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सोमवार, 26 सितंबर 2016

‘तीज पर्व’ पर प्रचलित पारंपरिक हरियाणवी लोकगीत


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इस बार ‘तीज पर्व’ पर प्रचलित हरियाणवी लोकगीत सुनने का एक नायाब अनुभव हुआ। रोहतक के महारानी किशोरी जाट कन्या कॉलेज में आयोजित ‘तीज-उत्सव’ में प्रख्यात हरियाणवी शख्सियत आदरणीय श्री रघुविन्द्र मलिक के आमंत्रण पर जाने का सौभाग्य मिला। इस अवसर पर कॉलेज प्रशासन ने ‘तीज पर्व’ की मूल पहचान को जीवन्त कर रखा था। तीज के गीत, झूले, हंसी-ठिठौली, गुलगुले-सुहाली, मेहन्दी, नाच-गीत आदि सबकुछ देखने को मिला। सबसे बड़ी बात यह थी कि इस आयोजन का मूल मकसद नई पीढ़ी की लड़कियों को हमारी मूल हरियाणवी तीज-परंपरा से साक्षात रूबरू करवाने का था। इससे बड़ी बात यह थी कि कॉलेज की प्रिन्सीपल श्रीमती कृष्णा चौधरी ने स्वयं आगे बढ़कर अपनी टीम के साथ ‘तीज पर्व’ पर गाया जाने वाल मूल पारंपरिक हरियाणवी गीत मंच से गाया और हरियाणवी संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन की अनूठी मिसाल पेश की। यह नायाब अनुभव आपके साथ सांझा करने की प्रबल इच्छा हुई। आप भी देखिए व सुनिए ‘तीज पर्व’ पर प्रचलित हमारा पारंपरिक हरियाणवी लोकगीत...! इसके लिए https://www.youtube.com/channel/UCTffoVWnqRlWknMuof94pSAइस लिंक को क्लिक करने का कष्ट करें:
- राजेश कश्यप


शनिवार, 24 सितंबर 2016

यूं बने थे ‘जननायक’ चौधरी देवीलाल

25 सितम्बर / जयन्ती पर विशेष /
‘जननायक’ चौधरी देवीलाल
चौधरी देवीलाल यूं बने थे ‘जननायक’ 
-राजेश कश्यप

हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती है।
तब जाकर होता है चमन में दीदावर पैदा।।
हरियाणा की मिट्टी बड़ी पावन है। इस मिट्टी में अनेक ऋषि-मुनि, त्यागी तपस्वी, संत-फकीर और दैवीय शक्तियों ने अपनी जन्मभूमि व कर्मभूमि बनाया है। इन्हीं में से एक दैवीय शक्ति ने 25 सितम्बर, 1914 को हरियाणा के सिरसा जिले में गाँव तेजाखेड़ा के समृद्ध किसान चौधरी लेखराम के घर श्रीमती सुगना देवी की कोख से चौधरी देवीलाल के रूप में जन्म लिया। चौधरी लेखराम आर्य चौटाला गाँव के बहुत बड़े जमींदार थे और आर्य समाज की विचारधारा रखते थे, जिसका प्रभाव देवीलाल पर भी पड़ा। बालक देवीलाल की प्राथमिक शिक्षा मण्डी गाँव से हुई। इसके बाद उन्हें उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए मोगा भेज दिया गया। देवीलाल को पढ़ाई के साथ-साथ खेलों में बेहद रूचि थी। उनका सबसे पसन्दीदा खेल कुश्ती था। उन्होंने गाँव बादल (पंजाब) के अखाड़े में बाकायदा प्रशिक्षण भी हासिल किया था।
जब देवीलाल दसवीं कक्षा में थे, पूरे देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का स्वतंत्रता आन्दोलन जोरों पर था। लाला लाजपतराय के ओजस्वी भाषण और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रति असीम लगाव के चलते बालक देवीलाल ने भी राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में छलांग लगा दी। उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करनी शुरू कर दी। मात्र 16 वर्ष की आयु में सन् 1929 के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन में देवीलाल ने एक सच्चे स्वयंसेवक के रूप में भाग लिया। वर्ष 1930 में देवीलाल ने आर्य समाज के प्रखर नेता स्वामी केशवानंद द्वारा बनाई गई नमक की पुड़िया खरीदी तो कोहराम मच गया और परिणामस्वरूप उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। इसके बाद तो देवीलाल पूरी तरह राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए और कांग्रेस के सक्रिय सदस्य बन गए। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे सभी राष्ट्रीय आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी की। इसी कारण उन्हें 4 जनवरी, 1931 को अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार करके लाहौर की बोस्टर्ल जेल में डाल दिया। उन्हें छह मास की कठोर सजा सुनाई गई। इसी जेल में चौधरी देवीलाल की मुलाकात महान स्वतंत्रता सेनानियों के साथ हुई। 
चौधरी देवीलाल के जेल जाने और छूटने का ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसने रूकने का नाम ही नहीं लिया। चौधरी देवीलाल को अंग्रेज सरकार विरोधी आन्दोलनों में हिस्सा लेने के लिए वर्ष 1932 में एक बार फिर गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। उन्हें सोलह दिन बाद रिहा कर दिया गया। वर्ष 1938 मंे उन्हें आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी के डेलीगेट के रूप में भी चुना गया। वर्ष 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान चौधरी देवीलाल ने ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ और ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के नारों को गुंजाकर रख दिया। इसके परिणामस्वरूप उन्हें कालू आना गाँव से पुलिस ने 5 अक्तूबर, 1942 को गिरफ्तार कर लिया और जेल में डाल दिया। चौधरी देवीलाल हिसार व मुल्तान में दो वर्ष तक नजरबन्द रहे। जेल में चौधरी देवीलाल ने भूख-प्यास आदि हर यातना को डटकर सहा और कभी भी विचलित नहीं हुए। राष्ट्र के प्रति उनके इस जोश और जुनून से पुलिस अधिकारी भी अचंभित रहते थे। चौधरी देवीलाल राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलनों में कुल मिलाकर सात बार जेल गए। उनके बड़े भाई साहिब राम भी देश की आजादी के लिए जेल गए। 
स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत चौधरी देवीलाल ने किसानों के हित में काम करना शुरू कर दिया। आम मजदूर से लेकर किसानों, असहाय, गरीबों, बुजुर्गों और महिलाओं की आवाज को बुलन्द करने के लिए चौधरी देवीलाल ने कोई कसर नहीं छोड़ी। वे आम आदमी के सर्वमान्य नेता बन गए। इसी के परिणामस्वरूप वर्ष 1952 में पंजाब विधानसभा के सदस्य चुन लिए गए और वर्ष 1956 में पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बने। वर्ष 1958 में सिरसा विधानसभा उपचुनाव में पंजाब विधानसभा के सदस्य चुने गए। सन! 1956-57 मंे चीफ पार्लियामेंटरी सेक्रेटरी रहे। इसके बाद प्रो. शेर सिंह के साथ हिन्दी आन्दोलन चलाया और साथ ही अलग से हरियाणा बनाने की मांग को भी पुरजोर ढ़ंग से उठाया। वर्ष 1966 में हिन्दी आन्दोलन चलाने वालों और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के बीच समझौता हो गया। इसी के साथ 1 नवम्बर, 1966 को हरियाणा प्रदेश का निर्माण भी हो गया।  वे वर्ष सन् 1948 से 1954 और वर्ष 1966 से 1971 तक हिसार जिला परिषद के सदस्य रहे। वर्ष 1972 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया और सन् 1974 में रोड़ी हल्के से हरियाणा विधानसभा का चुनाव कांग्रेस पार्टी के विरूद्ध जीता। सन् 1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों की मुखर पैरवी करने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया और 19 माह तक उन्हें जेल में रखा गया।
चौधरी देवीलाल ने वर्ष 1977 में जनता पार्टी से चुनाव जीता और 21 जून, 1977 को पहली बार हरियाणा प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। वे 28 जून, 1979 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे। वर्ष 1980-82 तक वे लोकसभा के सदस्य रहे। इसी दौरान न्याय युद्ध का आन्दोलन छेड़ने और आम आदमी की आवाज को बुलन्द करने के कारण प्रदेश में इतने प्रसिद्ध हो गए कि जन-जन उनसे दिल से जुड़ गया और उन्हें ‘ताऊ’ कहकर पुकारने लगा। वर्ष 1987 के दौरान ताऊ देवीलाल की आंधी में विपक्षी पार्टियों सूखे तिनकों की तरह उड़ गई और ताऊ देवीलाल की पार्टी ने हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों में से रिकार्ड़ 85 सीटों पर विजय हासिल की। इसी के चलते वे दूसरी बार 20 जून, 1987 को मुख्यमंत्री बने। इसबार वे 1 दिसम्बर, 1989 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान उन्हांेने अभूतपूर्व, अप्रत्याशित व अनूठे कल्याणकारी कार्य किए और देश में सच्चे जननायक बनकर उभरे।
चौधरी देवीलाल वर्ष 1989 में रोहतक लोकसभा सीट से भारी मतों के साथ संसद पहुंचे। संसद पहुंचने पर स्व. चरण सिंह, एच.डी. देवगौड़ा, स्व. वी.पी. सिंह व चन्द्रशेखर ने जननायक ताऊ देवीलाल का नाम प्रधानमंत्री के पद के लिए प्रस्तावित किया। असीम त्याग और निःस्वार्थ प्रवृति के धनी चौधरी देवीलाल ने बड़ी विनम्रता के साथ प्रधानमंत्री का ताज अपने सिर पहनने की बजाय वी.पी. सिंह के सिर पर रख दिया और स्वयं उपप्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित किया। वे वर्ष 1989 से 1991 के तक उपप्रधानमंत्री रहे। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की यह अनूठी मिसाल आज भी बड़े गर्व व गौरव के साथ याद की जाती है।
चौधरी देवीलाल ने आजीवन आम आदमी के उत्थान के लिए काम किया। उनका राजनीतिक जीवन बेहद ही उतार-चढ़ाव भरा रहा। उनका पूरा जीवन ही संघर्षों और चुनौतियों से भरा रहा। चौधरी देवीलाल का एक महत्वपूर्ण नारा था, ‘लोकराज लोकलाज से चलता है।’ चौधरी देवीलाल राजनीतिक क्षेत्र में एक अनुकरणीय नेता रहे। उन्होंने हरदम गरीबों, असहायों, मजदूरों, किसानों, दलितों, पिछड़ों, महिलाओं, बुजुर्गों आदि हर वर्ग के कल्याण के लिए अनूठे कार्य किए। वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पंेशन, दलितों व पिछड़ों की गरीब महिलाओं के लिए जच्चा-बच्चा योजना, काम के बदले अनाज, घूमन्तू बच्चों को शिक्षा के दौरान प्रतिदिन एक रूपया देने की योजना, बेरोजगारों के साक्षात्कार के लिए मुफ्त यात्रा, गरीब मजदूरों, दुकानदारों व किसानों आदि के व्यवसायिक व कृषि ऋण माफ करना, गरीब ग्रामीणों को सस्ती दर पर ऋण दिलवाना, टैªक्टरों का टोकन टैक्स बंद करना, किसानांे को बिजली, खाद, पानी आदि प्रचूर मात्रा में उपलब्ध करवाना आदि असंख्य कल्याणकारी योजनाएं जननायक चौधरी देवीलाल की अनूठी, अनुपम और अनुकरणीय देने रहीं। इन्हीं सबके चलते जन-जन के हृदय में वे अपनी अमिट छाप छोड़ पाए।
चौधरी देवीलाल सरल स्वभाव और अत्यन्त दयालू प्रवृति की महान शख्सियत थे। उनके अन्दर स्वार्थ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, कपट, जालसाजी, बेईमानी आदि कुप्रवृतियों का नामोनिशान भी नहीं था। उनके रास्ते में रोड़े अटकाने और उनके लिए बाधा उत्पन्न करने वालों के प्रति भी उनका बेहद सौम्य व्यवहार रहता था। उनका मानना था कि उनके सामने जितने संकट और अड़चने आती हैं, वे उतने ही अधिक निखरते चले जाते हैं। उन्होंने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानीं। उनके दिल में हमेशा देहात व देहातियों के प्रति लगाव रहा। वे ग्रामीण विकास के प्रबल पक्षधर थे। वे अक्सर कहते थे कि जब तक गरीब किसान, मजदूर इस देश में सम्पन्न नहीं होगा, तब तक इस देश की उन्नति के कोई मायने नहीं हैं। उनका मानना था कि भारत के विकास का रास्ता खेतों से होकर गुजरता है। उनका स्पष्ट मत था कि ‘हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, हर तन पर कपड़ा, हर सिर पर मकान, हर पेट में रोटी, बाकी सब बात खोटी।’
कुल मिलाकर जननायक चौधरी देवीलाल आम जनमानस के लिए किसी दैवीय अवतार से कम नहीं थे। उनका पूरा जीवन ही आम आदमी के प्रति समर्पित रहा। हरियाणा के घर-घर में राजनीतिक जागृति पैदा करने वाले ताऊ देवीलाल ही थे। उनकी हर सांस देहात के लोगों के कल्याण के लिए धड़कतीं थीं। जब वे दिल्ली के अस्पताल में जिन्दगी के आखिरी सांस ले रहे थे, तब भी उन्हें देहात के किसानों व मजदूरों की चिंता थी। उस समय भी वे उनसे मिलने के लिए आने वालों से बराबर देहातियों की कुशलक्षेम पूछ रहे थे। आम आदमी के हितों के लिए धड़कते इस दिल ने अंततः 6 अपै्रल, 2001 की शाम को सात बजे धड़कना बंद कर दिया और देहातियों का यह दैवीय अवतार हमेशा के लिए परमपिता परमात्मा के श्रीचरणों में जा विराजा। भारत सरकार ने उनकीं अत्येष्टि किसान घाट में की और जननायक ताऊ देवीलाल की समाधि स्थापित की। इस महान और अमर शख्सियत को सादर कोटि-कोटि नमन।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।)


राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

सम्पर्क सूत्र:
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889
e-mail : rajeshtitoli@gmail.com

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में 3500 से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)


जानिए चमगादड़ के रहस्य!

चमगादड़
जानिए चमगादड़ के रहस्य!
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क्या आपने चमगादड़ देखा है? क्या आपने इसकी आवाज सुनी है? क्या आपको पता है कि यह पेड़ पर कैसे लटकते है? इन्हें शुभ माना जाए या अशुभ? इस तरह के सवालों को जानने के लिए यह जानकारी आपकी सेवा में प्रस्तुत है।
चमगादड़ को देखने, सुनने व पेड़ों पर लटका देखने के लिए दिए गए विडियो लिंक पर क्लिक करें। विडियो में दिखाई दे रहे चमगादड़ कैथल जिले के पुराना बस स्टैण्ड के नजदीक जवाहर पार्क से फिल्माए गए हैं। 
चमगादड़ आकाश में उड़ने वाले स्तनधारी प्राणी हैं। ये एकमात्र एसे स्तनधारी जीव हैं जोकि उड़ सकते हैं। ये पूर्णतः निशाचर होते हैं। ये पेड़ों पर अथवा अंधेरी गुफाओं में उलटे लटके हुए मिलेंगें। ये अन्य पक्षियों की तरह जमीन से उड़ान नहीं भर सकते, इसलिए ये उलटे लटकते हैं। इनके पैरों के उभार पीछे की तरफ होते हैं। जिसके कारण ये आसानी से पेड़ की शाखाओं व दीवारों पर लटक सकते हैं। 
प्रचलित मान्यताओं के अनुसार चमगादड़ का घर में घूसना अपशकुन माना जाता है, लेकिन यदि चमगादड़ घर में अपना बसेरा बना ले तो वह समृद्धिदायक समझा जाता है। चीनी फेंगसुई चमगादड़ को घर में रखने से लंबी आयु, समृद्धिदायक, सौभाग्यवर्द्धक एवं बिमारियों से मुक्ति देने जैसे लाभ मिलने की धारणा देखने को मिलती है। 
बिहार की ऐतिहासिक स्थली वैशाली गढ़ में चमगादड़ों की विशेष तौरपर पूजा की जाती है। यहां के लोगों का मानना है कि चमगादड़ लक्ष्मी के वाहन के समान होते हैं और घर में समृद्धि लाते हैं। उनका कहना है कि जहां चमगादड़ों का वास होता है, वहां धन की कमी नहीं होती। इसके साथ ही लोगों की मान्यता है कि यह उनकीं रक्षा भी करते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि चमगादड़ों के शरीर से जो गन्ध निकलती है, वह उन विषाणुओं को नष्ट कर देती है जो मानव शरीर के लिए नुकसानदेह माने जाते हैं।आस्ट्रेलिया शहर के एर्थटन शहर में स्थित टोल्गा बैट हास्पिटल में चमगादड़ों के बच्चों का इलाज किया जाता है। ये वो बच्चे होते हैं जो या तो पैरालाइसिस के शिकार होते हैं या फिर जिनकी माँ नहीं होती हैं। 
अब लगे हाथ इस विडियो लिंक को क्लिक करके चमगादड़ों की दुनिया को भी देख लीजिए।



प्रस्तुति:
राजेश कश्यप 
(स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक)
मोबाईल नं. 9416629889

