ही यह लाभ जाता रहा। लेकिन, जो मूल रूप से पिछड़े श्रेणी के लोग थे, चाहे वे झीमर थे, तेली थे, तम्बोली थे, कुम्हार थे, नाई थे, खाती थे, लुहार थे, उनका प्रतिनिधित्व क्लास वन और टू में एक तरह से नगण्य हो गया। लेकिन, लम्बे समय तक यह चलता रहा है। किसी सरकार ने इस तरफ कोई कदम उठाया नहीं। अब जो नया नोटिफिकेशन हुआ है, इसमें 16 प्रतिशत 10 और 6 मिलाकर कर दिया है। यानी 10 से बढ़ाकर 16 कर दिया है। ‘ए’ कैटेगरी की जातियों को 10 प्रतिशत दे दिया है और ‘बी’ कैटेगरी की 5 जातियों को 6 प्रतिशत दे दिया है। इस तरह नए नोटिफिकेशन के मुताबिक यह आरक्षण 10 से बढक़र 16 हो गया है। इससे भी पिछड़े वर्ग के लोगों को बहुत बड़ा सहारा मिल जायेगा। लेकिन, भविष्य में इसके सकारात्मक परिणाम आएंगे। केवल मात्र नौकरियों के आधार पर समाज का विकास नहीं हो सकता है। प्रदेश की आबादी 2.5 करोड़ है, उसमें तीन लाख नौकरियां हैं। इस तरह केवल 1.5 प्रतिशत नौकरियां बनती हैं। नौकरी तो एक अलग चीज है विकास के लिए, इसका मैं समर्थक हूँ। लेकिन, तकरीबन जो कारीगर जातियां हैं, चाहे वह छिप्पी है, चाहे लुहार है, चाहे कुम्हार है, उनकीं कलाओं की तरफ ध्यान देने की जरूरत है। अब झज्जर में एक कुम्हार भाई हैं। उसके बर्तन विदेशों में भी एक्सपोर्ट होते हैं। वह बढिय़ां कलात्मक चीजें बनाता है। लेकिन किसी कुम्हार को मिट्टी खोदने के लिए जगह नहीं दी गई। आवे-पजावे लगाने की जगह नहीं दी गई। जहां पर पजावे लगते थे, वहां पर पंचायती जमीन पर लोगों ने कब्जे कर लिए और वहां से कुम्हारों को खदेड़ दिया। ईंटे भट्ठे से आनी शुरू हो गई। ये प्रैक्टिकल चीजें हैं। कुम्हार तो वही गधे का मालिक रह गया। भ_े का मालिक तो कोई और बन गया। हमारी सरकार का यह इरादा है कि अगर मिट्टी की कला संसार को पकाने की कुम्हार ने दी है तो मिट्टी के सम्बंध में जितनी कलात्मक चीजें हैं और जितनी भी प्रोडक्शन है, चाहे वह ईंट बनाता है, चाहे मटका बनाता है, उसका मालिक भी कुम्हार ही होना चाहिए। वो तो अपने गधे लेकर आज तक मजदूर ही बना बैठा है। उसका मालिक तो कोई और है। हमारी सरकार यह चाहती है कि उनको इस स्तर तक ले जाया जाये कि उनको मालिकाना हक मिले और अपनी कला पर उनको पूरा का पूरा कब्जा हो। वो केवल मजदूर बनकर न रहे। उसके हाथ में जो कला है, उसको आधुनिक बनाने में मदद की जाये और उसे काम आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक मदद दी जाये, ताकि वह समाज की अच्छी श्रेणी के नागरिक के रूप में आ सके। इस सरकार जो अंतिम आदमी के उदय का जो सपना है, हम समझते हैं कि एक कार्यकाल गुजरेगा, लोगों को पता चल जाएगा और फिर दूसरा कार्यकाल आयेगा तो एक नये भारत का निर्माण हो जायेगा और हमारा देश प्रबुद्ध भारत कहलायेगा। यह सब पिछड़ों की बदौलत ही कहलायेगा, क्योंकि यही इस देश का असली रचनात्मक वर्ग है, जिनके हाथों में सारी दक्षता है। इन सब पर समय की मार पड़ी है। लेकिन, सरकार का इस ओर ध्यान है। जो लोग आजादी की लड़ाई लड़े, 1857 की क्रांति के दमन के बाद, सांहसी, कांजर इनको 1870 के एक्ट के अनुसार जायरा पेशा घोषित कर दिया गया। इस तरफ किसी ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। चोर-उचक्के उनको बना दिया गया। धक्के से उनपर चोरी के इल्जाम लगाकर थाने में बंद कर दिया जाता, दस नंबरी बना दिया जाता। हमारी सरकार ने पहली बार इस ओर ध्यान दिया है। जितनी घूमन्तू जातियां हैं, हम अलग से इनका आयोग बना रहे हैं, इनके बच्चों के लिए बोर्डिंग स्कूल बना रहे हैं। कुछ स्कूल चालू भी हो गए हैं। इनका अलग से एक सिस्टम चालू करके, चाहे गाडिय़ा लुहार हैं,चाहे सिपलीकर हैं, सिंगीकाट हैं, सपेरे हैं, बाजीगर हैं, ये सब जितनी घूमन्तू जातियां हैं, हम इनका अलग से बोर्ड बनाकर इनके विकास के लिए भी एक नया रास्ता तय कर रहे हैं। मैं समझता हूँ कि देश व समाज का जो एक रचनात्मक विकास होना चाहिए, उसकी ओर बीजेपी का ध्यान है। जैसे-जैसे समय आयेगा, इन सब प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सबके सामने आ जायेंगे। 

सवाल : चेयर बनने के बाद आपको कौन-कौन सी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

