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बुधवार, 21 दिसंबर 2011

जंग-ए-आजादी के नायाब महायोद्धा थे सरदार उधम सिंह


113वीं जयन्ति पर विशेष

जंग-ए-आजादी के नायाब महायोद्धा थे सरदार उधम सिंह

-राजेश कश्यप
शहीद उधम सिंह

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मिटने वालों का, बाकी यहीं निशां होगा।
ये पंक्तियां उन असंख्य जाने-अनजाने शूरवीर देशभक्त शहीदों के प्रति कृतज्ञता व सम्मान की प्रतीक हैं, जिन्होंने, देशी की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया और हंसते-हंसते अपने प्राणों की कुर्बानी तक दे गए। ऐसे ही महान शूरवीर देशभक्त शहीदों में ‘जंग-ए-आजादी’ के महायोद्धा सरदार उधम सिंह का नाम भी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। जब भी देश के अमर क्रांतिकारियों और शहीदों का जिक्र होता है तो उसमें शहीद उधम सिंह का नाम बड़ी शान से लिया जाता है। शहीद उधम सिंह ने आजीवन देश की आजादी के लिए संघर्ष किया और 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड का बदला लेकर हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमा। इस अमर शहीद का जन्म 26 दिसम्बर, 1899 को पंजाब के सुनाम गाँव में सरदार टहल सिंह के घर हुआ था। हालांकि टहल सिंह का शुरूआती नाम चुहड़ सिंह था। लेकिन, अमृत छकने के बाद उनका नाम टहल सिंह पड़ा। उनका पैतृक व्यवसाय खेतीबाड़ी था। लेकिन, उससे परिवार का गुजारा चल नहीं पा रहा था। इसलिए सरदार टहल सिंह ने पड़ौसी गाँव उपाल में रेलवे क्रासिंग पर चौकीदारी की नौकरी करने को मजबूर होना पड़ा। कहने का अभिप्राय सरदार उधम सिंह का जन्म एक अति साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम शेर सिंह था। उनके बड़े भाई का नाम मुक्ता सिंह था।

शहीद उधम सिंह का पैतृक घर 
शहीद उधम सिंह का बचपन भी बड़ा कष्टपूर्ण रहा। जब वे मात्र 12 वर्ष के थे, तो वर्ष 1901 में उनकीं माता जी का स्नेहमयी आंचल छिन गया और कुछ ही समय बाद वर्ष 1907 में उनके सिर से पिता का साया भी हमेशा के लिए उठ गया। अब वे इस दुनिया में एकदम अकेले और अनाथ हो गए। बचपन में ही उनकी दुनिया उजड़ गई थीं। ऐसे में उन्हें भाई किशन सिंह रागी का सहारा मिला और उन्होंने दोनों भाईयों को अमृतसर के खालसा अनाथालय में भर्ती करवा दिया। यहां पर दोनों भाईयों को नए नाम मिले। बालक शेर सिंह को उधम सिंह और मुक्ता सिंह को साधु सिंह नाम मिला। वर्ष 1917 में उनके बड़े भाई का भी निधन हो गया। अब तो अनाथ उधम सिंह पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। अनाथालय में रहते हुए बालक उधम सिंह ने जैसे तैसे वर्ष 1918 में दसवीं की परीक्षा पास की। इससे आगे वे कुछ सोचते, अगले ही वर्ष 1919 में उनके जीवन में एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया।