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

हरियाणा की शौर्यगाथा

23 सितम्बर/हरियाणा वीर एवं शहीदी दिवस विशेष
हरियाणा की शौर्यगाथा
-राजेश कश्यप

हरियाणा प्रदेश की भूमि न केवल ऋषि-मुनियों, साधु-सन्तों की पावनभूमि रही है, बल्कि यह जाबांज शूरवीरों, योद्धाओं, सूरमाओं और रणबांकुरों से भी भरी रही है। प्रदेश की माटी का कण-कण वीरत्व से जगमगाता है। यहां प्राचीनकाल से ही शौर्य, राष्ट्रपे्रम, बलिदान और वीरता की उच्च परंपराएं चिरस्थायी रही हैं। हरियाणा की इस गौरवमयी छवि का इतिहास साक्षी है। यहां की कुरूक्षेत्र की पावन भूमि महाभारत के धर्मयुद्ध में शहीद हुए शूरवीरों की अमिट कहानी को अपने अन्दर समेटे हुए है। हरियाणा की भूमि पर ही तरावड़ी, पानीपत आदि कई ऐतिहासिक लड़ाईयां लड़ीं गईं। ऐतिहासिक तथ्यों को टटोलते हैं तो पता चलता है कि जब विश्व विजयी सिकन्दर भारत पर विजय प्राप्त करने के लिए भारत के अन्य प्रदेशों को विजित करता हुआ रावी नदी के तट पर भारी सैन्यबल के साथ पहुंचा तो उसे हरियाणा के वीर सूरमाओं के अनुपम शौर्य के किस्से सुनने को मिले। हरियाणा के रणबांकुरों की शौर्य गाथा को सुनकर सिकन्दर ने वापस लौटने में ही अपनी भलाई समझी और वह सेना सहित चुपचाप वापिस लौट गया।
आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक का इतिहास हरियाणा के वीर रणबांकुरों की शौर्यगाथाओं से भरा पड़ा है। हमारा देश लगभग अढ़ाई सौ वर्षों तक अंग्रेजों का गुलाम रहा। गुलामी की इन बेड़ियों को काटने के लिए हरियाणा प्रदेश के शूरवीरों ने अपनी अह्म भूमिका निभाई। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान शहीद होने वाले देशभक्त-शहीदों की सूची में हरियाणा का नाम सर्वोपरि माना गया है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के वीर शहीदों में हरियाणा प्रदेश के अनेक शहीदों ने अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करवाया। इन सब देशभक्त शहीदों की गौरवगाथा का बखान जितना भी किया जाए, उतना ही कम होगा।  जब 10 मई, 1857 को बैरकपुर (पश्चिम बंगाल) की सैनिक छावनी से वीर सिपाही मंगल पाण्डे की गोली से निकली चिंगारी ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आगाज किया तो हरियाणा में अम्बाला छावनी की 5वीं व 7वीं पलटनें भी इस संग्राम में सिर पर कफन बांधकर कूद पड़ीं। अम्बाला के सैनिकों के विद्रोह के तीन दिन के अन्दर ही रोहतक, गुड़गाँव, पानीपत, झज्जर, नारनौल, रेवाड़ी, हाँसी, हिसार आदि सब जगह विद्रोह की आग भड़क उठी।
इस विद्रोह में हरियाणा के सैनिकों ने ही नहीं, बल्कि किसानों, मजदूरों और कर्मचारियों ने भी बढ़चढ़कर भाग लिया और बड़े स्तर पर ऐतिहासिक नेतृत्व भी किया। इनमें मेवात के किसान सदरूद्दीन, अहीरवाल के मुख्य सामंत तुलाराम, पलवल के किसान हरसुख राय एवं व्यापारी गफूर अली, फरीदाबाद के किसान धानू सिंह, बल्लभगढ़ के मुख्य सामन्त नाहर सिंह, फरूर्खनगर के मुख्य सामन्त अहमद अली एवं सरकारी कर्मचारी गुलाम मोहम्मद, पटौदी के मुख्य सामन्त अकबर अली, पानीपत के मौलवी इमाम अली कलन्दर, खरखौदा के किसान बिसारत अली, सांपला के किसान साबर खाँ, दुजाना के मुख्य सामन्त हसन अली, दादरी के मुख्य सामन्त बहादुर जंग, झज्जर के मुख्य सामन्त अब्दर्रहमान व उनके जनरल अब्दुस समद, भट्टू (हिसार) के सरकारी कर्मचारी मोहम्मद आजिम, हाँसी के सरकारी कर्मचारी हुकम चन्द, रानी के अपदस्थ मुख्य सामन्त नूर, लौहारू के मुख्य सामन्त अमीनुद्दीन और रोपड़ के सेवादार मोहन सिंह आदि सभी ने अपने-अपने क्षेत्र में क्रांतिकारियों का जबरदस्त नेतृत्व किया।
‘बल्लभगढ़ के शेर’ उपनाम से प्रसिद्ध राजा नाहर सिंह को अंग्रेजी सरकार ने 9 जनवरी, 1858 को चांदनी चैक पर सरेआम फांसी पर लटका दिया था। झज्जर नवाब अब्दुर्रहमान खां को भी सुनियोजित ढ़ंग से राजद्रोह का दोषी करार देकर 23 दिसम्बर, 1857 को लालकिले के सामने फांसी के तख्ते पर लटका दिया था। एक छोटी सी रियासत फर्रूखनगर के मालिक नवाब अहमद अली गुलाम खाँ ने खुलकर अंग्रेजों के विरूद्ध युद्ध का बिगुल बजाया और अंग्रेजों के खूब छक्के छुड़ाए। बाद में क्रूर अंगे्रजों ने उन्हें भी 23 जनवरी, 1858 को राजद्रोही करार देकर चाँदनी चैक में कोतवाली के सामने फाँसी पर लटका दिया। रानियां (सिरसा) के नवाब नूर समन्द खाँ ने अंग्रेजों से डटकर लौहा लिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें 17 जून, 1857 को फाँसी के फंदे पर लटका दिया गया। नांगल पठानी के राव किशन गोपाल ने 13 नवम्बर, 1857 को नसीबपुर (झज्जर) में क्रांतिकारियों के साथ अंगे्रजी सेना का सीधा मुकाबला किया और वे अपने बड़े भाई राव रामपाल के साथ रणभूमि में शहीद हो गए।
सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद हाँसी के लाला हुकमचन्द जैन व मिर्जा मुनीर बेग ने अंग्रेजी शासन के विरूद्ध बढ़चढ़कर योगदान दिया। अंग्रेजों ने राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें 19 जनवरी, 1858 को इन्हीं के घरों के सामने फाँसी पर लटका दिया। दादरी (बहादुरगढ़) के नवाब बहादुर जंग खाँ ने अंगे्रजों के विरूद्ध क्रांतिकारियों का तन-मन-धन से साथ दिया। इन पर भी राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, लेकिन आरोप सिद्ध न हो सके। इसके बावजूद उनकी संपत्ति को जब्त करके उन्हें लाहौर जेल भेज दिया गया। रेवाड़ी के महायोद्धा राव तुलाराम ने अंगे्रजों से अपने पूर्वजों के इलाकों रेवाड़ी, बोहड़ा, शाहजहांपुर आदि को पुनः हासिल करके अंग्रे्रजों को दंग करके रख दिया था। सोनीपत के लिबासपुर गाँव के सामान्य किसान नम्बरदार उदमी राम ने अपनी 22 सदस्यीय क्रांतिकारियों की टोली बनाकर समीप के राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरने वाले अंग्रेज अधिकारियों को जमकर निशाना बनाया। एक देशद्रोही के कारण वे अंग्रेजों के शिकंजे में फंस गए। अंगे्रजों ने उदमी राम को अत्यन्त क्रूर यातनायें देने के बाद राई के कैनाल रैस्ट हाऊस में पेड़ पर कीलों से ठोंककर लटका दिया, जहां उन्होंने 35वें दिन 28 जून, 1857 को अपने प्राण त्यागे। उनकीं पत्नी को भी पेड़ से बांध दिया गया और वे भी कुछ दिनों बाद ही शहीद हो गईं। अंगे्रजों ने शहीद उदमी राम के सभी साथियों को भयंकर यातनायें देने के बाद बहालगढ़ चैंक पर सरेआम पत्थर के कोल्हू के नीचे बुरी तरह रौंद दिया। यह पत्थर आज भी सोनीपत के देवीलाल पार्क में साक्ष्य के तौरपर मौजूद है।
इस तरह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान असंख्य जाने-अनजाने शूरवीरों ने अपनी शहादतें और कुर्बानियां दीं। बदकिस्मती से अंगे्रज इस क्रांति को विफल करने में कामयाब रहे। लेकिन, असंख्य शहीदों की कुर्बानियों और शहादतों ने देशवासियों को स्वतंत्रता की स्पष्ट राह दिखा दी। इसके बाद लगातार स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आन्दोलन चले, जिसमें हरियाणा के जनमानस ने बखूबी बढ़चढ़कर सक्रिय योगदान दिया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले आजादी के आन्दोलनों में यहां के लोगों ने महत्ती भूमिका निभाई। रोलेट एक्ट के विरोध में हरियाणा के लोगों ने खूब धरने, प्रदर्शन एवं जनसभाएं कीं। खिलाफत आन्दोलन (1920), असहयोग आन्दोलन (1932), साईमन कमीशन विरोध (1921), नमक सत्याग्रह आन्दोलन (1930), हैदराबाद सत्याग्रह (1939), भारत छोड़ो आन्दोलन (1942), आसौदा आन्दोलन (1942), प्रजामण्डल आन्दोलन आदि के साथ-साथ आजाद हिन्द फौज में भी हरियाणा के वीरों ने बढ़चढ़कर अपना योगदान दिया। आजाद हिन्द फौज में हरियाणा के कुल 2715 जवानों ने अपनी शहादतें देश के लिए दीं, जिनमें 398 अफसर और 2317 सिपाही शामिल थे। काफी लंबे संघर्ष के बाद उन्हें पराजय स्वीकार करनी पड़ी। ऐसे ही असंख्य आने-अनजाने वीरों की कुर्बानियों और शहादतों के बल पर हमारा देश अंग्रेजों की दासता की बेड़ियों को काटकर अंततः 15 अगस्त, 1947 को आजाद हो गया।