रामचन्द्र जांगड़ा : हमें सबसे ज्यादा चुनौतियां का सामना करना पड़ता है, ब्यूरोक्रेसी से। देश की जो ब्यूरोक्रेसी, खास तौरपर आईएएस, आईपीएस का जो ढ़ांचा है, अब कुछ लोग रिजर्वेशन से आगे आ गए, जो उसी समाज से निकले थे, जो दलित की श्रेणी में था, वो अलग बात है। लेकिन, ज्यादातर गर्वनमेंट कल्चर के लोग इसमें आए। इस बारे में एक छोटा सा उदाहरण दे सकता हूँ। हरियाणा प्रदेश में न ठण्ड पड़ती, न मछली यहां खाई जाती, न कोई मीट खाया जाता और न मुर्गे खाए जाते। क्योंकि यह गरम प्रदेश है। लेकिन, यहां पर हेचरिज के नाम पर सब्सिडी, पोल्ट्रीज के नाम पर सब्सिडी, सुअर पालन पर सब्सिडी, मछली पालन पर सब्सिडी। इस प्रदेश का क्या बना दिया, जो दूध-दही का प्रदेश था। जो गर्वनमेंट कल्चर से जुड़े लोग होते हैं, वे इस तरह की योजनाएं बनाते हैं। वो राजनीतिक लोगों को आर्थिक फायदा का एक सपना दिखा देते हैं कि इससे इतना पैसा उनको भी मिल जाएगा, हमें भी मिल जाएगा। इस चक्कर में राजनीतिक लोगों को भी लपेट लेते हैं। लेकिन, हमारी पार्टी इससे अलग है। बीजेपी में पहले संघ के जरिए संस्कार डाले जाते हैं, उसके बाद में आदमी को राजनीति में लाया जाता है। जब तक संस्कारीत लोग राजनीति में नहीं आएंगे, तब तक ब्यूरोक्रेसी उनका दुरूपयोग करती रहेगी और अपने ढ़ंग से चलाती रहेगी। देश की योजनाओं को ऐसे ढ़ंग से चलाएगी जैसे राजनीति और ब्यूरोक्रेसी का आपस में गठजोड़ है, उसको यह फायदा मिलता रहे। लेकिन, अब वो गठजोड़ टूट गया है। ब्यूरोक्रेसी को भी पता चल गया है कि अब मछली पालन का, मुर्गे पालन का समय चला गया है और अब गौ पालन का समय आ गया है। अब गौ सेवा आयोग हरियाणा में बना है। ये एक शुरूआत है। देशों में देश हरियाणा, जहां दूध-दही का खाणा, कहते थे, उसके लिए गौ सेवा आयोग का पहली बार गठन हुआ है। अब मछली आयोग का समय गया, गौ सेवा आयोग का समय आ गया है। इसके सकारात्मक परिणाम बहुत जल्द आप सबके सकारात्मक परिणाम आ जाएंगे। 

सवाल : सरकार बनने से पहले शायद ही किसी को उम्मीद थी कि भाजपा बिना किसी राजनीतिक गठबन्धन के हरियाणा में पूर्ण बहुमत की सरकार बना लेगी। लेकिन, आपने सबसे पहले इसकी भविष्यवाणी कर दी थी। आपके इस विश्वास का क्या आधार था?

रामचन्द्र जांगड़ा : मेरा राजनीतिक अनुभव और राजनीतिक आकलन यह कह रहा था कि चौटाला की तानाशाही से लोग पीछा छुड़ाना चाहते हैं, हुड्डा के जातिवाद और भ्रष्टाचार से लोग पीछा छुड़ाना चाहते हैं। इन सबका विकल्प एकमात्र बीजेपी है। चौधरी भजन लाल का परिवार, कुलदीप बिश्नोई जो अपने आपको समझता था कि मैं गैर-जाट का नेता कहलाऊंगा, उसका यह वहम था। मुझे कम से कम यह अहसास था कि धरातल पर सच्चाई कुछ और है। बीजेपी के बारे में जो मान्यता है पिछड़ी श्रेणी की, वह एक अलग से मान्यता है। मुझे यह विश्वास था कि चुनावों के दौरान आखिरी समय में लोग यही निर्णय करेंगे कि हम उस पार्टी को वोट दें, जो जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद आदि से ऊपर उठकर काम करेगी। कुल मिलाकर लोगों की उम्मीदों पर जो पार्टी खरी उतरती थी, वह बीजेपी ही थी। मैं अन्दर से आश्वस्त था कि अंतिम समय में लोगों का निर्णय लेना पड़ेगा और इसी लाईन पर आना पड़ेगा। मेरा जो आकलन था, वह बिल्कुल सही साहित हुआ। 

सवाल : जाट आन्दोलन के दौरान जिस तरह के दंगे हुए, कानून का मखौल उड़ा, यह सब कैसे हुआ? सरकार पर फेल होने के आरोप लग रहे हैं। आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगे? 

रामचन्द्र जांगड़ा : देखो मैं जैसा कि पहले ही आपको बता चुका हूँ कि जो अधिकारी लोग 10 प्रतिशत या 15 प्रतिशत मन्थली आती थी, वो बन्द हो गई। सारे टेन्डर ऑनलाईन हो गए। रजिस्ट्रियां ऑनलाईन शुरू हो गईं। तहसीलों की बिक्री बंद हो गई। थानों की बिक्री बंद हो गई। एफआईआर जीरो शुरू हो गई। पूरा तंत्र बैचेन था। समाज में एक तंत्र था, जो सैटिंग करवाता था कि एचटेट पास करवाने के इतने पैसे हैं, नौकरी में इन्टरव्यु पास करवाने के इतने पैसे लगेंगे, रिटर्न टेस्ट पास करवाने के इतने पैसे लगेंगे, मलाईदार जगह पर पोस्टिंग करवाने के इतने पैसे लगेंगे। वो सारी चीजें जो बन्द हो गईं, उसमें कुछ कर्मचारी व अधिकारी वर्ग और कुछ समाज के जो इस किस्म का काम करते हैं, राजनीति में लाईजनिंग का काम करते थे, वे सारे के सारे लोग बैचेन थे। उन्होंने इसका फायदा उठाया। युवापीढ़ी को बहकाया और उकसाया कि आरक्षण से ही तुम्हारा विकास हो सकता है। जब लोग गलत रास्ते पर चल पड़े तो वे अधिकारी लोग पीछे हट गए और आपस में लड़ाकर आम जनता को मरने के लिए छोड़ दिया गया। ये सारी चीजें आपके सामने आ चुकी हैं। प्रशासनिक अधिकारियों के नाम प्रकाश सिंह कमेटी ने उजागर कर दिए हैं कि क्या अधिकारियों का रोल था और थानों को किस तरह छोडक़र भाग गए और किस तरह से अपनी जिम्मेदारियों से अलग हट गए। ये सब बातें सबके सामने आ चुकी हैं। पूरा तंत्र अब बैचेन है। वे सस्पेंड भी हो गए, कुछ टर्मिनेट भी होने शुरू हो गए हैं। सरकार भी यह नहीं सोचती कि कोई आदमी राजनीतिक फायदे के लिए और अपने स्वार्थ के लिए इस हद तक जा सकता है कि प्रदेश का सौहार्द ही समाप्त कर दे। इसमें हमारा आकलन हरियाणा की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार यह था कि कुछ भी हो, हरियाणा सामाजिक भाईचारे के लिए मशहूर है। इसमें जातिवाद की गुंजाइश नहीं है। लेकिन कुछ लोग इस बात को ले आए। लेकिन, अब लोगों की समझ में भी अब यह बात आ गई है कि सामाजिक सौहार्द ही विकास का एकमात्र रास्ता है। समाज में जब तक समरसता नहीं होगी, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता के भी कोई मायने नहीं इसमें जो लोग इसमें शामिल थे, चाहे वो यशपाल मलिक था, चाहे और लोग थे, सबके ऊपर मुकदमे दर्ज हैं। डीजीपी ने जो गीता का सन्देश है कि कोई आततायी का वध करने लगे तो कोई दोष नहीं लगता है, जो स्त्री का अपहरण करता हो, चाहे प्रोपर्टी को जला रहा हो और शस्त्र लेकर आपकी तरफ मारने के लिए दौड़ रहा हो, उसको गीता में आततायी की संज्ञा दी गई है और आततायी का वध करने में भी कोई दोष नहीं लगता है। हरियाणा प्रदेश के डीजीपी इस बात को खुले तौरपर कह चुके हैं। इस बात की कानून भी इजाजत देता है। मैं समझता हूँ कि जो असामाजिक ताकते थीं, उनके हौंसले पस्त हो गए हैं और भविष्य में हरियाणा में अमन-चैन के साथ विकास होगा। 