13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी वाले दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में पंजाब कांगेस के शीर्ष नेता डा. सैफुद्दीन किचलू व सत्यपाल की गिरफ्तारी और रोलट ऐक्ट के विरोध में लगभग 20 हजार लोग इक्कठा हुए, जिससे अंग्रेजी सरकार के माथे पर पसीना आ गया। तभी पंजाब के तत्कालीन गर्वनर माइकल ओ डायर के आदेश पर जनरल हैरी डायर ने बन्दूकों से लैस 90 से अधिक सैनिकों और दो बख्तरबंद गाड़ियों के साथ जलियांवाला बाग में प्रवेश किया और सभा में शांतिपूर्ण ढ़ंग से बैठे लोगों, महिलाओं और मासूम बच्चों पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। जब तक कोई कुछ समझ पाता चारों तरफ लाशों के ढ़ेर, मासूम बच्चों की चित्कार और घायलों की करूणामयी चित्कार का आलम स्थापित हो चुका था। 
अंग्रेजों की इस दमनात्मक कार्यवाही में आधिकारिक तौरपर 379 लोग मारे गए और जलियांवाला बाग में स्थापित सूचना पट्ट के अनुसार 120 लोगों के शव तो कुएं से ही मिले, जोकि जान बचाने के लिए उसमें कूद गए थे। पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार जलियांवाला बाग में कम से कम 1300 लोग शहीद हुए थे। जबकि स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार यह आंकड़ा 1500 को पार कर गया था। इसी घटना के सन्दर्भ में अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डाक्टर स्मिथ के अनुसार इस हत्याकाण्ड में मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी। कुल मिलाकर हजारों निर्दोष लोगों, महिलाओं और मासूम बच्चों को जनरल डायर ने देखते ही देखते मौत की नींद सुला दिया।
जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। क्रांतिकारियों के खून में आग लग गई। आक्रोश की ज्वाला हर देशवासी के दिल में धधक उठी। यह हत्याकाण्ड उधम सिंह ने अपनी आंखों से देखा। उस समय वे इक्कठा हुई भीड़ को अनाथालय के साथियों के साथ पानी पिलाने का काम कर रहे थे। यह हत्याकाण्ड देखकर नवयुवक उधम सिंह का खून भी खौल उठा। उन्होंने उसी समय जलियांवाला बाग की मिट्टी उठाई और अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में ले जाकर शपथ ली, कि जब तक इस नरसंहार के असली गुनहगार को मौत को भी मौत की नींद नहीं सुला दूंगा, तब तक चैन से नहीं बैठूंगा।
उधम सिंह ने इस हत्याकाण्ड का असली गुनहगार पंजाब के तत्कालीन गर्वनर माइकल ओ डायर को माना, क्योंकि उसी के आदेश पर यह जनसंहार हुआ था। अब उधम सिंह का जनरल डायर को मौत की नींद सुलाने का प्रमुख मिशन बन गया था। अपने इस मिशन को पूरा करने के लिए उधम सिंह अनाथालय को छोड़कर स्वतंत्रता आन्दोलन के समर में कूद पड़े। उन्होंने देश के क्रांतिकारियों से सम्पर्क साधना शुरू कर दिया। वर्ष 1920 में वे अफ्रीका जा पहुंचे। वर्ष 1921 में नैरोबी के रास्ते संयुक्त राज्य अमेरिका जाने का भरसक प्रयत्न किया, लेकिन वीजा न मिलने के कारण कामयाबी हाथ नहीं लगी और उन्हें स्वदेश लौटना पड़ा। लेकिन, निरन्तर प्रयासों के बाद अंतत: वे वर्ष 1924 में अमेरिका पहुंचने में कामयाब हो गए। वे अमेरिका में सक्रिय गदर पार्टी में शामिल हो गए और क्रांतिकारियों से सम्पर्क मजबूत बनाते चले गए। उन्होंने फ़्रांस, इटली, जर्मनी, रूस आदि कई देशों की यात्राएं करके क्रांतिकारियों से मजबूत संबंध बनाए। वे वर्ष 1927 में पुन: स्वदेश लौटे। यहां पर उन्होंने शहीदे आजम भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों से मुलाकात की। स्वदेश लौटने के मात्र तीन माह बाद ही वे अवैध हथियारों और प्रतिबन्धित क्रांतिकारी साहित्य के साथ पुलिस की गिरफ्त में आ गए। उन्हें 5 वर्ष की कठोर कैद की सजा हुई। 