इससे पूर्व प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों में भी हरियाणा के असंख्य शूरवीरों ने अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। प्रथम विश्वयुद्ध, 1914 में पूरे भारतवर्ष से कुल एक लाख पच्चीस हजार जवानों ने भाग लिया था, जिसमें अकेले हरियाणा से 80,000 से अधिक वीर सैनिक शामिल थे। हरियाणा में रोहतक जिले के सर्वाधिक लाल शामिल थे, जिनकी संख्या 22,000 से अधिक थी। इस प्रथम विश्वयुद्ध में हरियाणा के रणबांकुरों ने अपने शौर्य के बलबूते सैन्य पदकों के मामले में आठवां स्थान हासिल किया था। उल्लेखनीय है कि इन सैन्य पदकों में हरियाणा के वीर सूरमा रिसालदार बदलूराम को मरणोपरान्त दिया गया विक्टोरिया क्राॅस भी शामिल था, जिसके लिए हरियाणा जन-जन आज भी गर्व करता है। दूसरे विश्वयुद्ध में भी हरियाणा के एक लाख तीस हजार से अधिक रणबांकुरों ने भाग लिया था और अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। इस विश्वयुद्ध के लिए हरियाणा के वीर सैनिकों को कुल 26 पदक मिले थे, जिसमें पाँच विक्टोरिया क्राॅस शामिल थे। ये पाँच विक्टोरिया क्राॅस पलड़ा (झज्जर) के उमराव सिंह के अलावा हवलदार मेजर छैलूराम, सूबेदार रामसरूप, सूबेदार रिछपाल और जमादार अब्दुल हाफिज को मरणोपरान्त दिए गए थे।
इतिहास साक्षी है कि हरियाणा के वीर सूरमा सेनाओं में भर्ती होकर राष्ट्र की स्वतंत्रता, एकता, अखण्डता एवं उसकी अस्मिता की रक्षा के लिए हमेशा तन-मन-धन से समर्पित रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भी इस प्रदेश के रणबांकुरे सेना में भर्ती होकर देश के प्रहरी की सशक्त भूमिका निभा रहे हैं। देश की सशस्त्र सेनाओं में चाहे वह जाट रेजीमेंट हो या फिर ग्रेनेडियरर्ज, राजपुताना राईफल्स हो या कुमाऊं रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेन्ट हो या अन्य कोई टुकड़ी, सभी जगह हरियाणा के रणबांकुरों की उपस्थिति अहम् मिलेगी। इसलिए हम गर्व से कह सकते हैं कि हरियाणा के रणबांकुरों के बिना भारतीय सेना अधूरी दिखाई देगी। अगर अभी तक के युद्धों पर नजर डालें तो पाएंगे कि हरियाणा के शूरवीर सभी युद्धों में अग्रणी रहे हैं। आंकड़े गवाह हैं कि हरियाणा देश की जनसंख्या का मात्र दो प्रतिशत है, फिर भी हरियाणा प्रदेश का सैन्य दृष्टि से योगदान कम से कम बीस प्रतिशत है। इसका अभिप्राय, देश की सेना का हर पाँचवा सिपाही हरियाणा की मिट्टी का लाला है। सैन्य पदकांे के मामले में भी हरियाणा के रणबांकुरे तीसरे स्थान पर हैं। हरियाणा प्रदेश के लिए यह भी एक गौरवपूर्ण एवं ऐतिहासिक उपलब्धि है कि भिवानी जिले के गाँव बापौड़ा में जन्मे रणबांकुरे जनरल वी.के. सिंह भारतीय थल सेनाध्यक्ष के गौरवमयी पद को सुशोभित कर चुके हैं। वर्तमान थल सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सुहाग भी हरियाणा के वीर सपूत हैं। उनका पैतृक गाँव झज्जर जिले का बिशन गाँव है।
वर्ष 1947-48 के कश्मीर कश्मीर युद्ध पर नजर डालें तो पाएंगे कि हरियाणा के रणबांकुरे सैकिण्ड जाट के नायक शीशपाल को प्रथम महावीर चक्र (मरणोपरान्त) से सम्मानित किया गया था। इसी युद्ध के अन्य शहीद लांसनायक राम सिंह (सिक्ख रेजीमेंट), नायक सरदार सिंह (कुमाऊं रेजीमेंट), सूबेदार सार्दूल सिंह (राजपूत रेजीमेंट), सिपाही मांगेराम (थर्ड जाट रेजीमेंट) और सूबेदार थाम्बूराम व सिपाही यादराम (सैकिण्ड जाट) को मरणोपरान्त वीर चक्र से सुशोभित किया गया था। इनके अलावा इसी युद्ध में लेफ्टि. कर्नल धर्म सिंह, सिपाही हरिसिंह तथा हवलदार फतेहसिंह को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। सिपाही अमीलाल, नायब सूबेदार अमीर सिंह, हवलदार ईश्वर सिंह, हवलदार मातादीन, सूबेदार जुगलाल, सिपाही जयपाल, सेकिण्ड लेफ्टि. ठण्डीराम, मेजर इन्द्र सिंह कालान, दफेदार लालचन्द, नायक शिवचन्द राम, हवलदार नारायण आदि को वीर चक्र से अलंकृत किया गया था।
सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध में सर्वोपरि योगदान अहीर शूरवीरों का रहा, जो रिजान्गला युद्ध के नाम से इतिहास के पन्नों में अंकित है। सन् 1962 के युद्ध में रिजांगला युद्ध के सूरमाओं को हरियाणा ही नहीं, बल्कि एक ही रेजीमेंट के सबसे ज्यादा पदक प्राप्त हुए हैं, जिनमें एक महावीर चक्र नायक धर्मपाल सिंह दहिया (आर्मी मेडिकल कोर) को और नायक हुकमचन्द, लांस नायक सिंहराम, नायक गुलाब सिंह, नायब सूबेदार सूरजा को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया। इसी युद्ध में मेजर महेन्द्र सिंह चैधरी तथा मेजर सार्दूल सिंह रंधावा को महावीर चक्र तथा नायक सरदार सिंह, सूबेदार निहाल सिंह, कैप्टन गुरचरण भाटिया तथा नायक मुन्शीराम को मरणोपरान्त वीर चक्र से सुशोभित किया गया।
इसी युद्ध में नायक रामचन्द्र यादव व हवलदार रामकुमार यादव को भी रिजान्गला पोस्ट पर दिखाई वीरता के लिए वीर चक्र से सम्मानित किया गया। सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध में हरियाणा के मेजर जनरल स्वरूप सिंह कालान, मेजर रणजीत सिंह दयाल तथा लेफ्टि. जनरल के.के. सिंह को महावीर चक्र से सम्मानित किया। इसी युद्ध में सूबेदार खजान सिंह स्कवार्डन लीडर तेज प्रकाश सिंह गिल, सूबेदार पाले राम, सेवादार छोटूराम तथा हवलदार लहणा सिंह को वीर चक्र से अलंकृत किया गया। भारत माँ के लिए शहादत देने के लिए एस.पी.वर्मा, नायक रामकुमार, लांस हवलदार उमराव सिंह, रायफलमैन माथन सिंह, नायक जगदीश सिंह, सूबेदार नन्दकिशोर को मरणोपरान्त वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में भी हरियाणा के शूरवीरों का योगदान बड़ा अहम् रहा, जिसमें दस डोगरा के कैप्टन देवेन्द्र सिंह अहलावत व इंजीनियर के मेजर विजय रत्न चैधरी को मरणोपरान्त महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। इसी युद्ध में दुश्मन से लोहा लेते हुए अपना जीवन न्यौछावर करने वाले लेफ्टि. करतार सिंह अहलावत, लेफ्टि. हवासिंह, कैप्टन कुलदीप सिंह राठी, नायब सूबेदार उमेद सिंह, मेजर हरपाल सिंह, हवलदार दयानंद राम, लांस नायक अभेराम, सी.एच.एम. किशन सिंह, नायक महेन्द्र सिंह और बी.एस.एफ. के नायक उमेद सिंह व सहायक कमांडेंट नफे सिंह दलाल को मरणोपरान्त वीर चक्र से अलंकृत किया गया। इसी युद्ध में अपने शौर्य का अद्भूत प्रदर्शन करने वाले लेफ्टि. जनरल के.के. सिंह, कमोडोर ब्रजभूषण यादव, सी.मैन चमन सिंह को महावीर चक्र से सुशोभित किया गया। इनके अलावा युद्ध में दुश्मन को छठी का दूध याद दिलाने के लिए मेजर अमरीक सिंह, ग्रेनेडियर अमृत, लेफ्टि. कमाण्डर इन्द्र सिंह, फ्लाईग आॅफिसर जय सिंह अहलावत, मेहर शेर सिंह, हवलदार खजान सिंह, स्क्वार्डन लीडर जीवा सिंह, सवार जयसिंह, गर्नर टेकराम, कमोडोर विजय सिंह शेखावत को वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
सन् 1999 में भारत ने कारगिल में घुसपैठ करने का दुःसाहस किया तो भारत माँ के लालों ने ‘कारगिल आॅपे्रशन विजय’ के तहत पाकिस्तानी घुसपैठियों को पीठ दिखाकर भागने के लिए विवश कर दिया। भारत माँ क इन लालों में हरियाणा की पावन मिट्टी में जन्में अनेक शूरवीर शामिल थे। ‘कारगिल आॅप्रेशन विजय’ 21 मई से 14 जुलाई, 1999 तक चला। इसमें कुल 348 शूरवीरों ने शहादत दी, जिनमें हरियाणा के 80 रणबांकुरे शामिल थे। हरियाणा के रणबांकुरों ने देश की आन-बान और शान के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने में तनिक भी संकोच नहीं किया। इसकी पुष्टि इसी तथ्य से हो जाती है कि इस युद्ध में 17 जाट के 12 जवान तथा 18 गे्रनेडियर के 12 जवान एक ही दिन में शहीद हुए।
‘कारगिल आॅप्रेशन विजय’ में भिवानी जिले के जवानों ने सर्वाधिक शहादतें दीं। इसके बाद महेन्द्रगढ़ के दस, फरीदाबाद के बारह, रोहतक के दस, फरीदाबाद के सात, रेवाड़ी के छह, गुड़गाँव के पाँच तथा शेष अन्य जिलों के जवानों की शहादतें दर्ज हुईं। ‘कारगिल आॅप्रेशन विजय’ में अद्भूत शौर्य प्रदर्शन करने वाले लेफ्टि. बलवान सिंह को महावीर चक्र और सूबेदार रणधीर सिंह व लांस हवलदार रामकुमार को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया। इनके अलावा हवलदार हरिओम, नायक समुन्द्र सिंह, नायक बलवान सिंह, लांस नायक रामकुमार, सिपाही सुरेन्द्र सिंह तथा लांस हवलदार बलवान सिंह को सेना मेडल से अलंकृत किया गया। इन सब युद्धांे के अलावा आतंकवाद से लोहा लेने में भी हरियाणा के वीरों की अह्म भूमिका रही है, जिसमें मुख्य रूप से सेकिण्ड लेफ्टि. राकेश सिंह व मेजर राजीव जून के नाम सर्वोपरि स्थान पर आते हैं। ये दोनों वीर योद्धा 22 गे्रनेडियर रेजीमेंट के थे और दोनों को अशोक चक्र से मरणोपरान्त सम्मानित किया गया। ‘हरियाणा वीर एवं शहीदी दिवस’ देश पर तन-मन-धन अर्पण करने वाले और अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सभी जाने-अनजाने वीरों, सूरमाओं, रणबांकुरों और शहीदों को कोटिशः सादर नमन।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।) 