सवाल : निष्पक्ष व पारदर्शी कार्यवाही के लिए विपक्ष प्रकाश सिंह आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की लगातार मांग कर रहा है। क्या प्रकाश सिंह आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए?

रामचन्द्र जांगड़ा : सार्वजनिक हो तो रही है। जिन-जिन अधिकारियों के उसमें नाम हैं, उनको लगातार दण्डित किया जा रहा है। एक-एक स्टैप बाई स्टैप सारे काम होते हैं। जरूरी नहीं रिपोर्ट को ही सार्वजनिक करके कोई टैस्ट लेना होता है। प्रकाश सिंह कमेटी की जो सिफारिशें जिन अधिकारियों के प्रति, जिन कर्मचारियों के प्रति या जिन लोगों का जो रोल रहा है, उन सबका आकलन मुख्यमंत्री जी के और सरकार के सामने है। जैसे अभी यशपाल मलिक के साथ-साथ 125 लोगों पर मुकद्मा दर्ज हुआ है, तीन एचएसीएस अधिकारी सस्पेंड हुए हैं, उनके नाम सबके सामने आए हैं, नौ डीएसपी सस्पेंड हुए, उनके नाम सबके सामने हैं और तकरीबन दर्जनों एएसआई व इंस्पेक्टर लेवल के लोगों को चार्जशीट व संस्पेंड किया गया है। जब ये सारी चीजें सामने आ रही हैं तो इस प्रकार रिपोर्ट अपने आप ही उजागर हो जाएगी कि किसके नाम थे और किनको दंडित कर दिया गया है। 

सवाल : समीकरण और तथ्य बता रहे हैं कि इन दंगों के पीछे कुछ राजनीतिक नेताओं का भी हाथ था? क्या राजनीतिक नेताओं पर भी कार्यवाही नहीं होनी चाहिए?

रामचन्द्र जांगड़ा : बाकायदा होगी और होनी भी चाहिए। चाहे वो मेरी पार्टी का भी हो और चाहे विपक्षी पार्टी का हो। जो अपने व्यक्तिगत राजनीतिक उद्देश्य के लिए प्रदेश का अमन-चैन खराब करता है, सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ता है तो सुनिश्चित रूप से उसका सन्देह सामने आ जाता है। 
सवाल : जाट आरक्षण पर हाईकोर्ट ने स्टे लगा दिया है। जाटों ने एक बार फिर 5 जून से आन्दोलन की घोषणा कर दी है। एक बार फिर पिछली पुनरावृति न हो, क्या सरकार ने इसके लिए पूरी तैयारी कर ली है?
रामचन्द्र जांगड़ा : अब किसी को डरने की जरूरत नहीं है। अब दंगों की कोई गुंजाइश नहीं है। सरकार पूरी तरह सजग है। यह फैसला देश की सर्वोच्च अदालत का है। सरकार ने अपनी जिम्मेदारी को पूरा किया है। पिछली दफा भी सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों को पूरा किया था। यूपीए सरकार के दौरान आरक्षण दिया गया। उसी सरकार के समय में इसे चैलेंज किया गया। हमारी सरकार के समय में इसका निर्णय आया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द किया। हमारी सरकार ने उस पर पुनर्विचार याचिका डाली। हमारी सरकार यही कर सकती थी। यह पुनर्याचिका भी रद्द हो गई। सर्वोच्च अदालत से ऊपर कोई नहीं। लेकिन, हरियाणा प्रदेश का सौहार्द बिगाडऩे के लिए संवैधानिक व्यवस्थाओं से ऊपर उठकर लोगों ने प्रदेश का नुकसान किया, तकरीबन लाखों करोड़ की सम्पत्ति जलाई गई। नुकसान तो हुआ है, हर जगह बिखराव हुआ है। लेकिन, सरकार ने तमाम खाप पंचायतों आदि को बुलाकर बीच का रास्ता निकाला और लोगों की मांग के अनुसार आरक्षण दे दिया। लेकिन, यदि वो कोर्ट में चैलेंज होता है तो सरकार उसमें क्या कर सकती है? कोर्ट में जाने का हर वर्ग और हर व्यक्ति को अधिकार है। कोर्ट से ऊपर न सरकार है और न व्यक्ति है। सरकार दोबारा हाईकोर्ट में दोबारा फिर जवाब दे देगी। संविधान में जो लिखा गया है, निर्णय उसी के अनुसार होता है। संविधान में आरक्षण का जो मूल आधार है, उसको सामाजिक आधार पर तय किया गया है। राजस्थान में भरतपुर और अलवर में दोनों मिलाकर जाटों को पिछड़ा मानकर आरक्षण दे दिया गया। हरियाणा में जाट सामाजिक रूप से पिछड़ेपन की श्रेणी में नहीं आता है। यह ठीक है कि आर्थिक रूप से पिछड़े जाट भी हैं, ब्राहा्रण भी हैं, बनिए भी हैं और पंजाबी वर्ग के लोग भी हैं। मैं समझता हूँ कि इसका सही रास्ता यही निकलता था। एक पिछड़े वर्ग की श्रेणी, एक दलित वर्ग की श्रेणी और एक आर्थिक पिछड़ेपन की श्रेणी में आरक्षण देना चाहिए। उस आर्थिक पिछड़े वर्ग की श्रेणी में चाहे जाट आता हो, चाहे ब्राहा्रण आता हो, चाहे पंजाबी आता हो, चाहे बनिया आता हो और चाहे ठाकुर आता है, उनको अलग से आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर अलग से आरक्षण की सीमा तय करके दे दिया जाए। बाकी जो पिछड़े वर्ग और दलित वर्ग हैं, उनको छेड़ा न जाए। यही एक सही रास्ता निकलता था। लेकिन, इन लोगों ने दबाव बनाया, जल्दबाजी की, दंगे किए और सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया। सरकार चाहती थी कि समाज में समरसता रहे। लोगों को लगे कि सरकार सबका साथ और सबका विकास कर रही है। सरकार ने तो सब कर दिया। लेकिन, यदि फिर भी यह कोर्ट में चैलेंज होता है तो न इसे सरकार रोक सकती है और कोई व्यक्ति रोक सकता है। संविधान के ऊपर न कोई नहीं है। पिछले दिनों हरियाणा में जो कुछ भी हुआ, उसकी हम जोरदार भत्र्सना करते हैं और निन्दा भी करते हैं। लेकिन, आगे सरकार सजग है। देश के संविधान से ऊपर जाकर यदि कोई देश की कानून व्यवस्था बिगाडऩे की कोशिश करेगा तो डीजीपी साहब भी, मुख्यमंत्री जी भी और पूरी सरकार कह चुकी है कि ऐसे लोगों को भविष्य में बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वो सरकारी कर्मचारी व अधिकारी हों और चाहे वो आम आदमी हो। प्रदेश के सौहार्द और कानूनी व्यवस्था को किसी भी हालत में बिगडऩे नहीं दिया जाएगा। 