वर्ष 1931 में उधम सिंह जेल से रिहा हुए। रिहा होने के उपरांत उधम सिंह अपने गाँव सुनाम में लौट आए। गाँव में आने के बाद थाने में प्रतिदिन हाजिरी देने के नाम पर उन्हें कई तरह की प्रताड़ओं को झेलना पड़ा। पुलिस उन पर कड़ी नजर रख रही थी। इससे बचने के लिए वे अमृतसर में आ गए और अपना नाम बदलकर मोहमद सिंह आजाद रख लिया। यहां पर उन्होंने साईन बोर्ड पेंट करने की दुकान खोल ली। उधम सिंह वर्ष 1933 में पुलिस को चकमा देने में कामयाब हो गए और कश्मीर जा पहुंचे। इसके बाद वे जर्मनी होते हुए इटली जा पहुंचे। इटली में कुछ माह के बाद फ़्रांस, स्विटजरलैण्ड और आस्ट्रिया होते हुए वर्ष 1934 में अपने मिशन को पूरा करने के लिए इंग्लैण्ड पहुंचने में कामयाब हो गए।
वर्ष 1938 में लन्दन के शेफ़र्ड बुश गुरुद्वारा में लंगर सेवा के दौरान रोटी बनाते शहीद उधम सिंह
इंग्लैण्ड पहुचंकर उधम सिंह पूर्वी लन्दन की एडरल स्ट्रीट में एक किराए का मकान लेकर रहने लगे। यहां रहकर उन्होंने जनरल डायर को मारने की अचूक तैयारियां शुरू कर दीं और मौके की तलाश करने लगे। उनकीं यह तलाश वर्ष 1940 में जाकर पूरी हुई। जब उधम सिंह को पता चला कि 13 मार्च, 1940 को लन्दन के कैक्सटन हॉल में ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन और रायल सेन्ट्रल एशियन सोसायटी का संयुक्त अधिवेशन होने जा रहा है और उसमें जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड के वास्तविक गुनहगार माइकल ओ डायर बतौर वक्ता आमंत्रित हैं तो मौके की बाट जोह रहे उधम सिंह एकदम जोश से भर उठे। उधम सिंह ने गोलियों से भरा पिस्तोल लिया और एक मोटी पुस्तक के अन्दर उसकी आकृति के अनुसार पृष्ठ काट डाले। फिर वे पुस्तक के अन्दर इस पिस्तोल को छुपाकर समय से पहले ही पूरी तैयारी के साथ अधिवेशन स्थल की दर्शक दीर्घा में जा बैठे।
अधिवेशन में जैसे ही माइकल ओ डायर ने मंच पर आकर अपना वकतव्य देना शुरू किया, 21 सालों से सीने में प्रतिशोध की धधकती ज्वाला को दबाए बैठे उधम सिंह ने तुरन्त पुस्तक से अपना पिस्तोल निकाला और देखते ही देखते अन्धाधुन्ध छह राउण्ड गोलियां दाग दीं। उधम सिंह के इस अचूक हमले से हर कोई सन्न और स्तब्ध रह गया। अगले ही पल मंच का नजारा बदल चुका था। दो गलियां जलियांवाला बाग के हजारों लोगों के हत्यारे जनरल माइकल ओ डायर का सीना छलनी करके मौत की नींद सुला चुकीं थीं। मंच पर सर लुईस और लार्ड लेंमिगटन के अलावा जेटलेंड भी गोलियां लगने से घायलावस्था में चीख रहे थे और सभा में भयंकर भगदड़ मची हुई थी। लेकिन, भारत माता का वीर सपूत उधम सिंह गर्व और शौर्य भरा सीना ताने विजयी भाव से भरा निडरता के साथ खड़ा था। उन्होने वहां से भागने की तनिक भी कोशिश नहीं की।