 (राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

सम्पर्क सूत्र :
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889

e-mail : rajeshtitoli@gmail.com

हरियाणा की शौर्यगाथा

23 सितम्बर/हरियाणा वीर एवं शहीदी दिवस विशेष
हरियाणा की शौर्यगाथा
-राजेश कश्यप

हरियाणा प्रदेश की भूमि न केवल ऋषि-मुनियों, साधु-सन्तों की पावनभूमि रही है, बल्कि यह जाबांज शूरवीरों, योद्धाओं, सूरमाओं और रणबांकुरों से भी भरी रही है। प्रदेश की माटी का कण-कण वीरत्व से जगमगाता है। यहां प्राचीनकाल से ही शौर्य, राष्ट्रपे्रम, बलिदान और वीरता की उच्च परंपराएं चिरस्थायी रही हैं। हरियाणा की इस गौरवमयी छवि का इतिहास साक्षी है। यहां की कुरूक्षेत्र की पावन भूमि महाभारत के धर्मयुद्ध में शहीद हुए शूरवीरों की अमिट कहानी को अपने अन्दर समेटे हुए है। हरियाणा की भूमि पर ही तरावड़ी, पानीपत आदि कई ऐतिहासिक लड़ाईयां लड़ीं गईं। ऐतिहासिक तथ्यों को टटोलते हैं तो पता चलता है कि जब विश्व विजयी सिकन्दर भारत पर विजय प्राप्त करने के लिए भारत के अन्य प्रदेशों को विजित करता हुआ रावी नदी के तट पर भारी सैन्यबल के साथ पहुंचा तो उसे हरियाणा के वीर सूरमाओं के अनुपम शौर्य के किस्से सुनने को मिले। हरियाणा के रणबांकुरों की शौर्य गाथा को सुनकर सिकन्दर ने वापस लौटने में ही अपनी भलाई समझी और वह सेना सहित चुपचाप वापिस लौट गया।
आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक का इतिहास हरियाणा के वीर रणबांकुरों की शौर्यगाथाओं से भरा पड़ा है। हमारा देश लगभग अढ़ाई सौ वर्षों तक अंग्रेजों का गुलाम रहा। गुलामी की इन बेड़ियों को काटने के लिए हरियाणा प्रदेश के शूरवीरों ने अपनी अह्म भूमिका निभाई। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान शहीद होने वाले देशभक्त-शहीदों की सूची में हरियाणा का नाम सर्वोपरि माना गया है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के वीर शहीदों में हरियाणा प्रदेश के अनेक शहीदों ने अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करवाया। इन सब देशभक्त शहीदों की गौरवगाथा का बखान जितना भी किया जाए, उतना ही कम होगा।  जब 10 मई, 1857 को बैरकपुर (पश्चिम बंगाल) की सैनिक छावनी से वीर सिपाही मंगल पाण्डे की गोली से निकली चिंगारी ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आगाज किया तो हरियाणा में अम्बाला छावनी की 5वीं व 7वीं पलटनें भी इस संग्राम में सिर पर कफन बांधकर कूद पड़ीं। अम्बाला के सैनिकों के विद्रोह के तीन दिन के अन्दर ही रोहतक, गुड़गाँव, पानीपत, झज्जर, नारनौल, रेवाड़ी, हाँसी, हिसार आदि सब जगह विद्रोह की आग भड़क उठी।
इस विद्रोह में हरियाणा के सैनिकों ने ही नहीं, बल्कि किसानों, मजदूरों और कर्मचारियों ने भी बढ़चढ़कर भाग लिया और बड़े स्तर पर ऐतिहासिक नेतृत्व भी किया। इनमें मेवात के किसान सदरूद्दीन, अहीरवाल के मुख्य सामंत तुलाराम, पलवल के किसान हरसुख राय एवं व्यापारी गफूर अली, फरीदाबाद के किसान धानू सिंह, बल्लभगढ़ के मुख्य सामन्त नाहर सिंह, फरूर्खनगर के मुख्य सामन्त अहमद अली एवं सरकारी कर्मचारी गुलाम मोहम्मद, पटौदी के मुख्य सामन्त अकबर अली, पानीपत के मौलवी इमाम अली कलन्दर, खरखौदा के किसान बिसारत अली, सांपला के किसान साबर खाँ, दुजाना के मुख्य सामन्त हसन अली, दादरी के मुख्य सामन्त बहादुर जंग, झज्जर के मुख्य सामन्त अब्दर्रहमान व उनके जनरल अब्दुस समद, भट्टू (हिसार) के सरकारी कर्मचारी मोहम्मद आजिम, हाँसी के सरकारी कर्मचारी हुकम चन्द, रानी के अपदस्थ मुख्य सामन्त नूर, लौहारू के मुख्य सामन्त अमीनुद्दीन और रोपड़ के सेवादार मोहन सिंह आदि सभी ने अपने-अपने क्षेत्र में क्रांतिकारियों का जबरदस्त नेतृत्व किया।
‘बल्लभगढ़ के शेर’ उपनाम से प्रसिद्ध राजा नाहर सिंह को अंग्रेजी सरकार ने 9 जनवरी, 1858 को चांदनी चैक पर सरेआम फांसी पर लटका दिया था। झज्जर नवाब अब्दुर्रहमान खां को भी सुनियोजित ढ़ंग से राजद्रोह का दोषी करार देकर 23 दिसम्बर, 1857 को लालकिले के सामने फांसी के तख्ते पर लटका दिया था। एक छोटी सी रियासत फर्रूखनगर के मालिक नवाब अहमद अली गुलाम खाँ ने खुलकर अंग्रेजों के विरूद्ध युद्ध का बिगुल बजाया और अंग्रेजों के खूब छक्के छुड़ाए। बाद में क्रूर अंगे्रजों ने उन्हें भी 23 जनवरी, 1858 को राजद्रोही करार देकर चाँदनी चैक में कोतवाली के सामने फाँसी पर लटका दिया। रानियां (सिरसा) के नवाब नूर समन्द खाँ ने अंग्रेजों से डटकर लौहा लिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें 17 जून, 1857 को फाँसी के फंदे पर लटका दिया गया। नांगल पठानी के राव किशन गोपाल ने 13 नवम्बर, 1857 को नसीबपुर (झज्जर) में क्रांतिकारियों के साथ अंगे्रजी सेना का सीधा मुकाबला किया और वे अपने बड़े भाई राव रामपाल के साथ रणभूमि में शहीद हो गए।
सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद हाँसी के लाला हुकमचन्द जैन व मिर्जा मुनीर बेग ने अंग्रेजी शासन के विरूद्ध बढ़चढ़कर योगदान दिया। अंग्रेजों ने राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें 19 जनवरी, 1858 को इन्हीं के घरों के सामने फाँसी पर लटका दिया। दादरी (बहादुरगढ़) के नवाब बहादुर जंग खाँ ने अंगे्रजों के विरूद्ध क्रांतिकारियों का तन-मन-धन से साथ दिया। इन पर भी राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, लेकिन आरोप सिद्ध न हो सके। इसके बावजूद उनकी संपत्ति को जब्त करके उन्हें लाहौर जेल भेज दिया गया। रेवाड़ी के महायोद्धा राव तुलाराम ने अंगे्रजों से अपने पूर्वजों के इलाकों रेवाड़ी, बोहड़ा, शाहजहांपुर आदि को पुनः हासिल करके अंग्रे्रजों को दंग करके रख दिया था। सोनीपत के लिबासपुर गाँव के सामान्य किसान नम्बरदार उदमी राम ने अपनी 22 सदस्यीय क्रांतिकारियों की टोली बनाकर समीप के राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरने वाले अंग्रेज अधिकारियों को जमकर निशाना बनाया। एक देशद्रोही के कारण वे अंग्रेजों के शिकंजे में फंस गए। अंगे्रजों ने उदमी राम को अत्यन्त क्रूर यातनायें देने के बाद राई के कैनाल रैस्ट हाऊस में पेड़ पर कीलों से ठोंककर लटका दिया, जहां उन्होंने 35वें दिन 28 जून, 1857 को अपने प्राण त्यागे। उनकीं पत्नी को भी पेड़ से बांध दिया गया और वे भी कुछ दिनों बाद ही शहीद हो गईं। अंगे्रजों ने शहीद उदमी राम के सभी साथियों को भयंकर यातनायें देने के बाद बहालगढ़ चैंक पर सरेआम पत्थर के कोल्हू के नीचे बुरी तरह रौंद दिया। यह पत्थर आज भी सोनीपत के देवीलाल पार्क में साक्ष्य के तौरपर मौजूद है।
इस तरह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान असंख्य जाने-अनजाने शूरवीरों ने अपनी शहादतें और कुर्बानियां दीं। बदकिस्मती से अंगे्रज इस क्रांति को विफल करने में कामयाब रहे। लेकिन, असंख्य शहीदों की कुर्बानियों और शहादतों ने देशवासियों को स्वतंत्रता की स्पष्ट राह दिखा दी। इसके बाद लगातार स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आन्दोलन चले, जिसमें हरियाणा के जनमानस ने बखूबी बढ़चढ़कर सक्रिय योगदान दिया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले आजादी के आन्दोलनों में यहां के लोगों ने महत्ती भूमिका निभाई। रोलेट एक्ट के विरोध में हरियाणा के लोगों ने खूब धरने, प्रदर्शन एवं जनसभाएं कीं। खिलाफत आन्दोलन (1920), असहयोग आन्दोलन (1932), साईमन कमीशन विरोध (1921), नमक सत्याग्रह आन्दोलन (1930), हैदराबाद सत्याग्रह (1939), भारत छोड़ो आन्दोलन (1942), आसौदा आन्दोलन (1942), प्रजामण्डल आन्दोलन आदि के साथ-साथ आजाद हिन्द फौज में भी हरियाणा के वीरों ने बढ़चढ़कर अपना योगदान दिया। आजाद हिन्द फौज में हरियाणा के कुल 2715 जवानों ने अपनी शहादतें देश के लिए दीं, जिनमें 398 अफसर और 2317 सिपाही शामिल थे। काफी लंबे संघर्ष के बाद उन्हें पराजय स्वीकार करनी पड़ी। ऐसे ही असंख्य आने-अनजाने वीरों की कुर्बानियों और शहादतों के बल पर हमारा देश अंग्रेजों की दासता की बेड़ियों को काटकर अंततः 15 अगस्त, 1947 को आजाद हो गया।