सवाल : आप समाज को क्या सन्देश देना चाहेंगे?


रामचन्द्र जांगड़ा : मेरा सन्देश यही है कि हरियाणा में छत्तीस कौम की बहू-बेटी को हर आदमी अपनी बहू-बेटी मानता था। बेटे की बारात लेकर जाता तो गाँव की बहन को सम्मान के तौरपर एक रूपया या दो रूपये की जो व्यवस्था थी, देकर आता था। ब्याह-शादी में आपस में न्यौंदा-निंधार होती थी, उसमें जाति-धर्म का कोई मामला नहीं था। सब लोग एक-दूसरे की मदद करते थे। दूसरे की बहन-बेटी को पूरी इज्जत व सम्मान देते थे। सुख-दु:ख में एक-दूसरे के काम आते थे। हरियाणा में कई बार भीषण अकाल पड़े, लेकिन कभी कोई भूखा नहीं सोया। लोग एक-दूसरे को संभालते थे कि कोई भूखा तो नहीं रह गया। वही समरसता और वही शांति हरियाणा में आए और वही सद्भाव हरियाणा के लोगों में पैदा हो, मेरा यह सपना है। सबका साथ और सबका विकास के रास्ते पर चल रही और भ्रष्टाचार विहिन सरकार का लोग पूरा सहयोग करें और हमारा जो अंतिम आदमी के उदय का जो सपना है, चाहे उसमें कोई जाट है और चाहे गैर-जाट है, वह पूरा हो। हर कोई पसन्द नहीं करता कि कोई किसी जाति का नाम ले। हम तो हरियाणा एक और हरियाणवी एक नीति के तहत छत्तीस बिरादरी का विकास करके चलते हैं। सामाजिक सद्भाव के साथ प्रदेश विकास के रास्ते पर आगे बढ़े, यही मेरा सपना है और यही मेरा सन्देश है। 

रविवार, 8 मई 2016

जननी तेरी जय है !