महान क्रांतिकारी और देशभक्त उधम सिंह को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। 1 अप्रैल, 1940 को उन पर औपचारिक रूप से हत्या का मुकदमा शुरू किया गया। इसी बीच उधम सिंह ने जेल में भूख हड़ताल शुरू कर दी। उन्होंने 42 दिन तक भूख हड़ताल जारी रखी। उन्हें जबरदस्ती तरल पदार्थ दिया गया। अंतत: ब्रिटिश जज एटकिंसन ने त्वरित अदालती कार्यवाही करते हुए भारत माता के वीर सपूत उधम सिंह को सजा-ए-मौत का फरमान जारी कर दिया। इस सजा को सुनकर वीर क्रांतिकारी उधम सिंह को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। उन्होंने अपने अंतिम उद्गार प्रकट करते हुए कहा-"मैं परवाह नहीं करता, मर जाना कोई बुरी बात नहीं है। क्या फायदा है, यदि मौत का इंतजार करते हुए हम बूढ़े हो जाएं? ऐसा करना कोई अच्छी बात नहीं है। यदि हम मरना चाहते हैं तो युवावस्था में मरें। यही अच्छा है और यही मैं कर रहा हूँ। मैं अपने देश के लिए मर रहा हूँ।" अपने इन अमूल्य उद्गारों के साथ भारत माँ का यह नायाब योद्धा 31 जुलाई, 1940 को लन्दन की पेंटविले जेल में हंसता-हंसता फांसी के फंदे पर झूल गया। इस महान शहीद को इसी जेल के अहाते में दफना दिया गया।
भारत माँ के इस अनूठे लाल की शहादत को देशभर में सलामी दी गई। नेता जी सुभाषचन्द्र बोस सरीखे महान क्रांतिकारियों ने शहीद उधम सिंह के अमूल्य बलिदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। सत्तर के दशक में शहीद उधम सिंह के अवशेषों को लाने की कवायद शुरू की गई। पंजाब के सुल्तानपुर लोधी के विधायक सरदार साधु सिंह थिण्ड के अथक प्रयासों और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी की विशेष रूचि के बाद इंग्लैण्ड ने शहीद उधम सिंह के अवशेष देना स्वीकार किया। भारत सरकार के विशेष दूत के रूप में सरदार साधु सिंह थिण्ड जुलाई, 1974 में लन्दन पहुंचे और इंग्लैण्ड सरकार से शहीद उधम सिंह के अवशेष प्राप्त करके स्वदेश लौटे। जंग-ए-आजादी के इस पराक्रमी महायोद्धा उधम सिंह की अस्थियों के स्वागत के लिए हवाई अड्डे पर तत्कालीन कांगे्रस अध्यक्ष शंकर दयाल शर्मा, पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह सहित देश की कई नामी हस्तियां मौजूद थीं। शहीद उधम सिंह का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गाँव सुनाम (पंजाब) में किया गया और उनकीं अस्थियों को पूरे राजकीय सम्मान के साथ सतलुज में प्रवाहित किया गया।
जब जंग-ए-आजादी के नायाब और पराक्रमी क्रांतिकारी उधम सिंह की वीरता को स्मरण किया जाता है तो गर्व से सीना तन जाता है और जब आजादी के चौंसठ सालों के बाद उनके वारिसों की एकदम दयनीय हालत को देखा जाता है तो सिर शर्म के मारे झुक जाता है। दरअसल, आज इन्हीं महान शहीद उधम सिंह के वंशज सरदार जीत सिंह (पौत्र) ईंटे ढ़ोकर, पत्थर तोड़कर और मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का गुजारा करने को मजबूर हैं। बेरोजगारी, बेकारी, गरीबी, बेबसी और बेकद्री के चलते पूरा परिवार अभिशप्त जीवन जीने को विवश है। गरीबी की इंतहा के चलते शहीद उधम सिंह के प्रपौत्र जग्गा सिंह को 11वीं कक्षा पास करने के उपरांत पढ़ाई अधूरी छोड़कर मेहनत मजदूरी करने को विवश होना पड़ा।