इससे पूर्व प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों में भी हरियाणा के असंख्य शूरवीरों ने अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। प्रथम विश्वयुद्ध, 1914 में पूरे भारतवर्ष से कुल एक लाख पच्चीस हजार जवानों ने भाग लिया था, जिसमें अकेले हरियाणा से 80,000 से अधिक वीर सैनिक शामिल थे। हरियाणा में रोहतक जिले के सर्वाधिक लाल शामिल थे, जिनकी संख्या 22,000 से अधिक थी। इस प्रथम विश्वयुद्ध में हरियाणा के रणबांकुरों ने अपने शौर्य के बलबूते सैन्य पदकों के मामले में आठवां स्थान हासिल किया था। उल्लेखनीय है कि इन सैन्य पदकों में हरियाणा के वीर सूरमा रिसालदार बदलूराम को मरणोपरान्त दिया गया विक्टोरिया क्राॅस भी शामिल था, जिसके लिए हरियाणा जन-जन आज भी गर्व करता है। दूसरे विश्वयुद्ध में भी हरियाणा के एक लाख तीस हजार से अधिक रणबांकुरों ने भाग लिया था और अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। इस विश्वयुद्ध के लिए हरियाणा के वीर सैनिकों को कुल 26 पदक मिले थे, जिसमें पाँच विक्टोरिया क्राॅस शामिल थे। ये पाँच विक्टोरिया क्राॅस पलड़ा (झज्जर) के उमराव सिंह के अलावा हवलदार मेजर छैलूराम, सूबेदार रामसरूप, सूबेदार रिछपाल और जमादार अब्दुल हाफिज को मरणोपरान्त दिए गए थे।
इतिहास साक्षी है कि हरियाणा के वीर सूरमा सेनाओं में भर्ती होकर राष्ट्र की स्वतंत्रता, एकता, अखण्डता एवं उसकी अस्मिता की रक्षा के लिए हमेशा तन-मन-धन से समर्पित रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भी इस प्रदेश के रणबांकुरे सेना में भर्ती होकर देश के प्रहरी की सशक्त भूमिका निभा रहे हैं। देश की सशस्त्र सेनाओं में चाहे वह जाट रेजीमेंट हो या फिर ग्रेनेडियरर्ज, राजपुताना राईफल्स हो या कुमाऊं रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेन्ट हो या अन्य कोई टुकड़ी, सभी जगह हरियाणा के रणबांकुरों की उपस्थिति अहम् मिलेगी। इसलिए हम गर्व से कह सकते हैं कि हरियाणा के रणबांकुरों के बिना भारतीय सेना अधूरी दिखाई देगी। अगर अभी तक के युद्धों पर नजर डालें तो पाएंगे कि हरियाणा के शूरवीर सभी युद्धों में अग्रणी रहे हैं। आंकड़े गवाह हैं कि हरियाणा देश की जनसंख्या का मात्र दो प्रतिशत है, फिर भी हरियाणा प्रदेश का सैन्य दृष्टि से योगदान कम से कम बीस प्रतिशत है। इसका अभिप्राय, देश की सेना का हर पाँचवा सिपाही हरियाणा की मिट्टी का लाला है। सैन्य पदकांे के मामले में भी हरियाणा के रणबांकुरे तीसरे स्थान पर हैं। हरियाणा प्रदेश के लिए यह भी एक गौरवपूर्ण एवं ऐतिहासिक उपलब्धि है कि भिवानी जिले के गाँव बापौड़ा में जन्मे रणबांकुरे जनरल वी.के. सिंह भारतीय थल सेनाध्यक्ष के गौरवमयी पद को सुशोभित कर चुके हैं। वर्तमान थल सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सुहाग भी हरियाणा के वीर सपूत हैं। उनका पैतृक गाँव झज्जर जिले का बिशन गाँव है।
वर्ष 1947-48 के कश्मीर कश्मीर युद्ध पर नजर डालें तो पाएंगे कि हरियाणा के रणबांकुरे सैकिण्ड जाट के नायक शीशपाल को प्रथम महावीर चक्र (मरणोपरान्त) से सम्मानित किया गया था। इसी युद्ध के अन्य शहीद लांसनायक राम सिंह (सिक्ख रेजीमेंट), नायक सरदार सिंह (कुमाऊं रेजीमेंट), सूबेदार सार्दूल सिंह (राजपूत रेजीमेंट), सिपाही मांगेराम (थर्ड जाट रेजीमेंट) और सूबेदार थाम्बूराम व सिपाही यादराम (सैकिण्ड जाट) को मरणोपरान्त वीर चक्र से सुशोभित किया गया था। इनके अलावा इसी युद्ध में लेफ्टि. कर्नल धर्म सिंह, सिपाही हरिसिंह तथा हवलदार फतेहसिंह को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। सिपाही अमीलाल, नायब सूबेदार अमीर सिंह, हवलदार ईश्वर सिंह, हवलदार मातादीन, सूबेदार जुगलाल, सिपाही जयपाल, सेकिण्ड लेफ्टि. ठण्डीराम, मेजर इन्द्र सिंह कालान, दफेदार लालचन्द, नायक शिवचन्द राम, हवलदार नारायण आदि को वीर चक्र से अलंकृत किया गया था।
सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध में सर्वोपरि योगदान अहीर शूरवीरों का रहा, जो रिजान्गला युद्ध के नाम से इतिहास के पन्नों में अंकित है। सन् 1962 के युद्ध में रिजांगला युद्ध के सूरमाओं को हरियाणा ही नहीं, बल्कि एक ही रेजीमेंट के सबसे ज्यादा पदक प्राप्त हुए हैं, जिनमें एक महावीर चक्र नायक धर्मपाल सिंह दहिया (आर्मी मेडिकल कोर) को और नायक हुकमचन्द, लांस नायक सिंहराम, नायक गुलाब सिंह, नायब सूबेदार सूरजा को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया। इसी युद्ध में मेजर महेन्द्र सिंह चैधरी तथा मेजर सार्दूल सिंह रंधावा को महावीर चक्र तथा नायक सरदार सिंह, सूबेदार निहाल सिंह, कैप्टन गुरचरण भाटिया तथा नायक मुन्शीराम को मरणोपरान्त वीर चक्र से सुशोभित किया गया।
इसी युद्ध में नायक रामचन्द्र यादव व हवलदार रामकुमार यादव को भी रिजान्गला पोस्ट पर दिखाई वीरता के लिए वीर चक्र से सम्मानित किया गया। सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध में हरियाणा के मेजर जनरल स्वरूप सिंह कालान, मेजर रणजीत सिंह दयाल तथा लेफ्टि. जनरल के.के. सिंह को महावीर चक्र से सम्मानित किया। इसी युद्ध में सूबेदार खजान सिंह स्कवार्डन लीडर तेज प्रकाश सिंह गिल, सूबेदार पाले राम, सेवादार छोटूराम तथा हवलदार लहणा सिंह को वीर चक्र से अलंकृत किया गया। भारत माँ के लिए शहादत देने के लिए एस.पी.वर्मा, नायक रामकुमार, लांस हवलदार उमराव सिंह, रायफलमैन माथन सिंह, नायक जगदीश सिंह, सूबेदार नन्दकिशोर को मरणोपरान्त वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में भी हरियाणा के शूरवीरों का योगदान बड़ा अहम् रहा, जिसमें दस डोगरा के कैप्टन देवेन्द्र सिंह अहलावत व इंजीनियर के मेजर विजय रत्न चैधरी को मरणोपरान्त महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। इसी युद्ध में दुश्मन से लोहा लेते हुए अपना जीवन न्यौछावर करने वाले लेफ्टि. करतार सिंह अहलावत, लेफ्टि. हवासिंह, कैप्टन कुलदीप सिंह राठी, नायब सूबेदार उमेद सिंह, मेजर हरपाल सिंह, हवलदार दयानंद राम, लांस नायक अभेराम, सी.एच.एम. किशन सिंह, नायक महेन्द्र सिंह और बी.एस.एफ. के नायक उमेद सिंह व सहायक कमांडेंट नफे सिंह दलाल को मरणोपरान्त वीर चक्र से अलंकृत किया गया। इसी युद्ध में अपने शौर्य का अद्भूत प्रदर्शन करने वाले लेफ्टि. जनरल के.के. सिंह, कमोडोर ब्रजभूषण यादव, सी.मैन चमन सिंह को महावीर चक्र से सुशोभित किया गया। इनके अलावा युद्ध में दुश्मन को छठी का दूध याद दिलाने के लिए मेजर अमरीक सिंह, ग्रेनेडियर अमृत, लेफ्टि. कमाण्डर इन्द्र सिंह, फ्लाईग आॅफिसर जय सिंह अहलावत, मेहर शेर सिंह, हवलदार खजान सिंह, स्क्वार्डन लीडर जीवा सिंह, सवार जयसिंह, गर्नर टेकराम, कमोडोर विजय सिंह शेखावत को वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
सन् 1999 में भारत ने कारगिल में घुसपैठ करने का दुःसाहस किया तो भारत माँ के लालों ने ‘कारगिल आॅपे्रशन विजय’ के तहत पाकिस्तानी घुसपैठियों को पीठ दिखाकर भागने के लिए विवश कर दिया। भारत माँ क इन लालों में हरियाणा की पावन मिट्टी में जन्में अनेक शूरवीर शामिल थे। ‘कारगिल आॅप्रेशन विजय’ 21 मई से 14 जुलाई, 1999 तक चला। इसमें कुल 348 शूरवीरों ने शहादत दी, जिनमें हरियाणा के 80 रणबांकुरे शामिल थे। हरियाणा के रणबांकुरों ने देश की आन-बान और शान के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने में तनिक भी संकोच नहीं किया। इसकी पुष्टि इसी तथ्य से हो जाती है कि इस युद्ध में 17 जाट के 12 जवान तथा 18 गे्रनेडियर के 12 जवान एक ही दिन में शहीद हुए।
‘कारगिल आॅप्रेशन विजय’ में भिवानी जिले के जवानों ने सर्वाधिक शहादतें दीं। इसके बाद महेन्द्रगढ़ के दस, फरीदाबाद के बारह, रोहतक के दस, फरीदाबाद के सात, रेवाड़ी के छह, गुड़गाँव के पाँच तथा शेष अन्य जिलों के जवानों की शहादतें दर्ज हुईं। ‘कारगिल आॅप्रेशन विजय’ में अद्भूत शौर्य प्रदर्शन करने वाले लेफ्टि. बलवान सिंह को महावीर चक्र और सूबेदार रणधीर सिंह व लांस हवलदार रामकुमार को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया। इनके अलावा हवलदार हरिओम, नायक समुन्द्र सिंह, नायक बलवान सिंह, लांस नायक रामकुमार, सिपाही सुरेन्द्र सिंह तथा लांस हवलदार बलवान सिंह को सेना मेडल से अलंकृत किया गया। इन सब युद्धांे के अलावा आतंकवाद से लोहा लेने में भी हरियाणा के वीरों की अह्म भूमिका रही है, जिसमें मुख्य रूप से सेकिण्ड लेफ्टि. राकेश सिंह व मेजर राजीव जून के नाम सर्वोपरि स्थान पर आते हैं। ये दोनों वीर योद्धा 22 गे्रनेडियर रेजीमेंट के थे और दोनों को अशोक चक्र से मरणोपरान्त सम्मानित किया गया। ‘हरियाणा वीर एवं शहीदी दिवस’ देश पर तन-मन-धन अर्पण करने वाले और अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सभी जाने-अनजाने वीरों, सूरमाओं, रणबांकुरों और शहीदों को कोटिशः सादर नमन।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक हैं।) 