8 मई / मातृ दिवस विशेष
Mothers Day Special - Rajesh Kashyap

जननी तेरी जय है !
- राजेश कश्यप

‘‘माँ !’’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वत: उमड़ पड़ता है और मनो:मस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘माँ’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘माँ’ की ममता और उसके आँचल की महिमा का को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। नौ महीने तक गर्भ में रखना, प्रसव पीड़ा झेलना, स्तनपान करवाना, रात-रात भर बच्चे के लिए जागना, खुद गीले में रहकर बच्चे को सूखे में रखना, मीठी-मीठी लोरियां सुनाना, ममता के आंचल में छुपाए रखना, तोतली जुबान में संवाद व अटखेलियां करना, पुलकित हो उठना, ऊंगली पकडक़र चलना सिखाना, प्यार से डांटना-फटकारना, रूठना-मनाना, दूध-दही-मक्खन का लाड़-लड़ाकर खिलाना-पिलाना, बच्चे के लिए अच्छे-अच्छे सपने बुनना, बच्चे की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी चुनौती का डटकर सामना करना और बड़े होने पर भी वही मासूमियत और कोमलता भरा व्यवहार.....ये सब ही तो हर ‘माँ’ की मूल पहचान। इस सृष्टि के हर जीव और जन्तु की ‘माँ’ की यही मूल पहचान है।
हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब ‘माँ’ की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी ‘माँ’ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बावजूद ‘माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई शब्दों में नहीं पिरो पाया है।
हमारे देश भारत में ‘माँ’ को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है और वेदों में ‘माँ’ को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम ‘माँ’ के रूप में की उद्बोधित किया गया है:
‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वमम देव देव:।।’
वेदों में ‘माँ’ को ‘अंबा’, ‘अम्बिका’, ‘दुर्गा’, ‘देवी’, ‘सरस्वती’, ‘शक्ति’, ‘ज्योति’, ‘पृथ्वी’ आदि नामों से संबोधित किया गया है। इसके अलावा ‘माँ’ को ‘माता’, ‘मात’, ‘मातृ’, ‘अम्मा’, ‘अम्मी’, ‘जननी’, ‘जन्मदात्री’, ‘जीवनदायिनी’, ‘जनयत्री’, ‘धात्री’, ‘प्रसू’ आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है।
ऋग्वेद में ‘माँ’ की महिमा का यशोगान कुछ इस प्रकार से किया गया है, ‘हे उषा के समान प्राणदायिनी माँ ! हमें महान सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करो। तुम हमें नियम-परायण बनाओं। हमें यश और अद्धत ऐश्वर्य प्रदान करो।’
सामवेद में एक प्रेरणादायक मंत्र मिलता है, जिसका अभिप्राय है, ‘हे जिज्ञासु पुत्र! तू माता की आज्ञा का पालन कर, अपने दुराचरण से माता को कष्ट मत दे। अपनी माता को अपने समीप रख, मन को शुद्ध कर और आचरण की ज्योति को प्रकाशित कर।’
प्राचीन ग्रन्थों में कई औषधियों के अनुपम गुणों की तुलना ‘माँ’ से की गई है। एक प्राचीन ग्रन्थ में आंवला को ‘शिवा’ (कल्याणकारी), ‘वयस्था’ (अवस्था को बनाए रखने वाला) और ‘धात्री’ (माता के समान रक्षा करने वाला) कहा गया है। राजा बल्लभ निघन्टु ने भी एक जगह ‘हरीतकी’ (हरड़) के गुणों की तुलना ‘माँ’ से कुछ इस प्रकार की है:
‘यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरितकी।’
(अर्थात, हरीतकी (हरड़) मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली होती है।)
श्रीमदभागवत पुराण में उल्लेख मिलता है कि ‘माताओं की सेवा से मिला आशिष, सात जन्मों के कष्टों व पापों को भी दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा का कवच का काम करती है।’ इसके साथ ही श्रीमदभागवत में कहा गया है कि ‘माँ’ बच्चे की प्रथम गुरू होती है।‘
रामायण में श्रीराम अपने श्रीमुख से ‘माँ’ को स्वर्ग से भी बढक़र मानते हैं। वे कहते हैं कि:
‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।’
(अर्थात, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढक़र है।)
महाभारत में जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि ‘भूमि से भारी कौन?’ तब युधिष्ठर जवाब देते हैं:
‘माता गुरूतरा भूमे:।’
(अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।)
महाभारत में अनुशासन पर्व में पितामह भीष्म कहते हैं कि ‘भूमि के समान कोई दान नहीं, माता के समान कोई गुरू नहीं, सत्य के समान कोई धर्म नहीं और दान के समान को पुण्य नहीं है।’
इसके साथ ही महाभारत महाकाव्य के रचियता महर्षि वेदव्यास ने ‘माँ’ के बारे में लिखा है कि:
‘नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गति:।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।’
(अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।)
तैतरीय उपनिषद में ‘माँ’ के बारे में इस प्रकार उल्लेख मिलता है:
‘मातृ देवो भव:।’
(अर्थात, माता देवताओं से भी बढक़र होती है।)
संतो का भी स्पष्ट मानना है कि ‘माँ’ के चरणों में स्वर्ग होता है।’ आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी कालजयी रचना ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रारंभिक चरण में ‘शतपथ ब्राहा्रण’ की इस सूक्ति का उल्लेख कुछ इस प्रकार किया है:
‘अथ शिक्षा प्रवक्ष्याम:
मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेद:।’
(अर्थात, जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा।)
‘माँ’ के गुणों का उल्लेख करते हुए आगे कहा गया है कि:
‘प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।’
(अर्थात, धन्य वह माता है जो गर्भावान से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।)
‘चाणक्य-नीति’ के प्रथम अध्याय में भी ‘माँ’ की महिमा का बखूबी उल्लेख मिलता है। यथा:
‘रजतिम ओ गुरू तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।’
(अर्थात, जिस प्रकार संसार में पाँच प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार पाँच प्रकार की माँ होती हैं। जैसे, राजा की पत्नी, गुरू की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता।)
‘चाणक्य नीति’ में कौटिल्य स्पष्ट रूप से कहते हैं कि, ‘माता के समान कोई देवता नहीं है। ‘माँ’  परम देवी होती है।’
महर्षि मनु ने ‘माँ’ का यशोगान इस प्रकार किया है:
 ‘दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य होता है। सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हजार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण ‘माँ’ होती है।’
विश्व के महान साहित्यकारों और दार्शनिकों ने ‘माँ’ की महिमा का गौरवपूर्ण बखान किया है। एच.डब्लू बीचर के अनुसार, ‘जननी का हृदय शिशु की पाठशाला है।’ कालरिज का मानना है, ‘जननी जननी है, जीवित वस्तुओं में वह सबसे अधिक पवित्र है।’ इसी सन्दर्भ में विद्या तिवारी ने लिखा है, ‘माता और पिता स्वर्ग से महान् हैं।’ विश्व प्रसिद्ध नेपोलियन बोनापार्ट के अनुसार, ‘शिशु का भाग्य सदैव उसकी जननी द्वारा निर्मित होता है।’ महान भारतीय कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना में ‘माँ’ की महिम कुछ इस तरह बयां की:
‘स्वर्ग से भी श्रेष्ठ जननी जन्मभूमि कही गई।
सेवनिया है सभी को वहा महा महिमामयी’।।
(अर्थात, माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ कही गई हैं। इस महा महिमामयी जननी और जन्मभूमि की सेवा सभी लोगों को करनी चाहिए।)
इसके अलावा श्री गुप्त ने ‘माँ’ की महिमा में लिखा है:
‘जननी तेरे जात सभी हम,
जननी तेरी जय है।’
इसी क्रम में रामचरित उपाध्याय ने अपनी रचना ‘मातृभूमि’ में कुछ इस प्रकार ‘माँ’ की महिमा का उल्लेख किया है:
‘है पिता से मान्य माता दशगुनी, इस मर्म को,
जानते हैं वे सुधी जो जानते हैं धर्म को।’
(जो बुद्धिमान लोग धर्म को मानते हैं, वे जानते हैं कि माता पिता से दस गुनी मान्य होती है।)
इसके साथ ही ‘माँ’ के बारे में एक महाविद्वान ने क्या खूब कहा है, ‘कोमलता में जिसका हृदय गुलाब सी कलियों से भी अधिक कोमल है तथा दयामय है। पवित्रता में जो यज्ञ के धुएं के समान है और कत्र्तव्य में जो वज्र की तरह कठोर है-वही दिव्य जननी है।’
सिनेमा में भी ‘माँ’ पर आधारित बहुत सारी फिल्में और गाने बनाए गए हैं। कई गीत तो इतने मार्मिक बन पड़े हैं, जिनको सुनकर व्यक्ति एकदम द्रवित हो उठता है। मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा फिल्म ‘दादी माँ’ (1966) के लिए लिखा गया यह गीत आज भी लोगों के हृदय पटल पर अपनी अमिट छाप बनाए हुए है:
‘उसको नहीं देखा हमने कभी,
पर इसकी जरूरत क्या होगी!
ऐ माँ...ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग,
भगवान की सूरत क्या होगी!!’
‘माँ’ के बारे में लिखी गई ये हृदयस्पर्शी पंक्तियां हर किसी को प्रभावित किए बिना नहीं रहतीं:
‘कौन सी है वो चीज जो यहां नहीं मिलती।
सबकुछ मिल जाता है, लेकिन,
 हाँ...! ‘माँ’  नहीं मिलती।’
जो नारी ‘माँ’ नहीं बन पाती, वह जीवन भर स्वयं को अधूरा मानती है और जीवन भर तड़पती रहती है। समाज में ऐसी औरत को ‘बांझ’ कहा जाता है और उसकी कदम-कदम पर उपेक्षा की जाती है। नारी की इसी मनोदशा को हरियाणा के ‘सूर्यकवि’ पं. लखमीचन्द ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘पूर्ण भगत’ में कुछ इस तरह चित्रित किया है:
‘बांझ दोष की बीर नै के बेरा,
सन्तान होण का किसा दर्द हो सै।’
(अर्थात, जो औरत ‘माँ’ न बनी हो यानी जो बांझ हो, भला उसे प्रसव-पीड़ा का क्या पता हो सकता है।)
नारी इस सृष्टि और प्रकृति की ‘जननी’ है। नारी के बिना तो सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी शाश्वत सत्य को हरियाणा के सिरमौर कवि पं. मांगे राम ने अपने प्रख्यात साँग ‘शकुन्तला-दुष्यन्त’ में कुछ इस प्रकार समाहित किया है:
‘स्त्री ना होती जग म्हं, सृष्टि को रचावै कौण।
ब्रहा्रा विष्णु शिवजी तीनों, मन म्हं धारें बैठे मौन।
एक ब्रहा्रा नैं शतरूपा रच दी, जबसे लागी सृष्टि हौण।’
(अर्थात, यदि नारी नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। स्वयं ब्रहा्रा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ बैठे थे। जब ब्रहा्रा जी ने नारी की रचना की, तभी से सृष्टि की शुरूआत हुई।)
कुल मिलाकर, संसार का हर धर्म जननी ‘माँ’ की अपार महिमा का यशोगान करता है। हर धर्म और संस्कृति में ‘माँ’ के अलौकिक गुणों और रूपों का उल्लेखनीय वर्णन मिलता है। हिन्दू धर्म में देवियों को ‘माँ’ कहकर पुकारा गया है। धार्मिक परम्परा के अनुसार धन की देवी ‘लक्ष्मी माँ’, ज्ञान की देवी ‘सरस्वती माँ’ और शक्ति की देवी ‘दुर्गा माँ’ मानीं गई हैं। नवरात्रों में ‘माँ’ को नौ विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। मुस्लिम धर्म में भी ‘माँ’ को सर्वोपरि और पवित्र स्थान दिया गया है। हजरत मोहम्मद कहते हैं कि ‘‘माँ’  के चरणों के नीचे स्वर्ग है।’ ईसाईयों के पवित्र ग्रन्थ में स्पष्ट लिखा गया है कि ‘माता के बिना जीवन होता ही नहीं है।’ ईसाई धर्म में भी ‘माँ’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसके साथ ही भगवान यीशु की ‘माँ’ मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है। बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया गया है। यहुदी लोग भी ‘माँ’ को सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं। यहुदियों की मान्यता के अनुसार उनके 55 पैगम्बर हैं, जिनमें से सात महिलाएं भी शामिल हैं। सिख धर्म में भी ‘माँ’ का स्थान सबसे ऊँचा रखा गया है। 
कहने का अभिप्राय यह है कि चाहे कोई भी देश हो, कोई भी संस्कृति या सभ्यता हो और कोई भी भाषा अथवा बोली हो, ‘माँ’ के प्रति अटूट, अगाध और अपार सम्मान देखने को मिलेगा। ‘माँ’ को अंग्रेजी भाषा में ‘मदर’ ‘मम्मी’ या ‘मॉम’, हिन्दी में ‘माँ’, संस्कृत में ‘माता’, फारसी में ‘मादर’ और चीनी में ‘माकून’ कहकर पुकारा जाता है। भाषायी दृष्टि से ‘माँ’ के भले ही विभिन्न रूप हों, लेकिन ‘ममत्व’ और ‘वात्सल्य’ की दृष्टि में सभी एक समान ही होती हैं। ‘मातृ दिवस’ संसार भर में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। यूरोपीय देशों में ‘मदरिंग सनडे’ के रूप में मनाया जाता है। चीन में दार्शनिक मेंग जाई की माँ के जन्मदिन को ‘मातृ-दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। नेपाल में वैशाख कृष्ण पक्ष में ‘माता तीर्थ उत्सव’ मनाया जाता है। अमेरिका व भारत सहित कई अन्य देशों में मई के दूसरे रविवार को ‘मातृ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इंडोनेशिया में प्रतिवर्ष 22 दिसम्बर को ‘मातृ-दिवस’ मनाने की परंपरा है।  