मजदूरी करते एवं ईंटे तोड़ते शहीद उधम सिंह के पौत्र जीत सिंह
गत जुलाई माह में राज्यसभा सांसद डा. राम प्रकाश के प्रयासों के बाद हरियाणा के कुरूक्षेत्र जिले में पिपली स्थित पैरीकीट में आयोजित एक सम्मान-समारोह में पहुंचे शहीद उधम सिंह के पौत्र सरदार जीत सिंह और प्रपौत्र जग्गा सिंह की अत्यन्त दयनीय हालत देखकर और मार्मिक उद्गार सुनकर हर किसी का कलेजा मुंह को आ गया और सिर शर्म से झुक गया। शहीद का पौत्र सरदार जीत सिंह समारोह में हल्के रंग का कुर्ता-पायजामा पहने, कुर्ते पर अलग-अलग रंग के बटन लगाए, पैरों में 15-20 रूपये की प्लास्टिक की टूटी चप्पलें पहनें और बेबसी व कांतिहीन चेहरे के साथ आजादी के गीतों पर झूमने वाले हर निवासी को हकीकत का बोध करवा रहा था। जब उनसे अपने दादा के बारे में कुछ बोलने के लिए अनुरोध किया गया तो वे बस यही बोल पाए-"मैं कि बोलना, बोले तो उधम सिंह थे।" शिक्षा के बारे में पूछने पर वे इतना ही बोले कि, "मजदूरी करो और पेट भरो की जुगत में पढ़ाई-लिखाई के बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिला।"
मजदूरी करते एवं ईंटे ढोते शहीद उधम सिंह के पौत्र जीत सिंह 
शहीद उधम सिंह की चौथी पीढ़ी के वंशज जग्गा सिंह के उद्गार तो हर देशवासी को झिंझोड़कर रख देने वाले थे। शहीद के प्रपौत्र जग्गा सिंह का दर्द एकाएक छलक पड़ा और वे यही बोल पाए कि, "गरीबी के कारण ही उसे बीच में पढ़ाई छोड़नी पड़ी है। बड़ा दु:ख होता है कि देश को आजाद कराने के लिए फांसी पर चढ़ने वालों के वंशजों की इस आजाद देश में बेकद्री हो रही है।"
शहीद उधम सिंह के भांजे इंदर सिंह व खुशी नंद के अनुसार परिजनों ने पंजाब के मुख्यमंत्री से पत्र के जरिए गुहार लगाई है कि अमर शहीद उधम सिंह के पैतृक मकान के एक बड़े हिस्से पर पड़ौसियों ने अवैध कब्जा किया हुआ है। लेकिन, सरकार कोई रूचि नहीं ले रही है। एक अन्य जानकारी के अनुसार इससे पहले शहीद के परिवार को पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने शहीद के परिवार को एक सरकारी नौकरी देने का वायदा भी किया था, जोकि सिर्फ वायदा ही बनकर रह गया।
कुल मिलाकर जंग-ए-आजादी के नायाब योद्धा शहीद उधम सिंह को उनकीं 113वीं जयन्ति पर स्मरण करके सीना चौड़ा करने और शाब्दिक गौरवगान करते समय हमें उनके वंशजों की हालत और अपने परम-कत्र्तव्यबोध का भी स्मरण करना चाहिए। हर शहीद की जयन्ति और पुण्यतिथि को मनाते समय इस परंपरा का निर्वहन करना होगा। तभी हम अपने शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि और सच्चे अर्थों में अपनी कृतज्ञता का निर्वहन कर पाएंगे। महान क्रांतिकारी और अमर शहीद सरदार उधम सिंह को कोटि-कोटि नमन। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)