 (राजेश कश्यप)
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राजेश कश्यप
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रविवार, 4 सितंबर 2016

गुरू की महिमा अपार

5 सितम्बर/शिक्षक दिवस विशेष
गुरू की महिमा अपार
-राजेश कश्यप



गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
अर्थात, गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
गुरू यानी शिक्षक की महिमा अपार है। उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वेद, पुराण, उपनिषद, गीता, कवि, सन्त, मुनि आदि सब गुरू की अपार महिमा का बखान करते हैं। शास्त्रों में ‘गु का अर्थ ‘अंधकार या मूल अज्ञान और ‘रू का अर्थ ‘उसका निरोधक बताया गया है, जिसका अर्थ ‘अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला अर्थात अज्ञान को मिटाकर ज्ञान का मार्ग दिखाने वाला ‘गुरू होता है। गुरू को भगवान से भी बढ़कर दर्जा दिया गया है। सन्त कबीर कहते हैं:-
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय।।
अर्थात, गुरू और गोविन्द (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए, गुरू को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरू के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम है, जिनकी कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
इसके साथ ही संत कबीर गुरू की अपार महिमा बतलाते हुए कहते हैं:
सतगुरु सम कोई नहीं, सात दीप नौ खण्ड।
तीन लोक न पाइये, अरु इकइस ब्रह्मणड।।
अर्थात, सात द्वीप, नौ खण्ड, तीन लोक, इक्कीस ब्रहाण्डों में सद्गुरु के समान हितकारी आप किसी को नहीं पायेंगे।
संत शिरोमणि तुलसीदास ने भी गुरू को भगवान से भी श्रेष्ठ माना है। वे अपनी कालजयी रचना रामचरितमानस में लिखते हैं:
गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
जों बिरंचि संकर सम होई।।
अर्थात, भले ही कोई ब्रह्मा, शंकर के समान क्यों न हो, वह गुरु के बिना भव सागर पार नहीं कर सकता।
संत तुलसीदास जी तो गुरू/शिक्षक को मनुष्य रूप में नारायण यानी भगवान ही मानते हैं। वे रामचरितमानस में लिखते हैं:
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबिकर निकर।।
अर्थात्, गुरू मनुष्य रूप में नारायण ही हैं। मैं उनके चरण कमलों की वन्दना करता हूँ। जैसे सूर्य के निकलने पर अन्धेरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही उनके वचनों से मोहरूपी अन्धकार का नाश हो जाता है।
गुरू हमारा सदैव हितैषी व सच्चा मार्गदर्शी होता है। वह हमेशा हमारे कल्याण के बारे में सोचता है और एक अच्छे मार्ग पर चलने की पे्ररणा देता है। गुरू चाहे कितना ही कठोर क्यों न हो, उसका एकमात्र ध्येय अपने शिक्षार्थी यानी शिष्य का कल्याण करने का होता है। गुरू हमें एक सच्चा इंसान यानी श्रेष्ठ इंसान बनाता है। हमारे अवगुणों को समाप्त करने की हरसंभव कोशिश करता है। इस सन्दर्भ में संत कबीर ने लाजवाब अन्दाज में कहा है:
गुर कुम्हार शिष कुम्भ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।
अर्थात, गुरू एक कुम्हार के समान है और शिष्य एक घड़े के समान होता है। जिस प्रकार कुम्हार कच्चे घड़े के अन्दर हाथ डालकर, उसे अन्दर से सहारा देते हुए हल्की-हल्की चोट मारते हुए उसे आकर्षक रूप देता है, उसी प्रकार एक गुरू अपने शिष्य को एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व में तब्दील करता है।
महर्षि अरविंद शिक्षक की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि ‘अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्हें सींच-सींच कर महाप्राण शक्तियाँ बनाते हैं। साईं बाबा कहते थे कि, ‘ अपने गुरु में पूर्ण रूप से विश्वास करें. यही साधना है.’ प्रख्यात दर्शनशास्त्री अरस्तु कहते हैं कि ‘जन्म देने वालों से अच्छी शिक्षा देेने वालों को अधिक सम्मान दिया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने तो बस जन्म दिया है, पर उन्होंने जीना सिखाया है। अलेक्जेंडर महान का कहना था कि मैं जीने के लिए अपने पिता का ऋणी हूँ, पर अच्छे से जीने के लिए अपने गुरू का।
सन्त कहते हैं कि गुरु के वचनों पर शंका करना शिष्यत्व पर कलंक है। जिस दिन शिष्य ने गुरु को मानना शुरू किया उसी दिन से उसका उत्थान शुरू शुरू हो जाता है और जिस दिन से शिष्य ने गुरु के प्रति शंका करनी शुरू की, उसी दिन से शिष्य का पतन शुरू हो जाता है। सद्गुरु एक ऐसी शक्ति है जो शिष्य की सभी प्रकार के ताप-शाप से रक्षा करती है। शरणा गत शिष्य के दैहिक, दैविक, भौतिक कष्टों को दूर करने एवं उसे बैकुंठ धाम में पहुंचाने का दायित्व गुरु का होता है। इसलिए हमें अपने गुरू का पूर्ण सम्मान करना चाहिए और उनके द्वारा दिए जाने वाले ज्ञान का भलीभांति अनुसरण करना चाहिए। कोई भी ऐसा आचरण कदापि हीं करना चाहिए, जिससे गुरू यानी शिक्षक की मर्यादा अर्थात छवि को धक्का लगता हो। इस सन्दर्भ में महर्षि मनु अपनी अमर कृति में बतलाते हैं:
गुरू के समीप एक शिष्य का आसन सर्वदा अपने गुरू की अपेक्षा नीचे होना चाहिए। गुरू की पीठ पीछे बुराई या निन्दा न करें और न ही उनके किसी आचरण या वकतव्य की नकल करें। गुरू की अनुपस्थिति में शिष्य को अपने गुरू का नाम शिष्टतापूर्वक लेना चाहिए और गुरू की बुराई जहां कहीं भी हो रही हो, वह या तो वहां से चला जााए, या फिर कानों में उंगली डाल डाल ले। गुरू जहां कहीं भी मिलें, निष्ठापूर्वक शिष्य को अपने गुरू के चरण-स्पश्र करने चाहिएं।
अगर आज के सन्दर्भ में गुरू-शिष्य के सम्बंध देखें तो बड़ा दुःख होता है। बेहद विडम्बना का विषय है कि आज गुरू-शिष्य के बीच वो मर्यादित एवं स्नेहमयी सम्बंध देखने को सहज नहीं मिलते हैं, जो अतीत में भारतीय संस्कृति की पहचान होते थे। इसके कारण चाहे जो भी हों। लेकिन, हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि जब तक गुरू के प्रति सच्ची श्रद्धा व निष्ठा नहीं होगी, तब तक हमें सच्चे ज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी और हमें सद्मार्ग कभी हासिल नहीं होगा। इसी सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण अलौकिक कृति गीता में अपने सखा अर्जुन को सुझाते हुए कहते हैं:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यिा माम शुचः ।।
अर्थात् सभी साधनों को छोड़कर केवल नारायण स्वरूप गुरु की शरणगत हो जाना चाहिए। वे उसके सभी पापों का नाश कर देंगे। शोक नहीं करना चाहिए।

(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

स्थायी सम्पर्क सूत्र :
राजेश कश्यप
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मंगलवार, 2 अगस्त 2016

प्रतिभा का पैमाना अंग्रेजी क्यो?