(नोट :-लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)

 (राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
(स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक)
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(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में तीन हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

श्रमिक दिवस : श्रमिकों के अथक संघर्ष की महागाथा

1 मई/अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस विशेष

श्रमिक दिवस : श्रमिकों के अथक संघर्ष की महागाथा
- राजेश कश्यप

      एक मई अर्थात अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस। यह दिवस विशेषकर मजदूरों के लिए अपनी एकता प्रदर्शित करने का दिन माना जाता है। मजदूर लोग अपने अधिकारों एवं उनकी रक्षा को लेकर प्रदर्शन करते हैं। अगर आज के परिदृश्य में यदि हम मजदूर दिवस की महत्ता का आकलन करें तो पाएंगे कि इस दिवस की महत्ता पहले से भी कहीं ज्यादा हो गई है। वैश्विक पटल पर एक बार फिर पूंजीवाद का बोलबाला सिर चढक़र बोल रहा है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने सदैव गरीब मजदूरों का शोषण किया है, उनके अधिकारों पर कुठाराघात किया है और उन्हें जिन्दगी के उस पेचीदा मोड़ पर पहुंचाया है, जहां वह या तो आत्महत्या करने के लिए विवश होता है, या फिर उसे अपनी नियति को कोसते हुए भूखा-नंगा रहना पड़ता है। 
     सन् 1750 के आसपास यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई। उसके परिणामस्वरूप मजदूरों की स्थिति अत्यन्त दयनीय होती चली गई। मजदूरों से लगातार 12-12 और 18-18 घण्टों तक काम लिया जाता, न कोई अवकाश की सुविधा और न दुर्घटना का कोई मुआवजा। ऐसे ही अनेक ऐसे मूल कारण रहे, जिन्होंने मजदूरों की सहनशक्ति की सभी हदों को चकनाचूर कर डाला। यूरोप की औद्योगिक क्रांति के अलावा अमेरिका, रूस, आदि विकसित देशों में भी बड़ी-बड़ी क्रांतियां हुईं और उन सबके पीछे मजदूरों का हक मांगने का मूल मकसद रहा।
     अमेरिका में उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में ही मजदूरों ने ‘सूर्योदय से सूर्यास्त’ तक काम करने का विरोध करना शुरू कर दिया था। जब सन् 1806 में फिलाडेल्फिया के मोचियों ने ऐतिहासिक हड़ताल की तो अमेरिका सरकार ने साजिशन हड़तालियों पर मुकदमे चलाए। तब इस तथ्य का खुलासा हुआ कि मजदूरों से 19-20 घण्टे बड़ी बेदर्दी से काम लिया जाता है। उन्नीसवीं सदी के दूसरे व तीसरे दशक में तो मजदूरों में अपने हकों की लड़ाई के लिए खूब जागरूकता आ चुकी थी। इस दौरान एक ‘मैकेनिक्स यूनियन ऑफ फिलाडेल्फिया’ नामक श्रमिक संगठन का गठन भी हो चुका था। यह संगठन सामान्यत: दुनिया की पहली टे्रड यूनियन मानी जाती है। इस यूनियन के तत्वाधान में मजदूरों ने वर्ष 1827 में एक बड़ी हड़ताल की और काम के घण्टे घटाकर दस रखने की मांग की। इसके बाद इस माँग ने एक बहुत बड़े आन्दोलन का रूप ले लिया, जोकि कई वर्ष तक चला। बाद में, वॉन ब्यूरेन की संघीय सरकार को इस मांग पर अपनी मुहर लगाने को विवश होना ही पड़ा। 
     इस सफलता ने मजदूरों में एक नई ऊर्जा का संचार किया। कई नई युनियनें ‘मोल्डर्स यूनियन’, ‘मेकिनिस्ट्स युनियन’ आदि अस्तित्व में आईं और उनका दायरा बढ़ता चला गया। कुछ दशकों बाद आस्टेऊलिया के मजदूरों ने संगठित होकर ‘आठ घण्टे काम’ और ‘आठ घण्टे आराम’ के नारे के साथ संघर्ष शुरू कर दिया। इसी तर्ज पर अमेरिका में भी मजदूरों ने अगस्त, 1866 में स्थापित राष्ट्रीय श्रम संगठन ‘नेशनल लेबर यूनियन’ के बैनर तले ‘काम के घण्टे आठ करो’ आन्दोलन शुरू कर दिया। वर्ष 1868 में इस मांग के ही ठीक अनुरूप एक कानून अमेरिकी कांग्रेस ने पास कर दिया। अपनी मांगों को लेकर कई श्रम संगठनों ‘नाइट्स ऑफ लेबर’, ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर’ आदि ने जमकर हड़तालों का सिलसिला जारी रखा। उन्नीसवीं सदी के आठवें व नौंवे दशक में हड़तालों की बाढ़ सी आ गई थी। 
     ‘मई दिवस’ मनाने की शुरूआत दूसरे इंटरनेशनल द्वारा सन् 1886 में हेमार्केट घटना के बाद हुई। दरअसल, शिकागो के इलिनोइस (संयुक्त राज्य अमेरिका) में तीन दिवसीय हड़ताल का आयोजन किया गया था। इसमें 80,000 से अधिक आम मजदूरों, कारीगरों, व्यापारियों और अप्रवासी लोगों ने बढ़चढक़र भाग लिया। हड़ताल के तीसरे दिन पुलिस ने मेकॉर्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कंपनी संयंत्र में घुसकर शांतिपूर्वक हड़ताल कर रहे मजदूरों पर फायरिंग कर दी, जिसमें संयंत्र के छह मजदूर मारे गए और सैंकड़ों मजदूर बुरी तरह घायल हो गए। इस घटना के विरोध में अगले दिन 4 मई को हेमार्केट स्क्वायर में एक रैली का आयोजन किया गया। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए जैसे ही आगे बढ़ी, एक अज्ञात हमलावर ने पुलिस के दल पर बम फेंक दिया। इस विस्फोट में एक सिपाही की मौत हो गई। इसके बाद मजदूरों और पुलिस में सीधा खूनी टकराव हो गया। इस टकराव में सात पुलिसकर्मी और चार मजदूर मारे गए तथा दर्जनों घायल हो गए। 
     इस घटना के बाद कई मजदूर नेताओं पर मुकदमें चलाए गए। अंत में न्यायाधीश श्री गैरी ने 11 नवम्बर, 1887 को कंपकंपाती और लडख़ड़ाती आवाज में चार मजदूर नेताओं स्पाइडर, फिशर, एंजेल तथा पारसन्स को मौत और अन्य कई लोगों को लंबी अवधि की कारावास की सजा सुनाई। इस ऐतिहासिक घटना को चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1888 में अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर ने इसे मजदूरों के बलिदान को स्मरण करने और अपनी एकता को प्रदर्शित करते हुए अपनी आवाज बुलन्द करने के लिए प्रत्येक वर्ष 1 मई को ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इसके साथ ही 14 जुलाई, 1888 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में विश्व के समाजवादी लोग भारी संख्या में एकत्रित हुए और अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी संगठन (दूसरे इंटरनेशनल) की नींव रखी। इस अवसर पर संयुक्त प्रस्ताव पारित करके विश्वभर के मजदूरों के लिए कार्य की अधिकतम अवधि को आठ घंटे तक सीमित करने की माँग की गई और संपूर्ण विश्व में प्रथम मई को ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। 
     ‘मई दिवस’ पर कई जोशिले नारों ने वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थित दर्ज करवाई। समाचार पत्र और पत्रिकाओं में भी मई दिवस पर विचारोत्तेजक सामग्रियां प्रकाशित हुईं। ‘मई दिवस’ के सन्दर्भ में ‘वर्कर’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र में चाल्र्स ई. रथेनबर्ग ने लिखा, ‘‘’मई-दिवस, वह दिन जो पूंजीपतियों के दिल में डर और मजदूरों के दिलों में आशा पैदा करता है।’ इसी पत्र के एक अन्य ‘मई दिवस विशेषांक’ में यूजीन वी. डेब्स ने लिखा, ‘यह सबसे पहला और एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय दिवस है। यह मजदूर के सरोकार रखता है और क्रांति को समर्पित है।’

     ‘मई दिवस’ को इंग्लैण्ड में पहली बार वर्ष 1890 में मनाया गया। इसके बाद धीरे-धीरे सभी देशों में प्रथम मई को ‘मजदूर दिवस’ अर्थात ‘मई दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। वैसे मई दिवस का प्रथम इश्तिहार रूस की जेल में ब्लाडीमीर इलियच उलियानोव लेनिन ने वर्ष 1886 में ही लिख दिया था। भारत में मई दिवस मनाने की शुरूआत वर्ष 1923 से, चीन में वर्ष 1924 से और स्वतंत्र वियतनाम में वर्ष 1975 से हुई। वर्ष 1917 मजदूर संघर्ष का स्वर्णिम दौर रहा। इस वर्ष रूस में पहली बार सशक्त मजदूर शक्ति ने पंूजीपतियों की सत्ता को उखाड़ फेंका और अपने मसीहा लेनिन के नेतृत्व में ‘बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी’ की सर्वहारा राज्यसत्ता की स्थापना की। विश्व इतिहास की यह महान घटना ‘अक्तूबर क्रांति’ के नाम से जानी जाती है।
     वर्ष 1919 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) के प्रथम अधिवेशन में प्रस्ताव पारित किया गया कि सभी औद्योगिक संगठनों में कार्यावधि अधिक-से-अधिक आठ घंटे निर्धारित हो। इसके साथ ही श्रम संबंधी अन्य अनेक शर्तों को भी कलमबद्ध किया गया। विश्व के अधिकतर देशों ने इन शर्तों को स्वीकार करते हुए उन्हें लागू भी कर दिया। आगे चलकर वर्ष 1935 में इसी संगठन ने आठ घंटे की अवधि को घटाकर सात घंटे की अवधि का प्रस्ताव पारित करते हुए यह भी कहा कि एक सप्ताह में किसी भी मजदूर से 40 घंटे से अधिक काम नहीं लिया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव का अनुसरण आज भी विश्व के कई विकसित एवं विकासशील देशों में हो रहा है। 
     इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से लडऩे एवं अपने अधिकारों को पाने और उनकी सुरक्षा करने के लिए मजदूरों को जागरूक एवं संगठित करने का बहुत बड़ा श्रेय साम्यवाद के जनक कार्ल माक्र्स को जाता है। कार्ल माक्र्स ने समस्त मजदूर-शक्ति को एक होने एवं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना सिखाया था। कार्ल माक्र्स ने जो भी सिद्धान्त बनाए, सब पूंजीवादी अर्थव्यस्था का विरोध करने एवं मजदूरों की दशा सुधारने के लिए बनाए थे। 
कार्ल माक्र्स का पहला उद्देश्य श्रमिकों के शोषण, उनके उत्पीडऩ तथा उन पर होने वाले अत्याचारों का कड़ा विरोध करना था। कार्ल माक्र्स का दूसरा मुख्य उद्देश्य श्रमिकों की एकता तथा संगठन का निर्माण करना था। उनका यह उद्देश्य भी बखूबी फलीभूत हुआ और सभी देशों में श्रमिकों एवं किसानों के अपने संगठन निर्मित हुए। ये सब संगठन कार्ल माक्र्स के नारे, ‘‘दुनिया के श्रमिकों एक हो जाओ’’ ने ही बनाए। इस नारे के साथ कार्ल माक्र्स मजदूरों को ललकारते हुए कहते थे कि ‘‘एक होने पर तुम्हारी कोई हानि नहीं होगी, उलटे, तुम दासता की जंजीरों से मुक्त हो जाओगे’’।
     कार्ल माक्र्स चाहते थे कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित हो, जिसमें लोगों को आर्थिक समानता का अधिकार हो और जिसमें उन्हें सामाजिक न्याय मिले। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को कार्ल माक्र्स समाज व श्रमिक दोनों के लिए अभिशाप मानते थे। वे तो हिंसा का सहारा लेकर पूंजीवाद के विरूद्ध लडऩे का भी समर्थन करते थे। इस संघर्ष के दौरान उनकीं प्रमुख चेतावनी होती थी कि वे पूंजीवाद के विरूद्ध डटकर लड़ें, लेकिन आपस में निजी स्वार्थपूर्ति के लिए कदापि नहीं। 
     कार्ल माक्र्स ने मजदूरों को अपनी हालत सुधारने का जो सूत्र ‘संगठित बनो व अधिकारों के लिए संघर्ष करो’ दिया था, वह आज के दौर में भी उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है। लेकिन, बड़ी विडम्बना का विषय है कि यह नारा आज ऐसे कुचक्र में फंसा हुआ है, जिसमें संगठन के नाम पर निजी स्वार्थ की रोटियां सेंकी जाती हैं और अधिकारों के संघर्ष का सौदा किया जाता है। मजदूर लोग अपनी रोजी-रोटी को दांव पर लगाकर एकता का प्रदर्शन करते हैं और हड़ताल करके सडक़ों पर उतर आते हैं, लेकिन, संगठनों के नेता निजी स्वार्थपूर्ति के चलते राजनेताओं व पूंजीपतियों के हाथों अपना दीन-ईमान बेच देते हैं। परिणामस्वरूप आम मजदूरों के अधिकारों का सुरक्षा कवच आसानी से छिन्न-भिन्न हो जाता है। वास्तविक हकीकत तो यह है कि आजकल हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि मजदूर वर्ग मालिक (पूंजीपति वर्ग) व सरकार के रहमोकर्म पर निर्भर हो चुका है। बेहतर तो यही होगा कि पूंजीपति लोग व सरकार स्वयं ही मजदूरों के हितों का ख्याल रखें, वरना कार्ल माक्र्स के एक अन्य सिद्धान्त के अनुसार, ‘‘एक समय ऐसा जरूर आता है, जब मजदूर वर्ग एकाएक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था एवं प्रवृत्ति वालों के लिए विनाशक शक्ति बन जाता है।’’

(राजेश कश्यप स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)
(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
स्थायी सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
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