मुद्दा /
प्रतिभा का पैमाना अंग्रेजी क्यो?
-राजेश कश्यप

‘‘हमारा देश भी अजीब है यार! मतलब अपनी भाषा की कद्र ही नहीं है, जिसको देखो अंगे्रजीपंती झाड़ रहा है। अंग्रेजी नहीं आती तो मतलब कुछ नहीं आता? ये जो जापानी, चीनी, रशियन, जर्मन हैं, इन लोगों को गर्व है अपनी भाषा पर। वे प्यार करते हैं अपनी भाषा से। इनके स्टूडैन्टस, साईंटिस्ट, नेता हों, सब अपनी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। इनके नेता छोड़ो, अपने ले लो। जिस देश में सिर्फ अंग्रेजी बोली और समझी जाती है, वहां पर भी हिन्दी में सीना ठोंक कर भाषण दिया है। ये तो कुछ लोगों ने चलन बना दिया है कि जो अंगे्रजी झाड़ेगा, वही झंडे गाड़ेगा। अंगे्रजी बोलो, लेकिन उसे दीवार मत बनाओ यार! जब हुनर चमकता है तो यह अंग्रेजीपंती फीकी पड़ जाती है।’’ यह अनूठा सन्देश है जाने माने हास्य अभिनेता कपिला शर्मा के वायरल हुए विडियो का। दो मिनट तीन सैकिण्ड के ‘अंग्रेजीपंती को अंगूठा’ शीर्षक से वायरल हुआ हुए इस  विडियो के जरिए अभिनेता कपिल शर्मा के हिन्दी के प्रति इन भावनाओं और जज्बातों को अनूठा इजहार किया और जहां हिन्दी के सम्मान को ठेस पहुंचाने वालों की जमकर खबर ली है, वहीं अप्रत्यक्ष रूप से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा हाल ही में विदेश यात्राओं के दौरान हिन्दी में भाषण देने की जमकर तारीफ भी की है। हास्य अभिनेता का हिन्दी के सम्मान में इस विडियो के जरिए किया गया करारा कटाक्ष एकदम सटीक, तथ्यपरक एवं सराहनीय है। जो लोग हिन्दी होकर भी हिन्दी का अपमान करते हैं, उन्हें कपिल शर्मा ने बेहद अनूठे ढ़ंग से झाड़ा है और हिन्दी पर गर्व करने की पैरवी की है। 
अंग्रेजी को प्रतिभा का पैमाना समझने का दर्द भले ही आज कपिल शर्मा के जरिए चर्चित हुआ है। लेकिन, इस दर्द से हमारे देश की असंख्य प्रतिभाएं लंबे समय से जूझ रही हैं। विडम्बना देखिए कि देश की सबसे सर्वोच्च संस्था ‘संघ लोकसेवा आयोग’ (यूपीएससी) में भी प्रतिभा का पैमाना अंग्रेजी ही बना हुआ है। पिछली यूपीए सरकार के दौरान संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) की आईएएस, आईपीएस, आईएफएस एवं आईआरएस आदि की परीक्षा के नवीनतम संशोधन के तहत अंग्रेजी भाषा की परीक्षा को अनिवार्य कर दिया गया। केवल इतना ही नहीं, अब अंग्रेजी भाषा के अंक भी मैरिट सूची में जोड़े जाने का प्रावधान भी बनाया गया। इससे पहले अंगे्रजी के साथ-साथ किसी एक भारतीय भाषा की परीक्षा में न्यूनतम अंक पाना अनिवार्य था और उनके अंक मैरिट सूची में नहीं जुड़ते थे। परीक्षा पद्धति में हुए इन बदलावों को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपनी स्वीकृति दे थी। जैसे इस परीक्षा पद्धति के बदलावों का समाचार आया, सियासी गलियारों से लेकर आम आदमी तक खलबली मच गई। इस तरह अंग्रेजी को प्राथमिकता देने से निश्चित तौरपर हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के हितों पर कुठाराघात हुआ। 
स्वतंत्रता प्राप्ति के तीन दशक से अधिक समय तक तो लोकसेवा आयोग परीक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी ही रहा। भारी विरोध एवं आक्रोश के बाद बाद ही अन्य विकल्प जोड़े गए। वर्ष 1977 में डॉ . दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित हुआ, जिसने संघ लोक सेवा आयोग तथा कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग आदि के  दृष्टिगत यह सिफारिश की थी कि परीक्षा का माध्यम भारत की प्रमुख भाषाओं में से कोई भी भाषा हो सकती है। वर्ष 1979 में संघ लोक सेवा आयोग ने कोठारी आयोग की सिफारिशों को लागू किया और भारतीय प्रशासनिक आदि सेवाओं की परीक्षा के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में से किसी भी भारतीय भाषा को परीक्षा का माध्यम बनाने की छूट दी गई। इसका लाभ उन उम्मीदवारों को मिलना सम्भव हुआ जो गाँव-देहात से सम्बन्ध रखते थे, अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ़ सकते थे और अनूठी प्रतिभा एवं योग्यता होते हुए भी अंग्रेजी के अभिशाप से अभिशप्त थे। 
वर्ष 2008 से मुख्य परीक्षा में अंगे्रजी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रश्रपत्रों को अनिवार्य किया गया। इसके बावजूद अंग्रेजीयत दुर्भावना का कुचक्र समाप्त नहीं हुआ। अंग्रेजी प्रश्रपत्रों को हिन्दी में इस प्रकार से अनुवादित किया गया कि हिन्दी परीक्षार्थियों के लिए उसे समझना टेढ़ी खीर साबित हो जाये। वर्ष 2011 में लोकसेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा में एक बड़ा बदलाव करते हुए वैकल्पिक विषय को हटाकर सामान्य अध्ययन के दो अनिवार्य प्रश्रपत्र शुरू किये। इनसें से एक प्रश्रपत्र पूर्णतरू सामान्य अध्ययन का है तो दूसरे पत्र को ‘सीसैट’ की संज्ञा दी गई। इस ‘सीसैट’ का मतलब है ‘सिविल सर्विस एप्टीट्यूड टैस्ट’। ‘सीसैट’ में कुल 80 प्रश्रों में से 40 प्रश्र गद्यांश (कान्प्रहेंसिव) के होते हैं। इन गद्यांशों का हिन्दी अनुवाद शक एवं षडयंत्र के दायरे में हैं। इस हिन्दी अनुवाद को समझने में बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छूट जाते हैं। इसके चलते हिन्दी भाषी प्रतिभाओं का पिछडना स्वभाविक है। जबसे ‘सीसैट’ प्रणाली लागू की गई है, हिन्दी माध्यम के प्रतियोगी निरन्तर हाशिये पर खिसकते चले गये।
आंकड़ों के नजरिये से देखें तो ‘सीसैट’ लागू होने से पहले सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले हिन्दी भाषी प्रतियोगियों का प्रतिशत दस से अधिक ही होता था। वर्ष 2009 में तो यह 25.4 प्रतिशत तक जा पहँुचा था। लेकिन, वर्ष 2013 में यह प्रतिशत घटकर मात्र 2.3 पर आ गया। जबकि, इसके विपरीत इंजीनियरिंग एवं मैनेजमैंट की अंग्रेजी पृष्ठभूमि के प्रतियोगियों का एकछत्र साम्राज्य स्थापित होता चला गया। इस तथ्य की पुष्टि करने वाले आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011 में मुख्य परीक्षा में बैठने वाले प्रतियोगियों का प्रतिशत 82.9 और वर्ष 2012 में 81.8 प्रतिशत था। वर्ष 2009 की प्रारंभिक परीक्षा में सफल होने वाले कुल 11,504 परीक्षार्थियों में से 4,861 हिन्दी माध्यम के थे। इसी तरह वर्ष 2010 में मुख्य परीक्षा देने वाले कुल 11,865 में 4,194 हिन्दी भाषा के परीक्षार्थी थे। जबकि वर्ष 2010 में मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 11,237 परीक्षार्थियों में से हिन्दी के मात्र 1,700 परीक्षार्थी ही थे, वहीं अंगे्रजी के परीक्षार्थियों की संख्या 9,316 थी। वर्ष 2012 की मुख्य परीक्षा में शामिल होने वाले कुल 12,157 परीक्षार्थियों में से जहां अंग्रेजी के 9,961 परीक्षार्थी थे तो वहीं हिन्दी के मात्र 1,976 ही थे। इसके साथ ही वर्ष 2013 में सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण कुल 1122 प्रतियोगियों में से हिन्दी भाषा के छात्रों की संख्या मात्र 26 ही थी। 
आंकड़ों से स्पष्ट है कि ‘सीसैट’ लागू होने से पूर्व संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में उत्तरोत्तर हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थियों की संख्या में निरन्तर इजाफा हो रहा था। हिन्दी माध्यम से उच्चाधिकारी बनने वालों ने स्वयं को साबित करके दिखाया है कि वे अंगे्रजी वालों से किसी भी मामले में कमत्तर नहीं हैं। ऐसे में जब हिन्दी माध्यम वाले युवा अंगे्रजी वालों से किसी मायने में कम नहीं हैं तो फिर उनकों राष्ट्र सेवा से क्यों वंचित करने की कोशिश की जा रही है? 
सर्वविद्यित है कि देश में सत्तर फीसदी से अधिक लोग गाँव-देहात में निवास करते हैं और अत्यन्त गरीबी का जीवन जीते हैं। वे अपने बच्चों को बड़ी मुश्किल से सरकारी स्कूलों में पढ़ा पाते हैं। देश के सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत किसी से छिपी हुई नहीं है। बच्चों को समुचित संसाधनों के अभावों के बावजूद पढने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कुछ लोग कर्ज लेकर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए शहरों में भेजते हैं और आर्थिक मजबूरियों के चलते अंगे्रजी संस्थानों और कोचिंग सैन्टरों में नहीं भेज पाते हैं। इन सब विपरित परिस्थितियों के बावजूद एक आम आदमी का बालक यदि अपनी मातृभाषा अथवा राष्ट्रभाषा के माध्यम से उच्चाधिकारी बनने का संपना संजोता है और अपनी अटूट मेहनत और अनूठी प्रतिभा के बल पर अपना लक्ष्य हासिल करने की कोशिश करता है तो उसकी कोशिशों और सपनों पर पानी क्यों फेरा जाता है? 
विडम्बना का विषय है कि लार्ड मैकाले के दावे को आज भी हम चुनौती देने में सक्षम नहीं हो पाये हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि हम ऐसा भारत बना देंगे, जो रंग-रूप में तो भारतीय होगा, लेकिन भाषा और संस्कार में अंग्रेजीयत का गुलाम होगा। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी नई केन्द्र सरकार से तब नई उम्मीदों ने जन्म लिया, जब उसने हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय भाषाओं को पूर्ण मान-सम्मान देने का संकल्प लिया। सरकार के सभी विभागों में हिन्दी को प्राथमिकता देने के आदेश भी जारी किये गये। इसी से उत्साहित होकर यूपीएससी की परीक्षा में बैठने वाले हिन्दी भाषी प्रतियोगियों ने ‘सीसैट’ के खिलाफ आवाज बुलन्द की और परीक्षा प्रणाली में बदलाव की मांग की। इसके मद्देनजर सरकार ने अरविन्द वर्मा कमेटी गठित कर दी। आज यक्ष प्रश्र यह है कि आखिर अंग्रेजी को प्रतिभा का पैमाना कब तक समझा जाता रहेगा और हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को कब तक उपेक्षा का शिकार बनाया जाता रहेगा? 
(राजेश कश्यप)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।
स्थायी सम्पर्क सूत्र: 
राजेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक
म.नं. 1229, पाना नं. 8, नजदीक शिव मन्दिर,
गाँव टिटौली, जिला. रोहतक
हरियाणा-124005
मोबाईल. नं. 09416629889

(लेखक परिचय: हिन्दी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में द्वय स्नातकोत्तर। दो दशक से सक्रिय समाजसेवा व स्वतंत्र लेखन जारी। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में दो हजार से अधिक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। दर्जनों वार्ताएं, परिसंवाद, बातचीत, नाटक एवं नाटिकाएं आकाशवाणी रोहतक केन्द्र से प्रसारित। कई विशिष्ट सम्मान एवं पुरस्कार हासिल।)